00:00आचार्य जी मेरे मन में हमेशा दूसरों से इज़त पाने की चाह रहती है कि कोई तो थोड़ी सी इज़त
00:07दे दे
00:07इज़त की चाह बहुत बड़ी गुलामी होती है जिससे तुम इज़त मांग रहे हो तुम्हें इज़त मुफ्त नहीं दे देगा
00:14वो कहेगा तुम्हें इज़त दूँगा इन शर्तों पर
00:16मेरे मुताबिक जीओ, मेरे मुताबिक खाओ, पीओ, पहनो, चलो, कर्म करो
00:21तब मैं तुम्हें इज़त दूँगा
00:22तो अपना मूले तुम्हें खुद करना है
00:25ये चाहना कि दूसरे मुझे इज़त दें, सम्मान दें, मूल्य दें, ये वेर्थ की बात है
00:30और दूसरों से इज़त की मनशा रखना, सम्मान की कामना रखना
00:35हो सकता है इस बात का इशारा हो कि आप खुद ना अपनी इज़त करते हो ना अपना मूल्य करते
00:42हो
00:42जो व्यक्ति स्वयम का जितना मूल्य करता है और जिसमें जितना सही असली आत्मसंवान होता है, दूसरों से इज़ट पाने
00:52की उसकी हसरत तुतनी कम होती जाती है, और इसलिए वो बाहर से भी आजाद होता जाता है.
00:57इज़त की जिसने कामना कर ली वो बहुत बड़ा गुलाम हो जाता है
01:01और बाहर से सम्मान वही मांगता है जिसमें आत्म सम्मान नहीं होता है
01:06आत्म सम्मान रखो उसके अलावा कुछ नहीं चाहिए
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