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मद्रास हाईकोर्ट के जज भारता चक्रवर्ती ने अपनी एक ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा कि जाति का उन्मूलन ज़रूरी है। मंदिर के आयोजनों के निमंत्रणों में जाति का उल्लेख नहीं होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू की वाइस चांसलर का कहना है कि दलित हमेशा पीड़ित मानसिकता से ग्रसित रहते हैं। इसकी चारों तरफ़ आलोचना हो रही है।
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00:00एक तरफ हमारे सामने हैं तमिल नाडू हाई कोट के जज, भारता, चक्रवर्ती, जो कहते हैं जाती का उन्मूलन जरूरी
00:10है, जाती को जिन्दा नहीं रखना चाहिए, जाती की गंदगी दिमाग में होती है और तमिल नाडू सरकार से सीधे
00:17-सीधे कहते हैं कि आपके पैसे से
00:19जो मंदिरों के आयोजन होते हैं, वहाँ पर जाती का सरनेम के साथ इंविटेशन नहीं जाने चाहिए, क्योंकि ये एनिलेशन
00:28ऑफ कास्ट का रास्ता नहीं है, या जाती की दबंगई को जिन्दा रखने का रास्ता है, और ठीक उसी समय,
00:36देश की राजधानी दिल्ली, दि
00:49मातार एक विक्टिम हुड है, वे अपने को पीडित समझते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए, हर समय कोई शत्रू नहीं
00:57होता, 2026 में इस देश में, जहां तमिलनाडू हाई कोट के यह जज सीधे सीधे लाइन खीचते हुए कहते हैं,
01:06कि जब तक जाती की दबंगई जारी है, ज
01:10तब तक जाती का उन्मूलन नहीं होगा, जो बाबा साब बीम राओ अम बेटकर का सपना था, तब तक समाज
01:17बराबर नहीं होगा, और बहुत ही क्रांतिकारी अब्जर्वेशन देते हैं, सीधे सीधे एमके स्टालिन की सरकार को कहते हैं, कि
01:25इस तरह के आयोजनों में, जो �
01:28इंविटेशन जाता है, उसमें सरनेम नहीं होने चाहिए, कोशिश की जानी चाहिए, कि जाती का उन्मूलन हो, ताकि पढ़ने वाले
01:36को यह न पता चले, कि वह किस जाती का है, लेकिन देखिए, देश की राजधानी दिल्ली की यह, एक
01:44हमारी वाइस चांसलर, सीधे सीधे क
01:47कह रही हैं, कि जिस तरह से ब्लैक्स और अब भारत में दलित, लगातार, विक्टिम होड़ी आनि खुदी को पीड़ी
01:55समझ रहे हैं, यह सही नहीं हैं, इन दो तस्वीरों में कौन सी तस्वीर आपको सही लगती हैं, हमें बताईए
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