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नुमान जी की अद्भुत शक्तियों का गहन विश्लेषण! इस वीडियो पॉडकास्ट में जानिए कैसे वे शक्तिशाली योद्धा और विनम्र विद्वान दोनों हैं। 108X VFX और 16K क्वालिटी में रामायण की अनसुनी कहानियां, भक्ति भजनों के साथ।
टाइमस्टाम्प्स:
0:00 - परिचय
2:30 - योद्धा रूप
10:45 - विद्वान गुण
20:15 - VFX स्पेशल
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00:02When we say something like a shakti shali yodha, then our mind is the first thing that is the first
00:09thing that comes to mind.
00:10Is it not that there will be a very harsh way?
00:13Yes, absolutely.
00:15It's a kind of a shakti shali yodha.
00:18Meaning, the shakti shali yodha.
00:21If you look at the shakti shali yodha,
00:28you are running in the pavilion and the goryans.
00:31Right.
00:32It's like you can believe that with whom can be a strong spirit,
00:36there will not be a vinyamr.
00:38It is a very harsh way.
00:40We do the young people who do the spirit or body,
00:45often take care of that.
00:46Yes, absolutely.
00:47We have a strong spirit for vinyasha or the power.
00:51But when we go to the very traditionaliti-darshad and gharanthes,
01:25तो आज हम 2 अपरेल 2026 को मनाई जाने वाली चैतर पूर्निमा यानी हनुमान जयानती के विशेश अवसर पर एक
01:33ऐसे ही विशेख को सुलजाने जा रहे हैं।
01:55आनन्द रामायन और सकंद पुरान जैसे महान ग्रंथों का एक पूरा निचोड हमारे सामने रखता है।
02:01और इस पूरी चर्चा का जो मिशन है वो उन परतों को हटाना है जो सदियों से हमारी समझ पर
02:07पड़ी हुई है।
02:08अकसर लोग हनुमान जी को केवल शक्ती और शारेरिक बल के प्रतीक के रूप में ही पूछते हैं।
02:14लेकिन ये जो रिपोर्ट है ये स्पष्ट करती है कि वो केवल शक्ती नहीं है।
02:19बल कि वो शक्ती, भक्ती और युक्ती यानि जिसे हम बुद्धिमत्ता कहते हैं उन तीनों के सबसे उत्तम और पूर्ण
02:27उधारण है।
02:27मतलब जब ये तीनों चीजें एक साथ मिलती हैं तब जाकर उस चरित्र का निर्मान होता है जिसे हम हनुमान
02:34कहते हैं।
02:36इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए जो बात मुझे सबसे ज्यादा आकरशित करती हैं वो है उनके अवतरन की कथा। मतलब
02:44बचपन में हम सबने सुना है कि कैसे उन्हें वायुदेव का पुत्र कहा जाता है।
02:48हाँ या फिर वो कहानी कि कैसे उन्होंने बालपन में सूरे को एक मीठा फल समझ कर खाने की कोशिश
02:54की थी।
03:18ये एक बहुती सटीक अवलोकन है आपका। मलब ये वास्तव में एक पूरी भ्रमान्डिय योजना थी। अगर हम शिव पुराण
03:25और अन्य ग्रंथों को देखें तो हनुमान ये साक्षाद भगवान शिव के ग्यारवे रुदरा अफ्तार है।
03:30शिव के अफ्तार?
03:31हाँ, अब यहाँ गहराई में जाने वाली बात ये है कि शिव को अफ्तार लेने की आवश्यक्ता क्यूं पड़ी?
03:37राइट, ये सवाल तो उठता ही है।
03:39इसका उत्तर भगवान विश्नु के राम अफ्तार में छेपा है।
03:41जब भगवान विश्नु प्रित्वी पर धर्म की स्थापना और रावन के वद के लिए राम के रूप में अफ्तरित होने
03:46वाले थे, तब उनकी सहायता के लिए शिव ने भी अपना अंश भिजने का निर्ने लिया।
03:51शिव और विश्नु का ये जो संबंध है, ये अदवयत है।
04:23थीक उसी समय अयोध्या में राजा दश्रत का पुत्र प्राप्ति यग्य चल रहा था।
04:51शिव और शंकर सुवन दोनों कहा जाता है।
04:53मतलब शिव की चेतना, विश्नु का कार्य और वायुदेव की गती ये तीनों ही तत्व उनके जन्म के मूल में
05:00हैं।
05:00जीकिन यहां मेरे मन में एक बहुती लॉजिकल सवाल उठता है।
05:04और मुझे लगता है कि ये विरोधा भास काफी गहरा है।
05:08अगर वो साक्षाद भगवान शिव के रुद्रावतार हैं, तो उनके भीतर तो ब्रह्मान का सारा ग्यान जन्म से ही मौजूद
05:14होना चाहिए था ना।
05:15ये तो है।
05:16शिव तो स्वयम आदी गुरू है, फिर हनुमान जी को सूरेदेव के पास जाकर एक विद्यार्थी की तरह शिक्षा लेने
05:23की क्या वशक्ता पड़ गई। ये तो कुछ वैसा ही हुआ जैसे कोई महान और सिद्ध वैज्यानिक वापस प्रात्मिक विद्याले
05:31में जाकर ए�
05:39शिव की चेतना जब एक वानर के शरीर में आई तो उसके साथ अपार और असी में उर्जा भी आई।
05:45जब उन्होंने सूर को फल समझ कर छलांग लगाई थी, तो वो कोई साधारन बाल लीला नहीं थी, वो उस
05:52असीमित गतिज उर्जा यानि का प्रदर्शन था, जिससे अ�
06:01अपने आप में ना तो अच्छी होती है ना बुरी, लेकिन बिना अनुशासन के वो विनाशकारी हो सकती है, तो
06:08शिव का अवतार होने के बावजूद उस बहुतिक शरीर और उस मन को उस अनंत उर्जा को संभालने के लिए
06:14तैयार करना बहुत आवशक था, तो फिर सूर्य
06:22अनुशासन और निरंतरता के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं, वो एक पल के लिए भी नहीं रुकते, वो समय
06:28के सबसे ज़ादा पावंध है, उस असीमित उर्जा को अगर कोई सही दिशा दे सकता था, तो वो केवल सूर्य
06:34का अनुशासन ही था, और हनुमान जी का ज्
06:47के रत के सामने उल्टे पैर चलते हुए पूरी शिक्षा ग्रहन की, उल्टे पैर चलना मतलब इस दृष्य की कलपना
06:54करना ही रॉंक्टे खड़े कर देता है, बिल्कुल, अपने गुरु की ओर पीठ न हो, इस मर्यादा का सम्मान भी
07:00करना है, और सूर्य की उस तीवर गती क
07:03साथ निरंतर तालमेल भी बिठाना है, अंतरिक्ष में चलना और शास्त्रों का अध्यन करना, मतलब ये तो भौतिक विज्ञान के
07:12नियमों से परे की बात लगती है, एक आगरता का चरम स्तर है ये, और ये केवल वेदों या शास्त्रों
07:18का ग्यान नहीं था, आनंद रामाय
07:20एक बहुती सुन्दर प्रसंग आता है, जो उनके एक अलग ही रूप को हमारे सामने लाता है
07:24कौन सा रूप?
07:25एक श्रेष्ट संगीत कार का रूप?
07:27नारद मुनी जी ने तीनों लोकों में संगीत और वीना वादन का सबसे बड़ा ग्याता माना जाता है, उनका एक
07:34बार हनुमान जी के साथ संगीत का मुकाबला हुआ था
07:37जी हाँ, उस मुकाबले में हनुमान जी ने अपनी कला और सुरों का ऐसा उतक्रिष्ट प्रदर्शन किया कि स्वयम नारद
07:45मुनी भी चकेत रह गए और उन्हें अपनी हार माननी पड़ी
07:48इस दस्तावेज में एक और कहानी है, जिसने मुझे बहुत गहराई तक सोचने पर मजबूर कर दिया
07:55हनुमद रामाईं की कहानी
07:57हाँ, वो बहुत ही मारमिक कहानी है
07:59कहा जाता है कि उन्होंने पत्थरों पार अपने नाखोनों से रामाईं का अपना एक पूरा संसकरन लिखा था
08:06और जब महरशी वालमीकी ने उसे देखा, तो उन्हें लगा के उनकी अपनी लिखी रामाईं इसके आगे बिलकुल फीकी पढ़
08:14जाएगी और कोई उसे नहीं पढ़ेगा
08:15और ये जानने के बाद अनुमान जी ने क्या किया? उन्होंने वालमीकी जी को प्रसिद्धी दिलाने के लिए बिना एक
08:23पल सोचे अपनी उस अद्भुत रचना को समुदर में फैंक दिया
08:27मतलब कोई भी रचनाकार अपनी रचना को लेके कितना समवेधन शील होता है लेकिन यहां कोई मोही नहीं था
08:34और यहीं वो बिंदू है जहां हमें यह समझ आता है कि उनका ये विदवान रूप समाज की नजरों से
08:39इतना अंदेखा क्यों रह गया? उन्होंने स्वयम कभी अपने ग्यान या अपनी कला का प्रदर्शन नहीं किया
08:59बिलकुल
09:02तो क्या हम ये कह सकते हैं कि उनकी ये विनम्रता जो अकसर बाहर से देखने पर बहुत साधारन सी
09:09लगती है वो असल में योग और आत्मनी अंत्रन का सबसे उच्छतम स्तर है?
09:14पुन रूप से अगर हम आध्यात्मिक द्रिश्टी कुन से देखें तो हनुमान जी तीन प्रमुक योगों का एक बहुती दुरलब
09:21और सिटीक एकी करण हैं
09:23वो तीन योग कौन से हैं?
09:24पहला है कर्मयोग यानि निस्वार्थ कर्म करना जहां वो जो भी असाधारन कारे करते हैं उसका कोई फल या श्रे
09:32अपने लिए कभी नहीं मांगते
09:33दूसरा है भक्तियोग यानि पूर्ण समर्पन जो राम के प्रती उनके अटूट प्रेम में हमें सपष्ट दिखता है
09:55प्रान का मतलब केवल सांस लेना नहीं होता प्रान बेसिकली वो उर्जा है जो चेतना और शरे को जोड़ती है
10:01इसलिए जब भी कोई व्यक्ति शारिरेक या मानसिक रूप से कमजोर महसूस करता है तो वो हनमान का ध्यान करता
10:07है
10:07अच्छा क्योंकि वो प्रान शक्ति के मूल श्रोट से जुड़ना चाता है
10:11ये बहुत ही गहरी बात है लेकिन अब मैं उस प्रसंग पर आना चाती हूँ जो मुझे परसनली सबसे ज़ादा
10:18है इतने ग्यानी इतने बलशाली फिर भी बचपन में रिश्यों ने उन्हें एक श्राब दिया था कि वो अपनी सारी
10:27शक्तियां भूल जाएंगे
10:28हाँ वो श्राब बहुत महत्वपून है और जब माता सीता की खोच के लिए समुद्र पार करना था तब जमवंत
10:35जी ने उन्हें उनकी शक्तियों की याद दिलाई थी अगर मैं इस पूरी घटना को आज के युग के संदर्ब
10:42में देखूं तो मुझे इसमें एक बहुत ब�
10:55वाली बैटरी लगी है दुनिया के सारे बहतरीन सौफ्टवेर और सारा ज्यान उसमें फीड किया गया है लेकिन उसकी स्क्रीन
11:03लॉक है उसे चालू करने के लिए एक बाहरी पासवर्ड की आवशकता है हनुमान जी के मामले में वो पासवर्ड
11:11जामवन जी के वो शब्द थ
11:13जिन्होंने उन्हें याद दिलाया कि वो वास्तव में कौन है और मुझे लगता है कि ये बात सिर्फ हनुमान जी
11:19पर लागू नहीं होती ये तो पूरी मानव जाती की क्षमता का प्रतीक है एक बहुत ही सुन्दर और सठीक
11:24तुलना की है आपने है ना हर इंसान के भीतर अस
11:29लेकिन हमें उस क्षमता को जगाने के लिए किसी बाहरी प्रेना या पासवर्ड की जरुरत पड़ती ही है बलकुल और
11:36अगर हम उस श्राब की गहराई में जाए तो वो श्राब वास्तव में कोई सजा नहीं थी बलकि बहुत बड़ा
11:42वर्दान था वर्दान कैसे ये उस सू
12:00अगर उस असीमित शक्ती के साथ वो बड़े होते तो शायद वो उर्जा भटक सकती थी जब शक्तियां वापस आई
12:07तब तक उनका मस्तिश्क और उनकी आत्मा उस अनंत बल को संभालने के लिए पूरी तरह से परिपक वो हो
12:13चुके थे ये तो बहुत ही शांदार नजरिया
12:16है तो मतलब जब जामवंत जी ने वो पासवर्ड डाला और वो असीमित शक्ती का भंडार सक्रिय हो गया तो
12:23उसका परिणाम क्या हुआ दस्तावेज में उनकी शक्ती और युक्ती यानि बुद्धी मत्ता से जुड़ी कई छोटी कहानियों का जिक्र
12:31है
12:31जी हां बहुत सारी कहानिया है
12:33मैं चाहती हूँ कि हम उन सारी कहानियों की सिर्फ सूची बनाने के बजाए कुछ प्रमुख घटनाओं की कारेप्रणाली को
12:40समझे
12:40जैसे लंका जाते समय सुर्सा नामक नाग माता का प्रसंग आता है, उन्होंने वहाँ बलका प्रयोग क्यों नहीं किया?
12:49सुर्सा का प्रसंग युक्ती का सबसे बहतरीन उधारन है
12:53सुर्सा समुद्र में उनका रास्ता रोक कर खड़ी हो गई और शर्त रखी कि जो भी यहां से जाएगा उसे
12:59मेरे मूँ से होकर जाना होगा
13:00हाँ
13:01तो हनुमान जी ने अपना आकार बढ़ा किया, तो सुर्सा ने अपना मू और बढ़ा कर लिया
13:06ये प्रतियोग तलगातार बढ़ती गई, अब हनुमान जी चाहते तो अपने बल से सुर्सा का मूँ �phार सकते थे
13:12बिल्कुल, उन्में इतनी शक्ती तो थी ही
13:15But they didn't do that. They had a couple of their own
13:18one with a apprentice and with a get on the way they got
13:22on the way they got on the way they got on the way.
13:23This song is the Prachin Yudh Kala
13:26that's the Vishesh Siddharanthi.
13:29It's like Martial Arts.
13:31Exactly.
13:32The answer is the answer is the answer.
13:35It's the answer is the answer is the answer.
13:37It's the answer is the answer.
13:43Right.
13:45Yes.
14:00Oh, heal.
14:11ुसका वद कर दिया
14:12या उन्होंने कोई युक्ती नहीं लगाई
14:14सीधा बल प्रयोक किया
14:15सिंगी का द्वारा परच्छाई पकड़ने का ये विवरण
14:18बहुत ही प्रतिकात्मक लगता है
14:20इसके पीछी क्या अर्थ छुपा है
14:22देखे परच्छाई हमेशा हमारे अतीत
14:24हमारे छिपे हुए डर या हमारी असुरक्षाओं का प्रतीक होती है
14:28जब कोई व्यक्ती जीवन में उचाईयों की और उड़ रहा होता है
14:30तो अक्सर उसका अतीत या समाज की नकारात्मकता उसे पीछे खीचने का प्रयास करती है
14:35सिंगहिका उसी रुकावट का प्रतीक है
14:38हनुमान जी का सिंगहिका को मारना ये दर्शाता है
14:42कि जब जीवन के लक्ष की और बढ़ते समय अतीत की परचाई आपको नीचे खीचे
14:48तो वहाँ समझहता नहीं करना चाहिए
14:50बलकि उसे पूरी तरह से नश्ट कर देना चाहिए
14:54क्या बात है
14:55यही निर्णे लेने की ख्षमता
14:56कि कहां सुरसा के सामने छोटा होना है
14:59और कहां सिंगहिका का वध करना है
15:01यही सच्ची बुद्धिमता है
15:03और जहां अतुल्निय शक्ती के आवश्शक्ता थी
15:06वहाँ का तो क्या ही कहना
15:07मतलब जब लक्षमन जी युद्ध भूमी में मूर्चित हुए
15:10तो संजीवनी बूटी पहचानने में
15:12एक-एक पल कीमती था
15:14समय व्यर्थ करने के बजाए
15:15वो पूरा द्रोणा गिरी परवतियों खाड़ लाए
15:17हाँ वो बल का चरम प्रदर्शन था
15:19लेकिन शक्ती के इस प्रदर्शन में
15:21एक और बहुत ही रहस्यमई घटना का
15:23जिकरिस रिपोर्ट में है
15:24लंका दहन
15:25अकसर लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपनी पूँच से लंका जला दी
15:28लेकिन इसके पीछे एक तकनीकी पेच है
15:31ये कोई सामाने आग नहीं थी है न
15:33जी हाँ
15:34वो सामाने भौतिक आग नहीं थी
15:36विज्ञान कहता है कि सामाने आग
15:39ऑक्सिजन से जलती है
15:40और जो भी उसका रास्ते में आता है उसे राख कर देती है
15:43बिल्खुल
15:44अब एक ऐसा शहर जो पूरी तरह से सोने का बना हो
15:46उसे केवल माचिस की तीली या मशाल से तो नहीं जलाया जा सकता
15:50ग्रंतों के अनुसार वो हनुमान जी की योगिक अगनी थी
15:53योगिक अगनी
15:54हाँ
15:55योगिक अगनी केवल भौतिक नियमों से नहीं
15:57बलकि संकल्प या इरादे से जलती है
16:00वह उस क्रोध और नयाय की अगनी थी, जिसे उन्होंने अपनी योग बल से प्रकट किया था
16:05इसका मतलब है कि वो आग चुन-चुन की चीजों को नश्ट कर रहे थी
16:09Exactly, इसलिए उस भयंकर आग में भी रावन के भाई विभीशन का घर पूरी तरह सुरक्षित रहा
16:15अच्छा
16:16अगर वो सामाने आग होती, तो हवा के रुक के साथ पूरा शहर एक समान जलता
16:20विभीशन का घर सुरक्षित रहना ये साबित करता है कि उस प्रलैंकारी अगनी पर भी हनुमान जी का पूरा नेंतरन
16:26था
16:26वो केवल अधर्म का नाश कर रही थी
16:28ये तो बहुत ही अधभुद बात है, इसी दस्तावेज में एक छिपा हुआ तथ्य भी है, जो शायद बहुत कम
16:36लोग जानते हैं
16:37अश्ट सिधियां और नव निधियों के स्वामी होने के कारण हनुमान जी ने लंका दहन के दौरान शनी देव को
16:45रावन की कैद से बचाया था
16:47ये एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है, रावन ने अपने अहंकार में नव ग्रहों को अपने अधीन कर लिया था, जिसमें
16:54कर्मफल दाता शनी देव भी शामिल थे, उन्हें उल्टा लटका दिया गया था, हनुमान जी ने अपनी पूच के प्रहार
17:00से उस कैद को तोड
17:02और शनी देव को मुक्त कराया, और शायद इसी वज़े से शनी देव उनका इतना सम्मान करते हैं, बिल्कुल, इसी
17:08कारण से ये मान्यता है कि शनी देव, जिन से पूरे ब्रहमान के देवता भी भाईभीत रहते हैं, वो केवल
17:14हनुमान जी का सम्मान करते हैं, और यही कार�
17:29एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अश्ट सिधियां है, नवनिधियां है, जो अकेले पूरे परवतों को उठा सकता है, जिसकी योगिक
17:39अगनी से सोने की लंका जल सकते है और जिसका सम्मान भ्रमान के सबसे शक्तिशाली देवता भी करते हैं. इन
17:46सब के बावुजूद उस व्यक
17:58जब इशेक हो चुका था, दरबार में माता सीता ने हनुमान जी को अपने गले की सबसे कीमती मूतियों की
18:04माला भेट की. लेकिन हनुमान जी ने क्या किया? वो माला का एक-एक मूती अपने दांतों से तोड़ने लगे
18:09और उसमें कुछ खोजने लगे.
18:11और जब दरबार में बैठे लोगों ने उन पर व्यंग किया कि एक वानर को मूतियों का मोल क्या पता
18:16और पूछा कि वो क्या कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वो मूतियों में अपने राम को खोज रहे
18:22हैं. लोगों ने जब मजाक में पूछा कि क्या तुम्हारे भीतर भी �
18:28.
18:29.
18:29.
18:29.
18:29انہوں نے بنا کسی ہچکی چاہٹ
18:31کے اپنے ناخونوں سے اپنی چھاتی
18:33چیر دی. اور وہاں
18:35ساکشات بھگوان رام اور
18:37ماتا سیتا کی چھوی بسی ہوئی تھی.
18:39یہ کوئی جادو نہیں تھا.
18:40یہ اس بات کا پرتیق تھا
18:42کہ انہوں نے اپنے میں
18:43یا اپنے اہنکار کو پوری طرح سے مٹا دیا تھا.
18:47جہاں میں نہیں ہوتا وہیں
18:48اشور کا واس ہوتا ہے.
18:50ایک اور بہت ہی سندر قطعہ ہے
18:51سندور کی. جب انہوں نے ایک دن
18:54माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा तो उत्सुकता से इसका कारण पूछा
18:58माता ने सरलता से कह दिया कि इसे लगाने से उनके स्वामी राम की आयू लंबी होगी और उन्हें प्रसन्नता
19:04मिलेगी
19:05ये सुनते ही हनमान जी ने सोचा कि अगर चुटकी भर सिंदूर से राम की आयू बढ़ सकती है तो
19:12क्यों ना पूरे शरीर पर ही सिंदूर लगा लिया जाए
19:15और उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर मल लिया ये एक निश्चल, शुद्ध और बिना किसी शर्तवाली भक्ती का सबसे
19:24उंचा उदाहरण है
19:25हाँ और ऐसा नहीं है कि वो केवल एक भावुक भक्ती नहीं थे, वो कूटनीती और मध्यस्ता में भी बहुत
19:31निपुण थे, रावन के भाई विभीशन को पहचानना और उन्हें राम के पक्ष में लाना हो, या फिर युद्ध के
19:39बाद नंदिग्राम जाकर भरत को राम की
19:41वापसी की सूचना देना हो, हाँ, भरत जी वाले प्रसेंग में भी वो एकदम सही समय पर पहुँचे थे, बिल्कुल,
19:47भरत प्राण त्याग नहीं वाले थे, क्योंकि राम के लोटने की अवधी समाप्त हो रही थी, तब हनुमान जी ने
19:53सही समय पर पहुँचकर उनके प्
20:11शक माने जाते हैं, करोडों लोग हनुमान चालीसा या सुन्दरकान का पाठ करते हैं, हाँ, और ये कोई अंधिविश्वास नहीं
20:18है, बिल्कुल नहीं, ये केवल एक धार में कर्मकान नहीं है, जब भी कोई इनसान डर, भरम या मानसिक कमजोरी
20:25महसूस करता है, तो वो इन
20:27पाठों के जरिये उसी असीमित चेतना का अवाहन कर रहा होता है, सत्य कहा, हनुमान चालीसा की चौपाईयां केवल कुछ
20:35शब्द नहीं है, ये उस अनुशासन, मानसिक स्पष्टता और भयमुक्त अवस्था को जगाने का एक मनो वैग्यानिक माध्यम है, जो
20:44हनुमान जी
20:57और सफलता होने के बावजूद हम जमीन से जुड़े और संतुलित रह सकते हैं।
21:27तब एक साधारन प्राणी भी ईश्वर के समान हो जाता है।
21:57चिरन जीवी यानि जो हमेशा जीवित रहेगा। लेकिन बात सिर्फ जीवित रहने के नहीं है।
22:03जब भगवान राम का प्रित्वी पर समय पूरा हो गया और वो वैकुंठ यानि स्वर्ग लोट रहे थे, तो हनुमान
22:09जी के पास ये पूरा अधिकार और आमंत्रेंग था कि वो भी अपने प्रभू के साथ स्वर्ग जा सकते थे।
22:16वहाँ उन्हें स्वर्ग का अमरित, देवी देवताओं का सम्मान और ब्रह्मान की सारे सुख मिल सकते थे।
22:45कि पूर्ण शक्ती इनसान को पूरी तरह से भ्रष्ट कर देती है, एपसिलूट पावर करप्ट एपसिलूटली, लेकिन हनुमान जी का
22:53चरित्र इस विश्व प्रसित सिध्धान्त को पूरी तरह से जुटला देता है, जब किसी इनसान के पास ब्रमान की सबसे
23:01बड़ी शक
23:15कि सोचने वाली बात है, क्या सच्चा बल दुनिया पर राज करने और सुख भोगने में है, या असीमित शक्ती
23:21होने के बावजूद शून्य अहंकार के साथ सेवा करने में है, सत्ता और शक्ती के इस युग में परम शक्ती
23:29का यही वो रूप है, जिसे शायद आज हमें सब
23:32से जादा समझने की जरूरत है, इसी विचार के साथ हम आज के इस चर्चा को यही विराम देते हैं
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