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  • 4 hours ago
ओडिशा की "रग्बी क्वीन" मीरा रानी हेम्ब्रम की कहानी किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है. अनाथालय से निकलकर रग्बी स्टार बनने तक का सफर तमाम उतार चढ़ाव के बीच गुजरा. क्योंझर जिले के घासीपुर ब्लॉक के गोपालपुर गांव में बचपन मुश्किलों के बीच गुजरा. तीन साल की उम्र में मां को खो दिया. पिता छोटे किसान थे. पांच बच्चों की परवरिश में दिक्कतों की वजह से मीरा को आगे की जिंदगी अनाथालय में गुजारनी पड़ी. अनाथलय में रहते हुए मीरा रानी को एक सिंगापुर के कपल ने गोद लेने की कोशिश की. लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. कागजात में दिक्कत आई. गोद लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई. 2006 में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में पढ़ाई के लिए पहुंची. गांव की गरीबी से निकलकर एक शर्मीली लड़की के लिए यहां एडजेस्ट होना कम चैलेंच नहीं था. इसी दौरान पिता की मौत ने उन्हें तोड़ दिया. इनका सफर कभी भी दर्द से खाली नहीं रहा. कलिंगा में रहते हुए इनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट तब आया. जब 2007 में लंदन वर्ल्ड कप से लौटी अंडर-14 लड़कों की रग्बी टीम की विक्ट्री सेरेमनी देखते हुए इस खेल को लेकर जुनून जागा. क्लास 6 से रग्बी खेलना शुरु किया. जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2010 में मीरा को पहली बार नेशनल लेवल पर सफलता मिली. जब ओडिशा ने नई दिल्ली में नेशनल टूर्नामेंट में गोल्ड जीता. 2012 में इंडियन टीम का हिस्सा बनीं. 12 बार इंटरनेशनल लेवल पर देश को रिप्रजेंट किया. पांच बार मेडल जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं. हालाँकि चोट की वजह से वो 2021 से खेल से दूर हैं.लेकिन रग्बी को लेकर उनका जुनून आज भी जिंदा है. अपने अनुभव और कोचिंग से ओडिशा की महिला टीम को मजबूत कर रहीं हैं.

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00:03ओडिसा की रगबी क्वीन मीरा रानी हेम्ब्रम की कहानी किसी के भी रोंग्टे खड़ी कर सकती है।
00:30परिवार में खाना बहुत कम मिलता था, हर दिन हम पांचों के लिए खाने की कोई चीज ढूननी पड़ती थी,
00:36मैं अपने पिता को दोश नहीं दूँगी क्योंकि उनके पास हमें आनाथाले में छोडने के लावा कोई आप्शन नहीं था,
00:41हमने अपना बचपन वहीं बिताया
00:44आनाथाले में रहती हुए मीरा रानी को एक सिंगापुर के कपल ने गोध लेने की कोशिस की, लेकिन किस्मत ने
00:50उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था, काग्जात में दिक्कत आई, गोध लेने की पुर्किरिया पूरी नहीं हो पाई,
00:562006 में कलिंगा इंस्टूट आप सोस
01:14जब में कलिंगा में नैशनल केंप में थी, तब मेरे पिता गुजर गए, मैं उनके अंतिम संसकार में शामिल नहीं
01:19हो सकी, क्योंकि मैं देश के लिए खेल रही थी, मुझे यकीन है कि मेरे माता पिता जहां भी होंगे,
01:25उन्हें मुझ पर गर्भ होगा
01:27कलिंगा में रहती हुए, इनके जीवन का टर्निंग पॉइंट तब आया, जब 2007 में लंदन वर्ड काफ से लोटी अंडर
01:3314 लड़को की रगवी टीम की विक्टिर से रोवेनी देखते हुए, इस खेल को लेकर जुनून जागा
01:39कलास 6 से रगवी खेला शुरू किया, जिसके बात उन्हेंने कभी पीछे मूल कर नहीं देखा
01:47हमने मीरा की फूर्ती, दोड़ने की काबिलियत और फलक्सिबिलिटी को देखकर उन्हें चुना था
01:52इससे भी जरूरी बात यह है कि वह पहले दिन से ही फोकस्ट थी, जैसे कि मैंने उन्हें देखा है,
01:58डिडिकेशन और डिसिप्लीन उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है, इसलिए उन्हें इतनी जल्दी और इतने लंबे समय तक देश और
02:06राजिक को रिप्रेजेंट किया
02:10उनके बड़े भाई काहनु शरण हेंबरम का मानना है कि मुश्किलों ने मीरा रानी को मजबूत बना दिया
02:18सबी भाई बहनों में मीरा बच्पन सही मेंटली और फिजिकली मजबूत थी, उसने जिन्दगी की सुरुआत महीं फिजिकल काम किया,
02:27उससे उसका माइंड सेट बना, इसलिए जब उसे सही कोचिंग मिली तो वह आगे बढ़ बढ़ दिया
02:35साल 2010 में मीरा को पहली बार नेसल लेबल पर सफलता मिली, तब ओडीसा की टीम ने नई दिली में
02:42लेसल टूर्नमेंट में गोल्ड जीता, वर्स 2012 में इंडियन टीम का हिस्सा बनी, बारे बार इंटरनेसल लेबल पर देश को
02:49रिपरेजन्ट किया, पांच बार मेडल जीतने �
02:51वाली टीम का हिस्सा रही, हाला कि चोट की वज़े से ओ 2021 से खेल से दूर है, लेकिन रगबी
02:57को लेकर उनका जुरून आज भी जिन्दा है, अपने अन्वह और कोचिंग से ओडीसा की महिला टीम को मजबूत कर
03:04रही हैं, एटीवे भारत के लिए भोवनेस्वर से भवाने श
03:08गर्दास की रिपोर्ट पर
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