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  • 2 days ago
ओडिशा की जिस लोक नृत्यकला को पूरी दुनिया जानती है, जिस ओडिशी नृत्य को क्लासिकल डांस का दर्जा मिल चुका है, उस नृत्यकला को जन्मदेने वाली गोतीपुआ नृत्य कला सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है. सरकारी मदद नहीं मिलने की वजह से ये लोक कला खत्म हो रही है. अब कुछ ही गुरु ऐसे बच्चे हैं जो इस कला को संजोने की कोशिशों में जुटे हैं. इन्हीं गुरुओं में एक हैं गुरु बसंत महाराणा. चार साल की उम्र से ही उन्होंने अपने पिता गुरु लक्ष्मण महाराणा से से कला सीखी तब से वो इसका अभ्यास कर रहे हैं. इस कला का प्रचार-प्रसार करने के लिए उन्होंने अभिन्न सुंदर गोतीपुआ नृत्य परिषद गुरुकुल की स्थापना की.गोती का मतलब होता है एक. इसका ये नाम इसीलिए पड़ा, क्योंकि परिवार का एक बेटा ही इसका अभ्यास करता है. इसकी शुरूआत सन 1500 ईस्वी में हुई. जब यहां राजा प्रताप देव का शासन था. उस वक्त मंदिरों में देवदासी नृत्य प्रचलित था.. लेकिन मुगलों के आक्रमण की वजह से वो नृत्य बंद हो गया.. और धीरे-धीरे गोतीपुआ नृत्य प्रचलन में आया. श्री मंदिर में झूलन यात्रा, चंदन यात्रा डोला, शीतल षष्टी, रुक्मणि वाह के मौके पर इस नृत्य का आयोजन होता है. गुरु बसंत महाराणा ने पिता के अलावा गुरु पद्म श्री मगुनी दास और पद्म विभूषण गुरु कालूचरण मोहपात्रा से भी शिक्षा ली. अब वो बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे रहे हैं.  इस नृत्य कला का नाम श्री मंदिर से जुड़ा हुआ है. यह ओडिशा की संस्कृति और लोककला का अभिन्न हिस्सा है, लिहाजा इसका संरक्षण जरूरी है.  

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00:15ुडिशा की नृत्यकला को पूरी दुन्या जानती है
00:26जिस उडिशी नृत्यको क्लासिकल डांस का दरजा मिल चुका है
00:30उस नृत्यकला को जन्म देने वाली गोती पुआ नृत्यकला सबसे मुश्किल दोर से गुजर रही है
00:38सकारी मदद नहीं मिलने की वजह से ये लोकला खत्म हो रही है
00:42अब कुछ ही गुरु ऐसे बचे हैं जो इस कला को संजोनी की कोशिशों में जुटे है
00:48इन्ही गुरुओं में एक है गुरु बसंत महराणा
00:52चार साल की उम्र से ही उन्होंने अपने पिता गुरु लक्षमन महराणा से ये कला सीखी
00:57और तब से ही वो इसका अभ्यास कर रही है
01:05इस कला का प्रचार प्रसार करने के लिए उन्होंने अभिन्य सुन्दर गोती पुवा नृत्य परिशत गुरुकुल की स्थापना की
01:17गुरुकुल को जिन्दा रखने के लिए मदद की जरूरत है
01:19बिना मदद ये आगे नहीं बढ़ सकता
01:22हम सिर्फ इस कला और परंपरा को जिन्दा रखने की कोशिस कर रहे हैं
01:26गुरुकुल में 50 से ज़्यादा बच्चों को डांस के सिक्षा की वेवस्था करना मुस्किल हो रहा है
01:34गुरु वसंत महराना ने सालों पहले इस गुरुकुल की अस्थापना की
01:39यहाँ 50 से ज़्यादा बच्चों को बिना फीस लिए डांस के सिक्षा दे रहे हैं
01:43मकसद इस परंपरा को जिन्दा रखना है
01:46सरकारी मदद के बगए गुरुकुल को चलाना और छात्रों के लिए विवस्था करना मुश्किल हो रहा है
01:53गोती पुआ का मतलब होता है एक
01:56इसका ये नाम इसलिए भी पड़ा क्योंकि परिवार का एक बेटा ही इसका अफ्यास करता है
02:02इसकी शुरुवात सन पंद्रा सो इसवी में हुई
02:04जब यहां राजा प्रताप देव का शाशन था
02:08उस वक्त मंदिरों में देवदासी नृत्य प्रचले था
02:12लेकिन मुगलों के आकर्मन की वजह से वो बंध हो गया
02:16और धीरे धीरे गोती पुआ नृत्य प्रचलन में आया
02:20और मंदिर में जूलन यात्रा, चंदन यात्रा डोला, शीतल शश्टी, रुपमणी विवाह के मौके पर इस नृत्य का आयोजन होता
02:29है
02:32गुरू बसंत महराणा ने पिता के अलावा गुरू पदमश्री, मगुनी दास और पदमवे भूशन गुरू कालू चरण, मुह पात्रा से
02:41भी सिक्षा ली
02:42अब वो बच्चों को मुफ्त में सिक्षा दे रही है
02:50गोतिपुआ डाम्स की ट्रेनिंग छोटी उम्रे से सुरू हो जाती है
02:53मैंने 4-5 साल के उम्रे से इसे सुरू किया और पिछले 21 सालों से ट्रेनिंग ले रहा हूँ
02:58ये डाम्स सिखने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी पड़ती है
03:02लगतार अभ्यास करना पड़ता है फिर बाद में ये आसान हो जाता है
03:05हम हर दिन 5 घंटे अभ्यास करते हैं
03:08हम 30 से ज़्यादा देशों में परफॉर्म कर चुके हैं
03:11लेकिन इसकी डिमान घट रही है क्योंकि लोग इसे जानते नहीं
03:17ये उडिशा की संस्कृती और लोक कला का अभिन हिस्सा है
03:22लिहाजा इसका संरक्षन जरूरी है
03:24ETV भारत के लिए उडिशा के पुरी से शक्ति प्रसाद मिश्रा की रिपोर्ट
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