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01:00तो फिर शुरू करते हैं बर्बरिक के परिचय से, ये तो पता है कि वो कोई साधारन योद्धा नहीं थे, उनका वंश भी काफी अनोखा था, हाँ हाँ बिलकुल, उनका वंश ही उने खास बनाता है, वो महाबली भीम के पौत्र थे, मतलब पांदव वंश से सीथा जुडा�
01:30तो सोचिये मानव, राक्षस और नाग, तीनों के गुण, तीनों की शक्तियां उनमें थी, कहते हैं जन्म से ही चेहरे पर एक अलग तेज था
01:38हम, गजब, और ये तो बस शुरुवात थी, उनकी शक्तियों की, खास कर उन तीन बाणों की बहुत बात होती है, क्या खास था उनमें?
01:47वो तीन बाण तो जैसे उनकी पहचान ही बन गए, कथाओं में आता है कि उन्होंने शिवजी की बहुत कठोर तपस्या की थी
01:53शिवजी की?
01:55हाँ, और शिवजी प्रसंद हुए, उन्होंने बरबरिक को तीन ऐसे बाण दिये, जो कभी छुकते नहीं थे, अमोग, साथ में एक दिव्वि धनुष भी, शिवजी का वरदान था कि इन बाणों से वो तीनों लोकों पर विजय पा सकते हैं
02:08तीनों लोकों पर? सिर्फ तीन बाणों से? ये कैसे मुम्किन था?
02:12उन बाणों का तरीका बड़ा अनुखा था
02:15पहला बाण छोड़ते, तो वो उन सभी लक्षियों को चुन लेता, माग कर लेता, जिने नश्ट करना है
02:21दूसरा बाण छोड़ते, तो वो उन सभी को माग करता, जिने बचाना है
02:26और फिर तीसरा बाण, जब वो चलता, तो पलक जपकते ही उन सभी भेद देता, जिने पहले बाण ने चुना था, जिने दूसरे ने बचाया, उन्हें छोड़ कर
02:36खमाल है
02:37और सबसे बड़ी बात, वो बाण लक्ष भेद कर वापस उनके तरकश में आ जाते थे, इसी लिए उन्हें तीन बाण धारी कहा गया
02:45अब विश्वसनिया, मतलब अजय शक्ती एक तरह से, कहते हैं श्री कृष्ण भी जानते थी इनकी शक्ती के मारे में
02:53हाँ, एक कहानी है कि नारत जी ने एक बाड़ श्री कृष्ण के सामने बरबरीक के शौरे और उनके बाणों की तारीफ की थी
02:59श्री कृष्ण तो खेर, अंतरियामी थे, उन्होंने ध्यान लगा कर देखा, तो बरबरीक जंगल में अभ्यास कर रहे थे
03:06उन्होंने देखा कैसे बरबरीक का एक ही बाण, एक बड़े पेड के सारे पत्ते छेतता हुआ, नदी को चीरता हुआ, पहाड भीद कर वापस आ गया तरकश में
03:16बापरे?
03:17और यहीं पर उनकी वो मशूर प्रतिग्या आती है, जिसने शायद सारी कहानी बदल दी, क्या थी वो प्रतिग्या, उसका आधार क्या था?
03:32यह उनकी कहानी का एक बहुत ही मतलब एहम और शायद सबसे मुश्किल मोड है, बरबरीक ने अपनी मा मौरवी से बचपन में ही सीखा था कि शत्रिय का धर्म है निर्बल का साथ देना, इसी शिक्षा को उन्होंने अपना मूल मंत्र बना लिया, और प्रतिग्या ली मैं य
04:02लेकिन महाभारत कोई साधारन युद्ध नहीं था, वो धर्म और अधर्म की लड़ाई थी, बरबरीक की प्रतिग्या सिध्धान्त में सही होते होते भी असल में युद्ध के नतीजे को ही खत्म कर सकती थी, अच्छा, कैसे?
04:17कहते हैं, उनकी माने विदा करते हुए चेताया भी था, बेटा, धर्म का साथ देना, पर ध्यान रखना कहीं अधर्म के पक्ष में न खड़े हो जाना, ये शब्द जैसे भविश्चिवानी बन गये
04:29तो जब कुरुक्षेत्र का युद्ध तै हुआ, बर्बरिक भी अपने नीले घोडे पर तीन बान लेकर चल पड़े युद्ध भूमी की ओर
04:37श्रीकृष्ण क्यू चिंदित हुए उनके आने से?
04:40श्रीकृष्ण तो युद्ध के सूत्रधार थे, वो जानते थे कि बर्बरिक की मौजूदगी और उनकी प्रतिग्या धर्म की स्थापना में सबसे बड़ी रुकावट बन सकती है
04:50आप सोचिए, अगर शुरू में पांडव कमजोर पड़ते
04:53तो बर्बरिक उनकी तरफ आ जाते
04:55और उनकी शक्ती से पांडव पलभर में मजबूत हो जाते
04:58और जैसे ही पांडव मजबूत होते, कौरव कमजोर हो जाते
05:02Absolutely. And then, the labor
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09:23श्री कृष्ण ने उनकी इच्छा का सम्मान किया, वर्दान दिया, हेवीर बर्बरिक, तुम्हारा शीश कटने के बाद भी जीवित रहेगा, इसे युद्ध भूमी के पास सबसे उची पाहडी पर रख दिया जाएगा, जहांसे तुम पूरा युद्ध देख सकोगे.
09:37सिर्फ देखने का वर्दान या और भी कुछ?
10:07तो अब मेरे श्याम रूप में पूजा जाएगा, कल्युग में जो मुझे कष्ट में पुकारेगा, वो असल में तुझे ही पुकार रहा होगा.
10:13ओ, ये सुनकर तो बर्बरिक.
10:16उनका चेहरा खेल उठा, उन्होंने खुशी खुशी अपना शीश काट कर भगवान के चरणों में रख दिया, कहते हैं आकाश से फूलों की बारिश हुई, जै हो बर्बरिक, धर्म की जै हो, ऐसी आवाजें गुंजी.
10:28तो युद्ध के शाक्षी बने बर्बरिक. अच्छा, युद्ध खतम होने के बाद, पांडवों में जीत के श्रे को लेकर कुछ कहा सुनी हुई थी, तब बर्बरिक के शीश की क्या भूमिका रही?
10:39हाँ, युद्ध जीतने के बाद, पांडवों में थोड़ा कह सकते हैं, एंकार आ गया. कोई कहता मेरी वज़े से जीते, कोई कहता मेरी वज़े से. तब श्रीकृष्ण उन्हें उसी पहाड़ी पर ले गये, जहां बर्बरिक का शीश रखा था. उन्होंने कहा, इन्होंने
11:09सुदर्षन चक्र. सुदर्षन चक्र. हाँ, वही सारी कौरफ सेना का संहार कर रहा था. आप सब तो बस निमित्त थे. माकाली भी महामाया के रूप में रक्त पी रही थी. ये सुनकर पांडवों का सारा घमंद चूर-चूर हो गया, वो समझ गये के करता तो असल में भग�
11:39का शुरुवाती समय था. आज का जो राजिस्थान का सीकर जिला है, वहाँ खाटू नाम का एक छोटा सा गाउं था. वहाँ खास जगे पर धरती से अपने आप एक अदबुत शीश प्रकट हुआ. अपने आप? हाँ, लोग कथा कहती है कि जहाँ शीश प्रकट हुआ, वह
12:09में भगवान ने शाम प्रभू ने दर्शन दिये और कहा कि उस शीश को निकाल कर विधी विधान से स्थापित करो और एक बड़ा मंदिर बनवाँ. अच्छा? राजा ने बिलकुल वैसा ही किया और इस तरह खाटू शाम जी का प्रसिद्ध मंदिर बना. बरबरीक ही कल्य
12:39ताला नहीं? हाँ, ये द्वार सब के लिए हर्शं में खुला रहेगा, अमीर हो, गरीब हो, किसी भी जाती या धर्म काओ, जो भी सच्चे मन से मेरे पास आएगा, उसे मेरे दर्शन जरूर मिलेंगे. शायद इसलिए हाटू धाम में आज भी सब के लिए खुले द्वार क
13:09जब उन्हें लगेगा कि अब कोई सहारा नहीं, तब वो तुम्हें याद करेंगे. और तुम मेरे शाम रूप में उनका सहारा बनोगे, उनकी पीडा दूर करोगे, जैसे मैं अपने भक्तों की सुनता हूँ. भक्तों का यही विश्वास है कि जब दुनिया में सब रास्त
13:39बड़ा उत्साव है. लाखो भक्त, हाथों में निशान, जंडा लेकर, कई बार पैदल चलकर बाबा की दरबार पहुँचते हैं. और ये सिर्फ नाम की बात नहीं है, भक्तों के अनुभव भी है. वो सूखी रोटी वाली कहानी क्या है, वो बड़ी प्यारी लगती है सु
14:09अच्चे मन से बोला, प्रभु मेरे पास तो बस यही है, प्रेम से लाया हूँ, इसे ही मान लो. कहते हैं, ऐसा कहने पर मंदिर में शाम बाबा की मुर्ती पर हलकी सी मुस्कान आई और पुजारी ने देखा कि वही सूखी रोटी प्रशाद के रूप में मुर्ती के पास र
14:39दिखावे के नहीं, इसलिए उन्हें कल्यूग का दानी भी खहते हैं, जो जल्दी खोश होकर भक्तों की जोली बढ़ देते हैं।
15:09पहली, शक्ती का सही इस्तिमाल, बरबरिक बहुत शक्ती शाली थे, पर कृष्ण ने ये पक्का किया कि उनकी शक्ती धर्म की स्थाबना में लगे, उसे रोके नहीं।
15:39और श्री कृष्ण का वो वर्दान हारे का सहरा बनने का, ये आज के समय में शायद सबसे ज्यादा माइने रखता है, ने?
15:46निश्चित रूप से, आज की इस भागदौन वाली जिन्दगी में जहां लोग अकसर हार, निराशा, अकेलेपन से जूचते हैं, वहाँ ये विश्वास कि कोई है जो हारे हुए का भी साथ देता है, ये बहुत बड़ी हिम्मत देता है.
16:00हारे का सहारा का मतलब ही यही है, जब लगे कि अब कोई उमीद नहीं, सब दर्वाजे बंदे तब भी एक दर्वाजा खुला है, एक आस बाकी है, यही विश्वास करोडों लोगों को खाटू श्याम जी से जोडता है, बिल्कुल सही कहा, और यह हमें सोचने पर भी मजब
16:30क्या हम अपने जीवन में अपने आसपास के लोगों के लिए जो शायद किसी मुश्किल में हों, हारा हुआ महसूस कर रहे हों, क्या हम कभी वो सहारा बन सकते हैं, जैसा श्याम बाबा अपने भगतों के लिए हैं, इस पर सोचिएगा जरूर, जैश्री शाम
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