00:02When we say something like a shakti shali yodha, then our mind is the first thing that is the first
00:09thing that comes to mind.
00:10Is it not that there will be a very harsh way?
00:13Yes, absolutely.
00:15It's a kind of a shakti shali yodha.
00:18Meaning, the shakti shali yodha.
00:21If you look at the shakti shali yodha,
00:28you are running in the pavilion and the goryans.
00:31Right.
00:32It's like you can believe that with whom can be a strong spirit,
00:36there will not be a vinyamr.
00:38It is a very harsh way.
00:40We do the young people who do the spirit or body,
00:45often take care of that.
00:46Yes, absolutely.
00:47We have a strong spirit for vinyasha or the power.
00:51But when we go to the very traditionaliti-darshad and gharanthes,
01:25तो आज हम 2 अपरेल 2026 को मनाई जाने वाली चैतर पूर्निमा यानी हनुमान जयानती के विशेश अवसर पर एक
01:33ऐसे ही विशेख को सुलजाने जा रहे हैं।
01:55आनन्द रामायन और सकंद पुरान जैसे महान ग्रंथों का एक पूरा निचोड हमारे सामने रखता है।
02:01और इस पूरी चर्चा का जो मिशन है वो उन परतों को हटाना है जो सदियों से हमारी समझ पर
02:07पड़ी हुई है।
02:08अकसर लोग हनुमान जी को केवल शक्ती और शारेरिक बल के प्रतीक के रूप में ही पूछते हैं।
02:14लेकिन ये जो रिपोर्ट है ये स्पष्ट करती है कि वो केवल शक्ती नहीं है।
02:19बल कि वो शक्ती, भक्ती और युक्ती यानि जिसे हम बुद्धिमत्ता कहते हैं उन तीनों के सबसे उत्तम और पूर्ण
02:27उधारण है।
02:27मतलब जब ये तीनों चीजें एक साथ मिलती हैं तब जाकर उस चरित्र का निर्मान होता है जिसे हम हनुमान
02:34कहते हैं।
02:36इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए जो बात मुझे सबसे ज्यादा आकरशित करती हैं वो है उनके अवतरन की कथा। मतलब
02:44बचपन में हम सबने सुना है कि कैसे उन्हें वायुदेव का पुत्र कहा जाता है।
02:48हाँ या फिर वो कहानी कि कैसे उन्होंने बालपन में सूरे को एक मीठा फल समझ कर खाने की कोशिश
02:54की थी।
03:18ये एक बहुती सटीक अवलोकन है आपका। मलब ये वास्तव में एक पूरी भ्रमान्डिय योजना थी। अगर हम शिव पुराण
03:25और अन्य ग्रंथों को देखें तो हनुमान ये साक्षाद भगवान शिव के ग्यारवे रुदरा अफ्तार है।
03:30शिव के अफ्तार?
03:31हाँ, अब यहाँ गहराई में जाने वाली बात ये है कि शिव को अफ्तार लेने की आवश्यक्ता क्यूं पड़ी?
03:37राइट, ये सवाल तो उठता ही है।
03:39इसका उत्तर भगवान विश्नु के राम अफ्तार में छेपा है।
03:41जब भगवान विश्नु प्रित्वी पर धर्म की स्थापना और रावन के वद के लिए राम के रूप में अफ्तरित होने
03:46वाले थे, तब उनकी सहायता के लिए शिव ने भी अपना अंश भिजने का निर्ने लिया।
03:51शिव और विश्नु का ये जो संबंध है, ये अदवयत है।
04:23थीक उसी समय अयोध्या में राजा दश्रत का पुत्र प्राप्ति यग्य चल रहा था।
04:51शिव और शंकर सुवन दोनों कहा जाता है।
04:53मतलब शिव की चेतना, विश्नु का कार्य और वायुदेव की गती ये तीनों ही तत्व उनके जन्म के मूल में
05:00हैं।
05:00जीकिन यहां मेरे मन में एक बहुती लॉजिकल सवाल उठता है।
05:04और मुझे लगता है कि ये विरोधा भास काफी गहरा है।
05:08अगर वो साक्षाद भगवान शिव के रुद्रावतार हैं, तो उनके भीतर तो ब्रह्मान का सारा ग्यान जन्म से ही मौजूद
05:14होना चाहिए था ना।
05:15ये तो है।
05:16शिव तो स्वयम आदी गुरू है, फिर हनुमान जी को सूरेदेव के पास जाकर एक विद्यार्थी की तरह शिक्षा लेने
05:23की क्या वशक्ता पड़ गई। ये तो कुछ वैसा ही हुआ जैसे कोई महान और सिद्ध वैज्यानिक वापस प्रात्मिक विद्याले
05:31में जाकर ए�
05:39शिव की चेतना जब एक वानर के शरीर में आई तो उसके साथ अपार और असी में उर्जा भी आई।
05:45जब उन्होंने सूर को फल समझ कर छलांग लगाई थी, तो वो कोई साधारन बाल लीला नहीं थी, वो उस
05:52असीमित गतिज उर्जा यानि का प्रदर्शन था, जिससे अ�
06:01अपने आप में ना तो अच्छी होती है ना बुरी, लेकिन बिना अनुशासन के वो विनाशकारी हो सकती है, तो
06:08शिव का अवतार होने के बावजूद उस बहुतिक शरीर और उस मन को उस अनंत उर्जा को संभालने के लिए
06:14तैयार करना बहुत आवशक था, तो फिर सूर्य
06:22अनुशासन और निरंतरता के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं, वो एक पल के लिए भी नहीं रुकते, वो समय
06:28के सबसे ज़ादा पावंध है, उस असीमित उर्जा को अगर कोई सही दिशा दे सकता था, तो वो केवल सूर्य
06:34का अनुशासन ही था, और हनुमान जी का ज्
06:47के रत के सामने उल्टे पैर चलते हुए पूरी शिक्षा ग्रहन की, उल्टे पैर चलना मतलब इस दृष्य की कलपना
06:54करना ही रॉंक्टे खड़े कर देता है, बिल्कुल, अपने गुरु की ओर पीठ न हो, इस मर्यादा का सम्मान भी
07:00करना है, और सूर्य की उस तीवर गती क
07:03साथ निरंतर तालमेल भी बिठाना है, अंतरिक्ष में चलना और शास्त्रों का अध्यन करना, मतलब ये तो भौतिक विज्ञान के
07:12नियमों से परे की बात लगती है, एक आगरता का चरम स्तर है ये, और ये केवल वेदों या शास्त्रों
07:18का ग्यान नहीं था, आनंद रामाय
07:20एक बहुती सुन्दर प्रसंग आता है, जो उनके एक अलग ही रूप को हमारे सामने लाता है
07:24कौन सा रूप?
07:25एक श्रेष्ट संगीत कार का रूप?
07:27नारद मुनी जी ने तीनों लोकों में संगीत और वीना वादन का सबसे बड़ा ग्याता माना जाता है, उनका एक
07:34बार हनुमान जी के साथ संगीत का मुकाबला हुआ था
07:37जी हाँ, उस मुकाबले में हनुमान जी ने अपनी कला और सुरों का ऐसा उतक्रिष्ट प्रदर्शन किया कि स्वयम नारद
07:45मुनी भी चकेत रह गए और उन्हें अपनी हार माननी पड़ी
07:48इस दस्तावेज में एक और कहानी है, जिसने मुझे बहुत गहराई तक सोचने पर मजबूर कर दिया
07:55हनुमद रामाईं की कहानी
07:57हाँ, वो बहुत ही मारमिक कहानी है
07:59कहा जाता है कि उन्होंने पत्थरों पार अपने नाखोनों से रामाईं का अपना एक पूरा संसकरन लिखा था
08:06और जब महरशी वालमीकी ने उसे देखा, तो उन्हें लगा के उनकी अपनी लिखी रामाईं इसके आगे बिलकुल फीकी पढ़
08:14जाएगी और कोई उसे नहीं पढ़ेगा
08:15और ये जानने के बाद अनुमान जी ने क्या किया? उन्होंने वालमीकी जी को प्रसिद्धी दिलाने के लिए बिना एक
08:23पल सोचे अपनी उस अद्भुत रचना को समुदर में फैंक दिया
08:27मतलब कोई भी रचनाकार अपनी रचना को लेके कितना समवेधन शील होता है लेकिन यहां कोई मोही नहीं था
08:34और यहीं वो बिंदू है जहां हमें यह समझ आता है कि उनका ये विदवान रूप समाज की नजरों से
08:39इतना अंदेखा क्यों रह गया? उन्होंने स्वयम कभी अपने ग्यान या अपनी कला का प्रदर्शन नहीं किया
08:59बिलकुल
09:02तो क्या हम ये कह सकते हैं कि उनकी ये विनम्रता जो अकसर बाहर से देखने पर बहुत साधारन सी
09:09लगती है वो असल में योग और आत्मनी अंत्रन का सबसे उच्छतम स्तर है?
09:14पुन रूप से अगर हम आध्यात्मिक द्रिश्टी कुन से देखें तो हनुमान जी तीन प्रमुक योगों का एक बहुती दुरलब
09:21और सिटीक एकी करण हैं
09:23वो तीन योग कौन से हैं?
09:24पहला है कर्मयोग यानि निस्वार्थ कर्म करना जहां वो जो भी असाधारन कारे करते हैं उसका कोई फल या श्रे
09:32अपने लिए कभी नहीं मांगते
09:33दूसरा है भक्तियोग यानि पूर्ण समर्पन जो राम के प्रती उनके अटूट प्रेम में हमें सपष्ट दिखता है
09:55प्रान का मतलब केवल सांस लेना नहीं होता प्रान बेसिकली वो उर्जा है जो चेतना और शरे को जोड़ती है
10:01इसलिए जब भी कोई व्यक्ति शारिरेक या मानसिक रूप से कमजोर महसूस करता है तो वो हनमान का ध्यान करता
10:07है
10:07अच्छा क्योंकि वो प्रान शक्ति के मूल श्रोट से जुड़ना चाता है
10:11ये बहुत ही गहरी बात है लेकिन अब मैं उस प्रसंग पर आना चाती हूँ जो मुझे परसनली सबसे ज़ादा
10:18है इतने ग्यानी इतने बलशाली फिर भी बचपन में रिश्यों ने उन्हें एक श्राब दिया था कि वो अपनी सारी
10:27शक्तियां भूल जाएंगे
10:28हाँ वो श्राब बहुत महत्वपून है और जब माता सीता की खोच के लिए समुद्र पार करना था तब जमवंत
10:35जी ने उन्हें उनकी शक्तियों की याद दिलाई थी अगर मैं इस पूरी घटना को आज के युग के संदर्ब
10:42में देखूं तो मुझे इसमें एक बहुत ब�
10:55वाली बैटरी लगी है दुनिया के सारे बहतरीन सौफ्टवेर और सारा ज्यान उसमें फीड किया गया है लेकिन उसकी स्क्रीन
11:03लॉक है उसे चालू करने के लिए एक बाहरी पासवर्ड की आवशकता है हनुमान जी के मामले में वो पासवर्ड
11:11जामवन जी के वो शब्द थ
11:13जिन्होंने उन्हें याद दिलाया कि वो वास्तव में कौन है और मुझे लगता है कि ये बात सिर्फ हनुमान जी
11:19पर लागू नहीं होती ये तो पूरी मानव जाती की क्षमता का प्रतीक है एक बहुत ही सुन्दर और सठीक
11:24तुलना की है आपने है ना हर इंसान के भीतर अस
11:29लेकिन हमें उस क्षमता को जगाने के लिए किसी बाहरी प्रेना या पासवर्ड की जरुरत पड़ती ही है बलकुल और
11:36अगर हम उस श्राब की गहराई में जाए तो वो श्राब वास्तव में कोई सजा नहीं थी बलकि बहुत बड़ा
11:42वर्दान था वर्दान कैसे ये उस सू
12:00अगर उस असीमित शक्ती के साथ वो बड़े होते तो शायद वो उर्जा भटक सकती थी जब शक्तियां वापस आई
12:07तब तक उनका मस्तिश्क और उनकी आत्मा उस अनंत बल को संभालने के लिए पूरी तरह से परिपक वो हो
12:13चुके थे ये तो बहुत ही शांदार नजरिया
12:16है तो मतलब जब जामवंत जी ने वो पासवर्ड डाला और वो असीमित शक्ती का भंडार सक्रिय हो गया तो
12:23उसका परिणाम क्या हुआ दस्तावेज में उनकी शक्ती और युक्ती यानि बुद्धी मत्ता से जुड़ी कई छोटी कहानियों का जिक्र
12:31है
12:31जी हां बहुत सारी कहानिया है
12:33मैं चाहती हूँ कि हम उन सारी कहानियों की सिर्फ सूची बनाने के बजाए कुछ प्रमुख घटनाओं की कारेप्रणाली को
12:40समझे
12:40जैसे लंका जाते समय सुर्सा नामक नाग माता का प्रसंग आता है, उन्होंने वहाँ बलका प्रयोग क्यों नहीं किया?
12:49सुर्सा का प्रसंग युक्ती का सबसे बहतरीन उधारन है
12:53सुर्सा समुद्र में उनका रास्ता रोक कर खड़ी हो गई और शर्त रखी कि जो भी यहां से जाएगा उसे
12:59मेरे मूँ से होकर जाना होगा
13:00हाँ
13:01तो हनुमान जी ने अपना आकार बढ़ा किया, तो सुर्सा ने अपना मू और बढ़ा कर लिया
13:06ये प्रतियोग तलगातार बढ़ती गई, अब हनुमान जी चाहते तो अपने बल से सुर्सा का मूँ �phार सकते थे
13:12बिल्कुल, उन्में इतनी शक्ती तो थी ही
13:15But they didn't do that. They had a couple of their own
13:18one with a apprentice and with a get on the way they got
13:22on the way they got on the way they got on the way.
13:23This song is the Prachin Yudh Kala
13:26that's the Vishesh Siddharanthi.
13:29It's like Martial Arts.
13:31Exactly.
13:32The answer is the answer is the answer.
13:35It's the answer is the answer is the answer.
13:37It's the answer is the answer.
13:43Right.
13:45Yes.
14:00Oh, heal.
14:11ुसका वद कर दिया
14:12या उन्होंने कोई युक्ती नहीं लगाई
14:14सीधा बल प्रयोक किया
14:15सिंगी का द्वारा परच्छाई पकड़ने का ये विवरण
14:18बहुत ही प्रतिकात्मक लगता है
14:20इसके पीछी क्या अर्थ छुपा है
14:22देखे परच्छाई हमेशा हमारे अतीत
14:24हमारे छिपे हुए डर या हमारी असुरक्षाओं का प्रतीक होती है
14:28जब कोई व्यक्ती जीवन में उचाईयों की और उड़ रहा होता है
14:30तो अक्सर उसका अतीत या समाज की नकारात्मकता उसे पीछे खीचने का प्रयास करती है
14:35सिंगहिका उसी रुकावट का प्रतीक है
14:38हनुमान जी का सिंगहिका को मारना ये दर्शाता है
14:42कि जब जीवन के लक्ष की और बढ़ते समय अतीत की परचाई आपको नीचे खीचे
14:48तो वहाँ समझहता नहीं करना चाहिए
14:50बलकि उसे पूरी तरह से नश्ट कर देना चाहिए
14:54क्या बात है
14:55यही निर्णे लेने की ख्षमता
14:56कि कहां सुरसा के सामने छोटा होना है
14:59और कहां सिंगहिका का वध करना है
15:01यही सच्ची बुद्धिमता है
15:03और जहां अतुल्निय शक्ती के आवश्शक्ता थी
15:06वहाँ का तो क्या ही कहना
15:07मतलब जब लक्षमन जी युद्ध भूमी में मूर्चित हुए
15:10तो संजीवनी बूटी पहचानने में
15:12एक-एक पल कीमती था
15:14समय व्यर्थ करने के बजाए
15:15वो पूरा द्रोणा गिरी परवतियों खाड़ लाए
15:17हाँ वो बल का चरम प्रदर्शन था
15:19लेकिन शक्ती के इस प्रदर्शन में
15:21एक और बहुत ही रहस्यमई घटना का
15:23जिकरिस रिपोर्ट में है
15:24लंका दहन
15:25अकसर लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपनी पूँच से लंका जला दी
15:28लेकिन इसके पीछे एक तकनीकी पेच है
15:31ये कोई सामाने आग नहीं थी है न
15:33जी हाँ
15:34वो सामाने भौतिक आग नहीं थी
15:36विज्ञान कहता है कि सामाने आग
15:39ऑक्सिजन से जलती है
15:40और जो भी उसका रास्ते में आता है उसे राख कर देती है
15:43बिल्खुल
15:44अब एक ऐसा शहर जो पूरी तरह से सोने का बना हो
15:46उसे केवल माचिस की तीली या मशाल से तो नहीं जलाया जा सकता
15:50ग्रंतों के अनुसार वो हनुमान जी की योगिक अगनी थी
15:53योगिक अगनी
15:54हाँ
15:55योगिक अगनी केवल भौतिक नियमों से नहीं
15:57बलकि संकल्प या इरादे से जलती है
16:00वह उस क्रोध और नयाय की अगनी थी, जिसे उन्होंने अपनी योग बल से प्रकट किया था
16:05इसका मतलब है कि वो आग चुन-चुन की चीजों को नश्ट कर रहे थी
16:09Exactly, इसलिए उस भयंकर आग में भी रावन के भाई विभीशन का घर पूरी तरह सुरक्षित रहा
16:15अच्छा
16:16अगर वो सामाने आग होती, तो हवा के रुक के साथ पूरा शहर एक समान जलता
16:20विभीशन का घर सुरक्षित रहना ये साबित करता है कि उस प्रलैंकारी अगनी पर भी हनुमान जी का पूरा नेंतरन
16:26था
16:26वो केवल अधर्म का नाश कर रही थी
16:28ये तो बहुत ही अधभुद बात है, इसी दस्तावेज में एक छिपा हुआ तथ्य भी है, जो शायद बहुत कम
16:36लोग जानते हैं
16:37अश्ट सिधियां और नव निधियों के स्वामी होने के कारण हनुमान जी ने लंका दहन के दौरान शनी देव को
16:45रावन की कैद से बचाया था
16:47ये एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, रावन ने अपने अहंकार में नव ग्रहों को अपने अधीन कर लिया था, जिसमें
16:54कर्मफल दाता शनी देव भी शामिल थे, उन्हें उल्टा लटका दिया गया था, हनुमान जी ने अपनी पूच के प्रहार
17:00से उस कैद को तोड
17:02और शनी देव को मुक्त कराया, और शायद इसी वज़े से शनी देव उनका इतना सम्मान करते हैं, बिल्कुल, इसी
17:08कारण से ये मान्यता है कि शनी देव, जिन से पूरे ब्रहमान के देवता भी भाईभीत रहते हैं, वो केवल
17:14हनुमान जी का सम्मान करते हैं, और यही कार�
17:29एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अश्ट सिधियां है, नवनिधियां है, जो अकेले पूरे परवतों को उठा सकता है, जिसकी योगिक
17:39अगनी से सोने की लंका जल सकते है और जिसका सम्मान भ्रमान के सबसे शक्तिशाली देवता भी करते हैं. इन
17:46सब के बावुजूद उस व्यक
17:58जब इशेक हो चुका था, दरबार में माता सीता ने हनुमान जी को अपने गले की सबसे कीमती मूतियों की
18:04माला भेट की. लेकिन हनुमान जी ने क्या किया? वो माला का एक-एक मूती अपने दांतों से तोड़ने लगे
18:09और उसमें कुछ खोजने लगे.
18:11और जब दरबार में बैठे लोगों ने उन पर व्यंग किया कि एक वानर को मूतियों का मोल क्या पता
18:16और पूछा कि वो क्या कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वो मूतियों में अपने राम को खोज रहे
18:22हैं. लोगों ने जब मजाक में पूछा कि क्या तुम्हारे भीतर भी �
18:28.
18:29.
18:29.
18:29.
18:29انہوں نے بنا کسی ہچکی چاہٹ
18:31کے اپنے ناخونوں سے اپنی چھاتی
18:33چیر دی. اور وہاں
18:35ساکشات بھگوان رام اور
18:37ماتا سیتا کی چھوی بسی ہوئی تھی.
18:39یہ کوئی جادو نہیں تھا.
18:40یہ اس بات کا پرتیق تھا
18:42کہ انہوں نے اپنے میں
18:43یا اپنے اہنکار کو پوری طرح سے مٹا دیا تھا.
18:47جہاں میں نہیں ہوتا وہیں
18:48اشور کا واس ہوتا ہے.
18:50ایک اور بہت ہی سندر قطعہ ہے
18:51سندور کی. جب انہوں نے ایک دن
18:54माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा तो उत्सुकता से इसका कारण पूछा
18:58माता ने सरलता से कह दिया कि इसे लगाने से उनके स्वामी राम की आयू लंबी होगी और उन्हें प्रसन्नता
19:04मिलेगी
19:05ये सुनते ही हनमान जी ने सोचा कि अगर चुटकी भर सिंदूर से राम की आयू बढ़ सकती है तो
19:12क्यों ना पूरे शरीर पर ही सिंदूर लगा लिया जाए
19:15और उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर मल लिया ये एक निश्चल, शुद्ध और बिना किसी शर्तवाली भक्ती का सबसे
19:24उंचा उदाहरण है
19:25हाँ और ऐसा नहीं है कि वो केवल एक भावुक भक्ती नहीं थे, वो कूटनीती और मध्यस्ता में भी बहुत
19:31निपुण थे, रावन के भाई विभीशन को पहचानना और उन्हें राम के पक्ष में लाना हो, या फिर युद्ध के
19:39बाद नंदिग्राम जाकर भरत को राम की
19:41वापसी की सूचना देना हो, हाँ, भरत जी वाले प्रसेंग में भी वो एकदम सही समय पर पहुँचे थे, बिल्कुल,
19:47भरत प्राण त्याग नहीं वाले थे, क्योंकि राम के लोटने की अवधी समाप्त हो रही थी, तब हनुमान जी ने
19:53सही समय पर पहुँचकर उनके प्
20:11शक माने जाते हैं, करोडों लोग हनुमान चालीसा या सुन्दरकान का पाठ करते हैं, हाँ, और ये कोई अंधिविश्वास नहीं
20:18है, बिल्कुल नहीं, ये केवल एक धार में कर्मकान नहीं है, जब भी कोई इनसान डर, भरम या मानसिक कमजोरी
20:25महसूस करता है, तो वो इन
20:27पाठों के जरिये उसी असीमित चेतना का अवाहन कर रहा होता है, सत्य कहा, हनुमान चालीसा की चौपाईयां केवल कुछ
20:35शब्द नहीं है, ये उस अनुशासन, मानसिक स्पष्टता और भयमुक्त अवस्था को जगाने का एक मनो वैग्यानिक माध्यम है, जो
20:44हनुमान जी
20:57और सफलता होने के बावजूद हम जमीन से जुड़े और संतुलित रह सकते हैं।
21:27तब एक साधारन प्राणी भी ईश्वर के समान हो जाता है।
21:57चिरन जीवी यानि जो हमेशा जीवित रहेगा। लेकिन बात सिर्फ जीवित रहने के नहीं है।
22:03जब भगवान राम का प्रित्वी पर समय पूरा हो गया और वो वैकुंठ यानि स्वर्ग लोट रहे थे, तो हनुमान
22:09जी के पास ये पूरा अधिकार और आमंत्रेंग था कि वो भी अपने प्रभू के साथ स्वर्ग जा सकते थे।
22:16वहाँ उन्हें स्वर्ग का अमरित, देवी देवताओं का सम्मान और ब्रह्मान की सारे सुख मिल सकते थे।
22:45कि पूर्ण शक्ती इनसान को पूरी तरह से भ्रष्ट कर देती है, एपसिलूट पावर करप्ट एपसिलूटली, लेकिन हनुमान जी का
22:53चरित्र इस विश्व प्रसित सिध्धान्त को पूरी तरह से जुटला देता है, जब किसी इनसान के पास ब्रमान की सबसे
23:01बड़ी शक
23:15कि सोचने वाली बात है, क्या सच्चा बल दुनिया पर राज करने और सुख भोगने में है, या असीमित शक्ती
23:21होने के बावजूद शून्य अहंकार के साथ सेवा करने में है, सत्ता और शक्ती के इस युग में परम शक्ती
23:29का यही वो रूप है, जिसे शायद आज हमें सब
23:32से जादा समझने की जरूरत है, इसी विचार के साथ हम आज के इस चर्चा को यही विराम देते हैं
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