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Transcript
00:00मैं कौन हूँ? मैं ब्रामन हूँ, कि ठाकर हूँ, कि नाई हूँ, मला हूँ, जाटव हूँ, कुछ हूँ, मनुष्य थोड़ी
00:11हूँ, मनुष्य थोड़ी हूँ, बिहारी हूँ, तिलगु हूँ, तमिल हूँ, मनुष्य थोड़ी हूँ, जाती उप जाती फिर उसमें भी गोत
00:25आप मैं यह सब को छूँँ यह मेरी आइडेंटिटी है और कोई किसी को अपना नहीं मानता जाती की दीमक
00:32लगे हुई थी हिंदुस्तान के समाज के व्रक्ष को जाती का अर्थ होता है तुम्हारी किसमत तुम्हारे जन्म के समय
00:41ही टै हो गई निर्धारत हो गई सीमाएं बां
00:53बीतर से खोखला होकर जिया और जब आप ऐसे हो जाते हो तो आप में जीवन के लिए फिर कोई
01:00आग कोई उमंग शेश नहीं रहती भारत की हार उस दिन शुरू हो गई थी जिस दिन भारत ने ज्यान
01:06का अपमान करना शुरू किया था अपमान आज भी हो रहा है मैं भी जब
01:09ह야 कि इतना सा था तभी से मुझे इस बात पर है रत है और दुख है गहरा कि जिस
01:15देश के बाज गीता है उसको गुलाम बनना क्यों पड़ा धीरे-धीरे मैं बढ़ा हुआ मुखे पता चला इस देश
01:21के बाज गीता ही नहीं यहां कोई नहीं समझता गीता हमने तो धर्म का म
01:29अमपर गीता थोड़ी, अभार मिली
01:31तो ताज्यो क्या
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