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Transcript
00:00एक नाटक है जिस लाहुर नहीं देखिया और जम्या ने अरजल्गेर वजजाज साब का, तो हम नाटक प्ले करते थे,
00:04उसमें मैं नासिर काजमी और किरदार नहीं पाता था,
00:19किसमें तुमैरा मजब और उड़े थे हरी कुछ
00:24चुम्हारा तुमारा कोई हगी नहीं है जसमें तुम्हारा कोई सेग इनियों प्रों क कीसे बाह सकते हू
00:33जो बात तुम कहरे हो नाऊ
00:34यह बात इतनी सीधी है, इतनी आसान है, कि इसको कहने के लिए दम चाहिए, जटिल बाते तो बुजदिल भी
00:44बोल लेते हैं, मुसल्मान से पूछो, तुने मुसल्मान होना चुना था क्या कभी, इसाई से, हिंदू से, बौध से, किसी
00:52से पूछो, तु जो कुछ बना बैठा ह
00:55उसमें तेरी कोई च्वाइस, तेरा कोई चुनाव नहित था क्या, तुने कह दिया मैं फलानी जाते का हूँ, यह जाते
01:01तुने खुछ चुनी है क्या, तो जो कुछ भी तु बना बैठा है, तेरी सारी आइडेंटिटीज, तो सिर्फ तेरी गुलामी
01:08का पर्चम है, और तु
01:11उनको बड़ी शान से, बड़े गौरों से ढो रहा है, तु अपनी गुलामी की घोशना को यहां माथे पर चिपका
01:18कर घूम रहा है, और बड़े फक्र से कह रहा है, मैं तो यह हूँ, मैं तो वह हूँ, ऐसा
01:21है तु जिसके होने में उसका कोई चुनाव ही नहीं
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