Skip to playerSkip to main content
पिछले एपिसोड में हमने दक्ष की पुत्रियों अदिति और दिति से देवताओं और दानवों के जन्म की गाथा सुनी थी। इस बार, ऋषि मैत्रेय हमें दक्ष की अन्य अद्भुत पुत्रियों और उनकी विविध संतानों के बारे में बताएंगे, जिन्होंने ब्रह्मांड को नागों, गरुड़ों, यक्षों, राक्षसों, अप्सराओं और अनगिनत जीवों से भर दिया। कैसे बनी सृष्टि इतनी विविध और जीवंत? इस विशाल सृष्टि के रहस्यों को जानने के लिए देखें विष्णु पुराण S2 Ep7! #VishnuPurana #HinduMythology #DakshaPrajapati #Nagas #Garuda #Yakshas #Apsaras #MythologicalStories #AncientIndia
Transcript
00:00प्राचीन काल के उन दिव्य अध्यायों का स्मरण करते हुए, रिशी परशुराम ने शांट चित्त से रिशी मैत्रे को स्रिष्टी
00:07के आधिकाल की कथा सुनाना आरंभ किया, जहां ब्रहमांड का भाग्य निर्धारित होना था.
00:14उनकी अमरित्वानी से उद्भुत शब्दों ने उस शांट आश्रम को आलोकित कर दिया, मानो स्वय वेद मंत्र गूंज रहे हों,
00:22और मैत्रे की आखें उद्शुक्ता से चमक उठी.
00:26परशुराम ने कहा, हे मैत्रे इस विशाल ब्रहमांड की रचना परंपिता ब्रहमाने की जहां प्रत्येक तत्व संतुलन और उद्देश के
00:35साथ बुना गया है.
00:37इस स्रिष्टी के व्यवस्थापक, प्रजाप्ती दक्ष, ब्रहमा के मानस पुत्र थे, जिनहें जीवन और वन्ष परंपरा को आगे बढ़ाने का
00:46दिव्यकार्य सौपा गया था.
00:48दक्ष प्रजाप्ती की अनेक पुत्रिया थी, जो सौंदर्य, गुनों और दैविय शक्तियों से परिपूर्ण थी, और उनके माध्यम से ही
00:57विभिन वन्षों का विस्तार होना था.
01:00उनमें से दो प्रमुख थी अदिती, जो तेजोमी और पवित्रता की प्रतीक थी, और दिती, जिनके भीतर अदमय शक्ती और
01:09प्रखर्ता समाहित थी.
01:11अदिती का दिव्य रूप स्वयम प्रकाश और आशा का प्रतिरूप था, जिसके गर्ब से ब्रहमांड के सनरक्षक जन्म लेने वाले
01:19थे.
01:20वहीं, दिती अपने शक्तिशाली स्वरूप में एक अध्भुत आकर्शन रखती थी, जिनसे ऐसे पराक्रमी वंश का जन्म होना था जो
01:29ब्रहमांडिय संतुलन को चुनौती देगा.
01:33अधिती का विवाह परम ज्यानी और तपस्वी महरशी कशप से हुआ, जिन्होंने अपने तप बल से तीनों लोकों में सम्मान
01:40अरजित किया था.
01:42और फिर अपनी अदमेर उर्जा के साथ दिती ने भी उसी महान रिशी कश्यप से विवाह किया, जिनकी तपस्या ब्रहमांड
01:51में अद्विती थी
01:53अदिती के गर्ब से देवताओं ने जन्म लिया, वे दिव्य और तेजस्वी प्राणी जो ब्रहमांड में धर्म और न्याय के
02:00पालत बने
02:02वहीं दिती ने दान्वों को जन्म दिया, वे पराक्रमी और महत्वा कांक्षी योध्धा, जिनकी शक्ती ने स्वयन देवताओं को भी
02:10चुनोती दी
02:12इस प्रकार अधिती के पुत्रों, देवों और दिती के पुत्रों, दानवों के जन्म से स्रिष्टी में एक अध्भुत संतुलन स्थापित
02:20हुआ
02:22प्रारंभ में वे एक दूसरे के पूरक थे, प्रकृती के दो भिन पहलू जो ब्रहमांड की व्यवस्था के लिए आवश्चक
02:29थे
02:31किन्तु उनके स्वभाव में निहित भिनताय धीरे-धीरे संधर्ष की नीम बनी, जहां देवों का धर्म और दानवों का अहंकार
02:39टक्राने लगा
02:41यह संधर्ष केवल शक्ती का नहीं, अपितु धर्म, नीती और अस्तित्व के सिध्धानतों का था, जो पूरे ब्रहमांड पर प्रभाव
02:49डालने वाला था
02:50इस प्रकार देवों और दानवों के बीच यह शाश्वत द्वंद्व ब्रहमांडिय सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने के लिए एक प्रहरी
03:00की आवश्शक्ता को दर्शाता है
03:03यही से विश्णु पुरान की महान गाथा का आरंभ होता है, जो इन संधर्शों, विज्यों और धर्म की स्थापना की
03:11विस्त्रित कथा सुनाता है
03:14यह केवल देवों और दानवों की कहानी नहीं, अपितु प्रत्येक युग में धर्म और अधर्म के बीच होने वाले उस
03:21शाश्वक युद्ध की गाथा है
03:24यह विभाजन ब्रहमांडिय संधर्शों और सुरक्षा की आवश्शक्ता की नीव रखता है, जिसे विश्नु पुराण के आगे के अध्यायों में
03:33विस्तार से बताया जाएगा, और मैत्रे ध्यान से सुनते रहे
03:38महर्शी परशुराम ने मैत्रे को बताते हुए कहा कि प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों के माध्यम से ही इस ब्रहमांड में
03:45अनंत जीव प्रजातियों और विविध रूपों का विस्तार हुआ
03:50कद्रू ने अपने गर्ब से अनंत नाग वंश की उत्पत्ती की, जिनकी फुमकार और जग्मगाती मनियों की चमक से पाताल
03:58लोग का अंधकार भी प्रजवलित हो उठा
04:01महानाग अनंत शेश और वासुकी जैसे दिव्य सर्पों ने कद्रू के सनरक्षन में अपनी सहस्र फणों पर संपून प्रित्वी के
04:09संतुलन का दायत्व संभाला
04:12कद्रू की बहन विन्ता ने विहंगम पक्षी कुल की जन्नी बनकर संपून आकाश मंडल को एक नया और तेजस्वी स्वरूप
04:20प्रदान किया
04:22विन्ता के प्रथम पुत्र अरुण ने प्रभात की प्रथम रश्मी बनकर भगवान सूर्य देव के सब्तश वाले दिव्यरत का सार्थी
04:30पद ग्रहन किया
04:32तदोपरांत प्रजवलित अगनी के समान कांतिमान महाबलशाली गरूर का जन्म हुआ जिनकी पंखों की फड़फडाहट से समस्त दिशाएं कांप उठी
04:42कद्रू और विंता के बीच उपजे एक छलपून प्रतिसपर्धा के कारण नागों और पक्षी राज गरूर के मध्य सनातन शत्रुता
04:50का सूत्रपात हुआ
04:53सुर्सा ने अगाद समुद्र के विशालकाय जल्चरों और भयानक रक्षकों की उत्पत्ती करके महासागरों को जीवन से भर दिया
05:02तामरा ने आकाश में स्वतंत्र उरने वाले चील, बाज और समस्थ गरूरवन्शी पक्षियों को जन्न देकर नभ को गुंजायमान कर
05:10दिया
05:11सुर्भी ने समस्थ दुग्धदायनी कामधेनु गायों और पशुधन की रचना की, जिससे ब्रहमांड में पोशन और पवित्रता का संचार हुआ
05:20इराकी क्रिपादरिष्टी से प्रित्वी पर विशाल वरिक्ष लताएं, ओश्धिया और हरीभी वनस्पतिया खिलकर लहराने लगी
05:30खसा ने वनों के रक्षक यक्षों और रहस्यमेई जीवों को जन दिया, जो प्राकृतिक संपदाओं की रक्षा करने में सनलगन
05:38हुए
05:39मुनी नामक देवी ने सुर्भित अपसराओं और गंधर्वों की रचना की, जिनके नरित्य और संगीत से संपूर्ण देवलोक सजीवो उठा
05:49अरिष्टा के गर्भ से उत्पन्न किन्नरों और दिव्य संगीतग्यों ने ब्रहमांड के हर कोने में मधुर स्वर तरंगों का संचार
05:57किया
05:58क्रोध्वशा ने हिंसक और उग्रस्वभाव वाले जीवों को जन्म देकर प्रकृती में तीवर शक्ती का अध्भुत संतुलन स्थापित किया
06:06सर्मा ने तीक्ष्न द्रिष्टी वाले वैंते जीवों और वंचर्श्वान वंश की उत्पत्ती कर परवतिय भुभागों को जीवन्त बनाया
06:16दक्ष की इन सभी पुत्रियों ने अपने अपने वंश से इस संसार के प्राकृतिक और आध्यात्मिक पारिस्थती की तंत्र को
06:24पूर्ण किया
06:26भगवान ब्रह्मा और श्री हरी विष्णु ने इस अध्वैत और विविध जीवस्रिष्टी को देखकर अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपना आशिरवात
06:35प्रदान किया
06:37मैत्रे ने भक्तिभाव से गदगद होकर परशुराम जी के चर्णों में नमन किया और इस दिव्य रहस्य की सराहना की
06:45इस प्रकार दक्ष की पुत्रियों के माध्यम से ब्रहमांड का कोना कोना चेतना और जीवन के विविध रंगों से आच्छादित
06:53हो गया
06:54दक्ष की पुत्री दानू ने महर्शी कश्चप के साथ मिलकर एक अत्यंत शक्तिशालिनी और पराक्रमी दानव जाती की नीवख्यी जिसने
07:03संपूर्ण ब्रहमांड के इतिहास को जखजोर कर रख दिया
07:07अपने भावी वंश को अमर और सर्वशक तिमान बनाने के लिए दानू ने महर्शी कश्चप के सानिध्य में कठोर तपस्या
07:15करके असीन ब्रहमांडिय उर्जा प्राप्त की
07:19तपस्या के प्रभाव से दानू के गर्ब से असीन बलशाली और दिव्य शक्तियों से संपन्न कई वीर दानव पुत्रों का
07:26जन्म हुआ
07:28दानू के पुत्रों में सबसे जेष्ट और पराक्रमी विप्रचित्ती था, जिसकी वीर्ता और नेत्रित्व क्षमता से देवगन भी भैभीत रहते
07:37थे
07:38विप्रचित्ती के साथ ही पुलोमन नामक एक विशालकाय दानव का जन्म हुआ, जिसकी शारिरिक शक्ती और गदा युद्ध में कोई
07:46बराबरी नहीं कर सकता था
07:49उसी वन्ष में माया दानव का आगमन हुआ, जो वास्तुकला और मायावी तंत्र में संपून ब्रहमांड का सबसे श्रिष्ट शिल्पकार
07:57बना
07:58नमुची नामक दानव ने भी दानव के वन्ष में जन्म लिया, जिसे अपनी अद्वितिय युक्तियों और चल्बल के कारण परास्त
08:06करना असंभव माना जाता था
08:09दानवों ने पाताल और रसातल के गभीर लोकों में एक से बढ़कर एक भव्य, स्वर्णजडित और सुरक्षित नगरों का निर्मान
08:17किया
08:18माता दानू ने अपने सभी पुत्रों को ब्रहमान्डिय ज्यान और युद्ध कलाओं का आशिरवाद दे कर उन्हें संगठित और शक्तिशाली
08:27बनाया
08:28विप्रचित्ती ने ज्वाला मुखियों के भीतर दिव्य अगनी में ऐसे मायावी अस्त्रशस्त्र तयार करवाए जो देवताओं के हथियारों को चुनौती
08:37दे सकते थे
08:39दानव योध्धाओं ने पाताल लोक में निरंतर अभ्यास करके अपनी शारिरिक शमता और युद्ध कौशल को चरम सीमा तक पहुचा
08:47दिया
08:49अपनी बढ़ती शक्ती के अहंकार और महत्वा कांगशा के कारण दानवों की द्रिष्टी अब स्वर्गलोक के वैभव और अधिकारों पर
08:57टिक गई
08:59स्वर्ग के राजा इंद्र और अन्य देवगणों ने पाताल में दानवों के इस विशाल उभार को देखकर गहरे भय और
09:06चिन्ता का अनुभव किया
09:08महर्शी कश्यप ने अपने दानव पुत्रों को समझाया कि शक्ती का उप्योग धर्म और ब्रह्मांडिय संतुलन के पालन के लिए
09:16होना चाहिए न कि विनाश के लिए
09:19पिता के उपदेश के बावजूद विप्रचित्ती ने अपने विशाल दानव सैन्यदल को एकत्रित कर यग्यभाग और अधिकारों का दावा करने
09:28का संकल्प लिया
09:29अंतर देवताओं और दानवों की सेनाएं ब्रह्मांड के विशाल युद्धक्षेत्र में आमने सामनेया खडी हुई जिससे महासंग्राम का आरंभ हुआ
09:40पुलोमन और नमुची जैसे वीर दानवों ने अपनी मायावी युद्धकलाओं से देवसेना में खलबली मचा दी और युद्ध के नियमों
09:49को चुनौती दी
09:51भगवान विश्णू ने इस ब्रहमांडिय नाटक को तटस्थ भाव से देखा क्योंकि वे जानते थे कि प्रकाश और अंधकार दोनों
09:59ही स्रिष्टी के आवश्चक अंग है
10:02दानू के ये शक्तिशाली वन्षच पुराणों में अंधेरे और अपार शारिरिक बल के प्रतीक बने जिन्होंने देवताओं को सदैव सतर्क
10:11और कर्मठ बनाये रखा
10:13इस प्रकार दानू और महर्शी कश्यप की यह संतान परंपरा विश्णु पुराण में ब्रहमांड के संतुलन और द्वंदव की अमर
10:21गाथा के रूप में दर्ज हुई
10:24प्राचीन काल में जब ब्रहमांड अभी भी अपने प्रारंभिक स्वरूक में था
10:29रिशी कश्यप की दो और पत्निया थी कदरू जिसका सौंदर्य रात्री के गूढ रहस्य सा गहरा था और विंता जो
10:37प्रभात की पहली किरंसी पवित्र और उज्जवल थी
10:41रिशी कश्यप अपनी तपस्या और पत्नियों की निश्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें वर्दान मांगने का अफसर दिया, मानों वे ब्रहमांड
10:50की इच्छाओं को मूर्त रूप देने वाले देवता हों
10:53कद्रू ने अपनी महत्वा कांख्षा की गहराई में डूबी हुई, हजारों शक्तिशाली नागों को अपने पुत्रों के रूप में मांगा,
11:02जो प्रित्वी पर अपनी अदमय शक्ती से राज्य कर सकें
11:07विन्ता ने अपनी बहन से भी श्रेश्थता की चाह में दो पुत्रों की याचना की, जो कद्रू के हजारों नागों
11:14से भी अधिक शक्तिशाली और प्रतापी हों
11:17कश्य प्रिशी ने दोनों के वर्दानों को स्वीकार किया, किन्तु उनके दिव्य नेत्रों ने भविश्य के संधर्षों की एक धुंधली
11:25जलक देख ली, जो इस प्रतिदवंद्विता से जन्म लेने वाली थी
11:31वर्दान प्राप्त कर कदरू ने एक हजार अंडे दिये जिन में से प्रत्येक में एक एक नाग शिशु की भविश्य
11:38की शक्ती नहित थी जैसे प्रित्वी के गर्भ में छिपे रत्न
11:42उसके तुरंट बाद विन्ता ने दो विशाल चमकीले अंडे दिये जिनकी आभा इतनी तेज थी कि वे सूर्य और चंद्रमा
11:51के लगुरूप प्रतीत होते थे
11:54पांच सौ वर्षों तक दोनों बहने धैर्य पूर्वक अपने अंडों के सेने की प्रतीक्षा करती रही प्रत्येक दिन एक अनंत
12:02युग जैसा प्रतीत होता था जब तक की नियती ने अपना खेल शुरू नहीं किया
12:08अचानक कद्रू के एक हजार अंडे एक साथ तूटने लगे और उन में से हजारों शक्तिशाली नाग हर एक अपनी
12:16तरह से अनूठा और शांदार प्रित्वी के गर्ब से नए जीवन की तरह प्रकट हुए
12:22अपने पुत्रों के गौरव को देखकर विन्ता के धैर्य का बांध तूट गया और उसने अधीर्ता में अपने पहले अंडे
12:30को तोर दिया मानो नेती को चुनौती दे रही हो
12:34जैसे ही अंडा तूटा एक अर्धविक्सित शिशु अरोन बाहर आया जिसका निचला भाग अधूरा था और उसने अपनी माता विन्ता
12:43को उसकी अधीर्ता के लिए एक भयंकर श्राप दिया
12:47श्राप के बाद अरोन ने सूर्य देव के सार्थी का पद संभाला और विन्ता को अपने दूसरे अंडे से धैर्य
12:55पूर्वक प्रतीक्षा करने और अपनी बहन की दासी बनने का दंड मिला
13:00हजारों साल और बीट गए और विंता ने अपनी पीड़ा और धैर्य के साथ अपने दूसरे अंडे को सेने की
13:08प्रतीक्षा की जो उसके आशा और मुक्ती का अंतिम प्रतीक था
13:13फिर एक गर्जना के साथ दूसरा अंडा फटा और उससे महा प्रतापी गरूर प्रकट हुए जिनके पंक सूर्य के समान
13:21चमकते थे और जिनकी गर्जना बादलों को फार देती थी
13:26गरूर का तेज इतना प्रचंड था कि नवजात शिशु के रूप में ही उनका दिव्य प्रकाश अगनिदेव की ज्वाला के
13:34समान चमकने लगा जिससे देवलोक में भ्रम फैल गया
13:38देवताओं ने अपनी शंकाओं को दूर करने के लिए ब्रहमा के पास धावन किया जिन्होंने उन्हें समझाया कि यह कोई
13:46अगनिदेव नहीं बलकि विन्ता का पुत्र गरुड है जो पक्षियों का राजा होगा
13:52अपने बच्चों की असाधारन शक्तियों के साथ कदरू और विन्ता के बीच की प्रतिदवंद्विता और भी गहरी हो गई जैसे
14:00दो विशालकाय नदिया एक दूसरे से मिलने के लिए आतुर हो
14:05यह वह समय था जब देवताओं और असुरों ने अमरित की खोज में समुद्र का मन्थन किया जिससे कई अद्भुत
14:13रत्न और दिव्य प्राणी प्रकट हुए
14:16मन्थन से निकले अनेकों चमतकारों में से एक था उच्चाहश्रवा एक दिव्य सफेद घोड़ा जिसकी गती वायू के समान और
14:24सौंदर्य स्वर्गिक था
14:27उच्चाहश्रवा के अद्भुत सौंदर्य को देख कर कदरू और विंता के बीच एक विवाद छिड़ गया और कदरू ने उसकी
14:34पूँच के रंग पर एक शर्ट लगाने का प्रस्ताव रखा जो उनके भाग्य को हमेशा के लिए बदलने वाली थी
14:42शर्ट यह थी कि जो भी बहन उच्चाहश्रवा की पूँच के रंग के बारे में गलत साबित होगी वह दूसरी
14:49की दासी बन जाएगी एक ऐसी प्रतिग्या जिसने नेती के चक्र को कठोर्ता से घुमा दिया
14:56जब माता कदरू ने महर्शी कश्चप से सहसर तेजस्वी और शक्तिशाली सर्प पुत्रों की कामना की तब उनके गर्ब से
15:04उठती दिव्य उर्जा ने संपूर्ण पाताल लोग को आलोकित कर दिया
15:09पाताल लोक के गुप्त स्वर्णिम गर्भगरिह में कदरू के एक हजार सुवर्ण अंडो से रहस्य में प्रकाश की किरने फूटने
15:17लगी जिससे एक नए युग का सूत्रपात हुआ
15:21अंडो का आवर्ण तूटते ही सहस्र दिव्य नाग बाहर निकले जिनके शरीर पर चमकीले मनिया जड़ी थी और उनकी सांसों
15:29में विश्की भयंकर शक्ती बह रही थी
15:32कद्रू के सबसे जेश्ट पुत्र अनंत शेशनाग ने अपने सहस्र फणों पर जगमगाते श्वेट तेज के साथ जन्म लिया जिनका
15:41हृदय भक्ती और परमधर्म से उतप्रोत था
15:45ततपश्चात नीलम और मर्कत जैसी हरी कांती वाले वासुकी का प्राकट्य हुआ जिनके कंठ में विश्की अगाध ज्वाला और नेत्रों
15:54में अपार संप्रभुता विराजित थी
15:57लाल अगनी की ज्वालाओं समान धधक्ती त्वचावाले तक्षक नाग ने जन्म लेते ही अपनी भयंकर फूतकार और अत्यंत प्रखर बुद्धी
16:06का परिचय दिया
16:08चौथे प्रमुख नाग करकोटक ने अपने काले और नीले शलकों के साथ जन्म लिया जिनके पास मायावी रूप बदलने की
16:16गुप्तकला और परम विशैली शक्ती थी
16:19इन शक्तिशाली नागों ने भूलोग के नीचे स्थित विशाल पाताल लोग में प्रवेश किया और वहां अपने वैभवशाली सामराज्य का
16:28बीजारोपन किया
16:30पाताल लोग के मध्य में नागों ने भोगवती नामक एक अतिसुन्दर और देधी प्यमान नगरी का निर्मान किया जो अमूल्य
16:38नागमनिया और सुवर्ण स्तंभों से सुसजित थी
16:42जब शेशनाग ने अपने भाईयों में अहंकार और अधर्म की भावना देखी तो वे भोगवती नगरी का त्याग कर अत्यंत
16:50कठोर तपस्या हेतु गंधमादन परवत की ओर प्रस्थान कर गए
16:56शेशनाग की निश्चल तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रहमाजी प्रकट हुए और उन्हें संपून प्रित्वी तथा ब्रहमांड का भार अपने फणों
17:04पर धारन करने का शाश्वत दायत्व सौपा
17:08भगवान विश्चनु ने शेशनाग की भक्ती से गदगद होकर उन्हें क्षीर सागर में अपनी अनंत शया बनने का सर्वोच्च सौभाग्य
17:16प्रदान किया
17:18शेशनाग के जाने के पश्चात महाप्रतापी नागराज वासुकी ने मनिरत्न जडित मुकुट धारन कर पाताल लोग के समराठ के रूप
17:27में अपना राज्याभिशेक स्विकार किया
17:30नागों ने वेदपुराणों के गुप्त ज्यान, रसविद्या और पाताल में छिपे अमूल्य खजानों की रक्षा का दायत्व अपने अद्रिष्य हाथों
17:39में ले लिया
17:40प्रित्वी की जडो और पाताल के दिव्य जल स्रोतों की सुरक्षा करते हुए नागों ने प्राकृतिक संतुलन और जीवन के
17:48प्रवाह को बनाये रखा
17:50किन्तु नागों का भयंकर क्रोध और उनके विश्की विनाशकारी ज्वालाएं कभी-कभी देवों और मनुश्यों के लिए भी एक भीशन
17:58संकट का कारण बन जाती थी
18:01देवों और असुरों के बीच संतुलन बनाने में नागों की कूटनीती और मायावी शक्तियों ने अनेक बार ब्रहमांडिय नेती को
18:10एक नया मोर दिया
18:12पाताल लोक की गहराईयों में गूंजती नागों की दिव्य गर्जना ने तीनों लोकों में यह संदेश दिया कि वे केवल
18:19विनाशक नहीं, बलकि सृष्टी के महान संरक्षक भी हैं
18:24माता कदरू ने अपने हजार तेजस्वी पुत्रों को पाताल के स्वर्ण सिनहासनों पर विराजमान देखकर परम संतोष और मात्रिय भिमान
18:33का अनुभव किया
18:34इस प्रकार पाताल लोक नागों के असीन तेज, दिव्यग्यान और नागमानियों के अलोकिक प्रकाश से जग्मगाता हुआ ब्रहमांड के संतुलन
18:44का आधार बन गया
18:47महर्शी कश्यप की दो पत्नियों में से कद्रु ने हजार पराकरमी नाग पुत्रों का वर्दान मांगा, जबकि विंता ने केवल
18:54दो तेजस्वी और अतिशक्तिशाली पुत्रों की याचना की
18:59महर्शी कश्यप ने विन्ता को दो दिव्य और देधी प्यमान अंडे सौंपते हुए धैर्य पूर्वक उनके पकने की प्रतीक्षा करने
19:07का आदेश दिया
19:09कुछ ही समय में कदरू के हजार अंडों में से भयानक फूतकार करते हुए विशैले नाग प्रकट हुए और पूरी
19:16प्रित्वी पर अपना आधिपत्य स्थापित करने लगे
19:20कदरू के हजार पुत्रों को देखकर विंता से रहा न गया और उसने अधीर होकर पांच सौ वर्षों बाद अपने
19:27पहले अंडे को समय से पूर्व ही फोर दिया
19:31अंडे से अरुना का जन्म हुआ जिनका उपरी शरीर तो सूर्य के समान प्रकाशमान था किन्तु निचला अंग अधूरा रहने
19:39के कारण वे क्रोधित हो उठे
19:42अरुना ने अपनी माता विंता को अधीर्था के कारण कद्रू की दासी बनने का श्राप दिया और कहा कि दूसरा
19:49पुत्र ही उन्हें इस दास्ता से मुक्ठ कराएगा
19:53तत्पश्चात अरुना सूर्य देव के रत के सार्थी बने और अरुनोदय के रूप में प्रातहकाल के लालिमायुक्त आकाश को अपने
20:01तेज से सुशोभित करने लगे
20:04समुद्र मन्थन के दौरान जब उच्चैश्रवा नामक अलौकिक श्वेत घोडा निकला तब कदरु और विंता के बीच उसकी पूँच के
20:12रंग को लेकर एक शर्ट लग गई
20:15कदरु ने दावा किया कि उस दिव्य घोडे की पूँच काले रंग की है जबकि विंता ने उसके पूर्णतह बर्फ
20:23जैसे सफेध होने की बात कही
20:26कप्ती कदरु ने शर्ट जीतने के लिए अपने नाग पुत्रों को उच्चैश्रवा की पूँच से चिपक कर उसे काला बना
20:33देने का गुप्ट आदेश दिया
20:36जब कुछ धर्मात्मा नागों ने छल करने से मना किया तो कृध कदरु ने उन्हें भविश्य में राजा जनमेजय के
20:43सर्प सत्र यग्य में जल कर भस्म होने का श्राप दे दिया
20:48श्राप के भै से कापते हुए नागों ने चुपके से जाकर उच्चाश्रवा की पूँच को अपनी काली दे से पूरी
20:55तरह ढख लिया
20:57अगले दिन पूँच को काली देखकर विंता शर्थ हार गई और कदरू की छलपून चाल के कारण उसकी आजीवन दासी
21:04बन गई
21:06दासी बनी विंता को कदरू और उसके नाग पुत्रों की कठोर सेवा और अपमान सहते हुए दुखों के कई युग
21:13व्यतीत करने पड़े
21:15अंतह सही समय आने पर दूसरे अंडे में से एक भयंकर महागर्जना के साथ पक्षी राज गरुड का अलोकिक जन्म
21:23हुआ
21:24गरुड की देह का आकार इतना विशाल और तेज इतना प्रकर था कि देवगण भी उन्हें अगनिदेव समझ कर नमन
21:32करने लगे
21:34जब गरुड ने अपनी माता विंता को कदरू की दासी देखा तो वे क्रोधित हो उठे और नागों से माता
21:41की मुक्ती का उपाय पूछा
21:44नागों ने विंता को मुक्त करने के बदले स्वर्ग से देवराज इंद्र का अमरित कलश लाने की दुसाध्य शर्त रख
21:51दी
21:52अपनी माता की स्वतंत्रता के लिए गरुड ने एक महाहुंकार भरी और देवराज इंद्र की अमरावती नगरी की ओर प्रचंड
22:00वेक से उडान भरी
22:02गरुड की निस्वार्थ भक्ती और अतुल्य पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विश्णों ने प्रकट होकर उन्हें अपना अमर वाहन और
22:11ध्वच्छेन स्विकार किया
22:13प्रजाप्ती दक्ष की पुत्री खाशा और महर्शी कशप के पवित्र संगम से दो सर्वथा भिन्न और प्रभावशाली संतानों की धाराओं
22:22का जन्म हुआ
22:24खाशा के गर्भ से प्रथम संतान के रूप में यक्ष प्रकट हुए जो धन प्रकृती की गुप्त निधियों और वनस्पती
22:31जगत के दिव्यरक्षक बने
22:34उसी खाशा की कोख से अत्यंत शक्तिशाली और भयंकर राक्षस कुल का भी उदे हुआ जो विग्टन और तमस का
22:42प्रतिनिधित्व करते थे
22:44यक्षों ने सुन्दर सरोवर, सुगंधित वन और विशाल परवतों की तलहटियों को अपना निवास स्थान चुनकर प्राकृतिक संतुलन स्थापित किया
22:53इसके विपरीत राक्षसों ने अंधकारमय गुफाओं, दुर्गम रात्रियों और अगनिप्रजवलित क्षेत्रों में अपनी शक्ती का विस्तार करना प्रारंभ किया
23:04यक्ष देवराज कुबेर को अपना स्वामी मानते हुए, कैलाश परवत के निकट अलकापुरी नामक एक अलोकिक स्वर्ण नगरी के निर्मान
23:13में लीन हो गए
23:15राक्षसों ने अपनी शक्तियों को और अधिक तीवर करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या करके ब्रहमाजी से अजय होने के
23:23वर्दान मांगे
23:25भगवान शिव ने यक्षों की निश्चल भक्ती से प्रसन्न होकर उन्हें समस्त प्रित्वी के गुप्ट धन और और औश्धियों का
23:32रक्षक नियुक्त किया
23:33यक्ष अपने गुप्ट मायावी विद्याओं से प्रकृती के विभिन रूपों का सन्रक्षन करते थे ताकि वन और नदिया सदैव समरिध
23:43रहें
23:44दूसरी और राक्षसों ने महर्शियों के यग्यों में विघन डालना शुरू कर दिया जिससे संपूर्ण देवलोक में चिंता की लहर
23:52दोड़ गई
23:54रिशी कशप ने देखा कि कैसे एक ही माता के दो वनशच, एक सन्रक्षन और दूसरा विनाश के दो विप्रीट
24:01धुरुव बन चुके थे
24:04माता खाशा अपने दोनों प्रकार के पुत्रों की भिन प्रवृत्तियों को देख कर अत्यंत भावुक और अस्मंजस में रहती थी
24:12यक्षों ने अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए स्वर्ण धनुष और रतनों से सुसजित गदाओं के साथ अपनी चतुरंगिनी सेना
24:20तयार की
24:22राक्षस सेनाप्तियों ने अपनी अपार शक्ती का प्रदर्शन करने के लिए भयंकर अस्त्रशस्त्रों और मायावी शक्तियों का संचय किया
24:32अलकापुरी के स्वामी कुबेर ने यक्षों को आदेश दिया कि वे संसार के समस्ट कल्यानकारी संसाधनों की निश्पक्ष रक्षा करें
24:41राक्षसों की अनियंत्रित शक्तियों के कारण प्रित्वी लोक में भय और असुरक्षा का वातावर्ण व्याप्थ होने लगा
24:49रिशिमुनियों ने मिलकर स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णू की स्तुती की ताकीवे संसार में संतुलन पुनह स्थापित कर सकें
24:58भग्वान विष्णु ने आश्वासन दिया कि यक्षों की समरिधी और राक्षसों की शक्ती दोनों ही सृष्टी चक्र का अनिवार्य हिस्सा
25:07है
25:08इस प्रकार खाशा के वन्षज यक्ष और राक्षस इस ब्रहमांड में प्रकाश और छाया के निरंतर चलने वाले खेल के
25:16प्रतीक बन गए
25:18खाशा की यह कथा हमें सिखाती है कि प्रकृती में प्रत्येक उर्जा का अपना महत्व और स्रिष्टी के विकास में
25:25विशेश योगदान होता है
25:29महर्शी कश्यप के तपोनिष्ट आश्रम में देवी मुनी और अरिष्ठा ने देवलोग को सौंदर्य और संगीत से अलंकृत करने हेतु
25:37परम चेतना का ध्यान किया
25:40माता मुनी की घोर तपस्या के प्रभाव से उनके गर्भ से दिव्य नर्तकियों का प्रादुर्भाव हुआ जो अपसराओं के नाम
25:47से जानी गई
25:48ये अपसराय अद्भुत सौंदर्य, अनूप कांती और असीमित कलात्मक आकर्शन की प्रतिमूर्ती बनकर ब्रहमांड के सम्मुख प्रकट हुई
25:59स्वर्भ की इन नर्तकियों के चरण स्पर्ष से बादलों में अलौकिक तरंगे उत्पन हुई और पूरा देवलोक उनकी अध्भुत आभा
26:07से जग्म का उठा
26:10दूसरी और देवी अरिष्ठा ने अपने तप से देवलोक के महान संगीतकारों और गायकों अर्थात गंधर्वों को जन्म दिया
26:19गंधर्वों के प्रक्टीकरण के साथ ही पूरा अंतरिक्ष मधूर स्वरलहरियों और दिव्यरागों की धुन से गूझने लगा
26:26ये गंधर्व न केवल उतक्रिष्ट गायक थे बलकि वे वाद्य यंत्रों को बजाने में भी अत्यंत निपुन थे
26:35देवराज इंद्र ने अपसराओं और गंधर्वों का अमरावती में स्वागत करके उन्हें देवलोक का मुख्य सांस्कृतिक अंग घोशित किया
26:45इंद्र देव की राजसभा में जब गंधर्वों ने अपनी वीना और बांसुरी से संगीत का तान छेड़ा तो देवगन भाव
26:53विभोर हो उठे
26:55गंधर्वों के मधुर गायन के साथ ही अपसराओं ने अपनी लैबध पच्चाप से देवसभा में अलोकिक नृत्य आरंभ किया
27:02रंभा, मेनका, उर्वशी और तिलोत्तमा जैसी मुख्य अपसराओं ने अपने अद्वितियन रित्य कौशल से समस्त ब्रह्मांड को सम्मोहित कर दिया
27:14हाहा, हुहु और विश्वावसु जैसे गंधर्व नायकों ने वेदों की रिचाओं को संगीत्मय धुनों में पिरोकर स्वर्ग को गुंजायमान किया
27:24देवर्शी नारद ने भी अपनी वीना महती को उठाकर गंधर्वों और अपसराओं के इस अलौकिक संगम में अपना सुर मिलाया
27:33अपसराओं का नृत्य केवल मनोरंजन नहीं बलकि स्रिष्टी के संतुलन और उर्जा के प्रवाह को बनाय रखने का एक साधन
27:41बन गया
27:41इसी प्रकार गंधर्वों के संगीत ने समस्थ देवताओं, सिध्धों और मुनियों के चित को परमशांती और आनंद प्रदान किया
27:52त्रिदेवों ने मुनि और अरिष्ठा की संतानों के इस योगदान को देख कर उन्हें स्वर्ग का स्थाई सौंधर्य और प्रान
27:59गोशित किया
28:01अपसराओं के सौंधर्य और गंधर्वों के संगीत का यह अध्भुत संगमकला और संस्कृती का पहला शाश्वत स्रोत बना
28:10जब-जब स्वर्ग या प्रिथवी पर धर्म और आनंद का उत्सव होता, तब-ब इनकी उपस्थिती से वातावर्ण अलोकिक हो
28:18उठता था
28:30दक्ष पुत्रियों की इस दिव्य परंपरा ने ब्रहमांड में कला, संगीत और आनंद की अमर चेतना को सदैव के लिए
28:37स्थापित कर दिया
28:39जब ब्रहमा जी के मानस पुत्र महर्शी कशप ने स्रिष्टी के विस्तार का संकल्प लिया, तब दक्ष की पुत्रियों के
28:46माध्यम से पृत्वी पर जीवों की दिव्यधारा प्रवाहित होने लगी
28:51देवी सुर्भी ने शांत चित्त से ध्यान लगा कर पृत्वी के जन जीवन को पोशन देने के लिए समस्त चौपायों
28:58और पवित्र कामधेनु कुल को जन्म दिया
29:02सुर्भी की क्रिपा से उत्पन कामधेनु और अन्य दुधारू पशुओं ने अपनी पवित्रता से रिशियों के आश्रमों और यग्यों को
29:10सम्पून सम्रिध्धी प्रदान की
29:13हरीभरी घाटियों में विचरते हुए विभिन प्रकार के चौपाये पशुओं ने प्रिथ्वी के विस्त्रित भूभाग पर जीवन के नए स्पंदन
29:21का आरंभ किया
29:23महर्शी कश्यप ने सुर्भी और उनके वादसल्यमय गौवंश को अपना आशिरवाद दिया जिससे समस्थ प्राणियों के पोशन का मार्ग सदा
29:31के लिए सुगम हो गया
29:34ततपश्चात देवी तामरा ने गगन की विशालता की ओर द्रिष्टी डाली और आकाश चारी प्राणियों की रचना का संकल्प लिया
29:43देवी तामरा के संकल्प से ही गरूर्थ बास, शेन और रंग बिरंगे पक्षियों की असंख्य प्रजातियों का जन्म हुआ, जिन्होंने
29:51आकाश को अपने पंखों से भर दिया
29:54अनंत गगन में अपनी उची उडान भरते पक्षियों ने प्रकृती की गती को एक नया सौंदर्य और सुरमय गुंजन प्रदान
30:02किया
30:04तामरा की संतती ने न केवल परवतों की चोटियों पर अपने नीड बनाए, बल्कि वनों के व्रिक्षों को भी अपनी
30:11चेतना से सजीव कर दिया
30:14इसके बाद देवी तिमी ने अथांग और रहस्यमई जल निधी की ओर प्रस्थान किया, जहां उन्होंने विशालकाय जलिये जीवों का
30:22स्रिजन किया
30:24देवी तिमी के दिव्यतेज से समुद्र की गहराईयों में विशाल मत्स्यों, मगर मच्छों और अनेक जलचरों के संसार का निर्मान
30:32हुआ
30:33जल की प्रत्येक तरंग में तिमी के द्वारा रचे गए जीवों ने अपनी क्रीडा से महासागरों को जीवन और उर्जा
30:41से सराबोर कर दिया
30:43महासागरों की अतल गहराईयों से लेकर तटवर्ती क्षेत्रों तक देवी तिमी के स्रिजन ने जलिय पारिस्थितिकी को पूर्णता प्रदान की
30:53तदोपरांत देवी सर्मा ने घने वनों की ओर कदम बढ़ाया और निर्भीक मासाहारी प्राणियों की उत्पत्ती की
31:01देवी सर्मा के प्रभाव से सिंह, व्याघ्र, भेडिये और श्वान कुल के शक्तिशाली जीवों का जन्म हुआ, जिन्हें प्राकृतिक संतुलन
31:10का दायत्व मिला
31:12इन हिंसक और पराक्रमी जीवों ने वनों में जीवन के चक्र को व्यवस्थित किया और कमजोर तथा बलिष्ट के नियम
31:19को स्थापित किया
31:20देवी सर्मा ने अपने समस्त मानसाहारी जीवों को वनों की रक्षा और प्रकृती में शौर्य बनाये रखने की प्रेणा प्रदान
31:29की
31:31महर्शी कशप ने जब जल, स्थल और नभ पर इस अपार जीव विविधता को देखा तो उनका हृदय दक्ष की
31:38पुत्रियों के योगदान से प्रफुलित हो उठा
31:42सुर्भी, तामरा, तिमी और सर्मा के इस महान प्रयास ने प्रिथवी को हर रूप में जीवन्त, समरिध और सुन्दर बना
31:49दिया
31:50इस प्रकार प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों के माध्यम से प्रिथवी पर जीवन का यह अद्भुत और अनंत संसार हमेशा के
31:58लिए स्थापित हो गया
32:00महर्शी परशुराम ने शांत आश्रम के वातावर्ण में मैत्रे को सम्बोधित करते हुए कहा कि प्रजाप्ती दक्ष की पुत्रियों के
32:08माध्यम से ही इस ब्रह्मांड का विराट तानाबाना बुना गया था
32:13उन्होंने स्पष्ट किया कि महर्शी कश्यप की विविध पत्नियों ने ही देव, दानव, नाग और गरुड जैसे भिन्नभिन प्राणियों को
32:21जन्न देकर इस जगत को जीवन के रंगों से भर दिया
32:25रिशी कश्यप और उनकी दिव्यपत्निया एक अलौकिक तपोवन में विराजमान थी, जहां से संपूर्ण चराचर जगत की भावी पीढियों की
32:34आधारशिला रखी जा रही थी
32:37माता अधिती के पावन गर्ब से द्वादश आधितियों और देवताओं का जन्म हुआ, जिन्होंने संपूर्ण स्रिष्टी में प्रकाश, धर्म और
32:46व्यवस्था की स्थापना की
32:48माता दिती के गर्ब से उत्पन्शक्तिशाली दैतियों ने ब्रहमांड में पराक्रम और शक्ती का ऐसा संतुलन बनाया, जो देवताओं की
32:57परीक्षा लेने के लिए आवश्चक था
33:00माता दनों की संतान दानवों ने अपनी असीन मायावी विद्या से पाताल और दिशाओं में अपनी प्रचंड उपस्थिती दर्श कराई
33:09माता कदरू के स्नेहमय संरक्षन से अनंत नागों का जन्म हुआ, जो अपने सिर पर महामनियों को धारन कर पाताल
33:17लोक की शोभा बने
33:19माता विन्ता के अंडे से दिव्य पक्षी राज गरोर का प्राकट्य हुआ, जिनकी स्वर्णिम पंखों की फड़फडाहट से संपूर्ण गगनगूझ
33:28उठा
33:29माता सुर्भी से कामधेनू और गोवंश की उत्पत्ती हुई, जिन्होंने संपूर्ण संसार को दिव्य पोशन और यगिय हवी प्रदान करने
33:38का दायत्व संभाला
33:40माता क्रोध की संतानों ने जंगलों और परवतों में हिंसक तथा रक्षक जीवों के रूप में जन्म लेकर प्रकृती के
33:48चक्र को संतुलित किया
33:50माता इरा के पावन स्पर्ष से धर्ती पर विशाल वनस्पतिया, फलफूल और जीवंदायनी ओश्धिया लहलहा उठी
33:59माता मुनी के माध्यम से गंधर्वों और अपसराओं का स्रिजन हुआ, जिन्होंने स्वर्ग लोग को अपनी अलोकिक कला और संगीच
34:07से गुनजायमान किया
34:09माता अरिष्टा के अंश से आरोग्य और कल्यान की शक्तियां प्रकट हुई, जिन्होंने संसार के प्राणियों को रोगों और कष्टों
34:17से मुक्ती का मार्ग दिखाया
34:20परशुराम जी ने समझाया कि प्रकाश और अंधकार का यह अनवरत संधर्श ही वास्तव में कर्म और धर्म के महान
34:28चक्र को गतिमान रखता है
34:31स्रिष्टी का प्रत्येक जीव कर्म के एक अग्रिश धागे से बंधा हुआ है, जो उसके पूर्व जन्मों और भावी नेती
34:39का निर्धारन करता है
34:41रिशी मैत्रे ने अपने ध्यान नेत्रों से उस विराट ब्रह्मांडिय वरिक्ष को देखा, जिसकी हर शाखा में अंगिनत जीवों की
34:50जीवनगाथाएं स्पंदित हो रही थी
34:53भगवान श्री हरी विष्णू अपने क्षीर सागर में शेशनाग पर विराज मान होकर इस सम्पूर्ण विराट रचना के सूत्रधार बनकर
35:01जगत का पालन कर रहे हैं
35:04यह विविधता ही भविष्ण में आने वाले युगों, धर्म युद्धों और भगवान विष्णू के महा अवतारों के प्राकट्य की प्रिष्ठभू
35:12में तैयार करती है
35:15परमज्ञान की इस धारा को पीकर रिशी मैत्रे ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान परशुराम के चर्णों में कोटी-कोटी प्रणाम
35:23किया
35:25महर्शी परशुराम अपने तेजस्वी फरसे के साथ शितिच की ओर देखते हुए खड़े थे और उनकी दिव्यवानी का यह बोध
35:33सदास्दा के लिए ब्रहमांड में गूंजता रहा
Comments

Recommended