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ये वीडियो बोध प्रत्यूषा - 12th जनवरी , 2025 के लाइव सत्र से लिया गया है।
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Transcript
00:00ये घड़ा था, उसको एक महिला अपने सर पे रखे जाती थी नदी से पानी भरने रोज
00:06और घड़े को बड़ा गुमान था कि मैं कितना खुबसूरत हूँ, घड़े पे चितरकारी और भी हुई थी
00:10और घड़ा कहता था, भाली हूँ बहुत मैं, खोखला हूँ भीतर से
00:16मुझ में ये भर जाए, वो भर जाए, तो बड़ा मज़ा आए
00:19और मिट्टी को देखता था, नीचे की, कहता था, ये बेकार की मिट्टी, चिकनी मिट्टी, नदी किनारे की
00:24ये तो पाओं के नीचे आती है, मैं तो इससे अलग हूँ, मैं कहा हूँ, सर के उपर, और ये
00:30नदी किनारे के मिट्टी कहा रहती है, पाओं के नीचे, न कहें कि लानत भेशता हूँ इस मिट्टी पर, मुझ
00:36में तुम पानी क्यों भर रहे हो, पानी भरते हो अच्छी बात
00:52अम्रित भरो हमारे भीतर
00:55और ऐसा होता भी गया
00:56कभी उसमें कुछ भरा जाए
00:57कभी कुछ भरा जाए
00:58पर उसको कभी चैन ना आए
01:00एक दिन महिला उसको लेके आई
01:02नदी के पास भरने के लिए
01:03घड़ा फिसल के गिर गया
01:04जिस चिकनी मिट्टी से वो घड़ा उठा था
01:07वो घड़ा वही चिकनी मिट्टी हो गया
01:09उसको चैन आ गया
01:10जब तक तुम अपने आपको
01:14मिट्टी से अलग मानते रहोगे
01:16तुम्हें चैन नहीं आएगा
01:27जब तक तुम अपने आपको
01:36मिट्टी को मिट्टी होना पड़ेगा तभी उसको चैन आता है।
01:41अब तो ऐसा हुई चला। जिए पाओ तले की घास जैसा आपको नहीं मान लेते।
01:50तब तक चैन नहीं आेगा।
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