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ये वीडियो बोध प्रत्युषा - 14th अगस्त, 2025 के सत्र से लिया गया है|
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Transcript
00:00जितनी भी विवस्थाइं होती हैं, वो ट्रैफिक जैम हो, चाहे सरकारी दफ्तरों का भष्टाचार हो विवस्था हो, चाहे प्राइवेट सेक्टर
00:09की बनवर्जी हो, चाहे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन पर जो हो रहा होता है वो हो, वो सब कुछ उन
00:15लोगों का प्रति�
00:18विवस्था को बना और चला रहे हैं, बड़ी हो गई है, आपने पूछा ना कि लोग इतना तनाव क्यों जेलते
00:23रहते हैं, क्योंकि दूसरे जेल रहे हैं, क्योंकि उनसे पहले और जेल रहे थे, हमें बहुत-बहुत सारे लोग चाहिए,
00:29जो जो जोर से कह दें, नहीं, त�
00:45क्लीफ नहीं है, तो मैं ही क्या खास हूँ, मैं क्या वाज उठा रही हूँ, पंक खोलने का होसला आजाए,
00:50ये कह कह कि मेरी जिम्मेदारी है, मेरा अपना पन है, ना ना तुम उड़ो, और क्या पता तुम्हारी उड़ान
00:55देखके एक दो और को पंक खोलने का होसला आजा�
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