विष्णु पुराण के इस महाएपिसोड में, शिव-पार्वती के अमर प्रेम की गाथा एक नए मोड़ पर पहुँचती है! ✨ तारकासुर के आतंक से त्रस्त देवताओं की पुकार पर, कामदेव भगवान शिव की तपस्या भंग करने का असंभव कार्य करते हैं। क्या शिव का क्रोध ब्रह्मांड को जला देगा? 🔥 सती के पुनर्जन्म, देवी पार्वती, शिव को अपने अटूट प्रेम और कठोर तपस्या से कैसे जीतेंगी? 🧘♀️ प्रेम, बलिदान और दिव्य क्रोध की इस अद्भुत कहानी को देखें! #VishnuPurana #ShivParvati #Kamadeva #Tarakasur #Tapasya #Mythology #HinduGods
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00:00देवताओं के निवेदन और अपनी अंतरात्मा की पुकार सुनकर देवी पार्वती ने अपने हृदय में भगवान शिव को पती रूप
00:08में पाने का गहन संकल्प लिया और कैलास पर्वत की ओर अपनी दिव्ययात्रा आरंभ की.
00:15दुर्गम पथों और घने वनों को पार करते हुए पार्वती का द्रिड संकल्प हर पकपर और भी प्रगाड होता गया,
00:22जैसे कोई पवित्र नदी अपने उद्गम से सागर की ओर बढ़ती है.
00:28अंतर सुदूर क्षितिच पर उन्होंने कैलास पर्वत के श्वेत बर्फीले शिखर को देखा, जो अपनी अलोकिक आभासे समस्त दिशाओं को
00:37प्रकाशित कर रहा था.
00:39जैसे ही उन्होंने हिम आच्छादित कैलास के पवित्र क्षेत्र में प्रवेश किया, प्रकृती का कंकन शिव की शाश्वत उर्जा से
00:47स्पंदित होता महसूस हुआ.
00:50वन्य जीव जन्तूओं और जर्नों के मधुर कलकल के बीच उन्होंने एक गुफा के समक्ष भगवान शिव को गहरे ध्यान
00:58में लीन पाया, जिनकी आभासे पूरा वातावर्ण दिव्यहो उठा था.
01:03महादेव ध्यान की इतनी गहन अवस्था में थे कि उनका अस्तित्व स्वयंग ब्रह्मान से एकाकार हो गया था, मानो हिंखंड
01:12भी उनकी तपस्या के ताप से पिघल कर तरल शांती में बदल गए हो.
01:17पार्वती भय और भक्ती से अभिभूत होकर एक उचित दूरी पर ठहर गई, उनका हृदय शिव की दिव्य उपस्थिती के
01:25समक्ष नत्मस्तक हो उठा.
01:28उनके हृदय में महादेव की सेवा का अटल निश्चय था, और उन्होंने उसी क्षण अपनी तपस्या की शुरुवात शिव के
01:36निवास को समवारने से की.
01:39पारवती ने बड़ी विनमरता और पवित्रता से शिव के ध्यान स्थल के आसपास के क्षेत्र को स्वच करना आरंब किया,
01:46जैसे कोई भक्त अपने आराध्य के मंदिर को सजाता है.
01:51वह कैलास के हिम आच्छादित धलानों से सबसे सुन्दर और दुरलब पुष्प चुन्ती, मानो हर फूल महादेव के चर्णों में
01:59एक प्रार्थना हो.
02:01इसके उपरांथ वह उचे व्रिक्षों और जाडियों से सबसे मीठे और ताजे फल एकत्रित करती, जो महादेव को अर्पित करने
02:10योग्य हो.
02:12वह अत्यंत श्रद्धा और कलात मक्ता से फूलों और फलों को एक साथ सजाती, प्रत्येक भेंट में अपना हरिदय और
02:20आत्मा उडेल देती.
02:22हर भोर वह महादेव की गुफा के प्रवेश द्वार पर ताजे फूल धीरे से रखती, जैसे सूर्य की पहली किरने
02:30कमल पर गिरती हैं.
02:32वह बड़े सन्यम से मीठे और ताजे फल भी वहीं रखती, इस आशा के साथ की किसी दिन शिव अपनी
02:40तपस्या भंकर उनका प्रसाद ग्रहन करें.
02:43परंतु महादेव समाधी की गहन्तम अवस्था में लीन, अपनी आखें नहीं खोलते, उनकी दिवय चेतना ब्रहमांड के रहस्यों में विलीन
02:52थी.
02:54पार्वती हर दिन प्रार्थ ना करती, उनकी आखें नम होती पर उनकी आस्था अडिग रहती, मानो प्रत्येक आसु महादेव के
03:02प्रती उनकी अनूठी भक्ती का प्रमाण हो.
03:06दिन सप्ताह और फिर महीने बीटते गए, पर पार्वती की सेवा और तपस्या में रक्ती भर भी कमी नहीं आई,
03:13उनकी निष्ठा समय की सीमाओं से परे थी.
03:17कैलास की कठोर सर्दिया और प्रचंद हवाय भी उनके अटल संकल्प को डिगा न सकी, उनकी सेवा अगनी के समान
03:25प्रजवलित होती रही.
03:27उनका शरीर कष्ट सहता रहा, पर आत्मा में शिवप्रेम की जोती निरंतर प्रदीप रही, हर क्षन उनकी भक्ती को एक
03:35नई उचाई प्रदान करती रही.
03:39अंधेरे और ठंडी रातों में भी पार्वती का सेवा भाव कभी नहीं डिगा, उनकी आखों में शिव के खुलने की
03:46एक अटल आशा हमेशा चमकती रहती थी.
03:50तारकासुर के अत्याचार से तीनों लोकों में हाहाकार मचा हुआ था और देवता असहाय होकर अपने सामराज्य को तिनके की
03:58भांती बिखरते देख रहे थे.
04:01स्वर्गलोक के सिनहासन से बेदखल हो चुके देवराज इंद्र अपने देवगणों के साथ अत्यंत भयभीत और निराश अवस्था में विचार्विमर्ष
04:10कर रहे थे.
04:12ब्रहमदेव ने सभी देवताओं को समरण कराया कि केवल भगवान शिव और माता पार्वती का पुत्र ही तारकासुर का सहार
04:20करने में समर्थ होगा.
04:22किन्तु कैलाश परवत पर भगवान शिव एक ऐसे कठोर और अगाध ध्यान में लीन थे, जिसे भंकरना संपूर्ण ब्रहमांड के
04:31लिए असंभव प्रतीत हो रहा था.
04:34दूर खड़े होकर देवतागन महादेव के उस प्रचंड और दिव्य रूप को देख रहे थे, जिसकी योग अगनी के तेज
04:41से संपूर्ण पर्वत आलोकित हो रहा था.
04:45राजकुमारी पार्वती प्रतिदिन बड़ी भक्ती से महादेव के चर्णों में पुष्प अर्पित करती थी, परंतु शिवजी का ध्यान अडिग रहा.
04:55पार्वती जी के अलोकिक सौंदर्य और निश्चल सेवा के बावजूद भग्वान शिव अपने सांसारिक मोह से परे ध्यान की पराकाश्था
05:03में स्थित रहे.
05:05तारकासुर के बढ़ते अत्याचारों से विवश होकर इंद्र ने अमरावती में सभी महर्शियों और देवों की एक आपातकालीन सभा बुलाई.
05:15देवर्शी नारद ने अपनी वीना की तान छेड़ते हुए सुझाव दिया कि केवल कामदेव ही महादेव के मन में प्रेम
05:22का अंकुर प्रस्फुटित कर सकते हैं.
05:26देवराज के आदेश पर एक तेस्तररार दिव्यदूत कामदेव के वसंतमय लोग की ओर ततकाल रवाना हुआ.
05:34प्रेम के देवता कामदेव और उनकी अत्यंत रूपवती पत्नी रती वसंत रितु के मनमोहक वातावर्ण के साथ देवसभा में उपस्थित
05:43हुए.
05:44इंद्र ने अत्यंत सम्मान के साथ कामदेव का स्वागत किया और उनके समक्ष अपने हाथ जोड़कर सहायता की याचना की.
05:54देवों ने कामदेव को समझाया कि यदितार का सुर्का अंत न हुआ तो समस्त स्रिष्टी का संतुलन सदैव के लिए
06:01नश्ठ हो जाएगा.
06:03कामदेव को सौपा गया दायत्व अत्यंत कठिन था, उन्हें भगवान शिव की अखंड समाधी को भंकर उनके हृदय में प्रेम
06:11जगाना था.
06:13देवी रती अपने पती के जीवन पर मंदराते संकट को भांप कर भयभीत हो गई और उन्होंने इस भयंकर कार्य
06:21का विरोध किया.
06:23कामदेव भली भानती जानते थे कि महादेव के त्रीतिय नेत्र का एक क्रोधित कटाक्ष भी उन्हें क्षन भर में भस्म
06:30कर सकता है.
06:33इंद्र ने कामदेव को दुहाई दी की धर्म और देवताओं की रक्षा के लिए उनका यह प्रयास ही संपून ब्रहमांड
06:40की अंतिन आशा है.
06:43ब्रहमांड के कल्यान के लिए कामदेव ने अपने जीवन का जोखिम उठा कर भी इस जोखिम भरे कार्य को स्वीकार
06:50करने का द्रिड संकल्प लिया.
06:53उन्होंने अपने गन्ने के धनुष को कसकर पकड़ा और कामबानों की शक्ती को जागरित करते हुए कैलाश की ओर कदम
07:00बढ़ाए.
07:02कामदेव अपनी पतनी रती और वसंत रितु के साथ बर्फ से ढके कैलाश परवत की ओर अपनी अंतिम और एतिहासिक
07:10यात्रा पर निकल पड़े.
07:12देवताओं के अनवरत अनुन्य विनय के पश्चात प्रेम के देवता कामदेव ने स्रिष्टी के संतुलन हेतु स्वयन को इस अगनिप्रीक्षा
07:20में जोकने का कठिन निर्णय लिया.
07:24कामदेव ने अपनी प्रिय पत्नी रती को अपने इस घातक मिशन की बात बताई, जिसके बाद रती का हृदय असहनिय
07:31वेदना और भै से द्रवित हो उठा.
07:34इस विकट परिस्थिती में प्रेम के शाश्वत साक्षी और प्रकृती के जीवन्त प्रतीक कामदेव के मित्र वसंत उनके साथ खड़े
07:43होने के लिए सहज ही तयार हो गए.
07:46नारी, कामदेव और वसंत तीनों ने शिव की कैलाशस्थली की ओर यात्रा आरंभ की एक ऐसी यात्रा जिसका परिणाम तीनों
07:55के लिए अनिश्चित था.
07:57जैसे जैसे वे आगे बढ़े, स्वर्ग का कोमल सौंदर्य कठोर बरफीले कैलाश के विशाल और उदासीन द्रिशों में विलीन होता
08:06गया, जो उनके जीवन्त स्वरूपों के विप्रीद था.
08:10शिव के एकांट आश्रम के पास पहुँचते ही, उन्होंने देखा कि यह क्षेत्र अभी भी एक अचुते बरफीले सन्नाटे में
08:18डूबा हुआ था, जहां समय भी रुक्सा गया था.
08:22वसंत ने अपनी अलौकिक शक्ती का प्रयोग करना आरंभ किया, और उनके स्पर्ष मात्र से कैलाश की बरफीली धर्ती पर
08:30जीवन के पहले संकेत उभरने लगे.
08:34बरफ पिघलने लगी, सर्ध हवा में एक हलकी गर्माहट घुलने लगी, और कैलाश की चट्टानों से नई कोंपले जाकने लगी,
08:42मानो प्रित्वी जागरित हो रही हो.
08:46जहां कुछ पल पहले केवल बरफ का राज था, वहां अब हरीभरी घास और छोटे-छोटे पौधे तेजी से उगने
08:53लगे, प्रकृती अपने रंगों की चादर बिछा रही थी.
08:57शीघ्र ही कैलाश का शांत वातावर्ण रंग बिरंगे फूलों से भर गया, हर कली खिल उठी, मानो देवताओं ने धर्ती
09:06पर अपनी कला बिखेर दी हो.
09:09जंगलों से रंग बिरंगे पक्षी उड़कर आये, और उनकी सुरीली चहचहाहट ने कैलाश की चिर्माणी शांती को मधुर संगीत से
09:17भर दिया.
09:19हवा में अब मादक फूलों की खुश्बू घुल चुकी थी, जो हर सास के साथ हृदय को प्रेम से सराबोर
09:25कर रही थी, शिव की तपस्या को भेदने का पहला प्रयास था यह.
09:31सुन्दर हिरन, चंचल खरगोश और अन्यवनवासी जीव आनंद से नबनिर्मित वन में विचर्ण करने लगे, मानो वे भी प्रेम के
09:39इस मायाजाल का हिस्सा बन गए हूँ.
09:42पलक जपकते ही कैलाश का बर्फीला, एकांत कोना एक जीवन्त मादक नंदनवन में बदल गया, जो इंद्रियों को मोहित करने
09:51वाला एक पूर्ण मायाजाल था.
09:54इस सारे परिवर्तन के बावजूद, भगवान शिव अपनी गहन समाधी में लीन थे, ब्रहमान के सभी कोलाहल से परे, उनकी
10:02चेतना शांत थी.
10:05कामदेव ने अंतह अपनी स्थिती संभाली, अपने पुश्पबान को धारण किया, और अपनी आत्मा में एक गहरी कसक के साथ,
10:13अपने घातक कार्य के लिए तैयार हो गए.
10:16रती अपने पती की पीडा और उनके महान बलिदान को जानती थी, और उसकी आखें आसन्न विपत्ती की आशंका से
10:25भर गई.
10:27वसंत ने अपनी शक्तियों को और भी प्रबल किया, वातावर्ण में प्रेम और वासना की उर्जा को बढ़ा दिया, ताकि
10:34शिव का मन विचलित हो सके.
10:37सारा ब्रहमांड इस गेहन प्रेम के माया जाल में फस गया था, जिसकी तीवर तरंगे शिव की समाधी की ओर
10:44बढ़ रही थी.
10:46इस पराकाश्ठा पर कामदेव ने अपने धनुष को पूरी तरह से खीचा, वह जानते थे कि यह एक ऐसा क्षण
10:54है, जो स्रिष्टी के इतिहास को हमेशा के लिए बदल देगा.
10:59ब्रहमांड में एक मीठी, मधोश कर देने वाली सुगंध धीरे-धीरे फैल रही थी, जो कणकण को प्रेम के सुक्षम
11:07स्पंदनों से भर रही थी.
11:09अगाध ध्यान में लीन भगवान शिव के कैलाश परवत पर भी इस मायावी सुगंध का एक सुक्षम प्रभाव उनकी एकागरता
11:18की परिधी को विचलित करने लगा.
11:21इसी क्षण देवी पारवती अपनी दिव्य आभा के साथ कैलाश की धलानों पर प्रकट हुई, उनकी प्रत्येक चाल में असीम
11:29सौंदर्य और भक्ती की जलक थी.
11:33उनके चहरे पर एक शांत द्रिड संकल्प था, जैसे वे जानती हों कि यह विशेश पल ही उनके आराध्य को
11:40जगाने का एक मात्र अफसर है.
11:43इस दिव्य नाटक के अद्रिश्य सूत्रधार कामदेव एक सघन पुष्प वाटिका में चिपकर अपने गन्ने के धनुष को खीचते हुए
11:52सहीक्षन की प्रतीक्षा कर रहे थे.
11:55देवताओं द्वारा दिये गए इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने की द्रिड़ता उनके हर अंग में जलक रही थी, शिव
12:03को ध्यान से जगाने का उनका संकल्प अटूट था.
12:07देवी पारवती, शांत और सन्यमित भाव से भगवान शिव के समक्ष पहुची और अपने हाथों में सजे ताजे, सुगंधित पुष्पों
12:16को श्रधा पूर्वक अर्पित किया.
12:19उनकी उपस्थिती की सुख्ष्म उर्जा ने शिव के गहन ध्यान को भंग किया और उनके नेत्रक्षन भर के लिए खुले,
12:27पारवती की दिव्य छवी को स्वीकार करते हुए.
12:30यह एक ऐसा क्षन था जहां शिव की अगाध एक आगरता में एक अत्यंत सुख्ष्म दराराई ब्रहमांड ने अपनी सासे
12:39रोक ली इस निरनायक पल को देखने के लिए.
12:43और ठीक इसी भंगुर्क्षन में कामदेव ने अपने गन्ने के धनुष को पूरी शक्ती से खीच लिया, उसका तानित धागा
12:51एक मधुर जनकार के साथ कमपन कर उठा.
12:54धनुष पर सजे उसके पंचबान, काम, उनमादन, शोशन, तापन और स्तंभन दिव्य आभा के साथ चमक उठे, प्रत्येक में एक
13:04अध्वितिय मोहिनी शक्ती भरी थी.
13:07एक क्षण का मौन पसरा, फिर कामदेव ने अपना लक्षय साधा और प्रेम के उन पांच पुषपबानों को शिव के
13:14हृदय की ओर तीवर गती से छोड़ दिया.
13:18पुषपबानों ने आकाश को चीरते हुए, एक अध्रिश्य सुगंधित मार्ग बनाया, सीधे भगवान शिव के हृदय को भेदने के लिए
13:26उद्यत.
13:28संपूर्ण स्रिष्टी ने अपनी सांस थाम ली, नदीनाले शान्थ हो गए, हवा थम गई, मानो इस अप्रत्याशित घटना के परिणाम
13:37की प्रतीक्षा कर रही हो.
13:39इस बीच देवी पार्वती अपने आराध्य की ओर निहारती रही, उनके चहरे पर एक भोली आशा और प्रतीक्षा की चमक
13:48थी, कामदेव के प्रहार से अनभिग्य.
13:51और फिर एक अग्रिश्य उर्जा तरंग के साथ, उश्पबान भगवान शिव के हृदय में प्रवेश कर गए, एक सुक्ष्म मीठी
13:59पीडा और एक नई अनुभूती को जगाते हुए.
14:03उनके ध्यान की गहराया हिल उठीन, सदियों की तपस्या का आवर्ण कुछ पल के लिए तूट गया, और एक अप्रिचित
14:11भावना उनके अंतर्मन में जागरित हुई.
14:14शिव के नेत्र अब पूरी तरह खुल गए, उनका शांत चित एक नई मधूर हलचल से भर गया, जैसे एक
14:22सुक्त ज्वाला मुखी में प्रेम की चिंगारी भड़क उठी हो.
14:26कामदेव ने दूर से अपने लक्षे को भेदते हुए, संतुष्टी की एक विजी मुस्कान बिखेरी यह मानते हुए कि उसने
14:35अपना कार्य सफलता पूर्वक पूर्ण कर लिया है.
14:39परंतु शिव की दृष्टी, जो अब पूरी तरह से जागरित हो चुकी थी, धीरे धीरे उस अदृष्ष शक्ती के स्रोत
14:46की ओर मुड़ी, जिसने उनके ध्यान को भंग किया था.
14:51कैलाश के सर्वोच शिखर पर देवों के देव महादेव गेहन समाधी में लीन थे, जहां ब्रहमांड की प्रत्येक ध्वनी शांत
14:59हो गई थी.
15:01परवत की ओट में छिपा, कामदेव अपने गन्ने के धनुष पर पूलों के बान चड़ा रहा था, जिसकी नोक पर
15:08वासना का मधुर विश लगा था.
15:11उसके दिव्य प्रभाव से, रुखे पहाड भी अचानक नवजीवन पाकर खिले हुए कुसुमोध्यान में बदल गए, हर ओर मकरंद की
15:19सुगंध फैल गई.
15:21अवसर को साथ कर, कामदेव ने अपने मोहनास्त्र को लक्षे की ओर साधा, जिसका उद्देश ब्रहमांड के सबसे बड़े तपस्वी
15:30के तप को भंग करना था.
15:33दिव्यबान एक स्वर्गिय बिजली की भाती वायुमंडल को चीरता हुआ, अपने मोहक आकर्शन के साथ तीवर गती से महादेव की
15:41ओर बढ़ा.
15:43शन भर में वह कामबान सीधे महादेव के हरिदैस थल में जा लगा, जहां अनादी काल से कोई कामना नहीं
15:50जन्मी थी.
15:52बान के स्पर्ष से परमशान्त महादेव के देह में एक सुक्ष्म कमपन हुआ, जैसे सुप्त ब्रहमांड में पहली हलचल हुई
16:00हो.
16:01उनकी शांत निमीलित पलकों के नीचे, आखों में एक क्षणिक चमक उठी, जो अनन्त काल के तब के बाद एक
16:09नई अनुभूती का संकेत था.
16:12एक अप्रिचित मधुर उश्मा उनके समस्ट अस्तित्व में फैल गई, जो अनन्त काल के वैराग्य में कभी अनुभव नहीं की
16:20गई थी.
16:21एक तीवर विचलित करने वाली कामना का क्षणिक ज्वार उनके मन में उठा, जो उनकी एकाग्रता को तोरने की धमकी
16:29दे रहा था.
16:31उनकी गहन समाधी डगमगाने लगी, सहस्त्रों वर्षों की तपस्या की आधारशिला क्षण भर के लिए हिल उठी.
16:40महादेव को ततकाल आभास हुआ कि यह कोई आंतरिक विकार नहीं, बलकि किसी बाहरी शक्ती का दुस्सांसिक हस्तक्षेप है.
16:49उनकी परमशांती भंग हुई थी, जो तीनों लोकों के लिए एक अक्षमय अपराध था.
16:56उनके दिव्य माथे पर एक गहरी शिकन उभ्री, जो ब्रहमांड को विचलित करने वाले असंतोष का पहला संकेत था.
17:05धीरे-धीरे अत्यंत गंभीरता से उन्होंने अपनी आखें खोलनी आरंभ की, मानो अनंत काल की निद्रा से जाग रहे हुँ.
17:14जैसे ही उनकी पलके धीरे-धीरे उठीन, तीनों लोकों में एक अप्रत्याशित सन्नाटा चा गया, हर आत्मा ने अपनी सांस
17:23रोक ली.
17:25ब्रहमांडी अगनी के समान उनकी आखें खुली, और उन्होंने अपनी भंग हुई शांती के स्रोत की खोज में चारों ओर
17:32स्कैन किया.
17:34उनकी तीखी द्रिष्टी हर चाया, हर पत्ती को भेद रही थी, उस उद्दंड आत्मा को ढूंडते हुए जिसने उनका तप
17:42भंग करने का साहस किया.
17:45उनका शांत, राजसी मुखमंडल अब धीरे-धीरे क्रोध की अगनी से विक्रित होने लगा था, प्रत्येक रेखा में भीशन रोश
17:53उभर रहा था.
17:55उनकी द्रिष्टी में ब्रहमांडिय तूफान उमड रहा था, जिसका प्रत्येक कन उस परम शक्ती के प्रल्यंकारी क्रोध की घोशना कर
18:03रहा था.
18:05शिव अपने तपस्या भंग होने से उपजेतीवर क्रोध में, गहन वन की ओर अपनी धधक्ती द्रिष्टी घुमाते हैं, हर छाया
18:13में किसी अज्यात उपदरवी को खोचते हुए.
18:17सहसा, एक विशाल व्रिक्ष के पीछे से आती अद्रिष्य उर्जा को भांप कर, शिव की आखे सुक्षमता से सिकुर्ती हैं,
18:25जिसने उनके शांत ध्यान में विधिन डाला था.
18:29विशाल काय व्रिक्ष के पीछे छिपा कामदेव, अपने पुष्प बानों और गन्ना धनुष को कसकर पकड़े हुए, भैसे थर-थर
18:37कांप रहा है, शिव की अलौकिक ग्रिष्टी से बचने की व्यर्थ आशा में.
18:42शिव की भेदक ग्रिष्टी ने अंत्ह अद्रिश्य आवर्ण को चीर दिया और कामदेव को उसकी छिपने की जगहे पर पकड़
18:50लिया, जिससे देवताओं का दूद स्थब्ध रह गया.
18:54पकड़े जाने पर कामदेव कापते हुए अपने पुष्प बान और गन्ना धनुष गिरा देता है, और अपने हाथों को जोड़कर
19:02शिव सिक्षमा और दया की अंतिम मूख याचना करता है.
19:08कामदेव को सामने देखकर शिव का क्रोध ज्वाला मुखी की तरह भड़क उठता है, ब्रहमांड की नीम्व तक को जख
19:15जोरता हुआ, क्योंकि उनका धैर्य पूरी तरह समाप्थ हो चुका था.
19:20उनके माथे पर स्थित तीसरा नेत्र धीरे-धीरे पूरी तरह खुलता है, जिससे एक अविश्वसनिय धधकता हुआ प्रकाश निकलता है,
19:29जो आसपास के वातावर्ण को तीवर गर्मी से भर देता है.
19:34तीसरा नेत्र पूरी तरह खुलते ही, उससे एक प्रचंड और धधकता हुआ अगनी स्तंध फूटता है, जो सीधे कामदेव की
19:43और एक अद्रिश्य तीर की भाती, वेग से बढ़ता है.
19:48असाय कामदेव स्तब्ध और गतिहीन खड़ा था, जब वह तीवर अगनी की लप्टों से तुरंट घेर जाता है, जो उसे
19:56एक पल में अपने आगोश में ले लेती हैं.
20:00एक पल में ट्रेन के देवता कामदेव का अलौकिक रूप विशाल अगनी के वेग से जल कर राख के धेर
20:07में बदल जाता है, केवल एक सुक्ष्म धुए का बादल शेश रह जाता है.
20:12दूर से ही कामदेव के भस्म होते देख, रती का हृदय चीख उठता है, एक ऐसी दर्धनाक विलाप करती है,
20:21जो पूरे ब्रहमांड में गूंज उठती है.
20:24अपने पती की ओर आकर्शित होकर, रती अपने विलाप के बीच तीवर गती से उस स्थान की ओर दौरती है,
20:32जहां अभी अभी कामदेव का अंथुआ था, आखों में आसुओं की धारा लिये.
20:38जली हुई धर्ती पर कामदेव की राख का धेर देखकर, रती का शरीर नियंत्रन खो देता है, और वह उसके
20:46सामने अश्रुपूर्ण आखों से पूरी तरह तूटकर गिर पड़ती है.
20:51अपने प्रिय कामदेव की राख को अपने हाथों में उठाते हुए, रती का हृदय विदारक विलाप आरंभ होता है, जो
20:59स्वर्ग और प्रित्वी दोनों को अपने दुख से भिगो देता है.
21:04रती अपने दुख में भी शिव की ओर अपना चहरा उठाती है, उनकी अलौकिक शक्ती से अपने पती को पुनरजीवित
21:12करने के लिए आर्तभाव से याचना करती है.
21:16शिव अपने तपस्या भंग होने से अभी भी क्रोधित रती के हृदय विदारक विलाप को सुनते हुए एक विशाल अचल
21:24परवत की भाती खड़े रहते हैं, उनके मुख पर एक गहन गंभीरता चाई हुई है.
21:31जब शिव से कोई उत्तर नहीं मिलता, तो रती का दुख और भी गहरा हो जाता है, और वह अपने
21:38पती के नाम पर फिर से करुन पुकार लगाती है, उसकी आवाज निराशा से भर जाती है.
21:45दूर गगन में कई दिव्य प्राणी और रिशिगन इस विनाशकारी दृष्य को भय और करुणा के साथ देखते हैं, कामदेव
21:53के बलिदान और रती के असीन दुख पर शोक मनाते हैं.
21:58एक भयानत सन्नाटा ब्रहमांड पर छाजाता है, कामदेव की राख और रती के विलाप के अलावा कुछ नहीं, जो इसक्षन
22:06की भारीत रास्दी की गवाही दे रहा है.
22:10हालाकी शिव के मुख पर एक सुक्षम परिवर्तन होता है, जो भविश्य में कामदेव के पुनुरुथान की एक असपष्ट संभावना
22:19का संकेत देता है, रती के अनवरक प्रेम और तपस्या के कारण.
22:24कामदेव के भस्म होते ही संपून ब्रहमांड में त्राहित्राही मच गई और समस्थ देवता भगवान शिव के प्रल्यंकारी रूप को
22:32देखकर भय से कामपने लगे.
22:35क्रोध की अगने शान्थ होते ही भगवान महादेव का तीसरा नेत्र धीरे-धीरे बंध हुआ, परंतु उनकी देह से अब
22:43भी प्रचंड रुद्र तेज प्रजवलित हो रहा था.
22:46देवराज इंद्र के नेत्रित्व में समस्थ देवगण तुरंत कैलाश परवत पर प्रकट हुए और महादेव के चर्णों में साष्टान प्रणाम
22:55करके क्षमा मांगने लगे.
22:58इंद्रदेव ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रार्थना करते हुए स्विकार किया कि कामदेव निर्दोष थे और उन्होंने यह कार्य केवल देवताओं
23:06के कल्यान के लिए किया था.
23:09वही निकठी कामदेव की पत्नी देवी रती अपने स्वामी की राख के धेर के पास बैठकर अत्यंत करुन करंदन कर
23:17रही थी
23:19उसी क्षन संपूर्ण आकाश में एक आलोकिक दिव्य प्रकाश फैला और जगत पालक भगवान श्री हरी विश्नु वहां प्रकट हुए
23:28भगवान विश्नु के शांत और करुनामय स्वरूप को देखकर देवताओं के भैभीत हृदय को अपार शांती का अनुभव हुआ
23:37श्री हरी विश्नु ने आगे बढ़कर महादेव को शांत किया और उनके प्रल्यंकारी तेज को अपनी सौमय वानी से शीतल
23:45कर दिया
23:47ततपश्चात प्रभु विश्नु ने विलाप करती हुई देवी रती की ओर देखा और उन्हें अभय मुद्रा में सांत्वना दी
23:55विश्नु जी ने समझाया कि कामदेव का यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा क्योंकि इसके पीछे ब्रहमांड का एक गूड और
24:03महान उद्देशित छिपा है
24:06देवी रती ने अश्रुपूरित वानी में पूछा कि अपने पती के बिनावे इस संसार में जीवन कैसे व्यतीत करेंगी
24:15भगवान विश्णु ने देवी रती को वर्दान दिया कि कामदेव अमर रहेंगे और अनंग के रूप में केबल रती को
24:22ही अग्रिश्य रूप में दिखाई देंगे
24:25श्री हरी ने आगे भविश्यवानी की की द्वापर युग में कामदेव, श्री कृष्ण और रुकमिनी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप
24:32में पुनह भौतिक शरीर धारण करेंगे
24:35यह वर्दान पाकर देवी रती के अश्रुथम गए और उन्होंने भक्तिभाव से भगवान विश्नु के चर्णों में शीशनवाया
24:44दूर खड़ी देवी पारवती ने भी यह सब देखा और उनका हृदय महादेव के प्रती अगात प्रेम और भक्ती से
24:52भर गया
24:54पितामा ब्रह्मा ने भी महादेव के शान्त रूप को नमन किया और विश्नु जी के इस अध्भुत न्याय की भूरी
25:01-भूरी प्रशन साकी
25:03महादेव ने विश्नु भगवान के वचनों का आदर करते हुए मौन स्वीकृती दी और उनका क्रोध पूर्णत है शान्त हो
25:10गया
25:12स्वर्गलोक से गंधर्वों और अपसराओं ने पुश्प वर्शा की जिससे संपूर्ण कैलाश परवत की वायू सुगंधित हो उठी
25:21समस्थ देवताओं ने एक स्वर में हर हर महादेव और जैश्री हरी के जैकारे लगाए जिससे आकाश गुँझ उठा
25:29शांती स्थापित होने के बाद अब मंच तयार था देवी पारवती की उस कठिन महातपस्या के लिए जो इतिहास बदलने
25:38वाली थी
25:39कामदेव की भस्न के समक्ष खड़ी होकर माता पारवती ने यह समच लिया कि बाहरी सौंदर्य से महादेव को नहीं
25:47बलकी केवल निशकाम भक्ती और कठिन तपस्या से ही जीता जा सकता है
25:54अपने राजमहल लोटकर पारवती ने संसार के समस्त भौतिक सुख सुविधाव और शाही विलासिता का सदा के लिए त्याग करने
26:02का द्रिड संकल्प लिया
26:04माता पारवती ने अपने मस्तक से स्वर्ण मुकुट, बहुमूल्य रत्न और रेश्मी वस्त्र उतार कर एक साध्वी का अत्यंत साधारन
26:13भेश धारन कर लिया
26:15रानी मेना ने अपनी कोमल पुत्री को अत्यंत कठिन तपस्या करने से रोकने के लिए व्यथित होकर उमा कहकर पुकारा,
26:23किन्तु पार्वती का संकल्प अटल था
26:26राजसी जीवन त्याद कर पार्वती नंगे पाव कठोर पथरीले हिमाली मारगों पर साधना के लिए द्रिड कद्मों से आगे बढ़
26:34गई
26:35हिमाले के सर्वोच्च और अगमय शिखर पर पहुँच कर माता पार्वती ने शांत और पवित्र वातावर्ण में अपनी एतिहासिक महात्पस्या
26:44का शुभारंभ किया
26:47उन्होंने गंगा नदी की पवित्र मिक्टी से शिवलिंग का निर्मान किया और भावविभोर होकर उस पर पुष्प और जल अर्पित
26:54करते हुए ध्यान लगाया
26:57ग्रिश्म रितू की भीशन तपन में पार्वती ने स्वयं को चार प्रजवलित अगनियों से घेर कर और उपर चमकते सूर्य
27:04को एक तक देखते हुए पंचागने तप आरंभ किया
27:09प्रजवलित ज्वालाओं के मध्य एक पाव पर खड़ी होकर वे अनवरत रूप से उम नमः शिवाय के महामंत्र का जाप
27:16करने लगी
27:18मुसलाधार मानसूनी वर्षा, कड़क्ती बिजली और प्रचंड तूफानों के बीच भी पारवती का ध्यान रंचमात्र भी नहीं डिगा
27:27शीतकाल की जमा देने वाली बर्फीली रातों में वे हिमाले की बर्फ से ठंडी नदियों के बहते जल में आधी
27:34डूबी रहकर तब करती रही
27:37शरीर के कठोर कश्टों की परवाह किये बिना उन्होंने पहले केवल व्रिक्षों के गिरे हुए सुखे पत्ते और कंदमूल खाकर
27:45स्वयन को जीवित रखा
27:47अंत्य उन्होंने सूखे पत्तों का भी त्याग कर दिया और केवल वायू का भक्षन करते हुए अपर्णा नाम से संपून
27:55ब्रहमांड में विख्यात हुई
27:58पार्वती के शरीर से निकलने वाले प्रखर आध्यात्मिक तेज से संपून हिमालय का हिंसक वातावर्ण भी एक परम शांत तपोवन
28:06में बदल गया
28:08उनके अलोकिक तपोबल के प्रभाव से खूंखार सिंह, तिरण और विशैले सर्प अपनी प्राकृतिक शत्रुता भूल कर उनके समीप शांती
28:17पूर्वक बैठने लगे
28:19आकाश मार्ग से गुजरते हुए सब्तर्शियों ने पार्वती की इस अभूत पूर्व और अकल्पनिय साधना को देखकर विस्मय से अपने
28:27मस्तक जुका लिए
28:30देवलोक में आसीन ब्रह्मा और विश्मों ने पार्वती की अनन्य निष्ठा और तपस्या की पराकाश्ठा को देखकर उन पर पुष्प
28:38वर्शा की
28:40पार्वती के तपसे उत्पन हुई अपार अलौकिक उर्जा की तरंगे दसों दिशाओं को भेदती हुई कैलाश परवत के गहन शूने
28:48तक पहुँचने लगी
28:50पार्वती के निश्काम और अगाध प्रेम के स्पंदन को महसूस करके भगवान शिव की सदियों पुरानी समाधी स्वतह ही भंग
28:58होने लगी
29:00समस्त बंधनों और सांसारिक विकारों से मुक्थ होकर तपो में पार्वती अब महादेव के पूर्ण मिलन के लिए सर्वतह तयार
29:08खड़ी थी
29:10पार्वती जी के प्रचंड तपोबल से तीनों लोकों को प्रदीप्त देखकर भगवान शिव ने उनकी निष्ठा की अंतिम परीक्षा लेने
29:18का विचार किया
29:20महादेव ने आकाश मार्ग से सब्तर्शियों का स्मरण किया और पलक जपकते ही सातों दिव्यरिशी कैलाश परवत पर उपस्थित हो
29:28गए
29:30भगवान शिव ने सब्तर्शियों से कहा कि वे पारवती के तपोवन में जाकर उनके द्रिड संकल्प और भक्ती की कठोर
29:37परीक्षा ले
29:39शिवजी की आग्या पाकर सब्तर्शी दिव्य जोती के समान हिमशिकरों पर बसी पार्वती की पावन तपोभूमी की ओर बढ़े
29:48परमतपस्वी सब्तर्शियों को अपने समक्ष पाकर देवी पार्वती ने उठकर अत्यंत नमरता पूर्वक उनका वंदन और सतकार किया
29:58महर्शी वशिष्ठ ने पार्वती से कहा कि शिव भस्मधारी, श्मशानवासी और अमंगलकारी वेश धारन करने वाले वैरागी हैं
30:08रिशियों ने छलपूर्वक देवी को परामर्श दिया कि वेश मशान के योगी शिव का त्याग कर वैकुंठनाथ भगवान विश्नु का
30:16बरण करें
30:18सब्तर्शियों की बाते सुनकर देवी पार्वती ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि उनका मन महादेव के अतिरिक्त किसी अन्य
30:26को स्विकार नहीं कर सकता
30:29पार्वती जी ने निडर होकर कहा कि भगवान शिव सगुन और निर्गुन से परेश्वयन परंब्रहम हैं जिनकी महीमा अज्यानी नहीं
30:37समझ सकते
30:39देवी पार्वती की अखंड और अचल शिव भक्ती से अभिभूत होकर सब्तर्शियों ने उन्हें आत्मिय आशिरवाद दिया और कैलाश की
30:48ओर लोट गए
30:50कैलाश पहुँचकर सब्तर्शियों ने भग्वान शिव को पार्वती की अनुपम तपस्या और अडिक प्रेम की गाथा सुना कर उनकी प्रशन
30:58साकी
30:59अब स्वयं परीक्षा लेने के उद्देश्य से भग्वान शिव ने एक कमनिय और तेजस्वी बटुक युवा ब्राहमन का रूप धारण
31:07कर लिया
31:09हाथ में कमंडल और छट्र धारण किये तेजस्वी ब्रहमचारी बटुक छद्म रूप में पार्वती जी की शांत तपोभूमी में प्रविष्ठ
31:17हुआ
31:18बटुक ने पार्वती के निकट पहुँचकर अत्यंत विनीत भाव से उनकी कठिन तपस्या का कारण और उनका परिचय पूछा
31:27जब पार्वती ने शिव को पती रूप में पाने की इच्छा व्यक्त की तो बटुक ने कुटिल्टा पूर्वक हंस्ते हुए
31:35शिव के अवगुनों का बखान शुरू कर दिया
31:38बटुक ने कहा कि जो गले में सर्प लपेटे बैल पर सवार होकर भटकता है वह राजकुमारियों के योग्यपती कभी
31:46नहीं हो सकता
31:48अपने आराध्य शिव की ऐसी निंदा सुनकर देवी पारवती के नयन क्रोध से प्रदीप्थो उठे और उनका मुखमंडल तेजस्वी हो
31:57गया
31:59पारवती जी ने बटुक को रुकने की चेतावनी दी और शिवनिंदा सुनने के पाप से बचने के लिए वहां से
32:05मुढ कर जाने लगी
32:07उसी क्षन बटुक का रूप ओजल हो गया और भगवान शिव अपने अनुपम चारू और दिव्य स्वरूप में पारवती के
32:15सामने प्रकट हो गए
32:17परमेश्वर शिव ने प्रेम पूर्वक पारवती का हाथ ठाम लिया और उनकी तपस्या से पूर्णत है प्रसन्न होकर उन्हें अपनी
32:25अर्धांगिनी स्विकार किया
32:28हिमालय की बरफीली चोटियों पर देवी पारवती अपनी महात पस्या के चरम पर पहुंच चुकी थी जहां उनके शरीर ने
32:36भौतिक सीमाओं को पार कर शुद्ध जोती का रूप धारण कर लिया था
32:41अद्रिश्य रूप में शिव अपने मनमोहक योगी वेश में वर्षों की अथक तपस्या से कुंदन सी तपकर निकली पारवती की
32:49अप्रतिम आस्था और अटल प्रेम को निहार रहे थे उनके हृदय में एक अपूर्व भाव जागरित हो रहा था
32:57तब शिव को अंतह यह ज्यात हुआ की पारवती का प्रेम किसी भी परीक्षा से परे है और अब किसी
33:04भी और कठिन अगनिपरीक्षा की आवश्शकता नहीं उनका समर्पन स्वय में पूर्ण है
33:10परंतु इसी क्षण पार्वती के मन में एक क्षणिक संदेह उठा, जैसे उनकी तपस्या का फल अभी भी एक मायावी
33:18म्रिगत्रिशना हो, उनके धैर्य की अंतिम सीमा पर खड़ा एक विचलित विचार
33:24तभी आकाश में एक तीवर अलौकिक प्रकाश पुँच प्रकट हुआ, जिसने समस्त ब्रहमांड को अपनी स्वर्णिम आभा से प्रकाशित कर
33:33दिया, जैसे सहस्र सूरियों का तेज एक साथ उतर आया हो
33:38योगी के छद्मरूप से लिप्टा शिव का दिव्य शरीर धीरे-धीरे विख्टित होने लगा, उसकी मानविय परतों के भीतर से
33:45अनंत ब्रहमांड का सार और नीलकंठ का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता चला गया
33:51पार्वती ने विस्मय और आनंद से अपनी आखें खोली, उनके समक्ष छद्मरूप से परे महादेव का वास्तविक भव्य स्वरूप धीरे
34:00-धीरे साकार हो रहा था, एक ऐसा दर्शन जो युगों की प्रतीक्षा का फल था
34:06और फिर समस्त ब्रहमांड को स्तब्ध कर महादेव शिव अपने पूर्णत तेजस्वी और अनुपम रूप में प्रकट हुए, उनके मुख
34:15मंडल से करोडो सूर्यों का तेज और अनंत शान्ती प्रवाहित हो रही थी
34:20इस अविस्मनिय दर्शन के सम्मुख पार्वती अपने समस्त अहंकार और तपस्या के भार को त्याग कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान
34:29शिव के चर्णों में निढाल होकर गिर पड़ी, उनका हृदय परम भक्ती से परिपूर्ण था
34:35आकाश और प्रित्वी के बीच गूंजती शिव की गंभीर मधुर्वानी ने कहा, हे पर्वतराज की पुत्री, हे तपस्या की मूर्ती,
34:44मैंने तुम्हे परख लिया है, और तुम्हारा प्रेम शाश्वत है, शुद्ध है, और अतुल्निय है
34:52महादेव ने पार्वती की वर्षों की विकट तपस्या का स्मरण किया, उनके त्याग और कश्टों का एक-एक पल उनके
34:59मन में जीवन्त हो उठा, जैसे कोई दिव्य कहानी स्वया उनके समक्ष अनफोल्डिंग हो रही हो
35:06तुम्हारा प्रेम हे गिरिजा, लौकिक नहीं, वह ब्रहमांडी है और हर अगनिप्रीक्षा ने उसे और अधिक शुद्ध और अधिक प्रबल
35:15बनाया है
35:15शिव ने अपने अनमोल वचन कहे, उनकी वानी में समस्त स्विष्टी का आशिरवाद समाया था
35:23महादेव ने स्वयन स्विकार किया कि पारवती के अटल प्रेम और त्याग ने उनके हृदय को भी विचलित कर दिया
35:30है
35:30उन्हें अपने एकांत और वैराग्य से बाहर निकल कर प्रेम की ओर आकर्शित किया है
35:36अब से तुम मेरी अरधांगिनी हो, मेरी शक्ती, मेरे अस्तित्व का अविभाज अंग शिवने गर्जना करते हुए कहा
35:45और उनके इन शब्दों से समस्त ब्रहमांड में एक नई उर्जा का संचार हुआ
35:51महादेव ने पार्वती का हाथ, अपने विशाल, शक्तिमय हाथ में लिया और दिव्य विवाह का वचन दिया
35:58मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्विकार करता हुँ और हमारा विवाह ही स्रिष्टी का सबसे पावन उच्सभ होगा
36:06ततकाल आकाश से देवदुन्दु भी बज उठी और समस्थ स्वर्गलोक से देवता, गंधर्व और अपसराय प्रकट हुए इस दिव्यस विकारोक्ती
36:16का साक्षी बनने और इस पवित्रक्षन का जयगोश करने के लिए
36:21प्रित्वी पर भी प्रकृती ने अपनी अनुपम सुन्दर्ता बिखेरी, फूल खिल उठे, नदिया शान्थ होकर बहने लगी और पहाडों की
36:29चोटिया स्वर्ण के समान चमक उठीन, मानो समस्थ स्रिष्टी इस शुब घडी का जश्न मना रही हो
36:37पार्वती का रूप अब बदल चुका था, तपस्या की कठोर्ता से निकल कर वह अनुपम सौन्दर्य और देविय तेज से
36:44परिपूर्ण एक पूर्ण देवी में परिवर्तित हो चुकी थी, उनकी आभा से सारा वातावर्ण जगमगा उठा
36:52शिव और पार्वती एक साथ खड़े थे, दो आत्माए एक होकर, उनकी दिव्य उपस्थिती से समस्त ब्रह्मांड प्रेम, शक्ती और
37:00संतुलन के एक नए युग की शुरुवात का अनुभव कर रहा था
37:05यह स्विकारोक्ती मात्र प्रेम का मिलन नहीं थी, बलकि ब्रह्मांडिय संतुलन की पुनह स्थापना और उस महाशक्ती के आगमन की
37:14प्रतिग्या थी, जो बाग में सृष्टी को भय से मुक्ती दिलाएगी
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