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  • 7 hours ago
सनातन धर्म में क्या है प्रेम का अर्थ, आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने विस्तार से बताया

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00:00आचारी जी बहुत-बहुत स्वागत है आपका साहित आज तक के इस मंच पर और मुझे लग रहा है कि बहुत सारे ऐसे आपके अन्याई हैं और बहुत फॉल्वर्स हैं जो सिर्फ आपको ही यहां पर सुनने और देखने के लिए आएं
00:13तो मैं इस पूरे जो सेशन की शुरुवात है वो सूर्दार जी का लिखा एक भजन है सबसे उची प्रेम सगाई दुरियोधन की मेवा त्यागी साग विदुर घर पाई जूटे फल सबरी के खाए बहु बिदी प्रेम लगाई सबसे उची प्रेम सगाई तो मेरा प्रशनी �
00:43आज तक को इस सुंदर समवाद की आयोजन के लिए और उन लोगों को भी जिनका आपने उलेख किया कि वे सुनने के लिए यहां उपस्थित हैं
00:53सनातन धर्म में प्रेम का अर्थ है परम त्रिप्ति चित की एक ऐसी अवस्था जिसमें कुछ भी पाने की प्यास शेष नहीं रह जाती वो प्रेम है
01:08दोखे से एक ऐसा प्रचलन हो गया है कि हम यह मानने लगें हैं कि प्रेम कोई प्यास है प्रेम कुछ पाने की व्याकुलता है पर ठीक ठीक सनातन धर्म में प्रेम प्यास नहीं परम त्रिप्ति है
01:26एक ऐसी अवधारना एक ऐसी मनोदशा हर्दय की एक ऐसी अवस्था जब ऐसी त्रिप्ति पा लेने का ऐसा असाधारन अनुहो भी तर आ जाए कि अब कुछ और पाने की लालसा नहो सारी भूख प्यास मिट जाए वो प्रेम है
01:44और इसलिए प्रेम की जितनी कथाएं हैं जो पदाप पढ़ रही हैं उसमें भी यही बात कही गई है वो ऐसे त्रिप्त कर देता है कि केले की जगह यदि छिलका खिलाया जाए तो खाने वाले कोई अनुभो नहीं होता कि इसमें स्वाद नहीं आ रहा है या इसमें त्रि�
02:14प्रेम नहीं की लालसा से मुक्त और परिपूर्ण हो जाता है तो मैं इस तरह कहना चाहता हूं कि प्रेम वह है सनातन धर्म में जो पूर्णता की प्रतीत मिले जाता है
02:23तो क्या ये सिर्फ भक्ती है या फिर आत्मा का पर्मात्मा से मिलन है
02:28सारे शब्द अलग अलग हैं और सनातन धर्म में शब्दों को बहुत महत्व दिया गया है
02:34हमारे एक बड़े आचार्य मनीशी भरत्रिहरी हुए हैं जिन्होंने शब्द को ब्रह्म कहकर के परिवाशित किया है
02:40तो जब हम भक्ती कहते हैं तब उह केवल प्रेम नहीं रह जाता है
02:44प्रेम के साथ कुछ विशिष्ट हो जाता है
02:47तो जिसमें पूज्य भाव है यदि उसमें प्रेम हो जाए तो उसकी संग्या भक्ती है
02:54प्रेमी सदा पूज्य नहीं होता पर जब प्रेमी में भी श्रद्धा का जागरण हो जाए
03:01अथवा पूज्य में जब प्रीति का अनुराग हो जाए तो उसको भक्ती कहते हैं
03:06हमारी सनातन धर्म के महान आचारिय धर्म समराट स्वामी करपात्री जी महराज हुए हैं उनका एक कथन है द्रवी भूत अंतह करण की भगवदा कारा कारित वृत्ति को भक्ति कहते हैं प्रेम में तरल हुआ अंतह करण जब श्रद्धा के आयतन में भर जाता है तो वो भक्त
03:36किसी एक ही वस्तु में मिलन घटित नहीं होता तो जब हम कहते हैं आत्मा और प्रतमा का मिलना तो पहले हमें यह समझना पड़ेगा कि यह कोई दो पर्थक बिन बिन चीजें हैं जबकि शास्थ रहीं वानते एक ही शुद्ध चैतन्य की दो स्थितियां हैं एक में उसकी सं
04:06ग्यान है एक योग है और एक भक्ति है जिसको गीता के 18 अध्यायों में 6 अध्यायों के खंड में समझाया गया है तो कोई योग के मार्ग से इसे पार करेगा कोई ग्यान के मार्ग से इसे पार करेगा जो इसको भक्ति के मार्ग से पार करेगा वो उस पद का गान करेगा जो �
04:36पिर भी आप अंतर पहचानना ही चाहें तो इनके द्रिग गंभीर हैं उनके चपल विशेश भगवान श्री राम भद्र और भगवान श्री कृष्ण चंद्र दोनों का प्रत्यक्ष दर्शन करिए जिनकी निगाह जिनके नेत्र शील से मर्यादा से शान्त होकर के स्थिर रह
05:06है रस की दृष्टी से उपासना की दृष्टी से भेद है एक में ईश्वरता जीव के लिए भोग्य बनती है और जीव जिन रसों का अनुभव कर सकता है उसमें वो आकारित हो जाती है रस रूप में इसलिए रास की लीला दिखाई पड़ती है एक में मनुष्यता को अप
05:36कम नहीं है पर श्री राम बेहुबल दिखाई नहीं देते हैं भगवान श्री कृष्ण दिखाई देते हैं दोनों एक ही हैं हमारे यहां तो इतना सरल करके कहा गया है कि राकारो श्रीमती राधा मकारो मधसूदन राधा जी के नाम का राकार और मधसूदन के नाम का मकार मिल
06:06नहीं आता है
06:36प्रेम करते हैं गोपियों को तब भी वो कोई एक नहीं है
06:39कोई ऐसा जो चाहता हो कि हमें कोई प्रेम करे और हमारे जैसे एक दर्जन को एक साथ करे आप में से वहाद उठाए
06:47क्या हम ये कलपना करते हैं कि कोई अपने प्रेमी से ये चाहता है
06:53कि वो मुझे को प्रेम करे तो मेरे साथ सो पचास और को भी करे
06:56भगवान कृष्ण ने जब प्रेम किया तब भी गोपियां अकेली नहीं है
07:01जब विवाह किया तो पत्नियां अकेली नहीं है
07:03और भगवान श्री राम भद्र एक बार श्री जानकी के प्रति उनका अनुराग पुश्पवाटिका में एक बार वेद लोग की मर्यादा में उनका विवाह विश्व के इतिहास में ऐसा प्रेम कहीं दूसरा दिखाई नहीं पड़ेगा
07:17कि श्री राम भद्र ने श्री जानकी की प्रतिमा बिठाकर के अपने अश्वमेद पूरे कर लिये
07:22धर्मशास्र के सिध्धानतों को किनारे रख दिया
07:25एक बार जिसका अंगीकार देवताओं को पितरों को गुरु को हुर्दे को साक्षी मान कर कर लिया
07:30उसकी जगह किसी और को दे नहीं सकते ये श्री राम भद्र ने किया
07:34और केवल प्रेम स्त्री और पुरुष में ही परिभाशित नहीं किया जाना चाहिए
07:38एक बात ये भी है ये थोड़ी व्याद ही सी हमारे भीतर है कि
07:42प्रेम कार्थ ये है कि दो विपरीत लंगियों के संदर्म में बात की जाए
07:47स्त्री पुरुषों के संदर्म में बात की जाए
07:49प्रेम मानवी ये चरित्र है
07:51अब भगवान श्री राम को देखें कि गोप्रातार तीर्थ पर खड़े हो करके
07:55ब्रह्मा को निर्देश करते हैं कि सारे अयोध्यावासी मेरे साथ वैकुंठ जाएंगे
08:00और धर्ती पर केबल एक बार ऐसा हुआ है
08:04कि भगवान श्री राम ने कहा कि मेरे वनवास में मेरे पीछे 14 वर्ष तक रोने वाले अयोध्यावासीयों को
08:10मैं दूसरी बार रोते हुए छोड़ कर जा नहीं सकता
08:13यदि मैं वैकुंठ जाओंगा तो ये सब जाएंगे
08:15और सब को सशरीर वैकुंठ श्री राम भद्र ले करके गए
08:19तो ये प्रेम की कथा है
08:20इसका आर्थ ये नहीं है कि भगवान श्री कृष्ण के प्रेम की कोई महिमा मैं कम कर रहा हूँ
08:25मैं चाहता हूँ कि आपके पास प्रेम के और बड़े आख्यान हो
08:28और श्री राम भद्र का जो प्रेम है
08:30अयोध्यावासीयों के प्रति
08:32सचरित्र मनुष्यों के प्रति
08:34और श्री जानकी के प्रति
08:36जिस पर कथा लिखी गई है
08:37जिस पर गाथा लिखी गई है
08:39मैं अगर उसी को कहने लगूँगा तो बहुत समय लग जाएगा
08:42केवल इतना कहते हुई है कि
08:44गोस्वामी तुलसीदास जो मरयादा के कवी है
08:46वे श्री जानकी का जब वंदन करते हैं
08:49श्री राम चरित्मानस में
08:51तो उत्भवस्थिति संगहार कारणीम
08:53कलेश हारणीम
08:54सरवस्ष्रियस करीम सीताम
08:55तो कह सकते थे जनकात्म जाम
08:58मैं जनक की बेटी की बंदना करता हूँ
09:01कह सकते थे कि मैं सुनैना की बेटी की बंदना करता हूँ
09:04कह सकते थे मैं मिथिला भूमी की कन्या की बंदना करता हूँ
09:07आचारे कहते हैं नहीं
09:09न तो हम राम वल लभाम
09:11श्री जानकी कि यदि कोई एक ही पहचान हमें करनी होगी
09:14तो वे श्री राम वल लभा हैं
09:16ये है प्रेम
09:17आचारे जी आपने कहा कि
09:20प्रेम सिर्फ स्री और पुरिश तक सीमित नहीं है
09:23गुरू शिश्य का भी प्रेम होता है
09:25वो भी एक रूप एक स्वरूप है
09:27किस तरह से एक गुरू का प्रेम
09:30शिश्य के जीवन में बदलाव लाता है
09:32और क्या ये सबसे उच्छ प्रेम का रूप माना जाए
09:35इस प्रेम में हमें जोड़ना पड़ेगा
09:38उस आयाम को जिसकी अभी चल्चा हमने भक्ति कह कर की है
09:42जब पूज्य में अनुराग होता है
09:44पूज्येश्व अनुरागह भक्ति ही
09:46तब उसकी संग्या भक्ति हो जाती है
09:48शिश्य का जो गुरू में प्रेम है
09:50वो हकेवल प्रेम नहीं है
09:52श्रद्धा के कारण भक्ति है
09:54गुरू का जो शिश्य में प्रेम है
09:56वह केवल प्रेम नहीं है
09:58रक्षन कोशन के कारण वादसल्य है
10:00आप याद करिए भगवान स्री कृष्ण और सुदामा की कथा
10:05जब सुदामा द्वारी का पहुंचते हैं
10:07भगवान स्री कृष्ण के साथ बैठते हैं
10:08तो एक और मित्र का मित्र से प्रेम दिखाई पड़ता है
10:11और भगवान स्री कृष्ण कहते हैं
10:13कि भईया याद करो वो दिन जब हम गुरुकुल में रहते थे
10:16समिधा चुनने के लिए हम दोनों जंगल गए थे गुरु के भेजे हुए
10:20और भीशन तूफान आंधी पानी आ गया था
10:23हम लोग भीगते हुए तेज वर्षा में वर्ख्ष के तने से सट करके
10:28ठंडी से दात कटकटाते हुए वहां खड़े थे
10:30और उस घोर अंधकार में जहां अनेक विद्यार्थी गुरुकुल में रहते थे
10:36हमारे गुरु ने चिंता की कि हमारे शिष्य जो समिधा लाने गए थे
10:40वे लोट कर आए कि नहीं आए
10:41पता चला कि अब तक नहीं लोटे हैं तो गुरु जी स्वयम अंधकार में
10:46प्रकाश लेकर के वन में खोजते हुए शिष्यों के लिए कि कहां गए
10:50वे बच्चे जो मेरे लिए समिधा चुनने गए थे
10:52उनके पास जाते हैं और जाकर के उनको हुर्दे से लगाते हैं
10:56आशीरवाद देते हैं और कहते हैं कि तुम्हारी इस श्रद्धा के कारण
11:00मैं ये तुमको आशीरवाद देता हूँ
11:02जो मैं तुम्हें पढ़ाता हूँ ये सब तो तुम्हें आये ही
11:05मेरे पढ़ाने से जो छूट गया हूँ वह सब भी तुमको विदित हो जाए
11:09ये गुरु का शिश्य के प्रति प्रेम है
11:11ये गुरु का शिश्य के प्रति प्रेम है
11:14कि भेजते हैं कि खेत में वर्शा से पानी बह कर बाहर निकल रहा है उसे रोकना है
11:20शिषय का प्रेम क्या है उसने जाकर बड़ी सरल समझ में आने वाली बात है
11:24मुंसला धार वर्शा हो रही है
11:25खेत की मेंड तूटकर पानी बाहर बह रहा है
11:28गुरु ने शिष्य को भेजा है जाकर के रोको
11:31मिट्टी गीली है वो जितनी मिट्टी लगाता है भेजाती है
11:34उसने देखा इस तरह तो सारी ही मेड खुल जाएगी
11:38शिष्य उस मेड की जगह उस वर्षा में मिट्टी में लेट गया दबा करके
11:42कि मैं लेड जाओंगा मेड की जगा तो पानी रुख जाएगा
11:45रुख गया पानी
11:47पर उतनी अधिक वर्षा मिट्टी और शीत में मूर्चित होकर के शिश्य वहीं रह गया
11:53और फिर गुरु जाते हैं कृपा करते हैं उसको जगाते हैं सचेतन करते हैं स्वस्थ करते हैं
12:00और कहते हैं कि आज से तुम्हारा नाम तुम्हारे पिता का नाम ही नहीं होगा तुम्हारे गोत्र का ही नाम नहीं होगा
12:06गुरु की सेवा में तुमने इस मिट्टी की क्यारी में इस मिट्टी के बहने को रोकने के लिए यहां lेट करके सुरक्षा की है
12:14और फिर इस मिट्टी का उद्दालन करके खड़े हुए हो
12:17आज से विश्व तुमको गोत्रप परवर से ही नहीं उद्दालक के नाम से जानेगा
12:21और गुरु ने अपने शेश्य को उसकी सियोगिता से विश्व में प्रतिष्थित कर दिया
12:25उपनिशत के रिशियों करके विद्यमान है
12:27तो सनातन परंपरा में प्रेम सरवत्र उपस्थित है
12:31पर वो अपने बरतन के अनुसार आकार बदल लेता है
12:34प्रेम तरल होता है ना
12:35तरल पदार्थ की विशेश्टा है जिस बरतन में रख देंगे उसके आकार का हो जाएगा
12:40जल को आप कलश में रख दें तो कलश के आकार का हो जाता है, बोतल में रख दें तो बोतल के आकार का हो जाता है, गलास में रख दें तो गलास के आकार का, तरलता की विशेष्टा ये है, वो अपने आयतन में आकारित हो जाता है, प्रेम तरल है, और इसलिए वो जिस आयतन म
13:10तो एकलव्य का उठा देना प्रेम का सर्वोच भाव था या उसको किसी और तरीके से भी प्रकट गया था।
13:40उन्ठित होकर पढ़ने के उसके बाहर निकलने की आवश्यक्ता है और ये बहुत अच्छा समय है कि हम फिर से अपने पाठों को ठीक से पढ़ें।
13:47जब हम कहते हैं कि एकलव्य असाधारन योद्धा है तब हमें ये बात ध्यान देनी होगी कि महाभारत में जो लोग लड़ रहे थे और जो मर गए और जिनका नाम हम नहीं जानते वे योद्धा नहीं थे क्या।
13:59महाभारत के युदध में जो लड़े जो लोग मरे उनकी पहँचान कहा होने वाली है
14:05और क्या होने वाली है जिस संख्या के योद्धां ने महाभारत में बलिदान दिया है क्या उनका दशाश भी हम जानते हैं।
14:21नहीं सकता कि यदि एकलव्य योद्धा बन करके खड़ा होगा तो इसका क्या होगा उस समय की जो राजनेतिक व्यवस्था है उस समय की जो सामरिक व्यवस्था है उसमें यह किसी राज्य का मुकुट धारन करके अपने योद्धा होने को घोशित नहीं कर सकेगा वो हमारा ल
14:51के बाद भी योद्धा होकर सामने आएगा तो चाहे पांडवों का चाहे कवरवों का चोथी पांचवी छठी लाइन का योद्धा होगा और बलिदान हो जाएगा कहीं इसका नाम लिखा नहीं जाएगा मेरी प्रतिमा बिठाकर के जिस शिष्य ने धनुर्वेद का एसाब भ
15:21कथाओं ने कहा कि अंगूठा काट लिया है क्या मिला होगा द्रोनाचैरे को अंगूठा काट करके और जब हम महाभारत पढ़ने जाते हैं और महाभारत पढ़ते हुए हम ये देखते हैं कि एक गुरु ने एक शिष्य का अंगूठा काट लिया और पांच हजार साल बाद
15:51आँख बंद करके पुत्रशोक में बैठा है और उसका मस्तक काट लिया गया है उस पर बात क्यों नहीं होती वो कौन है क्या हम केवल इसी तरह बात करेंगे कि जो मरा था वो किस वर्ग में आता है उसके आधार कार्ड में क्या लिखा है उसके परिवार रजिस्टर में क्या �
16:21नहीं होती तो शिशे का अंगूठा काट लेने की बात करना केवल पाखंड हो जाएगा हमें सारे प्रसंगों पर बात करनी पड़ेगी और तब मैं नहीं समझता हूं कि द्रोणाचारे ने कहा कि बेटे तुम अंगूठा काट दो
16:33द्रोनाचारे ने कहा वत्स तुमने जिस धनुर्विद्या का आनुसंधान किया है ये धनुर्विद्या अंततह युद्ध में विजेता होने या बलिदानी होने पर जाकर ही पूरी होती है धनुर्विद्या खेल नहीं है
16:46हम आज से नहीं समझ सकते कि जो हमारे यहां शूटर्स हैं वो क्या करते हैं
16:51सबसे अच्छे निशाने बाद सेना में नहीं जाते
16:53स्टेडियम में खेलते हैं, पैसा पाते हैं, नाम कमाते हैं
16:57आप अवगत हैं ना
16:58सबसे अच्छे निशाने बाद निशाना लगाने किसी काम के लिए नहीं जाते मैदान में बनाये हुए निशाने पर मारते हैं तीर
17:03आज भी आपके हाँ धनुरविद्या किसे खशा दी जाती है वो धनुरवेद किस काम का है वो केवल खेल है
17:09महाभारत काल میں
17:11धनुर विद्या खेल नहीं थी
17:13वो या तो मर जाने में और या तो जीतने में
17:15चरितार्थ होती थी, तीसरा कोई मार्ग नहीं था
17:18और तब एक आचारे देख रहा था
17:20कि इस विद्या को
17:21पुरस्कृत करने की योजना हमारे पास नहीं है
17:23इसको कैसे बचाया जा सकता है
17:25और यदि हम इमानदार होकर के
17:27द्रोनाचारे एकलव्य का प्रसंग पढ़ेंगे
17:29तो हमारे पास एकलव्य को याद करने की
17:32केवल एक कथा है कि गुरु ने अंगुठा कटवा लिया था
17:34मैं समझता हूँ ये द्रोनाचारे ने
17:37एकलव्य को निश्यस्त्र नहीं किया होता
17:40तो आज हम एकलव्य पर बात ही नहीं कर रहे होते
17:42अंगुठा कटवाया था ऐसा मेरा मत नहीं है
17:46उन्होंने वचन लिया था तुम युद्ध नहीं करोगे
17:49और जो युद्ध नहीं करता है उसके धनरधर होने का
17:53कोई अर्थ नहीं है इस कथा को
17:55narrative के माध्यम से पढ़ते
17:57हुई हमारे सामने ऐसे ला दिया गया
17:59कि ओ हो हो हो एक सवरन
18:01कोई गुरू था एक कोई ब्राहमन गुरू था
18:03एक कोई असवरन कोई अब्राहमन
18:05शिश्य था और उसने उसका
18:07अंगुठा कटवा लिया था हमें अपने
18:09पाठ फिर से ठीक से पढ़ने पड़ेंगे
18:11तब हमको पता चलेगा
18:13महाभारत में जो योद्धा खड़े हैं
18:15वो किस आधार पर खड़े हैं
18:19वहाँ जातिब व्यवस्था काम कर रही थी
18:21पर वो योद्धा के योग खड़े थे
18:23जब आप परीक्षाएं देखेंगे
18:25महाभारत में शिश्यों की
18:26जब उनकी प्रतियोगिताएं देखेंगे
18:28तब आपको ये बात स्पष्ट हो जाएगी
18:31कि वहाँ किसी भी तरह की
18:33योगिता को पुरस्कृत करने का
18:35एक सामाजिक धाचा है
18:36ये तब भी था
18:39और ये अब भी है
18:40जो सेलेक्ट हो जाते हैं हमारी विवस्था
18:43उनकी योगिता को ही पुरस्कृत करती है
18:45दश्मलव नंबर से जो सिविल में
18:47छूट जाते हैं न वो प्राथमिक
18:49पाठशाला के अध्यापक होने का धक्का खाते हैं
18:51फिर कोई नहीं मानता है कि
18:53आधे नंबर से कम जो हुआ है वो अयोगिय है
18:55और जो एक आधे नंबर उपर था हो योगिय है
18:57पर विवस्था क्या करती है
18:59विवस्था कुछ मानकों के भीतर चुनती है
19:01आचारे देखता है मानक इस शिशे को चुन नहीं पाएगा और इसकी विद्या इसका काल बन जाएगी
19:08इसकी रक्षा कैसे हो सकती है और एक आचारे ने अपने शिशे की रक्षा कर ली है
19:12इस अर्थ में इस कथा को पढ़ा जाना चाहिए
19:15आचारे जी इश्वर के प्रती प्रेम को कैसे व्यक्त करें क्योंकि काफी व्याक्या मुश्किल है
19:20कम शब्दों में यहाँ पर जो समय है उसमें भी बताना मुश्किल है
19:25लेकिन मैं चाहूंगे आप यह बताईए कि जो लोग एक एक घंटा पूजा करते हैं
19:30क्या वही असली इश्वर प्रेम है या फिर मन से इश्वर को चन सेकेंड़ ही याद कर लेना
19:36अपने आप में प्रेम के माइने है उसके भी
19:39कई सारे प्रश्ण कठिन इकठा कर दी है आपने मैं एक एक करके कहता हूँ
19:43मैं जानना चाहती हूं मूर्ति पूजा क्या जरूरी है?
19:45बहुत आवश्यक है परम आवश्यक है
19:47मूर्ति पूजा परम आवश्यक है यह कह करके तो मैं बाकी बात ने कहूंगा
19:51पहली बात तो ये कि आपने प्रारम्भ किया कि ईश्वर के प्रति प्रेम को कैसे व्यक्त करें
19:57तो मैं प्रार्थना करूँगा प्रेम को किसी भी प्रकार व्यक्त ना करें
20:02प्रेम व्यक्त करने के लिए नहीं अनुभव करने के लिए होता है
20:06और जब भी वो व्यक्त किया जाएगा तो खतरे में पड़ जाएगा, हम दुनिया में जितनी भी मूलेवान चीजें हैं उनको बचा कर रखते हैं, देवियां विशेश रूप से जानती हैं, महेंगी जोयलरी लाकर में रखी जाती है, और प्रेम से जादा मूलेवान जीवन
20:36करते हुए टीका में कहते हैं कि वो काम नहीं है, प्रेम है, तो आप प्रेम क्यों नहीं कहते हैं, क्योंकि प्रेम बहुत गोपनी है, तो प्रेमईव गोपरामानाम काम इत्यगमत प्रथाम गोपियों में जो प्रेम था उसको छिपाने के लिए काम शब्द का उपयोग किय
21:06बात ये है कि जब हम प्रेम करते हैं तो चुंकि हम चिन्मय और भौतिक दोनों को मिला कर बने हैं जीवन जड़चेतन का योग है तो प्रतीत ही हमारे भीतर हमारे अंतहकरण में होती है किन्तो व्योहार भौतिक वस्तूओं में ही घटित होता है जैसे प्रेम करने वाला व्य
21:36रहा हूं मैं एक और से चलूंगा
21:38मैं अभी क्रियाओं को पहरे क्रिया सिद्ध
21:40हो जाएगे तब सारी क्रियाएं गिन लेगे
22:03प्र्राण देते हैं किसी के लिए
22:05प्रेम में भी देते हैं, फसादेने के लिए भी देते हैं
22:08सुसाइड नोट लिखके मर जाते हैं, बाद वाले जेल चले जाते हैं
22:12तो ऐसे लोग भी हैं, इस पर भी चर्चा की गई है
22:15प्रेम के बड़े कवि हुए हैं घना अनंद
22:17और जब आप उनको पढ़ते हैं तो वो कहते हैं कि प्रेमी के लिए प्रेम में मर जाना सरहना नहीं है
22:23मरने की वेदना सह करके जीते जाना सरहना है
22:26मचली जल का वियोग होने पर मर जाती है और अपने प्रेमास्पद जल पर निर्मम होने का कलंक लगा जाती है
22:33नीर सनेही को लाए कलंक निरास होए कायर अत्याγαति प्राने
22:37प्रेमि वो है जो मरता हो तो मर जाए पर प्रेमासपद पर अपने मरने का पाप ना मढ़े
22:43तो ये जो कुछ प्रतीक है वो इसलिए है क्योंकि हम भौतिक जीवन जीते हैं
22:48तो हमारी प्रतीतियां केवल चिन्यमय नहीं हो सकती जैसे हम कलपना में भोजन नहीं कर सकते जैसे हम कलपना में सो नहीं सकते ऐसे ही प्रेम भी केवल चेतना में बना नहीं रहता थोड़ा सा ये दिरस Shastra पढ़ेंगे
23:01तो स्थाई भाव और रस आदिका विभाव अनुभाव का उसमें वरणन होता है
23:05हमारे हृदय में स्थाई भाव होता है
23:08उस स्थाई भाव को जब कहीं जगने का आउसर मिल जाता है
23:12जैसे हमारे भीतर एक स्थाई भाव है उसका नाम है रती
23:15पर उस रती भाव को जागरत करने के लिए जब कोई संगीत जब कोई सुगंध हमारे सामने आएगी
23:23हमारे अनुभव में आएगी तो उस थाई भाव जो था वो शंगार में रस रूप में परिड़त हो करके आ जाएगा
23:29तो हम उसका अनुभव करेंगे इश्वर के प्रतिजिन का प्रेम है वे उस इश्वर के साथ अपनी उपस्थित को प्रत्यक्षत या अनुभव करने के लिए मूर्ती की आराधना करते हैं और मूर्ती की आराधना करते हुए उस अमूर्त की आराधना करते हैं जिसको इश्व
23:59में था कमर में बहुत अधिक दर्द हो गया तो कथा में बैटना होता था चिकित्सक ने कहा महराज जी गरम पानी की थैली कमर पर रखिए तो मैंने उसे कहा भले आदमी दर्द मेरे बहुत भीतर अंदर है पीट पर रखने से क्या होगा वो बोले आप इसको छोड़िए उप
24:29द्वारा शरीर के द्वारा जो व्योहार करते हैं देरे देरे उसका प्रभाव हमारे चित पर हमारे अंतहकरण पर हमारी प्रतीतियों पर हमारी अनुभूतियों पर होता है मैं उदाहरन देता हूँ अंगुलिया प्रकृति ने अंगुठी पहनने के लिए नहीं बनाई है
24:59दें तो सुना लगता है जो निरंतर चश्मा पहनते हों चश्मा हटा दें तो उदास लगते हैं यही अभ्यास है तो जो हमारी चिन्मय वृत्ति है जो हमारी भावनाओं में अनुभूतियों में घटित होने वाली बात है उसको अपने प्रत्यक्ष जीवन में ले आने और अ
25:29क्या चीज है कोई संतान अपनी मा का अपने पिता का चेहरा भुला दे और कहे मा और पिता क्या होते हैं भाई और बहन एक दूसरे की उपस्थित को भूल जाएं और फिर कहें कि कोई प्रेम होता है हम जो कुछ भी जीते हैं जगत भोतिक पंच भूतों से ही बना है इसलि�
25:59पूजा धन बहुत देर तक पूजा ये सब तब पाखंड हो जाता है जब क्रिया तो होती है पर क्रिया में नहित विचार नहीं होता जब किसी आचार में उसके साथ उसका विचार भी जुड़ा हुआ हो तब वो न तो पाखंड है और ना वो नकली है वो complete असली है जब हम क्
26:29बहुत सारे followers है मैंने देखा है युवा पीडी तो अपना प्रेम ही व्यक्त करती है अचारे जी सोशल मीडिया के माध्यम से इंस्टाग्राम पर चीज़े डालने के लिए सांसारे को और भौतिक जिन चीजों के आप बात कर रहे हैं उनके प्रती आकरशन है उनमें तो आ�
26:59तो प्रेम असली और नकली नहीं होता या तो वो होता है और या तो नहीं होता है जिसे आप नकली कहते हैं वो प्रेम है ही नहीं तो असली नकली का कोई संकट नहीं है हमारी युवा पीड़ी पहले की पीड़ियों की अपेक्षा कुछ अधिक सम्रुद्ध है कुछ अधिक
27:29खड़े हो तो अपनी ही आवाज अपने आपको सुनाई नहीं देती
27:33जीवन में आपा धापी बढ़ी है युवा पीड़ी जीवन की
27:39बहुत सारी इच्छाओं प्राप्तियों के द्वंदो के एक ऐसे कोलाहल
27:43में पहुँच गई है जहां उसे लगता है बिना जोर से बोले कोई सुनता ही
27:47नहीं आप कभी कलपना करें कि जब बहुत सारे लोग बोल रहे हों तो
27:52अपने आप आपकी आवाज कुछ तेज हो जाती है जैसे ही हम समझते हैं कि हमें
27:58नहीं सुना जा रहा है, हम जोर से बोलने लगते हैं, युवा पीडि एक ऐसी क्राइसिस के सामने है, जब बहुत सारा तनाव है, बहुत सारे चाहने वाले, बहुत सारे चाहे जाने वाले, और एक द्वंद पैदा हुआ है, जीवन को मशीनों के बहुत अधिक सहयोग के कार�
28:28आराम को आप पुरानी फिल्मों को देखें तो साड़े तीन घंटे की फिल्म, लंबे लंबे गाने, बड़े स्लो मोशन में डांस करते हुए नायक नाई का, और फिर आज के गाने देख लें, तो आपको बिट्स बढ़े हुए मिलेंगे, स्पीट बढ़ी हुए मिलेंगी, �
28:58पीढ़ी के मन में आई है, और इसलिए उसका चाहा हुआ, उसके पाने के पहले किसी दूसरे के हाथ चला जाएगा, ये डर आया है, उस डर ने अपने होने को साबित करने, और अपने प्रत्याशी होने को साबित करने की एक तरह की चिंता पैदा की है, तो थोड़ी तीवर
29:28है, तो जीवात्मा अनाध्यात्मिक कैसे हो सकता है, वा अपनी आत्म सत्ता के होने का कितना बोध रखता है, ये तो एक विशे है, मूर्चित व्यक्ति भी अनाध्यात्मिक नहीं हो सकता है, क्योंकि उसको consciousness भले नहों, पर आत्मा थो विद्यमान ही है, कोई जो सावधान ह
29:58तो जिन्दगी में भरोसा कुछ लोग आपके लिए चिंता कर रहे हैं, कुछ लोग आपके लिए रच रहे हैं, कुछ लोग आपके लिए कमा कर इकठा करके रख रहे हैं, यह जो भरोसा था, यह युवा पीड़ी में कम हो गया है, निरंतर कम होता जा रहा है, उन्हें लगत
30:28उन पर भरोसा करें ये प्रकृति एक त्रेणवी वियर्थ नहीं उप जाती इस संसार में एक पत्ता भी किसी पेड़ में अनावश्यक नहीं आता उसकी एक कोडिंग है उतने ही आते हैं इतने दिनों से मनुश्य होता चला आ रहा है उंगलियां चार-चार होने लगी हो या �
30:58प्रमत्त है सूर्य अपनी आत्रा में तिल भर भी डिगता नहीं है सप्ताह और वर्ष तो आपको जिस सत्ता ने रचा है आपको प्रकृति अथवा परमात्मा जिस व्यवस्था ने रचा है वो बहुत होशियार है और हर समय हर ख्षन आपके लिए अवेयर है तो आप ये �
31:28यहां भक्ति परमपरा में एक छंद पढ़ा जाता है रे मनमूढ ब्रथा भटके नव मास कहो सुधिकौन लई बहुत दुखी हो कि तुम कमाओगे नहीं तो खाओगे क्या तो जब मा के गर्भ में थे तब कोशन मिल रहा था कि नहीं और जब जन्म लेता है कोई बच्चा
31:58गर्भ के बच्चे को मा के पेट के भीतर पोशन मिलता है और वो नवजात बच्चा जन्म ले लेता है तो उसको मा के थन से दूद मिलना शुरू हो जाता है और बच्चा दूद से सारा पोशन नहीं पा सकता तो मा अपने वातसले से भरी हुई उस बच्चे को धीरे धीरे
32:28बोतले के आता है धरती पर
32:29हमें जिन्दा रहने के लिए जितनी सारी चीजें होती हैं
32:33उनमें से एक भी हमने नहीं कमाई है
32:35सब हमको फ्री मिलती है
32:37हमने अपनी लालसाओं को पूरा करने के लिए ही
32:40अपने कमाने का पूरा उपयोग किया है
32:42इस ब्रह्मांड पर हम एक बूंद पानी भी बढ़ा नहीं सकते
32:46चाहे बोरिंग करके निकालने चाहे खरीद करके ले आएं
32:50ये पानी इस प्रकृति ने दिया है
32:51ये आक्सीजन से लेंडर लेकर हम जर्म नहीं लेते
32:54और आक्सीजन से जिंदा रहते हैं
32:56मोबाइल से जिंदा नहीं रहते
32:57हमें जीवित रहने के लिए जो कुछ चाहिए सब प्रकृति ने ने शुल्क दिया है
33:03हम उस पर भरोसा करें
33:04कि वो बाकी सब कुछ भी जो हमारे भीतर इच्छा है
33:07उसके लिए हम आयतन्वान होते जाएं
33:09आयतन्वान होना मतलब अपनी पात्रता तैयार करते चले जाएं
33:12जो पात्र होते हैं
33:14उनके लिए सिद्धियां उनको खोजती हैं कि उन तक पहुंचें
33:17समस्कृत में एक कथन है
33:20उद्योगिनम पुरुशसिंग मुपईति लक्षमी
33:22उद्योग करने वाले उद्योग माने आप मत समझ लीजेगा इंडस्ट्री
33:27उद्योग करने माने पुरुशार्थ करने वाले प्रयत्न करने वाले लोगों तो
33:31उनको खोजते हुए सिद्धियां आती है
33:33युवा पीड़ी हमारी मुझे लगता है पिछली पीड़ियों से ज़्यादा तयार और समझदार है उसे अपने भीतर ये पेशेंस ये विश्वास लाना पड़ेगा कि आप इस दुनिया में जबरदस्ती घुसकर नहीं आए हैं इस रचईता ने आपको इसमें बुलाया है �
34:03अपने जो फॉल्वर्स है उनके माध्यम से अपने प्रेम का व्याख्या कर लेते हैं कि अगर हमारे एक मिलियन से जादा फॉल्वर्स हो गए इंस्टा पर फेस्बुक पर तो हमें बड़ा प्रेम मिल रहा है वहीं तक दुनिया सीमित है अब ऐसे लोगों में आपकी अभी
34:33समस्थ्��ित आएं सूसाीड करने की समस्याएं ये क्यों बठता जारी है ये प्रेम का भावी तो है अचारे जारी जी
34:39ड़त ये प्रेम नहीं है ना पहले तो में ये इस पश्ट कर
34:43कि यह जो followers की भूक है मैं उस यात्रा का यात्री नहीं हूँ आपने कहा आपके बहुत सारे followers हैं मैंने कहा कि कुछ लोग आरम में भी आपने परीचे में भी कहा था तो उस समय मैंने प्रदिवाद इसलिए नहीं किया था कि आपके सद्भाव हैं सद्भाव स्विकार करने चा
35:13ऐसे मठकादाई तो मिला है जिसके शिष्य देश भर में हैं पीडियों पुरानी शिष्य परंपरा है और मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं शिष्य बनाने से बच रहा हूं मुझे छोड़ दीजिए हम followers बनाने में लगे हैं खुद हमें किन चीजों को follow up करना था जो हमार
35:43हैं उन्हें नहीं कहना चाहिए खुद को गुरू ये सारा संसार मुझे भूल जाएगा तो भी मैं वही हूँ जो हूँ ये भारतिय ग्यान परंपरा है ये विश्वा समें दिया गया है और इसलिए हम ये सोचते ही नहीं है कि ये प्रेम के कारण हो रहा है लोकतंत्र ने ध
36:13अधिरे ये बताया है कि जिसके साथ बहुत बड़े समर्थक खड़े हैं अधिक संख्या में उसकी बात जायज ना जायज होने के प्रशन के बाहर चली जाती है उसके साथ लोग डील करते हैं और सबसे जादा बड़ी व्याद ही इस देश में राजनीत इसे आई है क्यों �
36:43क्योंकि अधिक लोगों ने उसको मत दिया है इसलिए ये सिद्ध है कि वो ठीक है इस कुंठा ने धीरे धीरे धीरे ये संक्रामक बीमारी थी ये धर्मक्षेतर तक फैल गई है और धर्मो पदेश्टा भी समर्थन जुटाने की व्याद ही से ग्रस्त हो गए हैं उसका एक �
37:13महराज जी ऐसे करेंगे तो ये बात बन जाएगी ऐसे करेंगे तो ये बात बन जाएगी मैं तो चकित रह गया टेलिविजन पर देखते हुए कि कि किसी तीर्थ में किसी जगह में किसी पूझे संत को प्लाट खरीदना है पूरे प्लाट का पेमेंट कोई एक व्यक्ति नह
37:43मैं उसी पहँचान से आता हूँ
37:45वही धार्मिक पहँचान मुझ जैसे लोगों को भी वैलिड करती है
37:48तो मैं उसको तिरस्कत करने के लिए नहीं कहता
37:51पर मैं इस बात से दुखी हूँ
37:52ये प्रेम नहीं है, ये प्रपंच है
37:56अपने पीछे भीड खड़ी करके
37:58अपने सही गलत को पुष्ट करना
38:00और जिन भौतिक सिद्धियों और उपादानों के महत्व को कम करने के लिए
38:05धर्म जीवन में एक संतुलन लाता था
38:07धार्मिक शेत्र के प्रतिनी दिभी
38:10उन भौतिक सिद्धियों को अंगी कार करके
38:12उनके महत्तु को स्वेकार करके धार्मिक अवधारना को ही प्रश्ण चिन्ध में ला दे रहे हैं
38:17ये चिंता की बात है तो मैं उसका अनुमोधन नहीं कर सकता ये प्रेम नहीं है
38:21आचारे जी किसी का नाम ये बगेर मैं जाना चाहूंगी
38:26शंक्राचारे की उपाधी कैसे मिलती है
38:29इसको लेकर हाली में विवाद हुआ
38:31आप की इस पर क्या रहा है
38:33सबसे पहले तो मैं यह कहूँगा
38:35कि यह मेरे लिए बहुत दुख़द है
38:38लज्जास्पद है
38:39मैं बार-बार सोचता हूँ
38:41कि मैं इस पर बात ही न करूँ
38:42एक पंक्ती है ना कि
38:46कह भी नहीं सकते
38:48और चुप रह भी नहीं सकते
38:50रहा भी ना जाए, सहा भी ना जाए
38:52हाँ, तो एक ऐसी इस्थिती है
38:53यह ना कहें पर नहीं कहते हैं
38:56तो बहुत सारे लोग
38:57चाहते हैं कि महराज जी
38:59आप कुछ कहेंगे तो हमें भी
39:00एक सोचने का मार्ग मिलेगा
39:02शंकराचार्य परंपरा
39:04इस देश की बड़ी पवित्र परंपरा है
39:06जिसने हमारी सहस्राब दीने भारत को
39:09चरित्र में, धर्म में, वेदान्त के
39:11बोध में स्थिर करके रखा है
39:12कालक करम से हर चीज का हरास होता है
39:15परंपराओं का हरास हुआ है
39:17उनकी विश्वसनियता का भी हरास हुआ है
39:20मान्य पीठों में
39:22जिन आचारियों की नियुक्ती, केबल, आचारी, गद्दी
39:25और धार्मिक से धान्त करते थे
39:27उनमें न्यायालयों का भी प्रवेश हुआ है
39:29मुकदमे बने हैं, वहां से निरड़याये हैं
39:32वैलिड, इन्वैलिड होने के प्रश्णाये हैं
39:34तो ये तो तय है कि हम लोग कहीं
39:36अपनी जमीन से खिसक गए
39:37पर एक दूसरी बात ये है
39:40कि जब एक पद्धती बनी है
39:43कि आचारी अपने जीवन काल में आचारी घोशित करता है
39:46अपना उत्तराधिकारी घोशित करता है
39:47और घोशित करने के साथ ही विद्धत परिशद
39:51और उस पूरी परंपरा के जो प्रामानिक कुछ
39:54तीन-चार समस्थान है उनको सूचित करता है
39:56उसकी एक पद्धती है
39:58उस पद्धती के द्वारा पट्टा विशेक होता है
40:00सभी आचारी आ करके उसको
40:02अपना धार्मिक सैध्धान्तिक अनमोदन देते हैं
40:04और समाज के और शिश्यों के सामने
40:07ये ख्यापित हो जाता है
40:08कि अब ये आचारी होंगे
40:10ये हमारे सामने है
40:11दो पूझे पीठों में हमें ये दिखाई पड़ रहा है
40:14दो पूझे शंकराचारे पीठों में
40:18दोनों जगा उत्तरा धिकारी गोशित किये गए हैं
40:19उनके जीवनकाल में व्रत्यक्ष है
40:21तो जब जैसा होना चाहिए वैसा नहीं होता
40:24तब वैसा होने लगता है जैसा नहीं होना चाहिए
40:28ये इसका उदाहरन है
40:29कैसे होती है इस बात की चर्चा
40:32मैंने ये बात बहुत गत वर्ष महाकुम्भ में भी मंच पर से कही थी
40:37कि नियायालयों से, सरकार से, समाज से मेरी प्रार्थना है
40:42जिनकी खणाऊं हम पीडियों से पूजते आये हैं
40:45उनकी प्रामानिक्ता का निरड़े देने का दंभ हमें नहीं करना चाहिए
40:49हम कौन होते हैं ये बताने वाले कि शंकराचारे कैसे चुने जाएंगे
40:53और किसी चैनल पर बैठ करके किसी टीवी डिवेट में इस पर बात नहीं करनी चाहिए
40:58मैं बड़ी विनम्रता से कहूंगा
41:00हमारे समाचार चैनल बड़े-बड़े मीडिया हाउस पर डिवेट आयो जित करते हैं
41:04एक्सपर्ट्स को बैठाते हैं
41:06रत्ती भर भी योगिता हमारी नहीं है
41:09किसी शंकराचारी के बारे में ये कहने कि कि ये क्या है और क्या नहीं है
41:14वो कुछ नहीं होने पर भी हमारे पढ़े लिखे लोगों से एक कोस उचाई पर खड़े हैं
41:18तो हमें ये नहीं करना चाहिए
41:21जिन धार्मिक अधिश्ठानों ने पीडियों से भारत के स्वाभिमान की रक्षा की है
41:25और जिनकी खणाऊं हम पूझते आये हैं
41:28जिनका पाउध होकर के हमारा समाज पीता आया है
41:30जब मंच लगाकर तमाशा होता है कि ये हैं की नहीं हैं
41:33तो ये बहुत लज्जास्पद है
41:35हमें इससे बचना चाहिए
41:36बहुत सारे संस्थान अधिश्ठान ऐसे हैं
41:39जिनकी प्रामानिकता पर सवाल उठता है
41:41बहुत सारे नियाय अधिशों की नियुक्तियां भी बादित हैं
41:44पर उनके निरड़े अमान नहीं होते
41:46बहुत बार सरकार की भरतियों पर प्रशन चिन उठता है
41:51पर उनमें जो लोग नोकरी बाते हैं
41:52उनको बेतन मिलता रहता है
41:54बहुत सारे डाक्टर्स के आपरेशन विफल होते हैं
41:57उनके पेशेंट मर जाते हैं
41:58पर उनकी डिग्री वापस नहीं ली जाती
42:00समाज तो अच्छे बुरे लोगों को
42:03गुण और दोश को मिला कर ही बना है
42:06हम इस संसार में जूट सच के साथ ही जीते जाते हैं
42:09पर किसी बड़े मान निप्रामानिक आचायरे के विशे में
42:12हमें जरा भी कोई अउसर मिल जाए
42:14तो हम तुरंत लगते हैं चोच मारने
42:16ये हमारी कुंठा है
42:17मैं समझता हूँ हम लोगों को
42:19शंकराचायरियों की प्रामानिकता पर बात नहीं करनी चाहिए
42:21और जब हमारे मन में कोई द्वंदू उपस्थित हो
42:24तो द्वंदू को छोड़कर
42:26हमें भगवत पाद श्रिमदाद दिशंकराचायरे को समरन करना चाहिए
42:29जिन्होंने अपने अनुग्रह से
42:31अपने वईदुष्य से भारत को भारत बनाया
42:34और भूल जाना चाहिए कि आज क्या चल रहा है
42:36तो ये महाकूंब और
42:40माग मेले जैसे आयोजन में
42:42सनातन धर्म की जो एकता है
42:44वो प्रेम के माध्यम से कैसे दर्शाई जाएं
42:47वो प्रेम के माध्यम से ही प्रकट हो रही है
42:49इसको खोजना नहीं है आप रेखांकित कर दें तो काम बन जाएगा
42:52करोणों करोण लोग बिना निमंतर्ण पत्र के वहाँ पहुँचते हैं
42:56पुलिस कहती है रास्ता बंद है तो वो कहते हैं पैदल जाएंगे
42:59और पैदल भी उनको दस बार घुमाया जाता है
43:01मैंने लिखा है इस पर आप पढ़ेंगे तो आपको आनन्द आएगा
43:04सिर्फ पर इतना भार उठाया हुआ है बिशाने के पुवाल की चटाई
43:10जलाने की लकडी दान देने का और पका कर खाने का अन
43:14घर से ढो करके जो भीड ले करके आती है
43:16रात में बारा बजे एक बजे आप लोग करते ही हैं
43:19आप सणकों पर निकल जाएए लोहे की पट्टियों पर नंगे पाउं चलते हुए
43:23हजारों हजार आबाल वृद्ध नर्नारी
43:25गूम रहे हैं भटक रहे हैं उनको पता नहीं है कहा तक पहुँचना है
43:30संगम कहा है गंगा कहा है पुलिस वाले जाने नहीं देते उन पर भी दबाव है
43:34लगातार सूचना आती है कि जनसंख्या बढ़ती जा रही है बीड बढ़ती जा रही है
43:38उन्हे कोई परवाह नहीं है कियों आते हैं
43:42क्योंकि इनको तिर्थराजब प्रयाग से प्रेम है
43:44सादर मजजहि सकल त्रिवेनी पीडियां महा नहाती चली आई है
43:48मैं बार-बार कहता हूँ
43:50कुम्भ व्यवस्था का उत्सव नहीं है
43:52माग व्यवस्था का उत्सव नहीं है
43:54आस्था का उत्सव है
43:56व्यवस्था का काम वहां ज़ाडू लगाना है
43:59तो जब कुम्भ का और माग का हम दर्शन करते हैं
44:02तो हमारा ध्यान इस बात पर जाना चाहिए
44:04कि यह आस्था का और प्रेम का उत्सव है
44:07चूंकि बहुत बड़ी जनसंख्या वहां आती है और व्यवस्था पर बहुत बड़ा भार रहता है इसलिए आस्था से आये हुए लोगों को भी चाहिए कि वे व्यवस्था के साथ समझाओता करें
44:18हम भी वहां होते हैं अपना शिविर लगता है रोज पैदल चल कर स्नान करने जाते हैं के बल इसलिए नहीं कि पास लगा है तो हम गाड़ी से जा सकते हैं खुद को लज्जा होती है जिस सनक पर बच्चों को साथ लिये हुए वृद्धाएं ठोकर खाने के डर के बावजू�
44:48स्टेशन से उतरती है और गंगा तट तक पैदल आती है और लोट कर स्टेशन तक पैदल जाती है सनक के किनारे बिछा करके सोती है और रहती है उसी जनता के घर से आई हुई विक्षा खा करके हम साधू होने के नाते जब उसके सिर पर पाउं रख करके चलना चाहते हैं त
45:18तुम भी अपने को भगवान मत मान लेना नहीं तुमारा बेड़ा गर्क हो जाएगा
45:22जिस जनता के धूल में लोटते हुए जिस भारती ये समाज के घर का आटा चावल आता है तब मठों के बंडारे चलते हैं
45:32मठों को ये पहचानना चाहिए कि हम इनके सिर पर पाऊं रख कर न चलें
45:36वो हमें पूजा देते हैं इसलिए नहीं कि हम इतने महान हैं इसलिए कि ये रंग
45:40इसलिए कि ये तिलक इसलिए कि ये भगवदी ये उपादान पीडियों से पूजे जाते रहे हैं
45:46हम इनकी प्रामानिक्ता के प्रतिगंभीर नहीं होंगे तो इनकी पूजता खंडित हो जाएगी
45:50वो आस्था का मेला है व्यवस्था आस्था को बनाई रखने के लिए वहां होती है
45:56आस्था और व्यवस्था को सामन जस्य में रहना चाहिए यही मेरी प्रार्थना है
46:00राम चरित मानस या फिर किसी और ग्रंथ में आपका सबसे प्रिय प्रेम प्रसंग क्या है और इसके पीछे की वज़ा क्या है
46:08यह तो बड़ा कठिन विशे है यह वैसे ही है जैसे किसी मां से पूछा जाए कौन सा बच्चा सबसे प्रिय है
46:17सबसे छोटा होता है शायब
46:19यह एक
46:21बायोलाजिकल विशय एक जैविक घटना है
46:24इस पर चर्चा आई है
46:25मैं उसमें जाओंगा नहीं अभी
46:26लेकिन यह मां ही जानती है
46:29कि उसे सब प्रिय होते हैं
46:31सबसे छोटा वाला सबसे प्रिय क्यों होता है
46:33इसकी भी बड़ी लोकिक कताएं हैं
46:35मैं उसमें जाओंगा नहीं बहुत
46:36मैं अपने स्वरूप की सीमा में कुछ बातें कहूंगा
46:39एक प्रसंग श्री रामचरित मानस का
46:43जो मैं चाहता हूँ कि मैं कहूं
46:45और इसलिए भी कहूं कि मैंने उसको
46:47कई बार पहले भी इस प्रशन के उत्तर में दोहराया है
46:49तो वो मेरे चित्त में टिका हुआ है
46:51श्री जानकी जी
46:53श्री रगुनंदन के साथ
46:55पीछे पीछे चल रही है वन मार्ग में
46:57वन में निवास करने वाली
47:00स्त्रियां चाहती है कि इनसे थोड़ी बात करें
47:03संकोज करती है
47:06क्योंकि वन में बसने वाले वनवासी
47:09और राजा धिराज के पुतर श्री राम भद्र
47:11भले उन्होंने वलकल पहना है
47:13लेकिन देखने में पता चलता है कि ये कुछ विशिष्ट है
47:15तो वो आपस में बहुत बादचीत करती है
47:18कि ये बहुत सुंदर है
47:20और इनके साथ जो ये देवी हैं ये भी बहुत सुंदर है
47:22स्त्रियों का सहज एक कुतूहल है
47:24जानना चाहती है कि ये कौन है
47:26स्त्री एक है पुरुष्ट दो है
47:27इस युग में तो सब जस्टिफाइड है उस युग में ये चिंता थी कि एक स्त्री है दो पुरुषात चल रहे हैं संबंद क्या होगा
47:34तो मानस में और कवितावली में गोस्वामी जी ने इसका बहुत सुन्दर चित्रांकन किया है
47:41स्त्रियां समवाद में पुरुषां की अपेक्षा अधिक कुशल होती है जल्दी समवाद स्थापित कर लेती है क्योंकि उनमें संबेदना का वेग अधिक होता है
47:50वो जाती हैं प्रणाम करती है
47:52अब प्रणाम करने पर एक शील है
47:55कि जो चल रहा है वो रुके
47:56जानकी जी रुक गई है
47:58और वे उनसे प्रश्ण करती है
48:01स्वामी नी अविनयच हम भी हमारी
48:03देवी हमारे अविनयच को ख्षमा करना
48:07हम चलते हुई आपको रोक रहे हैं रास्ते में
48:09आपके मन में ये प्रश्ण होगा कि हम आपको क्यों टोक रहे हैं
48:13क्यों कहा हम आपकी अपनी हैं
48:15आपको अपना मानती हैं
48:17इसलिए रोक रही है
48:18प्रश्ण है कि आप हमें अपना क्यों मानती है
48:21प्रेम क्या है
48:22मैं नहीं चाहता कि मैं इसको प्रेमी प्रेमिका के अर्थ में बताऊं, पति-पत्नी के अर्थ में बताऊं, मैं आपको किसी प्रेम कथा से प्रेम बताऊं, ये बहुत जड़ हो चुका है
48:31मुझे अगे याद आते हैं
48:33जो कहते हैं कि मैं अपनी प्रेशी को
48:35कुमुदनी और कमल और चंद्रमा नहीं कहना चाहता हूं
48:40क्यों? कहा ये उपमान बुरे नहीं है
48:42इनका रंग उतर गया है इतना घिस दिया गया है इनको
48:45हर मुखडे को चंद्रमा चंद्रमा दुखी हो गया है अपने ऊपर
48:49तो मैं नहीं कहना चाहता हूं
48:50क्या कहना चाहते हो तो कहा लहाती हुई हरी दूब कह सकता हूं
48:55या अभी अभी खिली हुई बाजरे की कलगी कह सकता हूं
48:59तो मैं चाहता हूँ कि आपको दिखाऊं कि उस्त्रियां कहती हैं कि देवी हम आपसे कुछ पूछ रही हैं, किस अधिकार से पूछ रही हो, कहती हम आपसे अलग नहीं हैं, क्यों नहीं हैं?
49:11कहा हम वन में जन्मी हैं विपन माता पिता की संताने हैं जिसके साथ हमारा विवाह हुआ है उसके जीवन का जो सुख दुख है विवाह की साथ निभाने की प्रतिग्यां के कारण हम उसको अंगीकार करके तद्वत हो जाती है आज राजा धिराज की वेटी हो करके रगुकु
49:41वन के मार्क पर चल पड़ी हैं
49:43तो हमें लगता है कि हमें आप में कोई वहेद नहीं है
49:45इसलिए हम आपको अपना मान कर
49:47बिलग न मानव
49:48आप नागरी हैं, हम गमारी हैं
49:50लेकिन हम आप बिलकुल एक भाव भूमी पर जीने वाली हैं
49:54तो हमारा प्रशनी ये है
49:55कि आप बताईए कि आपके साथ चलने वाले कौन है
49:57और बड़ी प्रशस्ति करती है
50:00राजकूर दो सहज सलोने
50:02ये दोनों ही बड़े सुन्दर हैं
50:05इनको देख करके लगता है कि इसमें जो छोटे हैं और पीछे चल रहे हैं
50:09इनके रंग से सोने ने सुन्दरता ली है
50:11और श्री राम भद्र को कहती हैं कि इनके रंग की कान तिले करके पन्ना बना है
50:17ये आपके कौन है
50:20तो जानकी जी ने लक्ष्मण जी का परिचे कराया
50:24सहज सुभायं सुभगतन गोरे नाम लखन लगुदेवर मोरे
50:29ये मेरे चोटे देवर हैं लक्ष्मण नाम है
50:33राम जी का नाम कैसे लें
50:34आत्म नाम गरोर नाम नाम आतिक कृपनस्य चोश्रे यसकामो नग्रिणी आत
50:39भारती ये परंपरा में स्त्री और पुरुष्पती और पत्नी एक दूसरे का नाम न लें
50:43ये मर्यादा है
50:44तो क्या करें
50:45बहुरी बदन बिधु अंचल ढांकी
50:49अपने धोती का गूंगट आचल सिर पर खीच करके
50:53राम जी की ओर से नेत्रों को छिपा करके मुख को
50:56और नेत्रों का संकेत करके
50:59स्त्रियां ज़्यादा ठीक से जानती है
51:01कि ये मेरे वो हैं
51:03जो मुद्रा है
51:04तो बता दिया कि ये पती हैं
51:06और उस भाव में
51:08जो वनवासिनी इस्त्रियों का जानकी जी से है
51:11एक और छंद आप देखेंगे
51:13रास्ते में चल रहे हैं
51:17और प्यास लगी है
51:19राम जी ने कहा है
51:21कि रुकेंगे तो देर होगी धूप तेज है
51:23धीरे धीरे चलते रहो
51:24लक्षमर जी को कहा है
51:25कहीं से जल ले आओ
51:26लक्षमर जी जल ले आने के लिए चले हैं
51:30और जानकी जी रोकती हैं राम जी को
51:32खड़े रहने पर
51:34नीचे की बालू से पाउं तपते हैं
51:36चलते रहने में आराम है
51:37पर वे कहती है कि नहीं नहीं हम यहां रुकेंगे
51:39जलको गए लखन है लरिका परिखो पी ये छाहां घरी कोई ठाड़े
51:45घरी भर के लिए खड़े हो जाओ क्योंकि वन मार्ग में जल लेने के लिए जो लक्षमर गए हैं
51:52ये बालक हैं कहीं ऐसा नहों कि पीछे छूट जाएं भूल जाएं इसलिए उनको भी साथ लेकर के वन मार्ग में आगे बढ़ना चाहिए
51:59जो आयू राम जी की है उससे थोड़े ही अंतर पर लक्षमर जी की आयू है
52:03जानकी जी की आयू लक्षमर जी से भी कम है कताओं के अनुसार
52:07और वे जानकी जी संबंध के व्याज से लक्षमर जी लरिका हैं इनको पीछे शोड़कर आगे बढ़ना ठीक नहीं है
52:14साथ लेकर चलें इस प्रेम को जब हम देखेंगे
52:16तो देह का उनमाद मचाने वाले देह का उत्सो मनाने वाले विपरीत लिंगियों के प्रेम की जो कुंठा है
52:24उसके बाहर भी हमें कहीं प्रेम दिखाई पड़ेगा
52:27भाई और बहन का जो प्रेम है भाभी का देवर के प्रति जो वादसल्य पुत्रवत प्रेम है
52:33वनमे जनमी, वनमे घास और लकडी का काम करने वाली इस्त्रियों का
52:38राजमहल से निकल करके आने वाले राजकुमार और राजवधू का
52:42परिचे और पता और सुक दुख पूछते हुए जो प्रेम प्रकट होता है
52:46हमें चाहिए कि हम इसको भी पहँचाने
52:48मेरी एक कविता है माँ पर
52:49मैंने उसमें एक पंक्त ही कही है
52:53और आधरनी अब दिनाजी सामने हैं इसलिए याद आ गई है मुझे
52:56कवियों का समों हों समों को पस्ते थे तो
52:59हम सुनते हैं कि प्रेम में ऐसा हुआ है
53:03कि प्रेमिका के हाथ पर
53:05विद्याले में शंटियां पढ़ती है
53:07और प्रेमिका हाथ लाल हो जाता है
53:09हम फिल्म में गाना सुनते हैं
53:11कि मेरे प्रियतम की आँखों में दर्द है
53:14और मेरी आँख में लाली आ गई आप सुनते हैं
53:17और तब मैं कहता हूँ कि
53:19प्रेम के पोथियों के पंडितों कभी क्यों नहीं बताते कि वो भी मा होती है जिसकी खाई मिर्च का स्वाध हमें लगता है
53:29मा जब गर्व में धारण करती है बच्चे को जन्म दे करके दूद पिला कर पालती है बच्चे को तो बच्चे के स्वास्थे के लिए क्या आहार अनुकूल होगा ये सोचकर मा आहार करती है
53:42वो जो खाती है उसका प्रभाव बच्चे पर चला जाता है
53:46तो प्रेमी और प्रेमी का में ये आपको खोजने की क्या जरूरत है
53:49जिस दिन पैदा हुए थे उसी दिन आपको दिखाई पड़ गया था कि प्रेम ये है
53:52मा के बिगड़े हुए आहार से उसका दूद पीकर पलते हुए बच्चे का पेट बिगड़ जाता है
53:59ये प्रेम नहीं है
54:00तो हम प्रेम को उसके बड़े आयतन में देखेंगे जिससे ये सारा विश्व अभिशिंचित है
54:06जब आप देखेंगे तो आपको ये बात समझ में आ जाएगी कि धरती और आस्मान में कोई प्रेम है
54:12और भारती ये प्रेम की दृष्टी कहती है कि ये प्रेम की उतकंठा है व्याकुलता है
54:18कि धरती ऊपर को उभर गई है
54:20धरती वरतुल है
54:22उपर क्यों उठी हुई है सपाट क्यों नहीं हो गई है क्योंकि आकाश के प्रेम में उपर जाना चाहती है
54:28आकाश नीचे क्यों जुक गया है क्योंकि इसको भी धर्ती से प्रेम है और धर्ती को सपर्श करने के लिए कहीं जुक करके उसे छू लेना चाहता है
54:36प्रेम इतना व्यापक है जो सरवत्र दिखाई पड़ता है और इसलिए जब हम दूर तक देख पाते हैं तो हमें क्षितिज पर धर्ती और आस्मान की दूरी दूरी नहीं रह जाती है एक होती हुई दिखाई पड़ती है जब दृष्टी दूर तक जाएगी तो हमको प्रेम
55:06जाख्या करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपको भी धन्यवाद इस पूरे परियोजना के लिए बहुत सारा साधुवाद सभी को जैसे आराम
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