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यह वीडियो 06.02.2025 को दिल्ली साहित्य महोत्सव सत्र से लिया गया है।
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Transcript
00:00उस दिन अभी मैं सुन रहा था गुरुदत को ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है तुम्हारी है
00:12तुम ही समालो ये दुनिया हमें तुमने ये जैसी दुनिया बना रखी है में सुईकारी नहीं है एकदम नहीं सुईकार
00:20है और पहले तुम्हारी इस दुनिया का कामका
00:23चल भी गया था क्योंकि इसके परिडाम छुपे थे आज तो छुपे भी नहीं है आखों के सामने है अभी
00:29आप यहां बैठे हुए और दोसो तीन सो का एक युवाई होगा क्या चुपा हुआ है
00:35हम जिस क्षेत्र में बैठे हुए हैं दिल्ली पंजाब हर्याना पश्यमी उत्तर प्रदेश कितनी लड़कियां गायवें जन संख्या से पता
00:45है ना छुपा क्या हुआ है अब कैसे सुईकार कर ले रहा होगा कोई काल जब जंगनाना नहीं होती थी
00:51आज होती है हमें पता है हम
00:54हमें दिख रहा है कि हम क्या कर रहे हैं पश्वों के साथ हमें दिख रहा है हम जाती के
00:58नाम पर क्या कर रहे है हम महिलाओं के साथ क्या कर रहे हम जंगलों के साथ क्या कर रहे
01:02है हम बच्चों के साथ क्या कर रहे है एक स्टीन फाइल्स भी जब तक छुपी हुई थी चुप
01:21कोई टेक जायंट है कोई पुलिटिकल कोलोसस है इनको तो हम महापुरुष की तरह पूछते थे और ऐसे सेकड़ों हजारों
01:29नाम वा निकल के आ रहे हैं कि लड़कियों का सोशन कर रहे थे और बच्चों का और मार भी
01:35रहे थे शायद लाशे भी गिरी उस प्रक्रिया में मैं
01:38अगर तुम्हें है रत किसी बात पर हो रही है हम ऐसे ही थे पहले पता नहीं चलता था
01:44आज सुचना संचार का संवाध का योग है तो बाते खुल जाती है और यही मुझे अभी भी रोश है
01:51कि जब बाते खुल भी जा रहे हिं तब भी हम कैसे कह दे रहें
01:55कि पुरानी व्यवस्ता चलती रहे जब नहीं खुली तो नहीं खुल गई ना अब तो कम से कम इमांदारी से
02:00कहो कि नहीं चाहिए
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