00:03कभी खिलोनों की पिक्री से गुलजार रहने वाले करनाटक के चिनना पटना में सननाटा पसरा है तोई टाउन का अस्तित्व
00:11आज संकट में हैं खिलोने नहीं बिकपा रहे हैं कारीगरों का कहना है कि एक्सप्रेस्वे बनने के बाद से ग्राहक
00:18कम हो गए है
00:41एक्सप्रेस्वे बनने से पहले सब ही गाड़ियां यहीं से गुजरती थी
00:45यहां से गुजरने वाले यात्री खिलोने खरीदने रुकते थे
00:49पर अब रूट बदलने से लोग यहां से नहीं जाते
01:10अब कारीगर अपने खिलोने दूसरे शहरों में बेचने की कोशिश कर रहे है
01:15लेकिन वहां सस्ते और मशीन से बने खिलोनों से उन्हें कड़ी टकर मिल रही है
01:26सोपीस बनाने में हमें लगभग 15 दिन लगते हैं
01:29चीनी फेक्टरिया कुछ ही मिंटों में 1000 पीस तक बना सकती हैं
01:33मशीनों की वज़े से उनके दाम कम है
01:35हमारे खिलोने हाथ से बनाए और पॉलिश किये जाते हैं
01:39उस फिनिशिंग को मशीनरी से दोहराया नहीं जा सकता
01:46चिनना पटना में खिलोने बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है
01:50माना जाता है कि फार्सी कलाकृतियों से प्रेरित होकर टिपू सुल्तान ने
01:54फार्सी कारी गरों को बुला कर यहां के स्थानियाण लोगों को ट्रेनिंग दिलवाई
01:59तब से यहां हाथों से खिलोने बनाए जाते हैं
02:03खिलोनों को रंगने के लिए वेजिटेबल डाई और एको फ्रेंद्ली पेंट का इस्तिमाल किया जाता है
02:09यहां बनने वाले खिलोनों को 2005 में GI TAG भी मिल चुका है
02:14लेकिन नए संकट की वजह से इसकी पहचान पर खत्रा पैदा हो गया है
02:19साथी कारिगरों के लिए रोजी रोटी का संकट भी बन गया है
02:24ETV भारत के लिए करनाटक के चिन्ना पठना से मुहमद रफीक मुला की रिपोर्ट
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