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The Supreme Court has withdrawn its controversial remarks and directions against three academics associated with an NCERT Class 8 Social Science textbook that discussed judicial corruption, case backlogs, and shortage of judges. The Court clarified that the content was the result of a collective academic process and not the responsibility of any individual author. While the order brings relief to the scholars, questions remain about academic freedom, due process, and whether students should be taught about challenges within democratic institutions. Watch the full report for all the details behind one of the most debated education and judiciary controversies of the year.


एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। न्यायपालिका की भूमिका पर आधारित अध्याय में न्यायिक भ्रष्टाचार, लंबित मामलों और जजों की कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई थी और तीन शिक्षाविदों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। अब अदालत ने अपना वह आदेश वापस लेते हुए स्पष्ट किया है कि पाठ्यपुस्तक की सामग्री एक सामूहिक अकादमिक प्रक्रिया का हिस्सा थी और इसकी जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर नहीं डाली जा सकती। मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार को राहत तो मिल गई है, लेकिन अकादमिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और न्यायपालिका की आलोचना की सीमाओं को लेकर बहस अभी भी जारी है। जानिए पूरा विवाद, कोर्ट का यू-टर्न और इस फैसले के दूरगामी प्रभाव।

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~ED.106~GR.122~HT.96~VG.HM~

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00:05एक क्लास 8 की टेक्सबुक ने सुप्रीम कोट को अपना ही ओर्डर वापसेयर पर मजबूर कर दिया
00:09पूरी कॉंट्रोवर्सी शुरू हुई फेबरियर दोहसार चपपिस में
00:12जब एंसी आर्टी की नई क्लास 8 सोशल साइंस बुक में एक नया चैप्टर आया
00:18जिस में सीधा जुडिशिल करॉप्शन, 4.7 क्रोर पेंडिंग केस और जड़ शॉर्टेज को स्कूल सूरूर्स के सामने रग दिया
00:24गया
00:25सुप्रीम कोट भड़क उठी
00:26CGI सुर्यकांथ ने इसे calculated move कहा
00:29कहा कि पूरे देश के हाई कोट जड़िस परटर्ब्ड है और एक जटके में बुक पर ब्लैंकेट बैन लगा दिया
00:35गया
00:36फिजिकल कॉपी सीज डिजिटल वर्जिन्स टेकन डाउन और NCRT डिरेक्टर को शोर कॉस नोटिस सब एक साथ
00:42फिर आया मार्च 11 का वो ओर्डर जिसने तीनो अकाडेमिक्स, मिशेल दिनीनो, सुपर्णा दिवाकर और अलोग प्रस्नकुमार की प्रोफेस्टल जिन्दगी
00:50प्राक्टिकली खतम करती
00:51कोट ने कहा ये लोग डिलेबरिटी जुरिश्ट्री को बदनाम कर रहे थे और गवर्मेंट प्लस हर इंस्ट्यूशन को हुकम दिया
00:57इन्हें किसी भी अकैडमिक काम से दूर रखो
01:00एक भी सुनवाई नहीं एक भी मौका नहीं अपनी बात रखने का लेकिन ये तीनों कोई रैडिकल अक्रिविस्स नहीं थे
01:06मिशेल दिनीनो एक पदमिश्ट्री अबॉर्ड याफ्ता स्कॉलर एंसी आर्टी सोशल साइंस करकिलम कमिटी के चेर परसे
01:13जिनकी दास को साल की जिंदगी, इंडियन हिस्ट्री और सिविलाइजेशन को समझने और समझाने में गई है
01:19सुपर्णा दिवाकर, एक सीनियर एड्यूकेशनलिस्ट है, इंडियन स्कूल अव ड्यूक्मेंट मैनेजमेंट की कोफाउंडर जो नैश्ट्री एड्यूकेशन पॉलिसी यानि NEP 2020
01:28की इंप्लिमेंटेशन टास्कोर्स का हिस्सा रही है
01:31और आलोग प्रस्न कुमार एक रिस्पेक्टेड लीगल रिसर्चर है, विदी सेंटर ओव लीगल पॉलिसी के कोफाउंडर जिनकी पूरी जिन्दगी, कॉंस्टिशनल
01:38लौ और पॉलिसी रिसर्च में लगी है
01:40ये लोग क्लास्रूम्स और कोर्ट्रूम्स की बीच की खाई को पटने की कोशिश करते हैं, यही उनका काम था, यही
01:46उनकी पहचान थी
01:47और एक दिन सब कुछ बदल गया, सोचो एक बार, एक दिन आप एक reputed academic है, अपना काम रिस्पेक्टेड
01:54है, आप institutions के साथ काम करते हैं, अगर दिन Supreme Court का order आता है, जिसमें आपका नाम है
02:01और practically पूरा professional network आपसे हाथ धो लेता है
02:04कोई university engage नहीं कर सकती, कोई government project नहीं, कोई भी नहीं, senior advocate श्याम देवान ने court को
02:11बताया कि इस order के वज़े से तीनों की professional reputation and academic work को serious नक्सान पहुचा, उन्होंने अपनी
02:17बात रखने की कोशिश की, कहा कि यह chapter किसी एक का नहीं था, यह एक collective process का हिस्सा
02:23था, एक committee का काम था जिसमे
02:25कई लोग शामिल थे, उन्होंने कहा कि हमने कभी judiciary को hurt करने की नियत नहीं रखी, court ने initially
02:31एक inch नहीं दी, मार्ट से लेकर आच तक यह तीनों practically professionally frozen थे, कोई नया काम नहीं, कोई
02:38नया project नहीं, एक अजीब सी limbo में जिंदगी, और इस पूरे वक्त में एक बड़ी irony यह थी, कि
02:45
02:45इस chapter ने ये सब शुरू किया, उसमें लिखा था, judicial corruption, pending cases, judge shortage, ये वो चीज़े हैं
02:52जो इंडिया की हर अदालत की report में मिलती है, जो bar associations discuss करती है, जो legal scholars open
02:59ली लिखते हैं, सवाल ये था कि क्या चीज़े class 8 के बच्चों को पढ़नी चाहिए थी या नहीं, और
03:05उस सवाल का जवा
03:06आप देने की जगा, एक powerful institution ने सीधा उन लोगों को crush करने की कोशिश की, जिन्होंने वो सवाल
03:12उठाया था, आज Friday May 22, को Supreme Court ने माना, disassociation का order वापस लिया गया, bench ने officially
03:20clarify किया, कि textbook content एक collective decision था, किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, तीन academics को relief मिली, लेकिन
03:28एक catch अभी भी है,
03:30कोट ने साथ में ये भी कहा, कि central governments और state governments अपनी मर्जी से decide कर सकते हैं,
03:37कि इन्हें engage करना है या नहीं, मतलब complete rehabilitation नहीं हुई, दाग officially हटा, लेकिन shadow अभी भी है,
03:44कौन engage करेगा, उन्हें जब कोट का वो परहाना order लोगों के जहन में अभी भी ताजा है, तो ये
03:51सिरफ एक textbook की क
03:52कहानी नहीं थी, ये उस सवाल की कहानी थी, जब एक powerful institution, खुदी judge, jury और executioner बन जाए,
03:59तो एक आम आदमी चाहे, तो कितना भी पढ़ा लिखा हो, कहां जाए, तीन academics जिनकी जिनकी जिन्दगी, ideas और
04:05education के इर्द गिर्द बनी थी, उन्होंने एक chapter लिखा, एक collective chapter और उन्हें मह
04:22को जो नुकसान हुआ, वो कोई order वापस नहीं कर सकता, revise book आना बाकी है और असकी debate अभी
04:28भी open है, क्या school students को जुडेश्री के खबरों के बारे में पढ़ना चाहिए या नहीं, लेकिन शायद उससे
04:34भी बड़ा सवाल ये है कि क्या इस देश में सच लिखना क्या इतना महंगा
04:39होना चाहिए
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