00:00तो साथवी आठवी की बात है और मेरी कक्षा में एक लड़की हुआ करती थी प्राची शायद उसका नाम था
00:09तो प्राची की जितनी कौपियां किताबें थी उन पर पहले एक भूरा कवर चड़ा रहे
00:16उस भूरे कवर पर फिर वो अपने नीमचिक छोटी सी एक नाम पट्टे का लगाती थी और फिर उसके उपर
00:23वो पॉलिथीन की जिल्द चड़ाती थी
00:25इंट्रवल जो खाना खाने के लिए ब्रेक मिलता है उसके ठीक बात का समय था उस दिन मेरे टिफिन में
00:33कुछ पूडियां वगरा रहे होंगी तो मैंने खाया था था थोड़ा सा अचार मेरी टेबल पर गिरा हुआ था उसी
00:40समय पर मैंने प्राची से उसकी कॉपी ली मैंने
00:54कफिया मेरी साफ सुतरी रहती थी होड़ी तो सफाई का मुल समझता था मैंने माफी मांग ली तो प्राची अपना
01:02पाउं पटकती थोड़ा पीछे हो गई उसके बाद मैंने अंदर खोला कि जो चैप्टर मुझे इससे देखना है या जो
01:09सवाल रहा होगा देखने वाल्ला
01:24शकल देख रहा हूँ, यह है क्या, यह भी मुझे पूरे पांच मिनट तक
01:29खुब खरी-खुटी सुना कर गई है, इस कॉपी को ले करके, जिस कॉपी के भीतर कुछ है ही नहीं,
01:35प्राची लड़ रही है
01:36मुझसे कि किताब की जिल्द पर तेल क्यों लग गया जरा सा, किताब के भीतर मामला सफाचट है
01:45किताब के भीतर क्या है, दिल के भीतर क्या है, उसकी बात नहीं करोगे, क्योंकि दिल किसका है, तुम्हें यही
01:49नहीं पता भाई
01:50जो असली चीज़ है वो भीतर की है उसकी बात करो ही मत
01:53सब बाहरी बाहरी चीज़ों की बात कर लो
01:55उस मुद्दे को हम बिल्कुल दवाय रखना चाहते हैं
01:59क्योंकि एक मुद्दे को अगर हमने परत दर परत उगाड दिया
02:04तो जीवन में हमने जिन जिन चीजों को जगह दे रखी है
02:08जिन जिन चीजों से रिष्टा बना रखा है
02:10हमें उन सब को गाड़ना पड़ेगा
02:12और वहां पता चलेगा कि मामला तो गड़बड है
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