00:00जो सबसे तमाशबीन है, वो हमारा बड़ा भारी नायक है यही कहते हैं कि कविता सुनना, तमाशा देखना एक ही
00:08बात नहीं है।
00:10स्यादातर तर वक्त तमाशा देखते हैं और यहीं नहीं कि तमाशा देखते हैं तमाशा करते हैं तमाशे के लिए जितने
00:21प्रैत्न किये जा सकते हैं उतने प्रैत्न करते हैं और जो सबसे तमाश भीन है वो हमारा बड़ा भारी नायक
00:30है ऐसे में शुक्ली जी जो कह रहे हैं �
00:36ये सब कविता विरोधी काम है, साथ वर्ष हिंदी अंचल में संस्थाओं के विनाश का, उनके सत्यानास होने का साक्षी
00:56रहाओं, उनमें से कई संस्थाओं तो मैंने ही बनाई थी,
01:04और बहुत सारी संस्थाओं जो औरों ने बनाई थी, जो बहुत मकबूल थी, उनमें से एक थी काशी नागरी पेचाड़नी
01:13सभा,
01:15हिंदी साहित सम्मेलन दूसरा है, उत्त्रप्रदेश हिंदी संस्थां तीसरा है, बिहार राष्टभाशा परिशत चोथा है,
01:24और इन संस्थाओं के पुनुरुधार का कोई अवसर आ सकता है, मेरे जीवन काल में, ऐसा मैंने नहीं सोचा थे,
01:36मैं एक बेहत हताश व्यक्ति, ऐसा हताश व्यक्ति जो आशा करना छोड़ता नहीं है, तो मुझे ये रत्ती भर अंदेशा
01:54नहीं लगता था कि कभी काशी नागरी प्रचाड़नी सभा का पुनुरुधार होगा,
02:01तो सबसे पहले तो उसके पुनुरुधार के अग्रगामी योथा, वियो में शुक्र को बहुत पथाई कि उन्होंने ना सिर्फ बहुत
02:16सारे लोग होते हैं, जिनमें हमारे अनेक सम्मान निमित्र भी शामिल हैं, नामवज जी वगर, जिन्होंने कई संस्थाओं पर कभजा
02:25किया, लेकि उन संस्थाओं का कुछ पुनर जीवन नहीं हो पाया, लियो मेश जी ने इस सभा के अंतरगत और
02:39संजीव कुमार जी के सहयोग से, यह जो पुस्तके प्रकाशित की हैं, यह एक आश्यर यह है,
02:50क्योंकि मैंने भी बहुत पुस्तके प्रकाशित कराई हैं, 200-300, इसलिए मैं ज्यादा चकित नहीं होता, पर मैं चकित हूँ,
03:00कि ऐसी पुस्तके भी संभव हैं, यह तीनों ही आज जिन पर हम चर्चा कर रहे हैं,
03:10मैं हिंदी साहित का वईध विद्यार्थी नहीं था, तो मैंने एक जमाने में सब लोग आचारी राम चंद्र शुक लित्यादी
03:20को विधिवत पढ़ते थे, वैसे मैंने नहीं पढ़ा,
03:23मैंने छुट्टा पट्टा इधर पल्लव ग्राही रूप से पढ़ा था, तो मैं इस निबंध को फिर से एक बार ध्यान
03:32से बढ़ गया, इसके बहुत सारे गुणों पर तो हुमारे मित्रों ने प्रकाश डाला है,
03:41शाएक पहले ही पैराग्राफ में या पहले या दूसरे पैराग्राफ में, शुट्टल जी ने, यह थै की मुक्तावस्था यह जो
03:50बहुत प्रचलित है, उसी में कहा है,
03:56कि भाव योग जो है इसको भाव योग कहा और फिर कहा कि भाव योग कर्म योग और ज्ञान योग
04:05के समक्ष है जहां तक मैं जानता हूं
04:10मुझे नहीं पता कि हिंदी मतलब भारती काविचिंतन की परंपरा में कभी किसी और आचार ने ये कहा हो कि
04:24कविता कर्म और ज्ञान दोनों के समक्ष है एक तो यही पहला ही पहला ग्राफ यह मतलब पहले यह दूसरे
04:38उन्होंने आगे जाकर एक शब्द का इस्तिमाल किया है वन्शानुगत वासना की दीर्ग परंपरा
04:48और फिर ये भी कहा है जो अमूर्तन वाली वो अमूर्तन के विरुद्ध थे और क्यों थे इसका भी कुछ
04:58कारण इसमें बहुत सारा है
05:00अरूप राग बहुत परंपरा से एक शब्द लेकर कहा है कि यह अरूप राग यह ऐसा राग जिसका कोई उरूप
05:12नहीं है
05:15फिर यह तो पुसिद्ध है अलाकि यह तो कहा जाता है कि इसरा पाउंड ने भी कहा था कि
05:22इस सिविलिजेशन ग्रोज कभी पर उन्हों ने भी कहा है कि जो जो हमारी वृत्यों पर सभ्यता के नए नए
05:35आवरन चरते जाएंगे
05:37त्यों त्यों एक और तो कविता की आवश्चक्ता बहती जाएगी दूसरी और कभी कर्म कठिन होता जाएगा
05:49सभ्यता के परिद्रिश्य में भारती कला चिंतकों ने कावी चिंतकों ने कभी कविता को नहीं रखा
06:00अबल तो हमारे हां सभ्यता चिंतन उस अर्थ में शायद ऐसा है भी नहीं क्योंकि हम सभ्यता बोध से इतना
06:08ग्रस्त नहीं थे वह तो पश्रिमी उससे शायद होना शुरू हुए
06:14फिर उने एक बात कही कि काव्य में अर्थ ग्रहन मात्र से काम नहीं चलता बिम्ब ग्रहन अपेक्षित होता है
06:27यह बिम्ब ग्रहन निर्देश्ट गोचर और मूर्थ विशयकाही हो सकता है
06:39गोचर मूर्थ और निर्दिश्ट तो एक ऐसी अवधारणा है कविता की जिसमें अगे जाकर शायद मैं इस पर कुछ और
06:54भी कहूंगा
06:56एक जमानी में मैंने बिना कुछ जाने कहने की कोशिश ठी कि कविता संसार का गुणगान की सब्सांस कृफ संसार
07:17का गुणगान
07:18है यह जो संसार हमें दिया हुआ है उस संसार से कविता का क्या संबंद है इस बारे में रामचंद
07:30शुक्ल की दृष्टी बहुत स्पश्ट और बहुत अग्रिगामी है
07:33यह सोच के बहुत आश्यर होता है कि वीस्वी शदी के पूरवार्ध में जब हिंदी खड़ी बोली को आखिर खड़ी
07:47बोली को हिंदी की मान या मुख्य भाशा बनते अभी तो डेड़ सो साली हुए होंगे ज्यादा से ज्यादा हो
07:55शत्तर साल से तो हम ही उसमें पांग हुए
08:00पसे हुए है यह दसे हुए है इस उस समय उस व्यक्ति ने एक आचारे ने यह कल्पना की है
08:16कि संसार और कविता के बीच संबध क्या है
08:22और यह कि कविता से सिर्फ अर्थ ग्रहन से काम नहीं चलेगा बिम्ब ग्रहन जरूरी है मसल में इस बात
08:30पत्थवड़ा कम विचार हुआ है कि हाला के शुक्ल जी को छायावाद से अब एक शाकृत विरक्त अलोचक्त माना जाता
08:40है शुक्ल जी छायावाद में ही संभव थ
08:45क्योंकि उनका प्रकृति पर और अंत्र प्रकृति पर इस पर इस पर जितना आग्रह है वो सब चायावादियों से मिलता
08:52जुनता है भले वो उदाहरन पीचे से लेते हैं कालिदास से लेते हैं उधर से उधर से लेते हैं लेकिन
09:02उन पर चाया तो चायावाद इसके पीछे म
09:14आलोचना में नई स्थापना आलोचक अपने से नहीं कर सकता उस पर कविता के प्रभाव की ज़रूरत है तो यह
09:25कवी पूरव कर रहा है आप जानते हैं मैं उसको स्पष्ट कर देता मैं इसलिए ऐसा सोच रहा होगा फिर
09:31आगे कहते हैं वाहिय प्रकृति के साथ मनुष्य की �
09:35अन्तह प्रकृतिका सामंजस्य यह जरूरी है जगत अनेक रूपाक्तमक है और हिदय अनेक भावात्मक तो सामंजस्य के जो को जब
09:53खोलते हैं तो वो सामंजस्य कहां हो रहा है अनेक रूपाक्तमकता है जो संसार की है और अनेक भावात्मकता है
10:01जो हिदय की
10:05प्रच्छनता का उद्घाटन कवी कर्म का एक मुख्य अंग है प्रच्छनता का आजकल तो भंडा फोड करना कवी का मुख्य
10:16कर्म बन गया है आजकल कवी लोग कविता में ही भंडा फोड दूसरे का करते रहते हैं दूसरे पर टिपणी
10:24करते रहते हैं इत्याज इत्याज वो
10:26वो सब होता रहता है लेकिन यह जो प्रच्छनता है यह जो छुपा हुआ है जो ढका हुआ और जाहिर
10:37है कि ऐसा बहुत सारा संसार में है जो छुपा हुआ जो ढका हुआ उसका एक तरह से अनावरण कविता
10:48करती है और उन्हों
10:50को उदाहं दिया है कि यदि वह शन भर लीड़ ना हुआ योग न किया वह न खिला उसने विसरजन
11:01न किया वह न पसीजा न तिलमिलाया न हसा तो उसके जीवन में रह क्या गया यह उन क्रियाओं को
11:11कौन कौन से लिया वियापार है अगर यह
11:14हो रहे हैं उनकी प्रतिक्रिया में हिदय नहीं किया यह नहीं किया यह नहीं किया तो जीवन को प्रियाओं में
11:24परिभाशित कर यह
11:31हमने बहुत अर्से से छोड़ दिया
11:35हमारे हाँ जो यथार्थ का
11:37एक बहुत बड़ा अतंग हुआ
11:40उसमें क्रियाओं का कोई उलेख नहीं होता
11:43हम तो वस्तूओं का और शवियों का प्रतीकों का
11:48इत्याद इत्याद सबका करते हैं
11:50क्रियाओं का नहीं करते जैसा कि शुक्री जी ने किया अब काविदृष्टी के की जगहें क्या कहां काविदृष्टी जाती है
12:02किनको हिसाब में लेती है टीन जगहें एक है नर्ख्षेत जो असल में मनुष्ष्षेत होगा नर्शब्द उसी अर्थ में जिस
12:13अर्थ में नर्
12:16इंहों नहीं मारी जाती हुँ नर संग्धार में तो दोनों मारे जाते नर नारी कहा हुए तो उन्होंने
12:22शब्द के इस्तमाल के नर्ख्येत्र, मनुष्षेतर, बाह salvarisshiti, और inshac galachar
12:31कविता तीनों से वाबस्ता हो तभी वो शायद श्रेष्ट कविता आया इची कविता है साथ था कविता बनती हो गी
12:41फिर उन्होंने
12:46कहीं इस तरह का एक विश्व रूपी महा काव्य आचार शुक्ल की कलपना यह है कि यह विश्व ही महा
12:55काव्य है
12:56यानि जो विश्व हमको मिला है यही महा काव्य है और बाखी जो कविता है वो इस महा काव्य को
13:04किसी तरह से उसका किसी किसी अंश को उसके किसी हिस्से को किसी पक्ष को किसी पहलू को स्वायत करने
13:11की कोशिश है पर यह विश्व अपने आप में महा काव्य है वो लिखा हुआ
13:16महकाल की नहीं है वो रचा हुआ महकाल है किसी नहीं रचा है इसकी कोई कम से कम उनके हां
13:25इसका निर्देश नहीं है फिर वो रागात्मक सत्व की कमी अब जरा शब्द का इस्तेमाल देख रागात्मक सत्व की कमी
13:39यह वो किसी तरह की कविता की आलोचना करें जिसमें रागात
13:44ब époत मक्प सत्व नहीं हैं सट्थ की नहीं रांगात्मक सत्थ मैं को बाद में अगें सत्थ के सथा का
13:55सत्य रांगात्मक सत्थ की वह सुधत्र सत्य नहीं वह राग में लिठड़ा हुआ ह्वा है
14:08और ये नहीं कि वो मतलब आपको ऐसा लग सकता है जो मैं कह रहा हूं कि ये तो बड़ी
14:14एक उदात और दिव्य धारणा है और संसार का जो उबर खाबड है जो संसार के बहुत सारे अशोभग और
14:24अनिश्ट पक्ष हैं उनको वो ध्यान में नहीं लेते तो कहते हैं
14:30कभी अपने देशवासियों के सुख की उतकंठा कभी अन्य जाति के प्रति घोर विद्वेश कभी अपनी जाती शेश्टता का नया
14:42या पुराना गमंड कविता को भाव प्रसाद द्वारा कविता करमंड के लिए कर्मक्षेत्र का विस्तार कर दें ये तो फिर
14:56अलग गया तो
14:57ये घमंड ये जातिकत द्वेश इस सब की खबर उनको है और वो कविता में इसका अपने निबंध में इसका
15:06उलेख कर रहें फिर कहते हैं कि कविता तो भाव प्रसार द्वारा कर्मंड के लिए कर्मक्षेत्र का और विस्तार कर
15:16दें जो बहुत अपने को मैन अफ एक्षन क
15:24क्या है क्या है हमको वांट दू सम्थिंग उनके लिए शुक्ली जी की पुक्ति है कि कविता तो भाव प्रसार
15:36द्वारा कर्मंड के लिए कर्मक्षेत्र का और विस्तार कर दें उसके कर्मक्षेत्र को और बढ़ा देखती है
15:48हिदय का बंधन खुलता है मनुष्यता की उच्छ भूमी की प्राप्ति होती है हिदय अपने आप में मुक्त नहीं है
16:00वो बंधा हुआ है
16:02उसकी बंधन से जब मुक्ति होती है तो मनुष्यता का की उच्छ भूमी प्राप्त होती है
16:17यह मनुष्य का जगत के साथ जो पूर्ण तादात में है इसकी बार बार जिक्र करते हैं शुप्रिके
16:31और जिसके जितने उदाहरण हों में दिये उसमें कोई दिव्य भव्य कुलीन उदाहरण नहीं जितना मैंने देखा
16:41तो हम लोग जो यह कहते आए हैं हमें से कुछ लोग कम से कम के हिंदी में आधुनिक्ता के
16:48पदारपन से साधारण की केंद्रियता बढ़ी
16:54साधारण केंद्र में आया जो चाहे प्रेमजन की कहानियों के बात्रे उपन्यास के बात्र और बहुत सारे और यह जो
17:06साधारण की केंद्रियता है
17:09उसके एक तरह से पहले विचारक ही ज्रामचाद्र शुक्ले हैं क्योंकि वो यह कह रहे हैं कि मनुष्य का जगत
17:20के साथ पूर्ण तादात में और दो तरह की कल्पना हैं
17:25एक है विधायक कल्पना जो लेखक की कल्पना है और एक ग्राहक कल्पना है जो रसिक की या पाठक की
17:35ये शोता की कल्पना है
17:41ये भी कहते हैं कि कविता सुनना और तमाशा देखना एक ही बात नहीं है
17:50तो आजकल ज्यादातर लोग ज्यादातर वक्त तमाशा देखते हैं
17:58और यही नहीं कि तमाशा देखते हैं तमाशा करते हैं
18:03तमाशे के लिए कितने प्रैतन किये जा सकते हैं उतने प्रैतन करते हैं
18:11और जो सबसे तमाश बीन है वो हमारा बड़ा भारी नायक है
18:17ऐसे में शुक्ली जी जो कह रहे हैं कि ये सब कविता विरोधी काम है इस ये सब इसमें जो
18:28लिप्ट है इसमें जो लगा हुआ है उसके लिए कविता का कोई अर्थ नहीं होगा
18:37मूर्त गोचर पर जो आगरह है वो आगरह साधारंता पर आगरह है वो कभी इस तरह से उत्ते लुक्तरंगों में
18:57ऊपर और ऐसा हो नहीं सकता वो तो पडोस में हैं बगल में हैं आसपास है और हमेशा मूरत है
19:03हमेशा गोचर है हमेशा साधारन है और इसलिए शुक्ली जी की द्रिश्टी से वो हमेशा काविका अभिक्प्रा है
19:21कभी मैं सोचता हूं कि इतना गंभीर और सम्रिध
19:34काविचिंतन
19:371930 में अन्तिम मजबून परकाशिर तो अब सोचिए
19:48सत्तर चानमे वर्ष होने आए और इस लेख से आलोजकों ने
19:57पाठकों ने छात्रों ने शोधार्थियों ने और स्वयम कवियों ने कितना कम सीखा
20:10अगर हम उन सब विवातों बहसों को एक तरफ रखते हैं
20:17और सोचने लगें कि हमको यह जो गोचर मूर्थ संसार है और जो कविता का
20:27परम संबोध है उसको बदलने में उसमें अपनी शिरकत को गहरा करने उसको प्रश्णांकित करने
20:45लेकिन उसका उत्सव मनाने में कविता हमारी कितनी मदद कर सकती है या कविता कितना योगदान कर सकती है
21:02हमको नागरी पिचाड़नी सभा ने तो नहीं सोचा होगा कि ऐसे प्रकाशन कर वो कवियों को आलोचकों को शर्मिंदा करेंगे
21:14लेकिन आप शर्मिंदा कर रहें क्योंकि मुझे ही लगा कि मुझे ही इतना ठीक से पता नहीं था कि ऐसा
21:23अजबुत काविजिंदन हमारे हां है और जो हम दुनिया भरती बहसें करते रहें इस बहस का बहुत सारा पूरुवा भास
21:33तो इसी में है दन्यवाद
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