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  • 14 hours ago

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00:00:09इख्यास में ऐसा कभी नहीं वा जैसे हमारे रिशी मुनियों ने कभी ऐसा कोई रॉल प्ले नहीं किया कि लोगों
00:00:14को समझाना समझ सके
00:00:16तो चला होगे कि बुद्ध को त्याकने के बाद मैं और कहीं भी चला जाओं पर अब लॉट करके अपने
00:00:21महल तो नहीं आओंगा अपनी पत्नी के पास तो नहीं आओंगा त्यागा है मैंने बुद्ध को और आया हूँ लॉट
00:00:26कर अपने महल और अपनी पत्नी के पास
00:00:27This play was basically a summarization of everything we need to learn in just a duration of an hour or
00:00:34so.
00:00:35मत सुनाओ मुझे की जीवन दुख है, मत बताओ मुझे आरे सत्य, मत बताओ मुझे लोग पर लोग सत्य
00:00:41जो प्ले में जो बात हो रही थी, वो ऐसा लग रहा था कि ये मेरे ही भिदर की बात
00:00:46कर रही है, Achaadji
00:00:46मैं चाँ रहा है पर खड़ा वो नंगा अदमी हूँ, जिसे सारी दिशाय लील लेना चाहती है और जिसके पास
00:00:54बचने के लिए आवर अड़ी नहीं है
00:00:59सर ने जिस तरीके से समझाया है ना वो हम खुद तो नहीं समझ पाते का बेबी सर ने बिल्कुल
00:01:02हमारा आईना दिखा दिया कि तुम ऐसे हो और इन दो चीजों के बीच में फस होई हूँ
00:01:36वे बुद्धी तो थे
00:01:55वे बुद्धी तो थे
00:01:57का दिया जो मांगा जा सकता है सब है मेरे पास जो जो नहीं था वो
00:02:09वो आज मिल गया या मिलते मिलते रह गया
00:02:24कौन नहीं पहचानेगा उन्हें
00:02:27कौन नहीं पहचानेगा उन्हें
00:02:31तो हम बुद्ध मेरे मेरे दोआर आए
00:02:38वही चेहरा वही आँखें अपने निर्वान के बाद क्षेतर शेतर घूम रहे हैं
00:02:44आज आज मुझे मुझे अभागे के
00:02:50महल भी आए मेरे द्वार भी आए
00:02:54वही आँखें पर वो आँखें पत्तर जैसी क्यो थी
00:03:02बोले
00:03:05बिक्षाम देई बिक्षाम देई अपना बिक्षापात्र मेरे आगे फेला दिया
00:03:09मैं उनके सामने खड़ा हुआ था करबद
00:03:11मैंने का भगवान भगवान
00:03:18ऐसे देखा उन्होंने मुझे जैसे
00:03:22जैसे देखा ही नहों
00:03:24जैसे देखा ही नहों
00:03:28दो पलको पलकें उठाई मेरे मेरे महल को देखा
00:03:34फिर मुझे जैसे मेरे आरपार देख लिया हो
00:03:39मैं हाथ जोड़े उनसे प्रार्था नहीं करता रह गया
00:03:42और वो मुड़ करके वापस चले गए
00:03:50बिना मुझसे कुछ कहे
00:03:52तेवा का मौका देना तो दूर बिना मुझसे भिक्षावी लिए
00:03:58क्या कहना चाहते थे तथागत
00:04:02यह क्या हुआ है आज
00:04:04इसे अपना हो भाग्य मानू या परंदुर भाग्य
00:04:09बुद्ध द्वार आए
00:04:11मैं उनके चरण तक में सपरिश कर सका
00:04:17वापस चले गए कहा वापस विहार अपने विहार की और गए है
00:04:23मुझे उनके पास जाना होगा
00:04:28मुझे उनके पास जाना होगा
00:04:30बुद्ध यहां आए तो आवश्यक है कि मैं भी
00:04:34मैं भी उनके पर-पर मोहिनी
00:04:37मोहिनी
00:04:40आज आज रात उपवन में उसने बड़ा उत्सव सजाया है
00:04:47ओ मेरी प्यारी पत्मी मोहिनी
00:04:50और मैंने बादा कर बैठा हूँ कि
00:04:57उपवन में हम दोनों आज तांज भ्रवन पर चलेंगे
00:05:03गौतम बुद्ध को पसंद नहीं करती वो
00:05:06भिक्षों का दल महल के सामने से निकलता है
00:05:08भिक्षाम देही भिक्षाम देही कहते तो तो उखता आ जाती है
00:05:15आज उसका विशेश दिवस है और आज ही
00:05:18आज ही बुद्ध प्रकट हो गए मेरे सुमक्ष
00:05:23पर अभी तो दो पहर है ना अभी तो दो पहर है जाऊंगा और तखाल लोटाऊंगा
00:05:33मुहिनी को दिया वचन नहीं टूटेगा शाम का उत्सव अथावत रहेगा हम भ्रहमन पर भी चले जाएंगे
00:05:42मुहिनी मुझे मुझे किसी कार्यवश थोड़ा थोड़ा जाना होगा
00:05:57पर मैं अभी गया अभी आया
00:06:00वो यहां तक आये थे मुझे नहीं पता यह क्या था
00:06:04मुहिनी यह बात मुझे बड़े अभाग की अप्शक उनकी लग रही है
00:06:07बुद्ध द्वार पर आये और और एसे वापस लोट जाए उनकी आखे
00:06:13कुछ विशेश कह रही थी मुझसे
00:06:16मैं नहीं जानता हूं क्या कह रही थी उनकी आखे
00:06:19मुहिनी तुम प्रतीक्षा करना
00:06:22मैं संध्या से पूरो अवश्य वापस आजाओंगा
00:06:25मुहिनी मैं जा रहा हूं तुम प्रतीक्षा करना
00:06:27अवश्य आओंगा
00:06:27अब शेवापसा हूंगा
00:06:59दूसरे पैर गया था
00:07:05आधी रात के बाद वापस
00:07:09आधी रात के बाद वापस आया हूं
00:07:12अब सोच रहा हूंगे
00:07:18इतनी देर कहां लगा दी
00:07:23देर लग भी गई तो वापस आगया
00:07:28यही बड़ी बात है
00:07:29हज तो शायद वापस भी ना था
00:07:45जब मैं वहाँ पहुँचा
00:07:48तो बुद्ध न जाने कितने ही
00:07:52लोगों से घिरे हुए बैठे थे
00:07:54कैसी चांत करुणा नई मूरती भागत बुद्ध की
00:08:05मैं बहुत देर तक बैठा विचल नेत्रों से टक्टकी बांधे उन्हें देखता रहा
00:08:11इसकीत हुआ इस मानव समुद्र में मेरा थो कभी मौका ही नहीं लगेगा
00:08:22जब तो मैं बीतने लगा सांज की और बढ़ने लगा तो मैंने सोचा उठकर के वापस आजाओं
00:08:28मोहीनी को वचन दिया है और उठने उठने का मुझ में साहस ही नहीं हुआ उनके सामने मैं बैठा ही
00:08:36रह गया उनके
00:08:38और फिर और फिर फिर मुझे उनके सामने जाने का उसर मिला
00:08:49मैंने सुभव हुए अपराद के लिए उनसे ख्षमा मांगी
00:08:52मैंने कहा अथागत मेरा मेरा अतित्य स्वीकार गरें
00:08:58मेरा मेरा मंत्रन न ठुक राएं
00:09:04पर उनकी आखों में वही पाशान सी कठोर था
00:09:10जैसे देखा उनोंने में और देखकर भी नहीं देखा मुझे
00:09:24मैं निराश हुआ मैं वापस आने लगा
00:09:29कि मेरा आवंत्रन ठुक रादिया बुद्ध ने
00:09:35जब वापस आने लगा तो
00:09:38पीछे से उनकी वही शांत गंबीरा वागाई
00:09:43मैं मुड़ा जैसे स्वर्ग मिल गया मुझे
00:09:46उन्होंने मुझे रंकेत दिया अपने पीछे आने का
00:09:51मैं हाथ जोड़े उनके पीछे पीछे चला गया
00:09:55उनके उनके विहार में वहां बहुत कम लोग थे अधिकतर उनके भिक्षु बस
00:10:05मुझे उनके मध्य बैठने का मौका मिला और बुद्ध मुझे लक्षे करके
00:10:09बहुत देर तक लोक अलोक काम अकाम धर्म धर्म का उगदेश देते रहे
00:10:17मैं मंत्रमुगत सा सुनता रहा मेरी जैसी सारी कामनाएं पूरी हो गई
00:10:24पर फिर फिर अचानक अचानक बुद्ध मुझे अपने भिक्षु आनंद की और
00:10:40और और कहते हैं नंद को दीख्षा दे दो दीख्षा के लिए मैं
00:10:52मैं नहीं तैयार था दीख्षा के लिए मैंने लेकिन ना नहीं कहा मैंने हा भी नहीं कहा
00:11:01मैंने हा भी नहीं कहा
00:11:12मेरे मौन को मेरी मूख सहमत ही समझ लिया आनन्द और अन्य भिक्षु मेरी और कैची करतनी लेकर बढ़े मेरे
00:11:22केश काटने के लिए
00:11:27नजाने क्या उठा मेरे भीतर मैंने द्रणका से रोक दिया उनको नहीं नहीं नहीं और रोक दिया मैंने उनको तो
00:11:37वहां उपस्थित सारे भिक्षुओं ने मुझ पर कामना ग्रस्तोने का आरोप लगाया बोले
00:11:44तुम पर घन, मद, यौवन और स्त्री का ज्वर चढ़ा है इसलिए तुम बुद्ध के समीप होकर भी दीक्षा नहीं
00:11:53स्विकार कर रहे
00:11:54मैं चुप रहा, मैं चुप रहा
00:11:59मेरी चुप पी को देखकर इस बार स्वयम तथागत बुद्ध उठे और उन्होंने अपना भिक्षा पात्र मेरे हाथों में रखना
00:12:11चाहा
00:12:14मैं किंक कर्तव विमूड खड़ा था है इश्वर मुझे किस परीक्षा में डाल दिया
00:12:20वो मेरे सामने हैं सोहम तथागत बुद्ध मेरे सामने अपना ही भिक्षा पात्र लेकर खड़े थे
00:12:29और मेरे हाथ उसे ग्राण करने के लिए उठे ही नहीं
00:12:35जैसे उनकी आँखे मैंने पत्थर देखी थी मैं भी पत्थर हो गया
00:12:41आग सी उठी मेरे भीतर और फिर बिना उन्हें प्रडाम किये यका यक मैं मुड़कर तेजी से बाहर की और
00:12:49निकल गया
00:12:49बाहर की और निकल गया यहां ने के लिए नहीं
00:12:56उस वक्त मेरे भीतर दुनिया की हर वस्तु हर विशए हर व्यक्ति के लिए बस रोश था
00:13:04विरख्ति थी क्रोध था यहां तक की स्वयम बुद्ध के लिए भी अपने लिए भी मैं चीना नहीं चाहता था
00:13:11मैं बन की ओर चला गया मैं चाहता था कोई हिंस्र पशु मेरा शिकार कर ले और जब कोई पशु
00:13:17नहीं आया मेरी ओर तो मैंने स्वयम ही जा करके जंगली पशु को टूंडा दूंद करा लेकिन मरा मैं फिर
00:13:23भी नहीं मैं जिन्दा हूं
00:13:32और मैं लौट कर आया हूँ अपनी पुरानी दुनिया में बुद्ध को छोड़ करके
00:13:52यह यह घा तिर्फ शरीर ही नहीं फाड़ा गया है मेरा मेरे अंतर जगत के दो फाड़ कर दिये तथागत
00:14:04तुमने आज
00:14:07मैं वीश्वर मैं मैं भीतर जेल उल्वानू और और तुम उतनी देर से वहां खड़े क्या सुन रहे हो छुप
00:14:28छुप कर भीतर आओ
00:14:33महत्मा बुद्ध के सहचर भिक्षु और आनंद जब से मैं विहार से निकला में जानता हूं तुमने पीछा कराए मेरा
00:14:44बीचा घराए न का देखना चागते टे कहां जाएंगा आ अगया हूं महें अपने महल
00:14:50में वापस आगया हूं आऊ आओ भीतर आओ भीतर आओ भीतर आओ दिखना चाहते थे न कहां झाओंगा आओ आ
00:14:56यह
00:14:57ये है मेरा स्थान, देखो, देखो सुन्दर मेरा स्थान, वो प्रांगान, वो सुन्दर उपवन मेरा, जहां मेरी पत्नी मोहिनी आज
00:15:13शाम उच्छव रखना चाहती थी,
00:15:20और वो, वो जो सो रही है ला, वो वो पत्नी है मेरी, बहुत बहुत प्रेम करती है मुझसे, बहुत
00:15:32प्रेम,
00:15:32प्रेम प्रेम समझते हो भिक्षो प्रेम जानते हो प्रेम वो मेरी प्रतीक्षा में सोई है उसकी आखों में अभी भी
00:15:45मेरी व्याकुलता के आंसु होंगे
00:15:48स्थान, देख लिया स्थान
00:15:52सिर्फ स्थान ही देख सकते हो तुम आनंद
00:15:55यहाँ पर स्थान के अलावा भी कुछ है
00:15:59यह घर है मेरा, यह महल है मेरा
00:16:02यहाँ जीते हैं हम, यहाँ सिर्फ जगह नहीं है
00:16:05यहाँ स्थान के अलावा भी कुछ होता है
00:16:08लेकिन यहां जो होता है वो देखने कि तुम्हारे पास आखे ही नहीं है
00:16:19काम ताओं कि इस उम्मीद से तुम पीछा कर रहे थे मेरा
00:16:23तोचराय होगे कि मैं लज्जित होँगा बुद्ध को छोड़ करके
00:16:25नहीं मुझे कोई लज्जा नहीं है
00:16:30तोचराय होगे कि बुद्ध को त्यागने के बाद मैं और कहीं भी चला जाओ
00:16:34पर अब लोट करके अपने महल तो नहीं आओंगा
00:16:36अपनी पत्नी के पास तो नहीं आओंगा
00:16:37त्यागा है मैंने बुद्ध को और आया हूँ लोट कर अपने महल और अपनी पत्नी के पास
00:16:46और अपनी इच्छा से आया हूँ
00:16:49क्यों चलू किसी और की इच्छा पर
00:16:51क्यों चलू तथागत बुद्ध की इच्छा पर
00:16:58उन्हें दिखाई नहीं दी थी मेरी इच्छा
00:17:01जब मैंने केश काटने के लिए इंग मना करा था
00:17:06सब समझते हैं वो
00:17:08चुप हैं मौन हैं इसलिए सब जानते हैं वो
00:17:16जब सब जानते हैं तो ये भी जान जाते हैं
00:17:18कि जो अपने केश काटने से मना कर रहा है
00:17:22जो दीख्षा लेने से मना कर रहा है
00:17:25वो उनका भिक्षा पात्र भी तो नहीं क्रहन करेगा
00:17:29नहीं जान पाए, उठकर आए मेरी ओर
00:17:31और नहीं किया मैंने उनकी इच्छा का सम्मान
00:17:34नहीं करूँगा किसी पुद्ध की इच्छा का सम्मान
00:17:36मेरी अपनी जिंदगी है, मेरी अपनी इच्छाएं है
00:17:52बाणी का छल बहुत खेल चुके तुम मेरे साथ
00:17:58मत सुनाओ मुझे की जीवन दुख है
00:18:00मत बताओ मुझे आरे सत्य
00:18:02मत बताओ मुझे लोग पर लोग सत असत
00:18:06मैं जानता हूँ ये सब करके
00:18:09तुम चाहते क्या हो
00:18:11और जो तुम चाहते हो मैं कदाप ही नहीं होने दूँगा
00:18:31मत बताओ मुझे आरे आभूशन उतार करके सोई ये मेरी प्रतीक्षा में
00:18:39मेरी
00:18:41प्रेम प्रेम समझते हो
00:18:53जगा देखना चाहते थे ना घर देखना चाहते थे ना देख लिया सब
00:18:57मिल गया चैन
00:18:59मिल गया चैन तो तो जाओ यहां से अब निखलो
00:19:03निकलो ठेरो ठेरो ठेरो ठेरो
00:19:07जाने से पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर भी देते जाओ
00:19:12अहां बड़ी उत्कंठा से मेरी और मुड़कर खड़े हो गए
00:19:16उत्तरों से भरे हुए हो तुम
00:19:26अर जो प्रश्न है मेरे पास
00:19:30पिक्षु और आनंद उसका उत्तर तुम नहीं देपाओगे
00:19:39मेरे भीतर जो अगनी देहक रही है उसे तुम नहीं शांत कर पाओगे
00:19:48मेरे प्रश्नों का उत्तर तुमारे पास नहीं इसके पास नहीं
00:19:56तो है मेरे भी पास नहीं और जिसके पास हो सकता है उसको तो मैं छोड़ कर आ गया
00:20:19जाओ जाओ जाओ
00:20:23मुझे एक आंत चाहिए मुझे मुझे मधिरा चाहिए
00:20:28मुझे मुझे मुझे
00:20:31नहीं नहीं औशदी नहीं उपचार नहीं
00:20:36बहराय रकतब बहे मदिरा जाओ बिक्षु मुस्कुरा क्या रहे हो
00:20:45मुस्कुरा क्या रहे हो बिक्षुहर
00:20:49जामता हूं इस मुस्कुराहट के नीचे तुम्हारी ये आखे क्या कटाक्ष कर रही है
00:20:55तुम तुम तुम पूछ रहे हो मुझसे कि मेरे पास ऐसा क्या है भुलाने के लिए
00:21:02जो मुझे मदिरा का साहरा लेना पड़ रहा है
00:21:12हाँ हाँ हाँ हाँ बिक्षुवर हाँ मेरे पास निसंदे कुछ है बुलाने के लिए जिसको
00:21:30मैं इसमें डुबो कर विस्मृत कर देना चाहता हूँ
00:21:36लेकिन फिर भी मैं तुम से बहतर हूँ क्योंकि तुम्हारे जीवन में तो भुलाने लायक भी कुछ नहीं है
00:21:45इतना दरिद्र है तुम्हारा जीवन और तुम्हारा मन कि विस्मृत करने के लिए भी तुम्हारे पास कुछ नहीं
00:21:51जाओ भिक्षो ये मदिरा भी तुम्हारे लिए नहीं जाओ जाओ यहां से
00:22:17क कि अजय कहाओ भी जाओ पाs कि उनद्र यांद्र नोने जाओ था push तुम्हारे ज लगाओ
00:22:36जग्षामरे भी तरजूंग गया था कभी वापस नाने के लिए
00:22:46और देखो अब लोटा है तुम्हारा नंद के साल में
00:22:52सन पर पहले भी घाव खाए है मैंने
00:22:55युद में, आखेट में
00:22:59लेकिन मन जितना रक्तरंजे थे मेरा आज उतना कभी नहीं था
00:23:10तुम कहोगी कि अगर मैं जानता था कि शायद कभी नहीं लोटूँगा तो तुम्हें बता करके उनी गया
00:23:15मैं क्या बताता तुम्हें
00:23:19मैं क्या बताता तुम्हें
00:23:22मुझे नहीं पता था कि वहां
00:23:26मुझे नहीं पता था कि बुद्ध मुझे प्रिकार ही कर लेंगे
00:23:31मुझे नहीं पता था उन्होंने क्या योगिता देख ली
00:23:35महल के सामने भिक्षा मांगते हुए मेरी आखों में
00:23:39उन्होंने क्या देख लिया मुझ में जब मैं प्रतीक्षा कर रहा था
00:23:43और उनके विहार में मैं नहीं जानता था मुहिनी
00:23:48या यह शाहद मैं जानता था
00:23:50मैं यह भी नहीं जानता
00:23:57लेकिन छोड़ कर आया हूं मैं उनको
00:24:00छोड़ कर आया हूं
00:24:03वो जो भी वो जो भी चाहते थे
00:24:06वो मैंने कडाय पे होने नहीं दिया
00:24:07मैं तुम्हारा नंदू मोहिनी, मैं किसी बुद्ध का नहीं, मैं बस मोहिनी का हूँ, मैं तुम्हारा हूँ
00:24:15मुझे अभी भी पता है, तुम ने तब सुना ना मोहिनी, मेरा और आनंद का वारतालाब भी सुना ना मोहिनी
00:24:27तुम बस क्रोधित हो न, रुष्ट होकर लेटी हुई हो
00:24:35कितनी प्रतीक्षा की होगी तुमने, मैं जानता हूँ तुम अभी भी जगी हुई हो
00:24:41पर चलो अभिनहे करते हैं दोनों जैसे सोई हुई हो तुम
00:24:44ताकि कुछ बाते मैं तुमसे वो कह पाऊं जो कभी कह नहीं सकता था
00:24:51तुम्हारे पास नींद की खुमारी है और मेरे पास मदिरा की
00:24:54आओ कुछ बाते करें मोहिनी, इस खुमारी में हमारी बाते बहतर हो पाएंगी
00:25:09पुद्ध, चाहल चल लिए उन्होंने मेरे साथ
00:25:13जानती हूं मोहिनी, ये केश, तुम्हारे नंद के ये केश, ये केश जो तुम्हे कितने प्यारे है
00:25:19बुद्ध ये केश कटवा देना जाते थे, कह रहे ते भिक्षु ऐसे हो जाओ
00:25:25मैंने तुम्हारे नंद की केशों को सपर्ष नहीं करने दिया उन्हें
00:25:28ये मेरे नहीं है ये केश तुम्हारे है मोहिनी उन्हें कैसे लिजाने देता
00:25:36और केश कटवा देने से
00:25:39क्या मेरे व्यक्तित तुम्हें सत्य उभर आएगा
00:25:42और अगर सत्य उभर आता है केश कटवाने से
00:25:44तो जीब कटवा देते ना मेरी
00:25:46हाथ-पाउं कटवा देते
00:25:47गर्दानी कटवा देते मेरी
00:25:49केश ही क्यों कटवाने है
00:25:54मा आगर दिया मैंने मोहीनी
00:26:04मुझसे बोले
00:26:05न मैं हूँ
00:26:07न तुम हो
00:26:08हम सब
00:26:10जैसे उंगली से आकाश में
00:26:12खीची गई आकृतियां है
00:26:14जो बनते ही मिट जाती है
00:26:15जिनका होना ना होने के बराबर है
00:26:19अगर किसी चीज का
00:26:21होना उसके ना होने के बराबर है
00:26:24तो मेरे इनकेशों को भी होने दो ना
00:26:27ये होते हुए भी ना होने के बराबर है
00:26:36मैं ग्रहस्तू, मैं धनी हूँ, मैं शासक हूँ, मैं पती हूँ, मुझे ये सब रहने दो ना
00:26:44अगर किसी वस्तुका हो ना उसके ना होने के बराबर है तथा गुत-बुत
00:26:47तो मैं जो हूँ, मुझे वैसा ही रहने दो, वैसा होकर भी मैं वैसा नहीं हूँ
00:26:57मोहिनी तुम्हारा नन्द ये
00:27:02बातें नहीं कह पाया
00:27:03उनके समक्ष
00:27:05लेकिन अगर उसच मुझ बुद्ध है
00:27:08तो उन्होंने पढ़ लिया आओगा मेरी आखों बे
00:27:27मोहिनी मोहिनी
00:27:30कैसे स्पर्श करूं तुम्हे
00:27:34मैं गंदा हो गया मोहिनी
00:27:39मैं गंदा हो गया, मैं स्पर्श नहीं करूँ तुम्हें
00:27:49मेरी हल्की सी दियाहट पर जग जाने वाली तुम
00:27:53आज उधर मूखे
00:27:57ऐसे मूखेरे लेटी हो
00:28:01मेरे पूरे शरीर से बहती रत किये भूंदें भी
00:28:08पिंचित विचलित नहीं कर रहीं तुम्हें
00:28:15मेरे हिर्दय में तुम्हारे लिए आज भी वही है नुराग है मुहिनी
00:28:21कहो अपने रख्त से अभिशेख कर दू तुम्हारा
00:28:26मेरी आखों में आज भी तुम्हारी वही चाया है मुहिनी
00:28:30आज भी वही चाया है
00:28:34मैं किसी दबाव से तुम्हारे साथ नहीं रहा हूँ
00:28:39मैं अपनी इच्छा से अपनी स्वेच्छा से तुम्हें लाया था तुम्हारे साथ रहता हूँ
00:28:45लेकिन अब जब बात करी रहें तो ये भी बता देता हूँ
00:28:49कि मेरी ही एक और इच्छा है
00:28:50जो मुझे आज तुम से दूर तथागत
00:28:53बुद्ध के पास खीच ले गई
00:29:00मोहीनी
00:29:04मैं कभी भी बोल लेने दो
00:29:06मुझे अभी न बोला तो कभी न बोल पाऊंगा
00:29:08मैं कभी भी पूरा नहीं रह पाया तुम्हारे साथ
00:29:11मैं जब भी तुम्हारे साथ रहा हूँ
00:29:13आधा अधूरा बटा हुआ
00:29:14मेरा एक हिस्सा है जो अभिन है तुमसे
00:29:17बिल्कुल जुड़ा हुआ है तुमसे
00:29:19लेकिन एक हिस्सा मेरा ऐसा भी है
00:29:21जो कभी तुम्हारा नहीं हो पाया
00:29:27तुम सो रही हो
00:29:29यह सूने का स्वां कर रही हो, इसलिए साहस करके तुमसे यह कह पा रहा हूँ, जगी होती तो तुमसे
00:29:37सहन नहीं होता, तुमसे नहीं सहा जाता मेरा यह कहना, क्योंकि तुम सोचती हो, तुम चाहती हो, तुम उस सूर्य
00:29:48की तरह रहो, जिसके एर्द गेर्द मैं एक नक्षत्र
00:29:52की तरह चक्कर काटता रहूँ
00:29:56नहीं सहा जाएगा तुमसे
00:29:58जब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैं वो
00:30:00तूटा हुआ नक्षत रहूँ
00:30:03जिसका कोई
00:30:05धुरुब कोई कक्षा
00:30:07कोई दिशा नहीं है
00:30:08हाँ तुम सूर्य हो मेरे
00:30:11जीवन का
00:30:11लेकिन मैं तुम्हारे
00:30:14परिता
00:30:15पूरा नहीं घूम पाता
00:30:25कौन हूँ बे
00:30:26कौन हूँ बे मुहिनी
00:30:30आज की
00:30:32रात
00:30:38कह लेने दो मुझे
00:30:39कल नहीं पता
00:30:44तुम होगी की नहीं
00:30:48मैं होगा की नहीं
00:30:57कौन हूँ मैं
00:31:03मैं मुहिनी का हूँ
00:31:05मैं बुद्ध का हूँ
00:31:06मैं कौन हूँ
00:31:08मैं चराहे पर
00:31:09ख़ड़ा वो नंगा अद्मी हूँ
00:31:11जिसे सारी दिशाएं लील लेना चाहती है
00:31:15और जिसके पास बचने के लिए आवरण भी नहीं है
00:31:32मैं कभी इस दिशा बढ़ता हूँ
00:31:35मैं कभी इस दिशा बढ़ता हूँ
00:31:40मैं कभी इस दिशा बढ़ता हूँ
00:31:43मैं पाता हूँ वो दिशा खुद डोल रही है
00:31:46वो दिशा अपने ही द्रूप पर काप रही है
00:31:50और फिर मैं वहाँ पर क्लोग आता हूँ
00:31:58मैं कहीं का नहीं हूँ
00:32:05मैं तुम्हारे साथ हुआ करता था
00:32:10तुनन जाने कौन सी पुकार पुकारती थी मुझे
00:32:19आज मैं चला गया बुद्ध के पास
00:32:24तुनन नहीं बैठ पाया वहाँ क्योंकि तुम पुकारती थी मुझे
00:32:34और अब वापस लोटाया हूँ आदी रात तुम्हारे पास
00:32:39तुनन जाने कौन फिर से पुकार रहा है पुझे मैं वापस आकर भी तुम्हारा नहीं हो सकता
00:32:45मुईनी कुछ पुकार रहा है कुछ सुनाई दे रहा है
00:32:50तुम्हें नहीं सुनाई दे रहा मुईनी
00:32:52तुम सच मुझ सो रही है
00:32:55यह सोल अच्छी बात है, जो लोग सोते हैं, उन्हें कुछ सुनाई नहीं देता है, पर मुझे हमेशा कुछ सुनाई
00:33:01देता रहता है, सुनो, सुनो, सुनो, सुनो दूर से
00:33:10बुद्धाम शर्णां गच्छामे, हम्माम शर्णां गच्छामे, गच्छामे
00:33:39गच्छामे, नहीं, कहीं नहीं जाओंगा, कहीं, कहीं नहीं जाओंगा, यहीं जीओंगा, यह आधा, धूरा, फटा, फटा, चितरा जीवन
00:33:55क्योंकि
00:33:56क्योंकि
00:33:57ना मैं इधर का हूँ
00:33:59ना मैं उधर का हूँ
00:34:02ना मैं इधर का हूँ
00:34:04ना मैं उधर का हूँ
00:34:06क्यों
00:34:07क्यों ना मैं यहां का हूँ
00:34:10ना वहां का हूँ
00:34:12क्यों
00:34:23झाल झाल
00:35:00वह नहीं चली गई, बुद्धर आगए.
00:35:25आप्टेशन था, बहुत प्रसिद्ध कृतिया है, आप लोगोंने, कई उन्हें पढ़ाओगा, यह ना टक्या देखाओगा, लहरों के राजन्स.
00:35:41वह यह अड़ाप्ट किया था.
00:36:05हमेशा.
00:36:06आप मेरे लिए नाठक था, आप के लिए थोड़ी है.
00:36:18क्या बोलता हूं बार बार, शिक्षक का काम होता है, आइना बनना, तो यह तो मैंने आपको आपकी जिंदगी दिखाई
00:36:26है.
00:36:32तब की ऐसी, मेरे भी ऐसी है.
00:36:45तब की ऐसी है, मेरे भी ऐसी है.
00:36:49चैनली आपका है, तो नाठक है.
00:37:00बढ़ना मचारे जी, बहुत बहुत धन्यवाद एस, हमारे जीवन को आइना दिखाने के लिए.
00:37:05लेकिन अब तो उलश चुके हैं, क्या जो साथ है उसे भी कैसे ले जाएं, क्योंकि वो भी साथ नहीं
00:37:16छोड़ सकता है।
00:37:20उन्ही से पुछो बैठे हुए, जो साथ है वो भी इंसान है ना?
00:37:28जी
00:37:30इंसान है ना?
00:37:34उसको इंसान देखने में दिक्कत इसलिए होती है क्योंकि हम अक्सर देह देखकर, लिंग देखकर लाए होते हैं।
00:37:43साथ बनता ही ऐसा ही है, प्रकृति यह ही चाहती है, कि साथ ऐसा ही बने विपरीत लिंगियों में।
00:37:49तो इसलिए ये बहुत-बहुत साधारन सी बात, बहुत साधारन सी बात, कि वो जो साथ है आपके मुहिनी, वो
00:37:57भी इंसान है, ये कौंधती ही नहीं, इतनी साधारन सी बात है, वो भी इंसान है, मेरे मन में था,
00:38:11पर फिर मैंने कहा कि पता नहीं, पैयारी का समय भी नहीं था, �
00:38:14इतनी तैरी थी जहाता राज सुबही हुई है
00:38:19यह भी सब अभी अभी लाया गया आधी एक घंटे पहले
00:38:24नहीं तो इसमें रोल रिवर्सल भी हो सकता था
00:38:28मैं नंद को यहां सुला देता मोहिनी को खड़ा कर देता
00:38:33क्योंकि इंसान इंसान है इंसान की छटपटाहट तो उसकी चेतना में है लिंग कोई भी हो
00:38:41मुझे खत्रा यह लग रहा था कि ऐसे प्रदर्शित करने में वही पुरानी भावना और ज़्यादा दृड़ होती है
00:38:47रिन्फोर्स होती है
00:38:53के सत्य असाद हो धर्म की और जाने में स्त्री बाधा बनती है
00:39:00पर नाटक लिखा ही आसा गया है तो फिर शरीर पुरुष का है
00:39:06तो मैं खुद मोही नहीं बनू यह थोड़ा सा मुश्किल हो जाता
00:39:12समय भी नहीं था
00:39:13नहीं थो नहीं सच मुझ समय हो तो मैं बहुत अच्छी मोहीनी बन के दिखा सकता हूँ
00:39:31तो जो आकुलता नंद में थी वही उस दूसरे इंसान में उजो सो रहा था
00:39:37वो भी इंसान है जैसे यह भीतर से बिलखरा है
00:39:41कि पैसा मिला हुआ है युवा है ताकत है जाकर जंगल न जाने किस जानवर से खुदी बिढ़ गया था
00:39:49सुन्दर पत्नी है
00:39:53फिर भी व्याकुलता है उससी तरीके से वो जो इस्तरी होती है उसमें भी बराबर की व्याकुलता होती है
00:39:59वो भी इंसान है उसको भी युवाज शरीर मिला हुआ है पते मिला हुआ है उसके पास भी रुपया पैसा
00:40:06नौकर चाकर ये सब कुछ है पर बरावर की बेचैनी उसके अंदर भी होती है
00:40:12जो पुराना मॉडल चला है और जो कुछ हद तक इस नाटक से भी शायद प्रदर्शित हो गया हो वो
00:40:23यह है कि व्याकुलता तो साहब बस पुरुशों का विशेशा अधिकार है
00:40:32जो एक्जिस्टेंशियल एंग्स्ट है वो इस तरी को तो उठती ही नहीं उसका क्या काम है अगर बढ़िया रुपया पैसा
00:40:39मिल गया है तो अभूशन गहने वगयरा पहनो खाओ पीओ बच्चे पैदा करो सोई पड़े रहो
00:40:47बुद्ध के यहां भी हमने यहीं तो सुना अभी ना टक में कि सब कौन बैटे हुए थे बिक्षु ही
00:40:51बैटे हुएते वहाँ बिक्षुणी की तो हमने सुनी नहीं बात तो उससे भाव ऐसा आता है जैसे की सारी अस्तित्योंगत
00:41:00बेचैनी कि जैसे मुक्ति की सारी अभीप
00:41:05बस पुरुष कोई उष्टी हो इस्त्री तो माया की बच्ची है उसको बड़ा अच्छा लगता है कि मैं बंधन में
00:41:14पड़ी रहूं वो चाहती ही नहीं मुक्तो न और जब आप ऐसा दिमागी मॉडल बना लेते हैं तभी आपको समझ
00:41:24भी नहीं आता कि उसको कैसे समझाओं क्य
00:41:35उसको चाहिए नहीं तो फिर आपको बड़ी तकलीव उठती है फिर आप जो अभी सवाल कर ऐसे सवाल करते हो
00:41:40कि अब तो हमारी शादी हो गई हमारे जीवन में कोई है हम उसको कैसे समझाए माने क्या जैसे तुम
00:41:48समझे हो वैसी वह समझेगी ड़ो आग तुमें लगी हुई ह
00:41:54जिन भ्रमों में तुम जी रहे हैं उन्हीं में वो भी जी रही है
00:41:59तो उसको समझाए माने क्या दूसरी पजाती है
00:42:03ऐसी क्या विशेष समस्या आ जाती है किसी स्त्री को समझाने में
00:42:05और अध्यात्म के पूरे इतिहास में
00:42:09हमने इस समस्या को लगातार वैध घोशित किया है
00:42:14हमने यही दिखाया है कि पुरुष थन्यासी होना चाहता है
00:42:17पुरुष सब कुछ त्याग करके बाहर निकलना चाहता है
00:42:19पीछे से स्तरी आगर के उसको ऐसे पकड़ लेती है
00:42:22कभी याचना करती है, कभी अपना रूपियावन दिखाती है
00:42:25कभी बच्चों का बंधन डालती है, कभी कुछ करती है
00:42:28और इस्तरी ही बेडी है
00:42:30पुरुष तो पंच्छी की तरह आदा दोके उड़ना चाहता
00:42:33इस्तरी पिंजडे की तरह उसे पकड़ लेना साहती है
00:42:36क्या ये मॉडल सचमुष ठीक है ये ठीक है मॉडल मुझे तो उल्टा लगता है
00:42:44मुझे तो लगता है इस तरी में मुक्ति क्या गांग्शा पुरुष्टे जादा होती है
00:42:54एक आप लोग बार बार उसको कोट करते हैं उसका पोस्टर बनाते हैं कि जब गुलामी चुभी नहीं रही तो
00:42:59आजादी लेकर क्या करोगे
00:43:01गुलामी जिसको ज्यादा मिली हुई है वही आजादी के लिए ज्यादा फड़फडाएगा न तो गुलामी किसको ज्यादा मिली हुई है
00:43:08शरीर की, समाज की, धर्म की, परंपरा की गुलामी किसको ज्यादा मिली हुई है इस तरी को ज्यादा मिली हुई
00:43:13है तो आजादी के लि
00:43:29बैठी हुई है उसे बात तो करके देखो अभी वी मैं यहां पर जितना देख पा रहा हूं
00:43:41आधी तो होंगी कम से कम महिलाएं कि नहीं होंगी
00:43:43आधी तो होंगी
00:43:45आधी तो होंगी
00:43:48और अगर आधी मौझूद है
00:43:51मौझूदगी में अनुपाइट अगर एक और एक का है
00:43:54तो इक्षा में अनुपाइट दो और एक का होगा
00:43:56इस्त्रियों और पुरुशों का
00:43:57क्योंकि इस्त्रियों को यहां मौजूद होने के लिए पुरुषों से दूनी इच्छा लगानी पड़ती है
00:44:03दूना प्रयास करना पड़ता और दूने बंधन तोड़ने पड़ते हैं
00:44:06तब वो यहां आकर एक और एक यानुपाते मौजूद हो पाती है
00:44:15तो कौन कहता है कि महिला तो मोहिनी है, कामिनी है
00:44:22उसका तो काम है पुरुष को अपनी माया में बांध लेना, काला जादू कर देना
00:44:27उसको अपने रूप के जाल में फास लेना
00:44:30और बिचारा पुरुष कबूतर की तरह गुटरबू कर रहा है किया दे मुझे तो
00:44:33फसा लिया फसा लिया
00:44:39अगली बार इसका दूसरा अध्याय कर सकते हैं कि मोहिनी उठ गई
00:44:45मोहिनी उठ गई यह बोली निकल
00:44:53और बोल रही है कि तुम्हे क्या लग रहा है यह सब अनायास हो गया था कि बुद्ध यहां आए
00:44:57थे
00:44:57मैंने बलो आया था
00:44:59तुम्हे क्या लग रहा है यूंही तुम्हे दिक्षा दे रहे थे केश काट रहे थे कैची भी मैंने लिए दी
00:45:03थी
00:45:04आनंद को भी मैंने ही तुम्हारे पीच Curtis शोड़ा था कि इनको वापस आने मत देना
00:45:09पिर भी तू वापस आ गया बे शरम
00:45:13और अभी नहीं ऐसे कर रहा है कि जैसे मेरी खातिर लौटा हूँ, मेरे प्रेम में वापस आया है
00:45:24किस बात पर फिर से विचार करिएगा
00:45:27दासता का दंश तो ज्यादा इस तरी ही भुगत रही है न
00:45:33शरीर
00:45:35शरीर
00:45:38समाज
00:45:39हाँ
00:45:42परमपरा
00:45:46बहार निकलने में भी उसको दिखाई देता है कि सो तरीगे के बंधन है
00:45:52जो यहाँ आपर आए हैं रात में साथ आठ बजेगा नहीं कि धुक धुक चालू बजाएगी उनकी उसूचन लगेंगे कि
00:45:58कैसे जाएंगे वापस क्या करना है
00:46:03बंधनों के जादा नुभव किसको होता है तरी कोई होता है तो अगर मुक्ति दोगे तो लपक कर वही तो
00:46:11लेगी पहले और कौन लेगा
00:46:20इंसान की तरह देखो दोस्त की तरह देखो बात बनेगी पूलिए नमस्ते अचारे जी
00:46:32चौराहे पर नंगा खड़ा हूं चारो दिशाएं बुला रही हैं सभी दिशाएं पुकार रही हैं हर दिशा की तरफ आकर्शित
00:46:40होता हूं
00:46:41आगे जाता हूं फिर ऐसास होता है गलत दिशा में आ गया वो दिशाएं अपने ही धुरूप पर डोल रही
00:46:47है और फिर मैं अपने कदम ऐसा चलता रहता है और मदिरा पात्र फेंग देता हूं
00:46:55इन सब के बीच में आपके साथ हूं पिछले दो वर्शों से तो एक जूटा सा प्रतीत होने वाला जहांसा
00:47:03भी देता रहता हूं जैसा आप कहते हैं कि पिटते जाओ पिटते जाओ हारते जाओ हारते जाओ
00:47:23फड़ रहा हूं ऐसा ही होता जाता है मैं कौन हूं मैं वह हूं जो झो कि खुद को जहासा
00:47:33दे रहा है जो जहासा है वो अभी पहले प्रश्ण में हमने खूलकर रख दिया
00:47:40बुद्ध के पास जाकर भी लौट आने के पक्ष में तर्क क्या था नंद के पास
00:47:51तर्व क्या था
00:47:53अरे मोहिनी बुरा मानेगी
00:47:55मोहिनी बुरा मानेगी
00:47:56जब आप पूरा नाटक पढ़ेंगे
00:47:57तो आप पाएंगे कि
00:47:59मोहिनी नाटक में सुंदरी के नाम से
00:48:01तो आप पाएंगे कि जो मोहिनी का व्यक्तित्व है
00:48:04वो
00:48:05नंद से ज्यादा मस्बूत दिखाया गया है
00:48:10कि वह मौहिन ही नहीं है
00:48:12मोह नंद को है
00:48:17प्रटने के लिए चिरने के लिए
00:48:20दो पक्ष चाहिए ना
00:48:23जो परसपर विरोधी हो
00:48:25एक दूसरे के विपरीथ खीच रहे हो
00:48:28एक पक्षपर सत्य इतना तो समझ में आता है
00:48:30वहां वो बुद्ध बैठे हुए थे, इधर बुद्ध बैठे हुए थे, ये तो समझ में आता है
00:48:37और प्रस्तुत ऐसे किया गया, जैसे दूसरी तरफ कौन है, मोहिनी है
00:48:43और ये दोनों विपरीद दिशाओं में खीच रहे हुँ
00:48:46बुद्ध अपनी और खीच रहे है, बुद्ध सत्य की और धर्म की और खीच रहे है
00:48:49यहाँ तक तो ठीक है बिलकुल
00:48:52पर क्या हम परिक्षन करेंगे कि सचमुच मोहिनी
00:48:58अधर्म की और खीच रही है
00:49:00मोहित कर रही है
00:49:01जहासा दे रही है भ्रमित कर रही है
00:49:03या ये नंद बाबु
00:49:07का अपना अनुराग है
00:49:10इन्होंने प्रदर्शित ऐसे करा
00:49:11ये यहां मद्ध में खड़े हुए है
00:49:13ये है न जूला
00:49:14कभी आगे कभी पीछे
00:49:18ये यहां खड़े हुए है
00:49:19यहां बुद्ध है और यहां
00:49:21वो ही नहीं है
00:49:24और इन्होंने ऐसे दिखाया
00:49:25जैसे
00:49:27दोनों दिशाओं से दो विपरीत बल इनको
00:49:29खीच रहे हो इधर से तो खीच जा रहा है इधर से कोई है
00:49:31भी सच्मुज खीचने वाला
00:49:32या तुम खीच रहे हो
00:49:36या तुम खीच रहे हो
00:49:39वो तुम्हें खीच रहे हो तुम पकड़े बैठे हो
00:49:43यहां जूट था
00:49:45ठीक है बहुत भावनात्मक उबाल था नंद के वक्तव्यों में
00:49:50पर आवश्यक है कि भावना के पीछे छुपे जूट को भी पकड़ लिया जाए गार नंद ने प्रदर्शित यूं किया
00:50:00जैसे मोहीनी की खातिर वापस लौट करके आया है मोहीनी को पुरा लगेगा यह होगा वो गार उसकी खातिर आया
00:50:08है या अपनी खातिर आया है
00:50:14जहाँ लौट करके आया है महल में अपने वापस वहाँ पर वैभव है धन है सोना है और मोहीनी वो
00:50:25सुन्दर दिखाई गई है युवा है सुन्दर है तेज है
00:50:30तो बोलो अकरशन किसकी और से है इसकी और से है और जब आपनाटक पढ़ेंगे तो उसमें तो मोहीनी कई
00:50:40बार बोलती है नंद को तुम वापस लुट कर मताना तुम वापस लुट कर मताना जब वो आरा होता है
00:50:46मैंने तो इसको संखषेप में कर दिया था नहीं तो बहुत �
00:50:48ना ठीक का ना अठा करे़ वापस आ रहा होता है
00:50:51तो लौकर रोएरा आ करके
00:50:52सूचना देते हैं कि वापस आ रहा है जाते हैं
00:50:54वापस आ रहा है तुम मेरे कमड़े के दर्मातिय बंद कर दो
00:50:57मुझे यह आना ही छाहिए
00:51:00वो बुला रही है तुम चिपके हुए हो
00:51:04वो बुला रही है तुम चिपके हुए हो
00:51:06वो से मेरा आशा है मातरिस्त्री नहीं
00:51:08वो सब कुछ जिसका हवाला देकर जिसका बहाना लेकर
00:51:13तुम कहते हो कि अरे मैं सही काम कैसे करूँ जिंदगी में
00:51:17दूसरे भी तो काम करने हैं
00:51:19वो दूसरे काम तुम्हारे उपर चड़े हुए है
00:51:23या तुम खुछ जाकर अपने स्वार्थ, अपने मोह के कारण
00:51:26उन दूसरी चीजों से चिपके हुए हो
00:51:27बताओ
00:51:31बताओ
00:51:34बिल्कुल खून निकल रहा है
00:51:35बिल्कुल चिथड़े हो गए है भीतर से
00:51:38पर ये भी हो सकता है कि इधर
00:51:41तो बुद्ध बुला रहे हो
00:51:42बुद्ध ने अपना हाथ बढ़ाया आगे और कहा है कि लो
00:51:44और इधर ये हो सकता है कि इधर
00:51:47मैंने पकड रखा हो
00:51:49दोनों देशाओं में
00:51:52जो प्रक्रिया चल रही हो
00:51:54बहुत अलग-अलग हो सकती है
00:51:55और उसके अलग होने के बावजूद ऐसे लहूलुहान हुआ जा सकता है
00:51:59इधर तो बुद्ध बुला रहे हैं
00:52:01पर इधर से मुझे कोई बुला नहीं रहा है
00:52:03इधर वाले को तो मैंने जकड रखा है
00:52:08आप मत जकड़ो आप छोड़ दो
00:52:11आप मत जकड़ो
00:52:13मोह आपकी ओर से है
00:52:14मोही नहीं नाम व्यर्थ दूसरे को दे रहे हो
00:52:21पूछने लायक प्रश्ण होता
00:52:23इतना वैभव ना होता
00:52:27बड़ा महल ना होता
00:52:30तुंदर उकुवन ना होता
00:52:32इतने परिचारक ना होते
00:52:36तुंदर युवा आकर्शक पत्नी ना होती
00:52:39तो भी क्या नंद बाबू आपस लोट किया जाते
00:52:43ऐसे सवाल पूछा करो
00:52:49अब बताओ ये प्रेम है या क्या है
00:52:54बिचारे आनंद की तो फजीयत कर दी
00:52:57ये तुम्हें क्या मालूम कि ये सिर्फ जगा नहीं है
00:53:00यहां तो प्यार की खुश्बू है
00:53:01ये प्यार की खुश्बू तुमारे जीवन में ही नहीं आनंद
00:53:07हां कुछ गंध है पर क्या वो प्रेम की है
00:53:17प्रेम की पहचान तो बड़ी सीधी होती है
00:53:21मुक्ति देता है
00:53:24जो बांद कर रख रहा हो प्रेम के अलावा और कुछ होगा
00:53:28पचास तरह के नाम हो सकते हैं उसके प्रेम नहीं होगा लेकिए
00:53:38जब भी कोई बोले कि अंतर द्वंद है फसा हुआ हूँ
00:53:42तो वो किसमे अपना यकीन दिखा रहा है द्वायत में
00:53:46वो कह रहा है ना कि एक पक्ष है और दूसरा भी पर सत्य दो होते हैं क्या
00:53:52सत्य तो एक ही होता है आप कहरे हो मैं दो में फसा हूँ दो में फसे हो
00:53:57तो या तो इधर सत होगा इधर असत होगा या फिर इधर भी असत होगा और इधर भी असत होगा
00:54:06आप असत को पकड़े बैटे हो
00:54:11और सानुभूती मांग रहे हो
00:54:14असत को पकड़ कर आप बैटे हो
00:54:17आप कह रहे हो दो तरफ
00:54:19दो ताकतें, दो आवाजें मुझे बुलाती है
00:54:22पर सत्य की तो दो आवाजें होती नहीं
00:54:24वो तो एक ही तरफ होगा
00:54:25दूसरी तरफ जो होगा वो जूटी होगा
00:54:27या फिर दोनों तरफ जूट होगा
00:54:33फसना चुनाओ है
00:54:46सबाप्त हो गया सब
00:54:47उसके बाद आई बिलकुल हो सकता है
00:54:49कि मुहिनी उठ खड़ी हो
00:54:51ये सब खून खचर देखे
00:54:53आकर कि घाव गयरा साफ करे
00:54:55कपड़े बदलवाए
00:54:57माथे पर चुम्बन दे
00:54:59पर नंद को लगे कि
00:55:03जितना तनाव लिया जितनी परेशानी ली
00:55:05जितना खून बहा सब सार्थक हो गया
00:55:13इतना बढ़िया रोमैंस और कैसे मिलता
00:55:24तो बाबू ये चलता है
00:55:27तानभो ते मत बटोरो
00:55:31वो पात्र था जो अभी नीत कर दिया मैंने
00:55:33वो सच मुझ मेरे सामने हाज आज आज तो उदेड़ दूंगा
00:55:44कहिए
00:55:47आचारे जी एक केश काटने का भी प्रकरण था
00:55:51तो जो नंद का करेक्टर है वो ये बात कहता है
00:55:53हलांकि जब वो कहता भी है तो भी उसमें धुर्थता से दिखती है
00:55:57लेकिन वो उसको बोलता ऐसा है कि ये बस बाहरी कर्मकांड है
00:56:01इससे क्या ही हो जाना है
00:56:03तो इसका वास्तवी कर्थ मैं आपसे समझना चाहूँगा
00:56:07कि अगर बुद्ध ऐसा करा रहे हैं तो इसका क्या अर्थ हो सकता है
00:56:12देखो
00:56:17इन सब की जरूरत नहीं पढ़ती है उनको जो अवधूत हो गए
00:56:23महाशिव रात्री है अभी हम अवधूत के पास भी जाएंगे उन्हें नहीं पढ़ती है
00:56:27पर जो भिक्षू है न वो समाज से बाहर नहीं गया है
00:56:31वो भी समाज का एक विशिष्ट प्रकार का सदस्य होता है
00:56:37वो भी समाज का ही एक सदस्य होता है
00:56:40वो गाओं गाओं शहर शहर फिरता है भिक्षा मांगता है
00:56:42वो भी जंगल पहाड नहीं निकल गया है
00:56:44वो समाज में ही रहता है
00:56:45एक अलग तरीके से रहता है लेकिन रहता हो समाज में ही है
00:56:49तो ये एक प्रकार का चिहन होता है बस
00:56:53ताकि लोग जब देखें तो आपसे दूसरे तरह की उमीदें न करें
00:57:01क्योंकि हम किसी के अंतर जगत में घुसकर तो उसको पहचानते नहीं न
00:57:06हम तो वेशभूशा से ही अनुमान लगाते हैं कि इससे कैसा आचरण करना है
00:57:11और कैसी आशाएं रखनी है तो ये बस बताने का एक तरीका है
00:57:16कि देखो मुझसे वो आशाएं मत रखना मैं तुमको अग्रिम में ही बताई दे रहा हूं
00:57:35या तुम ऐसी बात करोगे तो मैं उसमें साथ दूँगा तुमारा और तुम ऐसी आशा रखो और अपनी आशा में
00:57:41तुम निवेश कर दो घंटे दो घंटे महीने दो महीने का
00:57:44और फिर तुम पाओ कि तुम्हारा निवेश वेर्थ गया है
00:57:47तो फिर क्या होगा
00:57:48तुम आओगे मुझसे उल्जोगे मुझपर इलजाम लगाओगे
00:57:54बात समझ रहे हो
00:57:55वही बात
00:57:57भिक्छू आपसे बोले तो आप एक तरीके से लेते हो
00:57:59और वही बात
00:58:02कोई दूसरा मनुश्या अगर आपसे बोले सधारन
00:58:05नागरिक ग्रहस्त
00:58:06तो आप उसको दूसरे तरह से लोगे
00:58:10तो इसका कोई पारमार्थिक महत तो नहीं है
00:58:13कि केश मुडा दिये
00:58:15कोई पारमार्थिक महत तो नहीं है
00:58:17इससे कुछ नहीं हो जाने वाला
00:58:18इस हद तक नंद की बात विल्कुल ठीक थी, कि बाल काटने से कोई क्या सत्य मिल जाना है, बात
00:58:24विल्कुल ठीक थी, बाल काटने सत्य नहीं मिलजाना है, ये एक समघजीए कि managerial process है, आज आप जैसे अपनी
00:58:35फर्म में में होते हो तो क्या यहां पर छिपका कर चलते हो अपना
00:58:39अपना आई कार्ड लेकर चलते हो ना उसी से आप स्वाइब भी कर लेते हो
00:58:45उसी स्वाइब भी कर लेते हो जो भिक्ष्यू का घुटा हुआ सर तकला उसको देख कर दूर से ही लोगों
00:58:56को पता चल जाता था वह आ रहा है खाना अगरे तयार कर लो भिक्षा दे देना
00:59:00वो उसका समझ लो कि इस स्वाइपिंग इन था
00:59:06बस समझा रही है उसका कोई पार्मार्थिक महत तो नहीं है
00:59:09बस प्रैक्टिकल यूटिलिटी है
00:59:12व्यवहारी कलाब हो जाता है
00:59:14समाज में ही रह रहे हो
00:59:15समाज के लोगों को सही संदेश जाता है
00:59:17तुमने पहले ही अपनी पहचान बता दी कि मैं कौन हो
00:59:21तुमने पहले ही अपनी पहचान बता दी कि मैं कौन हो
00:59:25लेकिन साथ ही साथ
00:59:27इसका दुर्पयोग भी करा जा सकता है
00:59:28आप भीतर से कोई बहुत गड़बड आत्मी भी हो सकते हो
00:59:31पर बाल बढ़ा भी सकते हो और बाल घुटा भी सकते हो और आप फिर बाल बढ़ा करके या घुटा
00:59:37करके लोगों को भ्रहमित कर सकते हो
00:59:41लोगों को प्रदर्शित कर सकते हो कि मैं तो भिक्षू हूँ या सन्यासी हूँ या साधू हूँ या कुछ और
00:59:46हूँ
00:59:48वो दूरुपयों की बात हो गई
00:59:49अभी हम यह बात कर रहे हैं कि
00:59:51बुद्ध ने विवस्था क्यों करी थी
00:59:53बुद्ध ने जिस खातिर विवस्था करी थी
00:59:54वो यही बात थी और कुछ नहीं
00:59:57इस पर एक और पूछ सकता हूँ
01:00:01आपने व्यभारिक अर्थ बताया
01:00:02इसका कि बाल घुटा लिया तो
01:00:04लोग क्या एक्सपेक्ट करेंगे और यह सारी चीज़े
01:00:06ताकि प्राक्टिकली हमें हल्फुल हो आगे बढ़ने में
01:00:10आपने तो इसका ठीक उल्टा किया हुआ है
01:00:12हमें घर परिवार संसार सब के साथ छोड़ दिया है
01:00:16और उपर ही कुछ कर्मकांड वगर भी नहीं करने देते हो आप
01:00:20साल में दो तिन बार आप बुला लेते हो
01:00:22जैसे महाशेवरातरी आदिपोच्सों पे
01:00:24बाकी हमें रहना वही है
01:00:26तो यह चीज़े कैसे कारगर साबित हो रही है
01:00:28और दूसरा जो लोग धर्म के ठेकदार बने बैटे हैं
01:00:32जिन्होंने धर्म को अपने मुठी में ले लिया है
01:00:35वो यह सारे काम कर रहे हैं
01:00:37उन्होंने वेश भूशा वैसी बना रखी है
01:00:39और वो पता नहीं क्या-क्या नई-नई चीज़े कर रहे हैं
01:00:41और रोज नई-नई खबरे भी आती जाती है
01:00:45क्योंकि भिक्षू के जब बाल घुट जाते हैं
01:00:49तो समाज के भीतर भी रह करके
01:00:52अपना एक विशिष्ट कोना बना लेता है
01:00:58मत्रे है तो समाज के अंदर ही
01:00:59पर वो अलग कहलाएगा
01:01:01क्या क्या लाएगा
01:01:01कि अरे तुम तो भिक्षू हो
01:01:03तुम्हे ग्रहस्तों के क्या पता
01:01:07दो फाड बन गए ना समाज के भीतर
01:01:09और जब भी दो फाड बनेंगे
01:01:12तब दूसरा बचा रह जाएगा
01:01:15दूसरा अपनी अलग पहचान
01:01:18सुरक्षित कर ले जाएगा
01:01:22मुझे आप पर ज्यादा भरोसा है
01:01:24मुझे नहीं लगता
01:01:26कि आपको ग्रहस्तों से
01:01:28अलग होने की जरूरत है
01:01:31मुझे नहीं लगता
01:01:32अपने आपको
01:01:33एक भिन वेश भूशा में दिखाने की
01:01:36आपको जरूरत है
01:01:38बिक्षू को लेकर हमने यही कहा
01:01:40ना
01:01:41कि अगर उसके बाल घुटे है
01:01:42तो लोग फिर खुद ही उससे
01:01:44मर्यादित वेवहर करेंगे
01:01:45यही कहा ना
01:01:46दूर से ही देख लेंगे अच्छा ही भिक्षू आ रहा है
01:01:48चलो इससे अलग तरह का वेवहर करो
01:01:52शायद
01:01:52वो बात वैद और उपयोगी
01:01:55रही होगी बुद्ध के समय में
01:01:56मैं देखता हूँ आज के समय में
01:01:58बिलकुल उसके विपरीत की जरूरत है
01:02:02मैं नहीं चाहता कि
01:02:03कोई आपकी वेशभूशा देखकर
01:02:04पहले ही सतर को जाए और आप से
01:02:07मर्यादित संसकारित किसम का
01:02:09वेवहर करना शुरू कर दे
01:02:11आप अपने बाल वाल बिलकुल घुटा लीजी
01:02:13आप यहां ग्रिटर नुटा में सड़क पर निकल पड़िये
01:02:18देखिए चारों और से लोग आकर
01:02:19कोई पाहुच हुएगा कोई कुछ करेगा
01:02:22आप बहुत सारी डोनेशन लेके
01:02:23अपने घर पहुच जाओगे
01:02:29मैं चाहता ही नहीं कि वैसा हो
01:02:32क्योंकि अगर मैं आपको कोई
01:02:34विशेश चिहन लक्षण वेशभूशा
01:02:37धारण करने की सला देता हूँ
01:02:40तो उसमें मेरी ये माननता होगी
01:02:44कि मैंने कर लिया स्विकार आपकी कमजोरी को
01:02:49कि आपको जरूरत है अपने आपको
01:02:52अलग दिखाने की ताकि सामने वाला
01:02:54मर्यादा में रहकर सीमा में रहकर व्यवहर करे
01:02:56मैं चाहता हूँ
01:02:57जैसी ये खुली दुनिया है
01:03:00जंगल है इसमें पशु हैं
01:03:02पिशाच हैं जैसी भी है इसमें आप
01:03:04बेधड़क उतरो बिना किसी आवरण के
01:03:06बिना किसी कवच के उतरो
01:03:15क्यों आपको
01:03:16क्यों आपको ये करना है
01:03:18कि दूर से ही आपको देखके
01:03:35तुम्हें कुछ जताने के लिए
01:03:37मुझे किसी खास किसम के
01:03:38कपड़े की या दाढ़ी की या माला की
01:03:40या बिन्दी की या बाल की
01:03:42ज़रूरत नहीं है
01:03:43मेरी हस्ती काफी है
01:03:51बात आ रही है से मझें कुछ
01:04:01क्यों दिखाना है कि हम अलग है
01:04:03आपके अलग होते ही
01:04:05वो जो दूसरा पक्ष है
01:04:06उसको वैधता मिल जाती है
01:04:08वो कहेगा फिर कि तुम
01:04:11एक अलग जीवन इसलिए जीपा रहे हो
01:04:13ना क्योंकि तुम तो भिख्शू हो
01:04:16और हम क्या हैं
01:04:17हम ग्रहस्त हैं
01:04:18हम पे दिम्मेदारी हैं
01:04:19तुम तो भिक्षू हो, देखो
01:04:22तुमारे बाल गुटे हो औहाई हैं,
01:04:23देखो तुमने ऐसे कपड़े पान रखे हैं,
01:04:25देखो तुम यह करतE हो वो करतE हो YouTube
01:04:26देखो तुमने ऐसा नाम रख लिया है
01:04:29इसलिए तुम एक अलग जिंदगी ने हो,
01:04:30रहे हो पर हम तो तुमसे अलग है ना हम तो तुमसे अलग है ना हाँ ठीक है तुम क्लाइमेट
01:04:37फ्रेंडली जीवन जी पा रहे हो क्योंकि तुम तो भिक्षू हो हाँ ठीक है तुम पशुकुरूरता के उत्पाद नहीं इस्तेमाल
01:04:44करते क्योंकि तुम तो पर हम तो हम क्लाइम
01:05:00तो ग्रहस्त हैं, तुम जितने भी अच्छे बात कर रहे हो, जितने भी अच्छे तुम काम कर रहे हो, वो
01:05:05तुम कर सकते हो, तुम एफोर्ड कर सकते हो, क्योंकि तुम तो भिक्षू हो, और हम क्या हैं, मैं उनको
01:05:12ही कहने का मौका ही नहीं देना चाहता, मैं चाहता हूँ आप �
01:05:15के सामने खड़े होगर के बोलें कि जैसे तुम गरहस तो ऐसे हम गरहस और कौन कहता है कि जिंवेदारी
01:05:21वास्तविक ब्रेम के साथ ग्रहस्त्य नहीं निभाई जा सकती
01:05:26कौन कहता है क्योंकि अध्यात्म पर सदा से यह आरोपरा है अध्यात्म का क्या मतलब है अच्छे अच्छे काम करना
01:05:33लेकिन दुनिया छोड़ करके बहुत अच्छे अच्छे काम करना लेकिन जंगल में जा करके मैं जाता हूं आप जंगल में
01:05:40जा करके अच्छे अच्छे काम �
01:05:41करें आप जिंदगी में ही रहकर अच्छे काम करें आप अरी बात समझें है वह विरूरत नहीं है अपने आपको
01:05:58अलग प्रदर्शित करने क्या अलग क्या दिखा लोगे वो भी बात सिध्धानतों के प्रिदिकूली होगे अलग क्या
01:06:11ये भी क्या है, मिट्टी अबाल भी क्या है
01:06:15तो बाहर से
01:06:16तो अलग होना संभवी नहीं है
01:06:18अलग तो बस भीतर से
01:06:20हुआ जा सकता है इस हर्थ में
01:06:21कि किसी के भीतर, वो कीड़ा बैठा होता है
01:06:24जिसको हम क्या बोलते हैं
01:06:25अहंकार, और कोई होता है जो
01:06:27कीडे के मित्यात्तों को देख लेता है अलग तो बस भीतर से हुआ जा सकता है ना बाहर से रूप
01:06:33परिवर्तन हो सकता है आयाम परिवर्तन नहीं हो सकता और रूप परिवर्तन करके क्या मिलेगा अभी मैं आपके सामने इस
01:06:39रूप में थोड़े देर में किसी और रूप में आ �
01:06:41जाओं उसे क्या फरक पड़ जाएगा पड़ जाएगा तो यह जो रूप पदलने का खेल चला है अध्यात्मे परंपरा से
01:06:50यह कोई बहुत सफल खेल नहीं है किस लिए चला था वो मैंने आपको बता दिया किस लिए चला था
01:06:58वेवहारी को प्योगिता थी उसकी कुछ उसकी क�
01:07:10कुछ शब्दों का उचारण शुरू कर लो माला कंठी कुछ धारण कर लो लोगन राम खिलोना जाना माला तिलक पहन
01:07:21मनमना आप तो वो जो उप्योगिता रही होगी वो बहुत पीछे चूट गई अब वो सब पस पाखंड का तरीका
01:07:30है उसकी कोई जरूरत भी नहीं है जर�
01:07:38यहां बैठे हो सब सफेद कपड़े पहन के बैठ गए हो इतना अजीब लगेगा
01:07:45मैं यहां से रंग लेके फेखना शुरू कर देंगा
01:07:53प्रक्रती में एक ही रंग है क्या इतने रंग है न क्या समझाता हमने गीता में जहां भेद नहीं है
01:08:02वहां भेद न करना भी विवेक कहलाता है
01:08:07विवेक माने सिर्फ अंतर करना नहीं होता
01:08:09हम सोचते हैं विवेक माने अंतर करना
01:08:13सत असत में अंतर करने को विवेक कहते हैं
01:08:16यह धूरी बात है
01:08:19जहां अंतर है ही नहीं
01:08:20वहां अंतर न करने को भी विवेक कहते हैं
01:08:24सफेद और काले में क्या अंतर मूलता
01:08:26कभी सफेद पेहन लो, कभी काला पेहन लो, इसमें क्या हो गया, कभी पजामा पेहन लिया, कभी पतलून पेहन ली,
01:08:31कभी कुछ
01:08:32पहन लिया, तुम्हारी मर्जी है, बाल लंबे रखने, रखलो कभी, बाल घुटाने, घुटालो कभी, मर्जी है, साड़ी पहननी है, सकर्ट
01:08:38पहननी है, मर्जी है, इसमें कौन सा अध्यात में घुसाएगा, तुम्हारी मर्जी है, साड़ी भी, आग लगा तो जल जाएगी,
01:08:47उसमें तुम कौन सा बड़ा भारी तुम भेद स्थापित कर रहे हो
01:08:55जहां भेद है फिर वहां भेद दिखना बंदो जाता है
01:08:58जब जहां भेद है ही नहीं
01:09:00वहां फाल्तु ही भेद खड़ा करोगे
01:09:02तो जहां सचमुच भेद है वहां भेद फिर नहीं दिखेगा
01:09:14अध्यात्म बस किसी गुट की चीज बना दे
01:09:17कि ये सब जो बैठे हैं
01:09:21हजारों ये तो सब गरहस्त हैं
01:09:23और वो जो पाथ जने वहाँ बैठे हैं कुल
01:09:25वो भिक्षू है
01:09:29तो फिर पाथ जनों की चीज रह गया अध्यात्म
01:09:32वो सब सर घुटाए बैठें टकले और ये सब यहाँ पर बढ़िया चोटी धारी केश धारी है
01:09:42तो फिर तो अध्यात्म कितनों तक सिमट कर रहे गया पांच तक क्यों सिमटाएं सब के लिए
01:09:48किशी को बाल लंबे बेशक रखो कॉन रोख सकता है किसी को नहीं रखने मत रखो
01:09:55को नियम की बात ठोड़ी प्रकरती की बात पेड़ों प� we फूल खेलते हैं और कभी पत्तीयां अगया
01:10:02जाती हैं पेड़ भी अपना पहनावा बदलते रहते हैं इसमें कौन सी बात
01:10:13कि अचरी जब नाटक स्टार्ट हुआ था, तो स्टार्टिंग में जो नंद का एंकार था, वो ऐसा दिखाई दे रहा
01:10:22था जब गीता सित्र में लोग आते हैं, जो स्टार्टिंग में जुड़ते हैं, लिंग से जब वो लौट के आया
01:10:29तो बुद्ध को छोड़ कर आया था, त
01:10:37तो सुरू में यह दिखाई पड़ता था कि सायद वो अपने जो स्वारते हैं, उनकी वैसे छोड़ कर आया है,
01:10:45थोड़ी देर बाद लगा कि सायद इस वैसे भी आया है, क्योंकि वो बीच में बोलता है कि जो मुझे
01:10:50चाहिए था वो तुम्हे छोड़ कर आ गया हूँ, अन्
01:11:05भी मोहीन न का बोलता कि मोहीनी की वएसे मैं आया हूँ घर भाणा जैसा ही प्रतीत हो रहा था
01:11:10था बहानाही दे रहा है, और जाए घर हमारे साथ भी ऐसे होता है, हम जो बहानेह देते हैं, मच्छयम
01:11:16था सर Teiri वहाने ही जा समझनी आmedim आया है कि ख्या था, जो नन्न को वार�
01:11:29बुद्ध वगेरा ना सब दूर से प्यारे लगते हैं दूर से प्यारे लगते हैं अभी भी आप देखोगे तो यहां
01:11:41पर हो नहीं गया बुद्ध के पास बुद्ध आए हैं उसके द्वार उसको खीच कर ले गए हैं यहां पर
01:11:47बुद्ध आपको सिर्फ मसीहा की तरह नहीं मि
01:11:58कि पूरा जो शहर यह बुद्ध के पास जा चुका है बस मोहिनी के कारण अनंध नहीं गए और मोहिनी
01:12:07खफा भी है क्योंकि मोहिनी ने उसी दिन जिस दिन बुद्ध बड़ी सभा कर रहे हैं मोहिनी ने उसी दिन
01:12:12अपना उत्सव रख लिया है उसे बहुत तरह की मदिरा वंग
01:12:26ये बढ़िया होगा ये तब होगा पर फिर अब दोपर हो रही है और उसको खबरें आ रही है कोई
01:12:30नहीं आने वाला उसकी दावत में क्यों क्योंकि आज ही शाम को बुद्ध ने अपना उपदेश रख दिया है और
01:12:39सारे लोग वहां जा रहे हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जै
01:12:58बुद्ध खुद उठकर आये हैं अनुमान आये हैं और इसलिए वहां खड़े हुए हैं भिक्षाम दे ही बोला है पर
01:13:08जो भिक्षा देने गया तो ली नहीं है जैसा इशारा करके चले गए हो कि अब तुम्हें आना है तो
01:13:16बुद्ध आये उसको ले गए उसके भीतर अपने
01:13:22नहीं था बुद्ध के लिए कि के दूर दूर से बोलना अच्छा लगता है हां बुद्ध है बड़े महान है
01:13:26बुद्ध इतने ही अच्छे होते तो क्या प्रतिक्षा करता कि बुद्ध आएंगे तब जाओंगा उनके पास वो पहले ही उठकरना
01:13:32चला गया होता है
01:13:37वो आधा धूरा सा है गुन-गुना सा मामला कोई विशेश सम्मान कोई विशेश प्रेम बुद्ध के लिए आरंभ से
01:13:47ही नहीं है
01:13:49पर ठीक है एक आकर्शन है शुरू में कहता है ना अरे वाह बुद्ध की वो सलोनी आकर्शक मूर्ति कितने
01:13:57संदर लग रहे थे बुद्ध खड़े हुए खड़े हो गए है एकदम स्थिर और मुझसे क्या कह रहे है भिख्षाम
01:14:02देही तो आकर्शन है व्यक्तित्त का आकर्�
01:14:16इसे भी लिए भी तो ब्दोड़ान के प्रतिक्षा नहीं करता वह खुदि पहले ही चला गया होता वो थो थो
01:14:23बुद्ध ने इतनी मैंद
01:14:24करी कि नंगे पाउं चल करके अपने विहार से इसके महल तक आए तब जा करके ये बंधु निकले बुद्ध
01:14:32के पास जाने के लिए ये अपनी स्वेच्छा थोड़ी जा रहे थे बुद्ध ने जान लगाई ये इनको खीचने के
01:14:37लिए
01:14:39जब बुद्ध ने के पास आ गए तो इनको भीतर थोड़ी जिम्यदारियन भववी कि मुझे भी जाना चाहिए तो यह
01:14:44वहां पहुँच गए दूर से तो फिर भी बुद्ध अच्छे लग रहे थे जब पहुँच गए तो वहां पर जो
01:14:49बाते हो रही है आपने सुना होगा ज
01:15:06क्रहन की बात कर रहे हैं बुद्ध के सामने बैट करके वो बाते सुनना एकदम जैसे कोई बोज आ गया
01:15:16हो जैसे किसी ने जकड़ लिया हो जैसे कोई गिरफ्त में ले रहा हो तो इसलिए सुनते हो कि बुलते
01:15:24हैं कि मैंना तो शुरू में हुआ कि उठके भागूं पर सहास �
01:15:27ही हुआ मुझे तो शुरू में लगा कि अरे मैं क्यों आ गया यहां पर यहां से भागो कुछ खत्रा
01:15:32है यहां पर कुछ खत्रा है क्या खत्रा था कुछ नहीं यही था अपनी कामना को अपने स्वार्थ को खत्रा
01:15:36था और क्या खत्रा था
01:15:44असल में जब आप नाटक पढ़ेंगे तो उसमें पढ़ा चलेगा कि चुकि शाम को दावत थी
01:15:51तो मोहिनी आज अपना एक विशेश श्रिंगार करना चाहती थी वो सब जो अभूशन गरा रखे हुए थे ना
01:15:58और जिस जो विशेश श्रिंगार करने वाली सेविका थी वो खुद बुद्ध क्या निकल गई थी तो अब मोहिनी के
01:16:07पास कोई बचा नहीं था जो उसका श्रिंगार भी करें अब बहुत विशेश तरगर श्रिंगार करती थी वो यहां पर
01:16:12सूरे बनाती थी उसके चारों नक्
01:16:25तो इन्होंने वादा करे था कि तुभारा मेक-प मैं करूँगा
01:16:29अब समझे लोगी किस बात की इनको इतनी जल्दी थी
01:16:35भेल सारा ये था
01:16:37बंदूबर को जल्दी लोटना था
01:16:40मोहिनी का
01:16:41मेक-प करने के लिए अपने हाथों से
01:16:45तो वहाँ गए वहाँ बैठ गए
01:16:47वहाँ पर उब्देश दे रहे हैं, जीवन दुख है, तो कामनाओं से आता है, कामनाओं को छोड़ने के लिए अश्टांग
01:16:58मार पर चलो, और अब इसर उदर देख रहे हैं, तो कहां यहाँ पर मोहिनी और वहाँ सब कौन बैठे
01:17:05हुए हैं,
01:17:09चारो और वही वही बैठे हुए हैं, दम घुट रहा है कि भागो यहाँ से, वहाँ मोहिनी प्रतीक्षा कर रही
01:17:14है कि यहाँ करके मुझे श्रिंगार करेगा, यह सब करेगा, और यहाँ यह सब घेर के बैठ गए हैं, पर
01:17:21बुद्ध ने भी ठान रखी, बुद्ध बोले अचल
01:17:35दीक्षा देना भी दो वजहों से हो सकता है, पहली तो वजह होती है व्यावारिक, व्यावारिक वजह यह होती है
01:17:42कि बुद्ध को भी एक मिशन चलाना था, और उसके लिए बहुत जरूरी था कि जो गणमानने लोग हों, जिनका
01:17:50रुतबा हो, रसूख हो, जिनके पास पैसा
01:17:52हो, ताकत हो, जिनके पास सत्ता हो, महल हो, वो लोग भी बुद्ध के संग में जुड़ें, अगर वो बुद्ध
01:18:01के संग में नहीं जुड़ते, तो बुद्ध का काम फैलता नहीं, यह तो यह व्यवारिक बात है कि बुद्ध स्वयम
01:18:08क्यों चाहते थे, कि इस व्यक्ति को अ�
01:18:23है, यह भीतर से तयार है नहीं दीक्षा के लिए, पर बाहर से यह ऐसे दर्शाना चाहता है, जैसे मेरा
01:18:29यह बड़ा प्रेमी हो, तो इस जुट का परदाफाश करने के लिए भी बुद्ध यह कह सकते हैं, कि ले
01:18:38लो ना दीक्षा, जैसे ही काऊंगा दीक्षा ले लो, वैसे
01:18:42ही तुमारी पूल खुल जाएगी, वैसे तो बहुत बन रहे हो, क्या बोलने के लिए, भगवान मेरा आतिथे स्विकार करिये,
01:18:47आईए मेरे महल में रहिए, मैं आपके चरण दोके पीऊंगा, और मेरी पत्नी तो आपकी पुरानी प्रेमिका है, अब जरूर
01:18:55आईए, अब य
01:19:11ये ज्यानियों के तरीके भी होते हैं पोल खोलने के, बिलकुल संभव है कि बुद्ध को पहले से यह नुमानों
01:19:19कि जैसे ही इसको दीख्षा को बोलेंगे भग जाएगा, पर वो उसको यही दिखाना चाहते थे कि तु जूटा आदमी
01:19:25है, उपर-उपर की बाते करने के लि�
01:19:42दिवी जी का संदेश आया, बोलेंगे संस्था से कॉल आई, कि आपके साल भर से उपर हो गया, आप यह
01:19:49100-200 रुपए करती रहती हो, कुछ तो करिए, यह करिए, बढ़ाइए, तो मैंने कहा कि ने, मैं कुछ नहीं
01:19:54कर सकती हूँ, और वो तो मुझे अचार जी से प्रेम है, म
01:20:10उन्होंने कहा, आप कितना कमाती हैं, कि आप नहीं दे पा रही हैं, तो उन्होंने अपनी एक आया बताई, बोली
01:20:15मैं इतना ही कमाती हूँ, तो इसलिए मैं यह 100-200 रुपए से उपर कुछ नहीं कर सकती, उन्होंने कहा
01:20:21एक काम करिए फिर, आप सबस्ता हाज आई, आप जित
01:20:40फिर तो आप संस्ता की सदस्या हो गई, आजाईए, आजाए, आजाईए
01:20:45बोली नहीं वो ऐसा वैसा घर में देमेदारियां है ऐसा है नहीं आ सकती
01:20:49हम आपको घर से काम करने का मौका दे रहे हैं
01:20:59वर्क फ्रॉम होम दे रहे हैं वे ट्रिपल सेलरी
01:21:04नहीं
01:21:05अच्छा पता ही डोनेशन कितनी देनी है
01:21:10कुछ भी मंजूर है
01:21:13पास आना मंजूर
01:21:15ये बात समझो
01:21:17दूर से प्यार जताना असान होता है इतना ही प्यार है तो आजाओ न भीतर
01:21:22यही दिखाना था बुद्धगो नंदगो
01:21:39आर यही बात समझों है हूं तुम ग्यानी माने क्या समझते होगी पस ऐसे बैठा रहता है
01:21:51यानी माने वो जो चतुराई के भी पार निकल गया है
01:21:55जिसके सामने तुम चतुराई खेलते हो और तुमारी चतुराई को बिलकुल
01:21:59ऐसे आर पार देख लेता है उसे बोलते हैं ग्यानी
01:22:05तुम उसके साथ चाल चलते हो तुम जो बोल रहे हो वो भी सुन लेता है
01:22:09तुम जो छुपा रहे हो, वो भी सुन लेता है
01:22:23परणामाचारे जी
01:22:24मुझे दिख्षा लेनी है, मैं अब कैसे होगा
01:22:32उसके लिए क्या करना होगा
01:22:34मोहिनी को लेकर आओ साथ
01:22:40मैं तुम्हे दिख्षा देने लगू
01:22:43और फिर तुम भग जाओ
01:22:44और भगी नहीं जाओ
01:22:47किसी मंच पे आके चिला चिला करके मेरा अपमान करो
01:22:50कि केश काटने से क्या होगा
01:22:52जबान काट दो, गर्दन काट दो, टांग काट दो
01:22:57तो वो बड़ी गड़बड होती है
01:22:58जो लोग आदे अधूर अंदर आ जाते हैं
01:23:01मैंने भी ये गल्ती अतीत में खूब करी
01:23:03आधे अधूरों को अंदर ले लिया
01:23:04जो आधा अधूर अंदर आया है वो भागेगा
01:23:06और जब बाहर जाएगा तो वो फिर खूब बदनामी भी करेगा, उल्टा-पुल्टा बोलेगा, और विरोध में काम करेगा.
01:23:12तो, मैं यह नहीं क्या रहा कि तुम जब बिलकुल एकमत हो जाओ, सहमत हो जाओ, तब ही आओ.
01:23:19मैं तो बस यह कह रहा हूँ कि, जिसकी खातिर बाहर भागने की नौबत आने वाली है, पहले उसको साथ
01:23:25लेके अंदर आओ.
01:23:44पुद्ध की जो अपनी अंतरंग मंडली थी, उसमें बहुत कम लोग थे.
01:23:53जिसको आप उनका इनर सर्किल बोलोगे न, बहुत कम लोग थे.
01:23:58इसलिए नहीं कि, बुद्ध बहुत कडाई से चुनाओ वगरा कर रहे थे.
01:24:10कडाई बुद्ध की ओर से नहीं थी.
01:24:13बुद्धों की संगती जेली नहीं जाती.
01:24:18तुम कोई न कोई बहाना बनाओगे, और जब दूर जाओगे तो ये तो नहीं बोलोगे.
01:24:23कि तुम से जेला नहीं गया, इसलिए दूर जा रहे हो.
01:24:26तुम सदा दूर जाने के पीछे कारण यहीं बताओगे, कि बुद्ध में कोई खोट थी.
01:24:29जैसे ये महाशे क्या कर रहे थे?
01:24:31बुद्ध ने ये गलती कर दी, बुद्ध ने वो गलती कर दी, बुद्ध ने ऐसा क्यों कह दिया?
01:24:39तो इसलिए आप पाते ये हो, कि उनके निकट जो आते भी हैं, उनमें से जाएतर टिकते नहीं.
01:24:45आप लोगों की मासूमियत इसमे है, कि आप कहते हो, अरे, कोई इतना पास होकर भी चला कैसे जा सकता
01:24:52है?
01:24:52हर महीने यहां से भी जाते हैं, बीस-पचास लोग.
01:24:56जो पास है, उसी के जाने की संभावना ज्यादा हो जाती है, भाई, आप क्यों नहीं समझ रहे हो?
01:25:04सत्त्य आग की तरह होता है, उसके पास बहुत देर तक नहीं बैठा जा सकता है, या तो भस्म हो
01:25:11जाओ, या दूर उर जाओ.
01:25:14पास बैठोगे तो बड़ी पीड़ा होगी, वही पीड़ा जो आप में से भहतों को जहलनी पड़ रही है, वही पीड़ा
01:25:24जिसके लिए कभीर साब ने कहा था कि बिरहिन, ओदी, लाकड़ी, उसके और धुदुआए, छूट पड़े या बिरह से जो
01:25:36सगली जली जाए, पू
01:25:42पूरी तरह दूर निकल जाओ, जिसे गीली लकड़ी होती है न, ओदी लाकड़ी, ओदी लकड़ी, गीली लकड़ी, जो ना तो
01:25:48जल रही है ठीक से, ना बुझही पा रही है, बस उसमें से धुआ निकल रहा है, धुदुदुदुदुदुदुदुदुदुदुदुद
01:26:08सत्य के निकट आने जैसी कोई बात नहीं होती है या तो तुम उसमें समा जाओगे या उससे छिटक जाओगे
01:26:15निकट जैसा कुछ नहीं होता कि तुम कहो कि हम निकट हैं एक और्बिट में हैं आसपास और्बिट कुछ नहीं
01:26:22होता उसका ग्रैविटेशन इतना तगड़ा होता
01:26:24है यो सारे और्बिट अपने में खीच लेता है
01:26:29कि आप लोग चाहते हो कि ऐसे वही ग्रहों की तरह अपनी कक्षा में गोल-गोल घूमों कि पास भी
01:26:38है और दूर
01:26:40भी है और एक्युलिब्रियम में ग्रैविटेशनल सेंट्रीपीटल बिल्कुल बराबर कर रखे और दंदना के घूम रहे है वो जड़ पदार्थ
01:26:54में चल जाता है सत्य के साथ तो यही है कि भला हो तुम्हारा कि तुम्हें पता ही न चले
01:27:00कि सच क्या है जूट क्या है क्योंकि
01:27:03सच पता लगने लग गया उसके बाद जिन्दगी में पीड़ा बहुत उठती है और उस पीड़ा से बचने के दो
01:27:10ही तरीके होते हैं या तो पूरी तरह सच्चाई में डूब जाओ या फिर मदिरा में डूब जाओ जो भाई
01:27:19साब कर रहे थे बुद्ध को छोड़कर मदिरा
01:27:32जो निकट भी नहीं कहा रहा हूँ जो डूब ही नहीं जा रहे जो डूब ही नहीं जा रहे वो
01:27:40बहुत समय तक निकट भी नहीं रह पाएंगे उनकी विवश्ता हो जाएगी उन्हें भागना पड़ेगा
01:27:49वो कहेंगे भाग करके भले जंगल जाना पड़े जंगली जानवरों से खुद को चिरवाना पड़े वो भी स्वीकार है बुद्ध
01:27:55नहीं स्वीकार है बुद्ध की संगती जंगली जानवर के पंजों से भी ज्यादा घातक लग रही है
01:28:10हुआ
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