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🚩 प्रभास क्षेत्रे सोमनाथं... प्रथमं ज्योतिर्लिंगम्। 🙏

जानिए सोमनाथ मंदिर का वो रहस्य जिसे विज्ञान भी नहीं समझ सका—हवा में तैरता हुआ 'चुंबकीय' शिवलिंग! 17 बार विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे लूटा और तोड़ा, लेकिन हर बार यह मंदिर अपनी राख से उठ खड़ा हुआ।

इस वीडियो में देखिए: ✅ सोमनाथ के हवा में उड़ते शिवलिंग का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सच। ✅ 17 हमलों के बावजूद सोमनाथ के 'अडिग' रहने का गौरवशाली इतिहास। ✅ भगवान शिव का वह भव्य रूप जिसे दुनिया का प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

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00:30फिर हम इतिहास के उन पन्नों को पल्टेंगे जिन में हमले, तबाही और फिर हर बार उट खड़े होने की जबरदस्त दास्तान दर्ज है. और हाँ, कुछ ऐसे हैरान करने वाले रहस्यों पर भी बात करेंगे जैसे की वो एक प्राचीन स्तंब जो सीधे दक्षणी धुरू�
01:00सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है. ये अपने आप में इतिहास का एक जीता जाकता दस्तावेज है. इसकी भोगोलिक स्थिती भी बहुत खास है. इसका प्रभाश शेत्र में होना, जहां कपिला, हिरन और पौरानिक सरस्वती तीन पवित्र नदियों का संगम होता है. और
01:30इस जगा की हर चीज का एक मतलब है और आज हम उसी मतलब को समझने की कोशिश करेंगे. बिल्कुल. तो चलिए सबसे पहले इसके नाम से ही शुरू करते हैं. सोमनात यानि सोम के नात. ये सोम कौन है? मुझे पता है इसका तालुक चान से है, पर इसके पीछे की असली कहान
02:00प्रजापती दक्ष की बेटियां और ये 27 पत्नियां असल में वैदिक जोतिश के 27 नक्षत रहें. लेकिन सोम अपनी एक पत्नी रोहनी से ज्यादा प्रेम करते थे और बाकी 26 की एक तरह से उपेक्षा कर रहे थे. और ये सिफ एक पारेवारिक जगडा नहीं था. है ना, �
02:30हो जाएंगे. अब जैसे ही चांद की चमक फीकी पढ़ने लगी, दुनिया का संतुलन बिगड़ने लगा. वैदिक माननेताओं में चांद को वनस्पतियों और ओशद ही जड़ीबूटियों का पोशक माना जाता है. वो समुद्र के जवारभाटे को नियंतरित करता है. उ
03:00शिव प्रसन्न हुए, लेकिन दक्ष का श्राप पूरी तरह से वापस नहीं लिया जा सकता था, क्यूंकि वो एक प्रजापती का वचन था. हाँ, तो उन्होंने एक बीच का रास्ता निकाला होगा. हाँ, एक बहुत ही सुन्दर समाधान. उन्होंने वरदान दिया कि सोम म
03:30जोतिरलिंग की स्थापना की, जिससे सोमेश्वर या सोमनात कहा गया, मतलब सोम के स्वामी, और इस जगा का नाम पड़ा प्रभास, यानि जहां चमक वापस आई. वाह, मतलब चांद का घटना बढ़ना, समुद्र का जवार भाटा, समय का चक्र, ये सब कुछ इस एक कहा
04:00जग में अपना सुरूप बदलता है. कहते हैं कि सत्य युग में इसे खुद सोम देव ने सोने से बनवाया था, त्रेता युग में लंका के राजा रावन ने इसे चांदी से बनाया, द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने इसे चंदन की लकडी से, और कल युग मे
04:30देव और असुर दोनों के लिए पूज्य हैं, तो सोचिए एक ही स्थान की विरासत में सोम, रावन और कृष्ण जैसे नाम जुड़े हैं.
04:38तो ये पौराने कथाएं सिर्फ कहानियों में नहीं, बलकि इस जगह की जमीन में भी बसी हुई हैं. आपने शुरू में त्रिवेणी संगम का जिकर किया था, वो कैसे इस कहानी को और गहरा बनाता है?
04:50त्रिवेणी संगम इस जगह की पवित्रता को कहीं गुना बढ़ा देता है?
05:20तो ये जगह शिव के उपासक को, यानि शैवों के लिए तो सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा है, लेकिन क्या इसका वैशनवों के लिए भी उतना ही महत्व है? मैंने सुना है कि भगवान कृष्ण के जीवन के अंतिम शन भी यहीं से जुड़े हैं?
05:31बिलकुल, ये प्रभाश शेत्र जितना शैवों का है, उतना ही वैशनवों का भी. यहां से कुछ किलोमीटर दूर भाल का तीर्थ है. ये वही जगह है जहां भगवान कृष्ण एक पेड़ के नीचे योग निद्रा में थे.
05:46जब जरा नामक एक शिकारी ने उनके पैर के तलवे को हिरन की आँख समशकर गलती से तीर मार दिया. और यही घटना द्वापर्युक के अंत और कल्युक की शुरुवात का प्रतीक बनी.
05:59और इसके बाद वो देहोत्सर्ग तीर्थ पहुँचे थे. सही. तीर लगने के बाद कृष्ण पैदल चलकर देहोत्सर्ग पहुँचे. जो हिरन नदी के किनारे हैं. वहां उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्यागा. देह और उत्सर्ग यानि शरीर का त्याग. यह दोन
06:29एक चीज है जिसके बारे में सुनकर मैं हैरान रह गई थी. बान स्तंब. यह क्या है? बान स्तंब सोमनात के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है. यह मंदिर के दक्षणी हिस्से में समुद्र की दिवार पर लगा एक स्तंब है. इस पर संस्कृत में एक शलोक लिखा है. आ
06:59दक्षण की ओर खीचें, तो अंटार्टिका तक किसी भी जमीन के टुकडे से नहीं टकराती. यह कैसे मुम्किन है? यह बात छटी शताबदी में लोगों को कैसे पता थी? क्या उनके पास दुनिया का नक्षा था? या कोई ऐसी तकनीक थी जिसके बारे में हम जानते ही नह
07:29हाँ, मध्धियोगी नितिहासकार खासकर अल-कजवीनी ने लिखा है कि सोमनात का मुख्य विग्र है हवा में बिना किसी सहारे के लटका हुआ था. भक्तों के लिए यह दैवीय चमतकार था. लेकिन अल-कजवीनी ने इसका एक विज्ञानिक कारण सुझाया. चुम्बकि
07:59कहानी कहती है कि जब महमूद गजनवी ने ऐसे देखा तो वो डर गया था. फिर असके सलाकारों ने छट से कुछ पत्थर हटाने का सुझाव दिया. जैसे ही कुछ पत्थर हटाए गये, चुम्बकि ये शेत्र तूड गया और शिवलिंग एक तरफ जुग गया. चाहे ये
08:29ये सोमनात की कहानी का केंद्रिया हिस्सा है. इसका इतिहास विनाश और पुनर निर्मान के चक्रों में बटा हुआ है. सबसे विनाशकारी हमला 1026 ईसवी में महमूद गजनवी ने किया. उसका मकसद दोहरा था. एक तो मूर्ती पूजा को खत्म करना और दूसरा मंदिर के
08:59इन दिन तक भयंकर युद्ध हुआ. मंदिर किले की तरह था जिसकी रक्षा, पुजारी, स्थानी असैनिक और आम लोग कर रहे थे. लेकिन आखिरकार घजनवी की सेना दीवारे फांदने में कामयाब हो गई. कहा जाता है कि उस नरसंगहार में 50,000 से ज्यादा रक्षक मा
09:29इन सा लगे. लेकिन सोमनात के कहानी तो यहीं से शुरू होती है. आपने सही कहा, यहीं से शुरू होता है सोमनात के जजबे का असली इमतिहान. घजनवी के जाने के तुरंद बाद सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 से 1042 के बीच मंदिर का पुनर निर्मान करवाया
09:59फिर 1395 में जफर खान ने और 1706 में औरंग जेबने से पूरी तरह से गिराने का आदेश दिया. इस लगतार विनाश के बीच जरूर कुछ ऐसी कहानिया भी होंगी जो प्रतिरोध और वीरता की होंगी. बिलकुल. इनी में से एक नायक थे, वीर हमीर जी गोहिल. जब जब �
10:29जात में गाई जाती हैं. कहते हैं कि सिर कटने के बाद भी उनका धर तलवार चलाता रहा. आज भी मंदिर परिसर में उनकी प्रतीमा है. और एक परंपरा है कि मंदिर का मुख्य ध्वज शिखर पर चलाने से पहले वीर हमीर जी की छत्री पर चलाया जाता है. ये तो अद्
10:59पूलना नामुंकिन है, वो है इंदौर की रानी अहिल्याबाई खोल करका. 1783 में जब मुख्य मंदिर खंडर था और उस पर एक मस्जिद जैसी सनरचना बना दी गई थी, तब उन्होंने दखल दिया. उन्होंने समझा कि मुख्य स्तल पर मंदिर बनाना राजनैतिक रू�
11:29और फिर आया भारत की आजादी का समय, जिसके साथ सोमनात का आधनिक पुनरजनम जुड़ा है. ये कैसे हुआ?
11:56उस द्रिश्य को देख कर उन्होंने इसे फिर से बनाने का संकल्प लिया. लेकिन मैंने सुना है कि इस पर कुछ राजनीतिक बहस भी हुई थी. आ, एक दिल्चस्प बहस थी. ततकालीन प्रधानमंत्री जवारलाल नहरू को चिंता थी कि एक धर्म निर्पेक्ष राज्य म
12:26तब महात्मा गांदी ने सला दी कि इसके लिए पैसा सरकार से नहीं, बलकि जनता से आना चाहिए. और इसी सलाह पर श्री सोमनात ट्रस्ट बनाया गया, जिसने आज के भव्य मंदिर का निर्मान किया.
12:38सही कहा, 11 मई 1951 को भारत के पहले राश्टरपती डॉक्टर राजिंदर प्रसाद ने इसकी प्रान प्रतिष्ठा की. आज जो हम भव्य मंदिर देखते हैं, वो उसी संकल्प का नतीज़ा है. ये मारू गुर्जर या सोलंकी शैली में बनाया है. ये मारू गुर्जर शैली
13:08जो गुजरात के पारम पर एक मंदिर निर्माताओं के वंश से आते हैं. इसका शिखर लगभग 155 फीट उचा है और इसकी सबसे खास बात ये है कि इसकी संरच्टा में लोहे का इस्तमाल नहीं हुआ है. पत्थरों को पारम पर एक टंग एंड ग्रूव तकनीक से जोड़
13:38तो आज हमने देखा कि सोमनात एथिन्स के पार्थे नौन या रोम के कोलोसियम जैसा कोई खंधर नहीं है जो सिर्फ अपनी पुरानी शान की याद दिलाता हो. ये एक जीवन्त धड़कता हुआ केंद्र है. इसकी कहानी सिर्फ तूटने और बनने की नहीं है. बलकि ये प
14:08जहानी का सार एक विचार में छुपा है कि बनाने की रचने की शक्ती हमेशा तोड़ने की शक्ती से ज्यादा ताकतवर होती है. जैसा कि भारत के पहले राश्टपती डॉक्टर राजिंद प्रसाद ने 1951 में इसके प्राण पर्तिष्ठा समारों में कहा था, सोमनात मंदि
14:38है कि सोमनात के शिवलिंग के अंदर सियाम मंतक मनी छिपी थी, एक चमतकारी रत्न जिसमें असी में शक्तियां थी. कहा जाता है कि महमूद गजनवी जैसे हमलावर शायद उसी भातिक मनी को खोजने आये थे, लेकिन ये सोचने वाली बात है कि सोमनात का असली रत्न क्या ह
15:08झाल
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