Skip to playerSkip to main content
सती के आत्मदाह के बाद, जब महादेव गहन तपस्या में लीन हो गए, तब ब्रह्मांड पर तारकासुर का आतंक छा गया! 👹 देवताओं की पुकार पर, भगवान विष्णु ने शिव पुत्र से ही उसके वध की भविष्यवाणी की। यह एपिसोड बताता है कि कैसे देवताओं ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने भेजा और कैसे हिमवान की पुत्री पार्वती, सती के पुनर्जन्म के रूप में, शिव से मिलन की ओर अग्रसर हुईं। क्या कामदेव सफल होंगे? शिव-पार्वती के प्रेम की दिव्य गाथा का आरंभ! ✨🙏 #VishnuPurana #ShivaParvati #Tarakasura #Kartikeya #HinduMythology #DevonKeDevMahadev #Puranas
Transcript
00:00सती के आत्मदाह और वीर्भदर के भयंकर प्रकोप के बाद प्रजाप्ती दक्ष का यग्यस्थल्ष मशान में परिवर्तित हो चुका था,
00:08जहां भयभीत देवता अपनी प्रानरक्षा के लिए यहां वहां भाग रहे थे।
00:14विध्वन्सकारी वीर्भदर का प्रचंड और रौद्र स्वरूप अभी भी यग्यमंडप के भगनावशेशों पर छाया हुआ था, जिसकी गर्जना से समस्त
00:23ब्रह्मांड की दिशाएं काम प्रही थी।
00:43त्रज्वालाय राख में बदल रही थी, जिससे तीनों लोकों का संतुलन गड्मड होने लगा।
00:49समुद्र के स्वामी वरून देव चोब और लज्जा से भरे हुए दूशित लहरों को देख रहे थे, मानो महासागर भी
00:57सती के बलिदान पर अश्रु बहा रहा हो।
01:00पवन देव की गती महादेव के अपार शोक के कारण थम गई थी, और संपूर्ण स्रिष्टी में एक दरावनी तथा
01:07घुटन भरी निरवता चा गई।
01:10प्राकृतिक व्यवस्था पूरी तरहे छिन्नभिन हो गई थी, पक्षियों ने गाना बंद कर दिया था और वनस्पतियां अपना सौंदर यको
01:19कर मुर्जाने लगी थी।
01:21स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा अपने विशाल कमल पर उदास बैठे हुए थे, क्योंकि उनके द्वारा रचित ब्रहमांडिय नियम शिवक्रोध
01:30की अगनी में भस्म हो चुके थे।
01:33भय से व्याकुल समस्त देवता एक स्थान पर एकत्र हुए, जिनकी कभी जाजवल्यमान रहने वाली दिव्य आभा अब निराशा के
01:42अंधेरे में विलीन हो रही थी।
01:45देवताओं ने आपस में स्विकार किया कि प्रजाप्ती दक्ष के अहंकार और महादेव के अनादर का परिणाम ही आज उन्हें
01:52इस भयानक विनाश के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
01:57उधर्प महायोगी शिव सती के भस्म अवशेशों को बाहों में थामे प्रचंड विलाप करते हुए संपून ब्रहमांड में उग्रतांडव नृत्य
02:06करने लगे।
02:08महाप्रलय की स्थिती को रोकने के लिए भगवान विश्नु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को बावन
02:15भागों में विभाजित कर दिया।
02:18सती के देहत्याग के पश्चात अत्यंत विरक्थ होकर महादेव निर्जन कैलाश परवत की ओर लोट गए जहां केवल बर्फ की
02:26जमा देने वाली ठंड फैली थी।
02:29कैलाश की उच्चतम चोटी पर बागंबर बिचाकर शिव पदमासन में बैठ गए और स्वयं को संसार की सुधबुध से दूर
02:37एक घोर समाधी में लीन कर लिया।
02:40महादेव की समाधी इतनी कठोर थी कि उनके चारों और एक दुरगम बर्फीली अगनी की दीवार बन गई जिसने उन्हें
02:49समस्त सुरसुर लोक से काट दिया।
02:51शिव के इस कठोर वैराग्य के कारण संपूर्ण ब्रहमांड में पुरुष और प्रकृती का संतुलन पूरी तरह से तूट गया,
03:00जिससे अंधकार का विस्तार होने लगा।
03:02शिव की अनुपस्थिती और देवताओं के क्षीन बल को देखकर पाताल लोक में असुरी शक्तिया पुनह सिर उठाने लगी और
03:11अत्याचार का शड्यंत्र रचने लगी।
03:15निराश और निस्सहाय होकर इंद्र और समस्त देवता दूर से ही कैलाश की दिशामे हाथ जोड़कर महादेव से पुनह कृपा
03:23करने की प्रार्थना करने लगे।
03:25तब भगवान विश्णू ने प्रकट होकर देवताओं को आश्वस्त किया कि समय आने पर सती पुनह जन्म लेंगी और महादेव
03:34के इस असीम शोक का अंत करेंगी।
03:37देवर्शी नारद वीना की तान छेरते हुए इस महान कथा के अगले सोपान की नीम रखने के लिए हिमालय राज
03:44के धाम की ओर प्रस्थान कर गए।
03:47जब तारकासुर ने तीनों लोकों पर आधिपत्य स्थापित करने की लालसा से एक दुर्गम ज्वाला मुखिये परवत पर घोर तपस्या
03:56प्रारंब की।
03:58कई हजार वर्षों तक बिना जल और अन्न के एक पैर पर खड़े होकर की गई उसकी उग्र साधना से
04:04ब्रहमांड में भीशन उत्ताप उत्पन होने लगा।
04:08तारकासुर की निश्ठा और तपका तेज देखकर स्रिश्टी के रचिता भगवान ब्रहमा स्वयम प्रकट हुए।
04:16ब्रहमा जी के प्रकट होते ही तारकासुर ने उन्हें प्रणाम किया और परम अमर्ता प्राप्त करने का वर्दान मांगा।
04:24स्रिष्टी के नियम की दुहाई देते हुए ब्रहमा जी ने कहा कि जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव की मृत्यू निश्चित
04:31है, इसलिए कोई अन्यवर मांगो
04:35तारकासुर ने अत्यंत चालाकी से वर्दान मांगा कि उसका वद केवल भगवान शिव के औरस पुत्र द्वारा ही संभव हो
04:43सके
04:44सती के विरह में शिवजी के वैरागी होने की बात जानकर आश्वस्थ तारकासुर को ब्रहमा जी ने तथास्तु कहकर वर्दान
04:52प्रदान किया
04:54वर्दान पाते ही तारकासुर के अहंकार की कोई सीमा न रही और वह उन्मत्त होकर जोर-जोर से हंसने लगा
05:03अपनी असीम शक्ती के बल पर तारकासुर ने पाताल लोक में एक विशाल और क्रूर असुरी सेना का गठन किया
05:11आमकार में अंधे होकर उसने स्वर्ग लोक को जीतने के लिए अपनी पूरी सेना के साथ देव लोक पर आक्रमन
05:19कर दिया
05:20देवराज, इंद्र और सभी देवताओं ने तारकासुर के इस अचानक हमले का सामना करने के लिए अपने शस्त्र उठा लिए
05:29स्वर्ग के प्रांगन में देवताओं और असुरों के बीच एक भयानक और रक्तरंजित महासंग्राम छिड़ गया
05:37वर्दान के कारण अजे तारकासुर ने अपनी सनहारक शक्तियों से देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं को परास्त कर दिया
05:46असुरों के अत्याचार से भयभीत होकर समस्त देवता स्वर्ग लोक छोड़कर वनों और गुफाओं में छिपने पर विवश हो गए
05:55स्वर्ग पर अधिकार जमा कर तारकासुर स्वयन सिनहासन पर बैठ गया और तीनों लोकों पर अपना क्रूर शासन स्थापित किया
06:04तारकासुर के आदेश पर असुरों ने प्रिथवी पर रिशियों मुनियों के पवित्र यग्यों का विनाश करना शुरू कर दिया
06:12पवित्र मंत्रों की आहुतियां बंध हो गई और रिशिमुनी भैभीत होकर अपने प्राण बचाने के लिए कंदराओं में शरण लेने
06:20लगे
06:22यग्यहवी न मिलने के कारण देवताओं की शक्तियां क्षीन होने लगी और पूरे ब्रहमांड में अंधकार चाने लगा
06:30निराश और असहाय होकर देवराज इंद्र सभी देवताओं को लेकर सहायता के लिए भगवान विश्नु की शरण में पहुँचे
06:39देवताओं की व्यथा सुनकर नारायन ने उन्हें स्मरण कराया कि इस संकट का निवारन केवल शिवपार्वती के मिलन से ही
06:47संभव है
06:49तारकासुर की भयंकर असुरी सेना ने अमरावती पर भीशन आक्रमण कर चारों दिशाओं में तबाही मचा दी
06:57स्वर्गलोग को बचाने के लिए देवराज इंद्र ने अपनी पराजित सेना को एकत्रित कर अंतिम युद्ध का शंकनाद किया
07:06रन्धूमी में देवताओं और असुरों के बीच भयंकर संग्राम छिड़ गया जिससे पूरा अंतरिक्ष दिव्यास्त्रों की ज्वाला से धधक उठा
07:16इंद्र देव ने अत्यंत क्रोध में आकर अपना वजर तारकासुर पर चलाया परंतु शिव जी के वर्दान के कारण वह
07:23निश्वल हो गया
07:25तारकासुर ने अटहास करते हुए देवताओं के अस्त्रों को विफल किया और अपनी मायावी शक्ती से उन्हें पीछे धकेल दिया
07:34अगनी वायू और वरुन देव के सन्युक्त प्रहार भी तारकासुर के विशालकाय सुरक्षा कवच को भेदने में पूरी तरह अस्फर
07:42रहे
07:43अपने सबसे शक्तिशाली शस्त्रों को व्यर्थ होते देख देवताओं की सेना में भगड़ मच गई और वे रणभूमी छोड़कर भागने
07:52लगे
07:53तारकासुर ने अमरावती के स्वर्ण सिनहासन पर अधिकार कर स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी घोशित कर दिया
08:01पराजित और अपमानित होकर सभी देवता छिपते छिपाते गुप्त पर्वतिय गुफाओं में अत्यंत निराश होकर शरण लेने लगे
08:11निराशा के घने अंधकार में डूब कर देवराज, इंद्र और अन्यमुख्य देवता अपनी मुक्ती का कोई मार्ग न पाकर शोक
08:18संतप्थ थे
08:20उसी क्षण वहाँ देवर्शी नारद का आगमन हुआ, जिन्होंने व्यथित देवताओं को भगवान विश्णु की शरण में जाने का परामर्श
08:28दिया
08:30नारद जी की बात सुनकर समस्त देवता पुनह आशा की किरण लेकर क्षीर सागर की ओर यात्रा करने लगे
08:38वैकुन्ठ लोग के भव्यस्वर्णिन द्वारों पर पहुँच कर देवताओं ने हाथ जोड कर भगवान श्री हरी की जैजैकार की
08:47अनंत क्षीर सागर में शेशनाग की शया पर विराजमान भगवान विश्णू और माता लक्ष्मी के दिव्यदर्शन से देवता अभिभूत हो
08:55गए
08:56सभी देवताओं ने भगवान विश्णू के चरण कमलों में नत्मस्तक होकर तारकासुर के अत्याचारों से रक्षा करने की गुहार लगाई
09:06देवराज इंद्र ने अश्रुपूरित नेत्रों से तारकासुर के असीम वर्दान और देवताओं की दुर्धशा का पूरा वृत्तांत सुनाया
09:15भगवान विश्णू ने अपने शांत और करुणामय नेत्र खोल कर संपूर्ण वातावर्ण में अभय प्रदान करने वाला अलौकिक प्रकाश फैला
09:24दिया
09:25श्री हरी ने देवताओं को बताया कि तारकासुर का वद केवल भगवान शिव के औरस पुत्र द्वारा ही संभव हो
09:32सकता है
09:34यह सुनकर देवता चिंतित हो उठे क्योंकि सती के विरह में महादेव इस समय घोर समाधी में लीन थे
09:42तब भगवान विश्नु ने देवताओं को आश्वस्त किया कि आदिशक्ती ने पार्वती के रूप में जन्म ले लिया है और
09:50शिव पार्वती का मिलन ही इस संकट का अंत करेगा
09:54देवलोक में तारकासुर के भीशन अत्याचारों से त्रस्थ होकर देवतागन भयाकुल हृदय से सहायता और मुक्ती की आस में परमपिता
10:03भगवान विश्नु की ओर अग्रसर हुए जिनकी शक्ती तीनों लोकों की पालक है
10:10शीरसागर में अनन्त नाग की शयापर योग निद्रा में लीन भगवान विश्नु ने अपने कमलन्यन खोलकर स्रिष्टी के स्पंदन को
10:18ग्रहन किया और देवताओं की विलाप से भरी पुकार को सुना जो ब्रहमांड के कोने-कोने में गूंज रही थी
10:26उनकी दिव्य उपस्थिती से क्शीरसागर का वातावर्ण और भी पवित्रहो उठा जहां देवतागन उनके समक्ष हाथ जोड़े आखों में आसूलिये
10:36अपने कश्टों का वर्णन करने लगे
10:39इंद्रदेव ने कापते स्वर में तारकासुर के असीमित बल और उसके द्वारा फैलाई गई अराजक्ता का बखान किया जिससे स्वर्गलोग
10:48की शांती भंग हो गई थी और धर्म का मार्ग अवरुद्ध हो गया था
10:53भगवान विश्णु ने धीर गंभीर मुद्रा में सभी देवताओं की पीडा को सुना उनके प्रत्येक शब्द को आत्मसात करते हुए
11:01जैसे ब्रह्मांड का पालक अपने बच्चों के दुख को समझ रहा हो
11:05कुछ क्षणों की गहन शान्ती के बाद भगवान विश्णु ने अपनी अमृत्वानी में बोलना आरंभ किया उनकी प्रत्येक शब्द में
11:15तीनों लोकों को सांत्वना देने वाली शक्ती समाई हुई थी
11:20उन्होंने समझाया की तारकासुर को ब्रह्मा का वर्दान प्राप्थ है जिसने उसे अजे बना दिया है केवल शिव के पुत्र
11:28द्वारा ही उसकी मृत्यू संभव है यह नेती का अटल विधान है
11:34तारकासुर के विनाश के लिए एक ऐसे असाधारण योध्धा की आवश्शक्ता है जो ब्रह्मान की समस्त नकारात्मक शक्तियों का सहार
11:42कर सके और वह शक्ती केवल महादेव के रुधिर से ही जन्म ले सकती है
11:49देवतागन चिन्तित और भमित दिखे क्योंकि शिव तो गेहन समाधी में लीन थे और उनका विवाह करना असंभवसा प्रतीत होता
11:58था
11:59तब भगवान विश्णू ने रहस्यो धातन किया कि सती जो शिव की पूर्व पत्नी थी अब हिमवान की पुत्री पार्वती
12:07के रूप में पुनरजन्म ले चुकी है नेती के गूर चक्र को पूरा करने के लिए
12:13हिमवान की पुत्री के रूप में पार्वती अब शिव को पुनह अपने प्रेम से मोहित करने और उनके वैराग्य को
12:20भंग करने के लिए जन्म ले चुकी है
12:24भगवान विश्णु ने स्पष्ट किया कि पार्वती का तप और प्रेम ही शिव को उनकी समाधी से बाहर लाएगा और
12:31उन्हें विवाह के लिए प्रेरित करेगा जिससे ब्रहमांड का संतुलन पुनह स्थापित होगा
12:37उनके मिलन से ही वह दिव्य शिशु जन्म लेगा जिसके बल से तारकासुर का अहमकार चूर-चूर होगा और देवलोग
12:45पर छाय संकट के बादल छंट जाएंगे
12:48भगवान विश्णों ने देवताओं को आश्वासन दिया कि यह दिव्य योजना अटल है और निश्चित रूप से सफल होगी उन्हें
12:57धैर्य रखने और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की सलाह दी
13:01उन्होंने देवताओं को यह भी समझाया कि उन्हें इस दिव्य विवाह को संपन कराने में अपनी भूमी का निभानी होगी
13:09ताकि शिव और पार्वती का मिलन शीघ्र हो सके
13:14भगवान विश्णों की दृष्टी में एक ब्रहमांडिय गंभीरता थी जो केवल वर्तमान की नहीं बलकि युगों के भविश्य को भी
13:22देखती थी देवताओं में आशा की एक नई लौ प्रजवलित करती हुई
13:28देवताओं जो कुछ क्षण पहले निराशा में डूबे थे अब उनके शब्दों से नई उर्जा और अटूट विश्वास से भर
13:35उठे जैसे सदियों की प्यास बुझ गई हो
13:39उन्होंने भगवान विश्णू को दंडवत प्रणाम किया उनके हृदय कृतग्यता और आस्था से परिपूर्ण थे जैसे अंधकार के बाद सूर्योदय
13:49हुआ हो
13:50जैसे ही देवगन विदा लेने लगे भगवान विश्णू की आखों में ब्रह्मान की संपूर्ण लीला का प्रतिविम दिखाई दिया जहां
13:58हर घटना एक विराट योजना का हिस्सा है
14:02और इस प्रकार भगवान विश्णू के परामर्ष से देवताओं के हिदय में आशा की एक नई किरन जगी जिसने उन्हें
14:11आगामी चुनोतियों का सामना करने के लिए तैयार किया
14:14एक ऐसे भविश्य की ओर जहां शिव पुत्र ही सहारक होगा
14:19देवताओं की सभा में जहां चिंता की लहरेन हर मुख पर स्पष्ट थी भगवान शिव की गहन तपस्या और संसार
14:27से उनकी विरक्ती ने एक गहरा संकट उत्पन्न कर दिया था
14:31क्योंकि तारकासुर का प्रकोग त्रिलोक में छाया हुआ था
14:35स्रिष्टी के पालक भगवान विश्णु अपनी गंभीर और शांत द्रिष्टी से देवताओं को देखते हुए समझते थे कि शिव को
14:44उनके वियोग की अगनी से बाहर निकालना कितना दुश्कर होगा फिर भी यही एक मात्र मार्ग था
14:51भगवान ब्रह्मा चार मुखों से गहन चिंतन में लीन यह जानते थे कि तारकासुर के अंत के लिए शिव पुत्र
14:58का जन्म अनिवार्य है और इस महान कार्य के लिए शिव को प्रेम के मार्ग पर लाना ही एक मात्र
15:05उपाए है
15:07देवताओं के बीच गहन मंत्रना चल रही थी हर कोई अपनी चिंता व्यक्त कर रहा था कि महादेव को उनकी
15:14समाधी से कैसे विचलित किया जाए जिनकी तपस्या की लौ तीनों लोकों को जला सकती थी
15:21ठीक उसी क्षण त्रिलोक में विचर्ण करने वाले देवर्शी नारद अपनी वीना महाती पर नारायन नारायन का जाप करते हुए
15:29दिव्य प्रकाश के साथ देवसभा में प्रकट हुए उनके आगमन से एक आशा की किरण जगी
15:37नारद ने देवताओं को बताया कि महादेव का हृदय सती के वियोग से तूट चुका है और वे ऐसी गहन
15:44तपस्या में लीन है जहां उन्हें जगाना किसी भी सामान्य शक्ती के वश्की बात नहीं
15:51उन्होंने स्मरण कराया कि तारकासुर को केवल शिवपुत्र ही मार सकता है जिसका जन्म तभी संभव है जब महादेव प्रेन
15:59के बंधन में बंध कर ग्रिहस्थ जीवन अपनाएं
16:03देवताओं को स्पष्ठ हुआ कि स्रिजन के कल्यान और तारकासुर के सहार के लिए महादेव का विवाही एक मात्र समाधान
16:11है और इस हेतु उन्हें उनकी जहन समाधी से बाहर लाना आवश्चक है
16:17किन्तु शिव को तपस्या से जगाने का विचार ही देवताओं को भयभीत कर रहा था क्योंकि उनकी क्रोधागनी प्रलय का
16:25कारण बन सकती थी और कोई भी उनके दिव्य क्रोध का सामना नहीं करना चाहता था
16:31तब देवताओं की दृष्टी कामदेव पर पड़ी जो अपनी पतनी रती के साथ देवसभा में उपस्थित थे उनका मुख भी
16:39इस भयानक कार्य की कल्पना से पीला पड़ गया था
16:44देवताओं ने एक स्वर में कामदेव से प्रार्थना की की वे ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जो शिव के
16:51मन में प्रेम का बीज बो सकते हैं ताकि सृष्टी का कल्यान हो सके
16:56कामदेव ने कापते हुए कहा कि महादेव का क्रोध असीम है और उन्हें जगाने का प्रयास महाविनाश को आमंत्रित करने
17:04जैसा होगा यह सोच कर ही उनका मन भय से भर उठा
17:09देवराज इंद्र अपने दिव्य वजर को थामे हुए कामदेव को समझाया कि यह केवल उनकी शक्ती का प्रश्ण नहीं बलकि
17:17समस्त स्विष्टी के अस्तित्व का प्रश्ण है जिसके लिए उन्हें यह बलिदान देना होगा
17:24रती कामदेव की प्रिय पतनी अपने पती की ओर चिंता भरी द्रिष्टी से देखती रही क्योंकि उन्हें महादेव के क्रोध
17:32की प्रचंडता का अनुमान था और वे कामदेव के भाग्य से डर रही थी
17:38अंतह देवताओं के सामुहिक अनुरोध और सृष्टी के कल्यान के लिए कामदेव ने भारी मन से इस असंभव कार्य का
17:45बीड़ा उठाया, भले ही उन्हें अपने स्वयंके अस्तित्व के विनाश का भय था
17:52कामदेव ने अपनी दिव्य शक्ती को एकत्र किया और अपने फूलों के बाणों को तयार किया, हर बाण में प्रेम
17:59की शक्ती समाहित थी, जो महादेव के हृदय को भेदने के लिए तत्पर थी
18:05कैलाश परवत की अदमें उचाईयों पर महादेव अपनी गहन तपस्या में लीन थे, उनका स्वरूक शांत और स्थिर था, किन्तु
18:13उनके भीतर सती के वियोग की अगनी अब भी धधक रही थी
18:18धीरे धीरे कामदेव अपनी पतनी रती और वसंत रितु के साथ कैलाश परवत की ओर बढ़े, जहां महादेव की तपस्या
18:27की उर्जा उन्हें चुनौती दे रही थी
18:30वसंत रितु के आगमन से कैलाश पर पूलों की बहार और पक्षियों का कलरव गूंच उठा, जिससे महादेव की तपस्या
18:38भंग होने लगी और उनके मन में एक सुक्ष्म हलचल पैदा हुई
18:43कामदेव ने उस क्षण को चुना जब महादेव के हरिदय में सती की स्मृती से एक क्षणिक व्यथा उठी और
18:50उन्होंने प्रेम का बान साधा, जो सीधे महादेव के हरिदय की ओर बढ़ा
18:56तारकासुर के बढ़ते अत्याचारों से भैभीत देवसभा में जब शिव जी की ध्यान समाधी भंग करने का अतिक्थिन प्रश्न उठा,
19:05तब सभी देवताओं की द्रिष्टी प्रेम के देवता कामदेव पर आटी की
19:10देवराज इंद्र ने अत्यांत व्याकुल होकर कामदेव का आहवान किया ताकि वे भगवान शिव के कठोर वैराग्य में प्रेम और
19:18आकर्शन की तरंगें उत्पन्न कर सकें
19:22अलोकिक स्वर्णन कांती से सुशोभित कामदेव देव सभा के मध्य प्रकट हुए किन्तु शिव जी का ध्यान भंग करने का
19:29प्रस्ताव सुनते ही उनका हृदय आशंका से कामप उठा
19:34इंद्र ने त्रिलोक की रक्षा की दुहाई देते हुए कामदेव को समझाया कि केवल शिव और पार्वती के मिलन से
19:41जन्मा पुत्र ही महादानव तारकासुर का सहार कर सकता है
19:46कामदेव ने अत्यंत भयभीत स्वर में कहा कि महादेव के तीसरे नेत्र की प्रल्यंकारी अगनी को प्रजवलित करना सीधे मृत्यू
19:55के विक्राल मुख में प्रवेश करने के समान है
19:59तब ब्रहमाजी और इंद्र ने कामदेव को आश्वस्थ करते हुए स्मरण कराया कि संपून ब्रहमांड की रक्षा हेतु यह महान
20:07बलिदान देना उनका ही धर्म है
20:11स्रिष्टी के कल्यान और धर्म की पुनस्थापना का गुरुतर भार समझते हुए कामदेव ने अपने भय पर विजय पाई और
20:19इस प्रांधा तक अभियान के लिए तत्पर हो गए
20:22देव सभा से लोटकर कामदेव ने अपनी अत्यंत रूपवती पत्नी रती को इस संकट पून और अलौकिक मिशन के विशय
20:30में विस्तार से बताया
20:33कामदेव के मुख से महादेव के क्रोध का संकट सुनकर देवी रती अत्यंत व्यथित हो गई और अश्रुपूरित नेत्रों से
20:40अपने स्वामी को रोकने का प्रयास करने लगी
20:44कामदेव ने अपनी प्रियत्मारती को धीरस बंधाते हुए समझाया कि स्रिष्टी के संतुलन और देवताओं के उध्धार हेतु यह धर्म
20:53संकट स्विकारना ही उनका परम लक्ष है
20:57पती के द्रिड संकल्प और धर्म प्रायंता को देखकर देवी रती ने भी अपने प्रेम के साथ खड़े रहने का
21:04निर्णय लिया और कैलाश चलने को सहर्ष तयार हो गई
21:08इस कठिन कार्य को सफल बनाने हेतु काम देव ने अपने प्रिय मित्र वसंत रितु का आहवान किया जो प्रकृती
21:16में नवजीवन और रस फूंकने में निपुर थे
21:18मित्र की पुकार सुनकर वसंत देव मुस्कुराते हुए प्रकट हुए और उन्होंने कामदेव के इस धर्मयुध में अपनी समस्ट अलोकिक
21:28शक्तियों को समर्पित करने का वचन दिया
21:31कामदेव देवी रती और वसंत ने मिलकर दिव्य इक्षुधनुष और पुश्पबानों को सिद्ध किया जो किसी भी योगी के मन
21:39में अनुराग उत्पन करने की शक्ति रखते थे
21:43कामदेव ने भारों की गुंजायमान प्रत्यंचा से सुसज्जित अपने प्रख्यात पुश्पधनुष को धारण किया जिससे सम्मोहन की अध्भुत गुलाबी और
21:53स्वर्निम किरने फूट रही थी
21:56तीनों दिव्य शक्तिया स्वर्गलोग की सीमाओं को लांध कर बर्फ से ढखे विशालकाय कैलाश परवत की दिशा में तीवर वेग
22:03से प्रस्थान कर गई
22:06कैलाश की अतिशीतल चोटियो और नीरव शान्ती के बीच पहुँचकर कामदेव ने अत्यंत सावधानी से महादेव की तपो भूमी की
22:14ओर अपने कदम बढ़ाए
22:17वसंत देव ने अपनी जादूई शक्तियों का संचार किया जिससे कैलाश की जम चुकी बंजर भूमी एक ही क्षण में
22:24सुर्भित नववसंत के उपवन में परिवर्तित हो गई
22:28बर्फ की पर्तों के बीच से भान्ति-भान्ती के पुश्प खिल उठे, मंद सुगंधित हवाएं चलने लगी और कोयल की
22:36मधुरतान से कैलाश का प्रांगन गुँझ उठा
22:39इस अलोकिक वसंत के बीच कामदेव ने थर्थराते हाथों से समाधिस्थ महादेव की और अपना पुश्पबान साधा, जबकि उनका मनभीशन
22:49परिणाम की आशंका से काम प्रहा था
22:53स्रिष्टी के कल्यान और तारकासुर के सहार हेतु, परवत्राज हिमवान और महारानी मेना ने दुर्गम हिमशिकरों पर वर्षों तक कठोर
23:01तपस्या की
23:03उनकी अटूट भक्ती से प्रसन्न होकर, जगतपती भगवान विश्णू स्वयन दिव्य प्रकाश के रूप में प्रकट हुए और उन्हें सर्वशक्तिशाली
23:12देवी के पुत्री रूप में आने का वर्दान दिया
23:15उसी क्षण सती की पवित्र आत्मा का अलोकिक तेज संपून ब्रह्मांड को आलोकित करता हुआ हिमालय के राजमहल की ओर
23:24उतरने लगा
23:26पावन वसंत रितु में महारानी मेना के गर्भ से एक अत्यंत रूपवती और अलोकिक कन्या का जन्म हुआ जिनका नाम
23:34पार्वती रखा गया
23:36पार्वती के जन्म लेते ही देवलोक से दिव्य गंधर्व मधुर संगीत गाने लगे और स्वर्ग से सुन्दर पुष्पों की अनवरत
23:44वर्षा होने लगी
23:46शिशु पार्वती की हथेलियों और चर्णों पर अनकित कमल तथा त्रिशूल के दिव्य चिन्ह उनके सर्वशक्तिमान आदिशक्ती होने का साक्ष्य
23:55दे रहे थे
23:57बालिका के अलौकिक स्वरूब के दर्शन हेतु देवर्षी नारद वीना बजाते हुए परवतराज हिम्बान के भव्य दर्बार में पधारे
24:06नारद मुनी ने बालिका की हस्तरे खाएं देखकर भविश्यवानी की की यह साक्षात जगत जन्नी हैं जिनका विवाह केवल देवाधिदेव
24:15महादेव से ही होगा
24:17जैसे जैसे पारवती बड़ी होने लगी उनकी सुन्दर्ता और दिव्यता पूरे हिमालय क्षेत्र में नए प्राण फूंकने लगी
24:26बचपन के खेलों में भी पारवती की रुची सांसारिक वस्तूओं में न होकर केवल महादेव की भक्ती में ही रमने
24:33लगी थी
24:35वह अपने हाथों से बर्फ और मिट्टी का शिवलिंग बना कर उस पर वनपुष्प अर्पित करती और घंटों ध्यानमग न
24:42रहती
24:44पारवती के अंतर्मन में पूर्वजन्म की स्मृतियां कौन्धती जिससे शिव के प्रती उनका अनुराग प्रतिपल गहराता चला गया
24:53दूसरी और सती के वियोग में भगवान शिव कठोर समाधी में लीन थे और बाह्य संसार से पूर्णत्ह विरक्थ हो
25:01चुके थे
25:02संध्या समय पारवती परवत के शिखरों पर बैठ कर दूर कैलाश की दिशा में शिव का ध्यान लगा कर अश्रु
25:09बहाया करती थी
25:12महारानी मेना अपनी सुकुमारी पुत्री के शिव के प्रती इस वैराग्य और कठिन प्रेन को देख कर चिंतित होने लगी
25:20हिम्वान ने पारवती को समझाया कि शिव परम वैरागी है और उन्हें पाना सामान्य रीती से संभव नहीं है
25:29परंतु पारवती ने ध्रेड संकल्प लिया कि वे केवल महादेव को ही अपने पती रूप में स्विकार करेंगी चाहे कितनी
25:37भी कठिनाई आए
25:39शिव को प्राप्थ करने की प्रबल इच्छा के साथ पारवती ने अपने राजसी वस्त्रों का त्याग कर तपोवन की ओर
25:46प्रस्थान किया
25:48वन के हिंसक पशुभी पारवती की भक्ती और निश्चल प्रेम के प्रभाव से शांत होकर उनके समीप बैठने लगे
25:57इस प्रकार सती के पुनरजन्म ने शिव पारवती के महामिलन और तारकासुर के अंत की पहली महान नीम रख दी
26:06देवभूमी हिमाले में बाल्यकाल त्याग कर परवतराज हिम्वान की पुत्री पारवती अब युवावस्था की दहलीज पर खड़ी थी
26:14जिनका दिव्य सौंदर्य जगत को मोहित कर रहा था
26:18अपनी पुत्री की बढ़ती हुई दिव्यता को देख परवतराज हिम्वान को संसार के कल्यान और देवों की आशाओं का भार
26:26अनुभव होने लगा
26:28तारकासुर के आतंक से त्रस्ट देवगणों के कश्टों का स्मरण कर हिम्वान को शिव के समाधी से जागरित होने की
26:35परम आवश्चक्ता का भान हुआ
26:38फिर एक दिवस अपने हृदय की बात पुत्री पारवती से कहते हुए हिम्वान ने शिव की सेवा में स्वयं को
26:45समर्पित करने का मार्क सुझाया
26:48पिता के शब्दों में छिपी नेती की पुकार को पहचानते हुए पारवती के अंतर्मन में एक अविचल संकल्प जागरित हुआ
26:57फिर शुभ मुहूर्त में अपनी सक्खियों के साथ पारवती ने देवों के कार्य सिध्धी हेतु शिव के एकांत तपस्यास्थल की
27:05ओर प्रस्थान किया
27:08हिंगरी की शांत पवित्र उचाईयों पर पहुँच कर उन्होंने उस कुटिया को देखा जहां महादेव अनंतकाल से ध्यान में लीन
27:16थे
27:17वहां शांत निर्जन वातावर्ण में उन्होंने महादेव शिव को देखा, जो अपनी भस्मविभूशित देह पर सर्पों को धारण किये समाधी
27:26में अचल बैठे थे
27:29अगाद श्रद्धा से उतप्रोथ होकर पारवती ने महादेव की कुटिया को स्वच करने का कार्य अपने हाथ में लिया, धूल
27:37और पत्तियों को धीरे-धीरे हटाती हुई
27:40प्रतिदिन वह वनोपवन से ताजे पुष्प और पवित्र बिल्व पत्र एकत्र करती, जिन्हें महादेव को अर्पित किया जा सके
27:49पूर्ण एकागरता से पारवती ने स्वच जल और अन्य पूजा सामगरी को शिव के ध्यानस्थल के पास करीने से सजाया
27:58वह महादेव को मौन रूप से निहारती रहती, उनके समाधी में लीन स्वरूप से अपनी भक्ती को और गहरा करती
28:06हुई
28:07दिन सप्ताह और मास बीटते गए, पारवती की सेवा अविचलित और अटल बनी रही, एक अटूट धारा के समान
28:16हिमवान के कठोर मौसमों का सामना करती हुई भी, पारवती ने अपनी सेवा में कोई कमी नहीं आने दी, उनकी
28:24निष्ठा अडिग रही
28:26उनके मुखमंडल पर कोई क्लेश नहीं, कोई धकान नहीं, बस एक शांत गहन भक्ती का तेज चमकता रहता था
28:34और महादेव अपनी समाधी में अनन्त और अचल बने रहे, जैसे प्रकृती के चक्र उनसे अप्रभावित होूँ
28:43कभी-कभी वह एक छोटी अगनी प्रजवलित करती, उसकी पवित्र लपतें उनके संकल्प की साक्षी बनती
28:51दूर गगन में देवगन और सप्तरिशी पार्वती की अविस्मर्निय भक्ती को देख चकित और प्रसन्न होते थे
29:00उनकी मौन उपस्थिती, एक अव्यक्त प्रेम की भांती, शिव के तपस्या स्थल को एक नया अर्थ दे रही थी
29:07इस प्रकार पार्वती ने अपनी अटूट निश्था से महादेव की अप्रभावित समाधी के चारों और प्रेम का एक अद्रिश धेरा
29:17बुंदिया था
29:19तपस्या के कठोर वातावर्ण को बदलने के लिए देवराज इंद्र की आग्या पाकर कामदेव, देवी रती और वसंत देव के
29:27साथ शिवजी की तपस्या स्थली की ओर बढ़े
29:31कामदेव ने अपने इकशुधनुष को मजबूती से थामा और अपनी पत्नी रती की ओर देखकर इस कठिन कार्य को सिध्ध
29:38करने का संकल्प दोहराया
29:41देवी रती ने पती कामदेव के मुख पर चिन्ता की रेखाय देखकर उन्हें महादेव के क्रोध के प्रती सचेत किया
29:49और पूर्ण सावधानी बरतने की सलाह दी
29:52वसंत देव ने अपनी दिव्य शक्तियों को जागरत किया और हिमाच्छादित परवत श्रिंख लाओं पर अपना प्राकृतिक जादू बिखेरना शुरू
30:01कर दिया
30:03वसंत के आगमन से कैलाश परवत की जमा देने वाली बर्फ पिघलने लगी और सूखी वनस्पतियों में जीवन की नई
30:10चेतना प्रवाहित होने लगी
30:13अचानक पूरी वन्धूमी में भांति भांती के रंग बिरंगे पुष्प खिल उठे और चारों और एक अलोकिक सुगंध चा गई
30:22शिव जी की शांद समाधिस्थली के चारों और के विशाल व्रिक्ष रातों रात हरे भरे पत्तों और रसीले फलों से
30:29लद गए
30:31मंदमंद बहती वसंत की शीतल और सुगंधित पवन ने पूरे परियावरण को मादक्ता और उल्लास से सराबोर कर दिया
30:39पेडों की डालियों पर बैठी कोयल और रंग बिरंगे पक्षी अपने मधुर कूक से वातावरण में प्रेम का संगीत घोलने
30:47लगे
30:48पुष्पों के पराग और मकरंद की खोज में भौरे गूंचते हुए चारों और मंदराने लगे जिससे प्रकृती का योवन निखर
30:56उठा
30:57इस अभूत पूर्व प्राकृतिक परिवर्तन के बीच भी भगवान शिव अपनी अगाध समाधी में लीन और पूर्णत्ह अविचलित बैठे रहे
31:07जाडियों के पीछे से शिवजी का ओजस्वी रूप देखकर कामदेव का हरिदय एक क्षण के लिए भय और संकोच से
31:15काम उठा
31:16देवी रती ने कामदेव के हाथ को थाम कर अंतिम बार उन्हें सचेत किया कि महेश्वर के तपोबल को चुनौती
31:24देना अत्यंत विनाशकारी हो सकता है
31:28किन्तो अपने उत्तरदायत्व और देवताओं के कल्यान को समरण कर कामदेव दबेपाव आगे बढ़े
31:35कामदेव ने शिवजी के ठीक सामने स्थित एक विशाल और घने आम के पेड के पीछे छिपकर अपना स्थान ग्रहन
31:43किया
31:44उन्होंने अपने सुनहरे तनीर से पांच बानों में से कामदीपक अर्विंद नामक पुषपबान बाहर निकाला
31:52कामदेव ने उस अलौकिक पुषपबान को अपने इकशुधनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाया और निशाना साधने की मुद्रा में आए
32:01उसी समय देवी पारवती हाथ में ताजे कमलों की माला लिए शिवजी की सेवा के लिए मंद गती से निकट
32:08आती दिखाई दी
32:21करने के लिए कामदेव ने प्रत्यंचा खीच कर बान छोड़ने का निर्ने लिया जिससे पूरा ब्रहमांड उच्सुकता से काम उठा
32:29हिमालय की शांत गुफा में जहां बरफीली चोटिया आकाश को छूती थी भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे उनकी
32:38अलौकिक उपस्थिती ने ब्रहमांड को एक मौन उर्जा से भर दिया था
32:43उन्ही क्षणों में देवी पार्वती, प्रेम और समर्पन की प्रतिमूर्ती अपनी आत्मा की गहराई से शिव की सेवा में मगन
32:51थी, उनके हृदय में अनकही भावनाय हिलोरे ले रही थी
32:56उनकी हर क्रिया, हर भाव में शिव के प्रती अगाध प्रेम और ब्रहमांडिय संतुलन के लिए गहरी कामना स्पष्ट जलक
33:04रही थी, मानो स्वयन प्रकृती उनकी इच्छा में लीन हो
33:09इधर प्रेम के देवता कामदेव अद्रिश्य रूप में उस दिव्य मिलन के शुभक्षन की प्रतीक्षा कर रहे थे, उनके धनुषपर
33:17सम्मोहन बान चड़ा हुआ था
33:20कामदेव के मन में देवताओं की पुकार गूंज रही थी, जो तारकासुर के अत्याचारों से त्रस्थ होकर शिव के पुत्र
33:27की आस लगाए बैठे थे
33:30धीरे धीरे शिव के गहन ध्यान की परतें हलकी होने लगी, जैसे ब्रहमांडिय निद्रा से कोई विराठ चेतना जागरित हो
33:38रही हो
33:39और फिर एक पल के लिए शिव ने अपनी अलोकिक आखें खोली, उनकी द्रिष्टी सीधे पार्वती पर पड़ी, जो उनके
33:48समीप खड़ी थी
33:50उस क्षण समय थमसा गया, ब्रहमांड ने अपनी श्वास रोक ली, जैसे किसी अप्रत्याशित घटना का साक्षी बनने को तयार
33:58हो
34:00पार्वती की द्रिष्टी शिव की आखों से मिली और उनके भीतर एक दिव्य कमपन हुआ, जैसे उनके शाश्वत प्रेन को
34:08एक नई पहचान मिली हो
34:10यही वहक्षन था, जिसका कामदेव सदियों से इंतजार कर रहे थे, और उन्होंने अपने सम्मोहन बान को शिव की ओर
34:18छोड़ दिया
34:20वायुमंडल में एक सुगंधित लहर फैल गई, बान अपनी दिव्य उर्जा के साथ शिव की ओर तीवरता से बढ़ा, मानो
34:28ब्रहमांडिय प्रेम का संदेश ले जा रहा हो
34:32बान शिव के हृदय को छूते ही एक तीवर उर्जा का संचार हुआ, जिसने उनकी योग निद्रा को भंग कर
34:39दिया और उनके भीतर एक अनूठी समवेदना जगा दी
34:44शिव के भीतर ब्रहमांडिय उर्जा का एक सागर उमड पड़ा, जो प्रेम के इस नए अनुभव से आंदोलित हो उठा,
34:51जैसे कोई प्राचीन नदी पहली बार अपना मार्ग बदल रही हो
34:57उनकी द्रिष्टी फिर से पार्वती पर्टी की, पर इस बार उसमें एक अध्यात आकर्शन, एक अध्भुत स्नेह और एक नई
35:05तरह की उच्सुकता थी
35:07पार्वती के मुख पर लज्जा और आनंद का अध्भुत मिश्रण जलका, उनके हृदय में प्रेम की एक नई जोती प्रजवलित
35:15हो उठी
35:16यह मात्र एक बान का प्रहार नहीं था, बलकि दो महान आत्माओं के मिलन की भविश्यवाणी थी, एक शाश्वत प्रेम
35:25कहानी की शुरुआ
35:27कामदेव ने अपना कार्य पूर्ण किया था, देवताओं की आशा अब फली भूत होने की ओर अग्रसर थी, ब्रहमाण में
35:35एक नई उर्जा का संचार हुआ
35:38मौन कैलाश अब प्रेम की फुस्फुसाहट से भर गया था, जैसे हर कण में एक नया जीवन स्पंदित हो रहा
35:45हो
35:46यह प्रेम केवल दो आत्माओं का नहीं, बलकि स्रिष्टी के भविश्य का भी सूत्रपात था, एक ऐसे पुत्र के आगमन
35:54की भूमिका, जो अधर्म का नाश करेगा
35:58इस प्रकार कामदेव के बाण ने न केवल शिव के तब को भंग किया, बलकि देवताओं के लिए आशा और
36:05ब्रहमांड के लिए एक नए युक का द्वार भी खोल दिया
Comments

Recommended