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00:00:00जो बाजारू गुरू हैं, जो लूट लाट रहे हैं, जेल भी चले जा रहे हैं, उनको तुम्हें दोश देते ही नहीं बिल्कुर।
00:00:05क्योंकि वह सिर्फ सप्लाईर हैं, उन्होंने आपको वही दिया, जो आपने मांगा, आप उनके पास मनोरंजन मांगने गए थे, उन्होंने दिखा दिया, आप गए थे उनके पास, कि अमें भूठ चढ़ा, उन्होंने कऄ लाट भूठ फगाय देते हैं तुम्हारा।
00:00:15धर्म के नाम पर अगर विवाद हो रहा है, तो यह सारे विवाद अधार्मिक हैं
00:00:33हमें धर्म के नाम पर किसे कहानियां दे दिये गए हैं, prossime hockey, कर्मकांड दे दिये गए हैं
00:00:40गए हैं दर्शंग नाम सुनते ही युगाओं को बड़ी असाजता होती है यहां एक विक्ति ऐसा नहीं है जो फिलोसफर नहीं है
00:00:49सब कोई अपने खेट से उठता फिलोसफर है कोई गली महले से उठ रहा है
00:00:54स्कूल कॉलेज के फिलोसफर है चौराहों पर फिलोसफर है नुकड़ पर फिलोसफर है चाय के अड़ो पर फिलोसफर है बाथरूम में फिलोसफर है इंस्टाग्राम में फिलोसफर है
00:01:05और आज का जो यूग है वो आपको अच्छा अनुभाव करने के
00:01:11फील गुड करने के इतने साधन और इतने मुरोन जन देता है
00:01:14कि आपकी हालत कितनी भी खराब हो आपको फिर भी ऐसा लगता है
00:01:18मेरी जिन्दगी तो ठीकी चल रही है
00:01:19तो आज गुलामी के जो दाम मिलते हैं उतने कभी नहीं मिलते थे
00:01:23तो आज गुलामी को ठुकराना और � Ub�श्किल होता जा रहा है
00:01:28कि आपने तो खुद चोड़ दिया और युवाओं को कहरे हैं कि
00:01:33दाम मिल रहे हैं इसलिए उन्होंने पकड़ने रखाय है
00:01:36तो इसी लिए तो हमारा इनका प्यार है, ना?
00:01:43इनके सामने कोई तो खड़ा होता है,
00:01:47जो कि अभी दाम लेकर बिखने को तयार नहीं है,
00:01:51तो यही बादने अच्छी लगता है.
00:02:06नमस्कार, कलिंग की धर्थी पे
00:02:34आचारी प्रसांत मुझी से बात करने का मुझे अचारी जी की भोनेस्वर आगमन में कलिंग की धर्थी पर
00:02:49और कलिंगा लिट्रेरी फेस्टिवल में आगमन के दोरान एक इच्छा थी कि उनसे बाद समवाद का काम मैं करूँ.
00:02:57आचारी जी खुद बहुत अच्छे प्रवचन करता हैं और व्याख्यान देते हैं, शिक्षक हैं, प्राध्यापक हैं, प्रसिक्षक हैं, प्रकरवक्ता हैं तो वो स्वैंग कुछ कहेंगे.
00:03:10लेकिन आचारी जी कि उन्हें समवाद में अभिरुची है और वो बात करना चाहते हैं.
00:03:17हमारा आज का विश्वै जो है आचारी जी का जो छेत्र है, वो बहुविध छेत्र है, लगातार देश की युवाद पीड़ी से समवाद करते रहते हैं और भारत के जितने भी बड़े संस्थान हो सकते हैं, जहां सबसे प्रकर बुद्धिमत्ता उपलब्ध होती है, उन्ह
00:03:47के दिमाग, युवाओं के मानस और उनके सामने जो संघर्स है, उनके सामने जो भविश्य है, या वो जो पाच चुके हैं, उसको लेकर जो उनके मन में कई बार अराजकता होती है, कई बार दुबिधा होती है, और वो एक तरह के स्वैन के संघर्स से लड़ रहे हैं, बरत
00:04:17पता के चलते आचारे जी उनके मन में वो शांती हो वो अपने जीवन के सही उद्देश्य को पा सकें उसके लिए ये प्रयास कर रहे हैं हमारा आज कभी से भारतिय दर्शन बेद और परंपरा में युवाओं की जो भूमी का है भागीदारी है उस पर केंद्रित है और सन्यो
00:04:47आजी जिसका कबर आप देख रहे हैं तो सबसे पहले तो मैं शिकायत के साथ सुरू करूँगा आचारी जिसे कि इनकी जो पूस्तके हैं अंग्रेजी में पहले आती हैं हिंदी में बाद में आती हैं और भारतिय भासाओं में सबसे बाद में आती हैं और मुझे लगता है क
00:05:17आप बेस्ट ब्रेन के साथ तो काम करते हैं आयायम, आयायटी और इस तरह के बड़े इंस्टिचीउट के पास तो सुभिधा भी है वो बच्चे काफी अभिजात के घरों से आते हैं या पढ़ लिख कर आते हैं
00:05:30तो जो सामान्य तबका है, जो इवा है, जो गाउं का है, भारत की गाउं का है और कहीं पढ़ाई कर रहा है आपके यूटीब पर और सोसल मेडिया पर आपकी उपस्तिती और आपकी लोग प्रियता है
00:05:4590 मिलियन से अधिक लोगों तक आपका प्रचार प्रसार है
00:05:52तो मेरा पहला प्रस्ण यह है कि जो यह यूवा है जो भारत के दर्शन परंपरा और आपको सुनकर उनसे जुड़ना चाहता है
00:06:02अपनी किताबें उनकी वासना में क्यों नहीं पहले लाते
00:06:06आपकी शिकायत वाजिब है और आकड़े पोड़ी सी अलग कहानी कहेंगे
00:06:17लगबग 160 किताबें हैं जिसमें से 120 हिंदी में ही है
00:06:25और वो हिंदी में ही है माने उनका अंग्रेजी अनुवादी उपलब्द नहीं है
00:06:33तो शिकायत शाहे दूसरे छूर से हो सकती है कि जो
00:06:43अंग्रेजी पाठक है वो किया सकता है कि आपका जो तीन चौथाई साहित है
00:06:49वो तो हिंदी में ही है और हमें कब मिलेगा
00:06:54कुछ गिनी चुनी किताबें हैं
00:06:57प्रशान्त अद्वाद संस्था आपने आप में एक प्रकाशक है
00:06:59हम पब्लिशर हैं और बहुत किताबे हैं
00:07:03और बहुत लोगों तक पहुँच रही हैं
00:07:05और जैसे हमने पिछली चर्चा में आपको याद होगा बात करी थी
00:07:08कि निउनतम मूले पर हम पहुँचा रहे हैं
00:07:10तो कुछ गिनी चुनी किताबे हैं जो बाहरी प्रकाशकों को हमने दी हैं
00:07:17जिसमें पिंग्विन, हार्पर कॉलिंस, जाइको ये लोग हैं
00:07:22और वो चार अंग्रेजी की किताबे हैं और एक या दो हिंदी की किताबे हैं
00:07:28जो वो चार अंग्रेजी की किटाबें हैं
00:07:30बस उनके हिंदी अनुआद उपलब्द नहीं है
00:07:32वो जो चार बाहरी प्रकाषबों को दीें
00:07:35क्यू
00:07:47और आप इस किताब पर हम चर्चा करेंगे
00:07:50लंबी क्योंकि ये किताब 9 अधियरों में बटी है
00:07:55और एक ऐसे सच की बात करती है जो हम सभी के पास है हम सभी के जीवन में है उम्र का कोई भी पड़ाओ हो
00:08:04और हाला कि युवाओं के भी ज़्यादा लोग प्री हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये किताब किसी भी उम्र के किसी भी व्यक्ति के
00:08:14यहां तक कि जो जीवन के आखिरी चरण में है उसके लिए भी बहुत उपयोगी है क्योंकि ये द्रिस्टी बदलने वाली किताब है कुछ सिखाने वाली किताब है
00:08:25इस किताब में क्या है इस पर बाद में चर्चा करेंगे चूकि हम कलिंग की धर्टी पर हैं तो सबसे पहले कलिंग को लेकर आपके मानस में जो छबियां आती हैं जो विचार आती हैं वो क्या है मतलब यहां के इतिहास संस्कृति और इस धर्टी पर जब आप पहली बार आ
00:08:55तो मैं भूवनेश्वर पहुँचा हूँ, तो कल तो रात में सत्र था, वो लगभग साड़े पाथ से शुरू हो करके, दस या ग्यारा बुज़े तक चला, बड़ा अद्भूत आनन्द था, आज मैंने दिन लगाया कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों को देखने में,
00:09:18तो चुक्कि मैं पहली बार आ रहा हूँ, तो स्मृतियां तो नहीं है, अनुभव हैं, और वो बहुत ताजे, हाली अनुभव हैं
00:09:26सबसे पहले तो मैं चाहूँगा कि हाल में उपस्तित सभी लोगों को इस बात पर खुशी होनी चाहिए कि कलिंगा लिटरीरी फेस्टिवल के दोरां, कलिंग की घरती पर आचार्य प्रिसांद पहली बार है,
00:09:37तो आज बड़ा रोचक वाक्या हुआ, हम राजारानी मंदिर में थे, तो वहाँ बात करते करते, मैंने कुछ कहना शुरू कर दिया, और चुकी संस्था किनने लोग भी साथ में थे, तो उसकी रिकॉर्डिंग शुरू हो गई,
00:09:57और वहाँ जो अन्य सब लोग घुमने आये हुए थे मंदिर में, दर्शन के लिए, या सिर्फ परेटन के लिए, वो लोग धीरे धीरे करके एकत्रित हो गए, तो कुल में लाकर मुझे लगता है, वहाँ लगभग दो घंटे बात हुई होगी,
00:10:15और मेरे लिए ये बात महतुपूर्ण है, रोचक है और आनंदप्रद है, कि कलिंग में लोग ऐसे हैं, जो जहां भी जाते हैं, भले ही व्यक्ते सामने अपरिचित खड़ा हो, पर अगर उसमें बोध पाते हैं, चितना की सुगंध किधर से भी आती है उनको, तो वो खिच
00:10:45तो एक फुटी मुटी भीड सी वहाँ एक अत्रित हो गई थी, यद्य पर जब कोई चैतन्य होकर सुनने आये, तो उसको भीड कहना नहीं चाहिए, पर फिर भी, और उनमें से अधिकतर लोग मुझे लगता है, शायद मुझे पहली बार देख रहे हूँ, और कुछ तो एक
00:11:15कर रही हो, लेकिन न सिर्फ उन्होंने ध्यान से सुना, अनुमति लेकर पास भी आये, और प्रश्न भी पूछे, तो ये बात हृदैस परशी थी, और आप सब को मेरा धन्यवाद और आयोजकों को आभार मुझे आमंत्रित करने के लिए, और मैं आशा करता हूँ,
00:11:44कल का सत्र था आज का है, अभी एक दो दिन और मैं आपके बीच रहूँगा, आपसे अधिक से अधिक हार्दिक बात हो पाएगी, आप कल भी आये थे, हजार से अधिक संख्या में उपलब्द थे, उपस्थित थे, आज भी आप हैं, मैं चाहूँगा कि हम समय का जो अधिक
00:12:14अपने मूल बेशे पराते हैं, भारती, दर्शन, परंपरा और युवा, मेरी दरिश्टी में आपकी जो अपनी जीवन यात्रा अब तकी है, उसमें इन तीनों का समुच्य दिखाई देता है, आपने युवा वस्था में ही आपने जीवन के बड़े निरड़ाई की, जिस
00:12:44सब कुछ था और दूसरी तरफ दर्शन, ग्यान और प्रग्याति, वर्तमान का युवा जिन लोगों के बीच आप जाते हैं, वो कहीं ने कहीं इनके बीच जूल रहा होता है, एक तरफ उसके पास परंपरा की ठाती होती है, और दूसरी तरफ आगे बढ़ने का कर्शन होत
00:13:14उसकी तरफ उसका आकर्शन होता है, मेरा प्रस्म ये है कि आपकी जो अपनी प्रिस्थ भूमेशिक्षा और आपका जो वज्यानिक दृष्ट को रहा है, और जो भारतिय दर्शन, वेदान्त, द्वैत को समझने कि जो आपकी दृष्ट रही है, इन दोनों के बीच आपने
00:13:44करेंगे और दूसरा उस युवा की बात करेंगे जो आज उन्चो नोटियों से दो चार हो रहा है, देखिए, दो तीन बाते होती है, आप दुनिया को देख रहे होते हैं, और समझने का प्रयास कर रहे होते हैं, आप युवा हैं, आप अठारा साल, बीस साल, याप अच्�
00:14:14और अभी आप ज्ञान अरजित करने की प्रक्रिया में ही हैं, आप समझने चाह रहे हैं कि दुनिया चलती कैसे, इसका इतिहास क्या रहा है, आर्थिक विवस्थाएं क्या है, सम्विधान क्या है, राजनैतिक संस्थाएं कौन सी, आप ये सब जान रहे हैं, तो ये आप ज
00:14:44आप जहां खड़े हुए हैं, आपके अपनी इस्थिति क्या है, तो ये दो बाते हो गई, एक हो गया बाहर का तथ्य, और एक हो गया अपना तथ्य, और इन दोनों से अलग, और इन दोनों के ही कभी काबू में ना आने वाली बात होती है, एक दूर का सितारा, जैसे ध्रू�
00:15:14जिससे हर युवा के हृदय में प्रेम होता है, सत्य है वो, जो तथ्यों की बहुत परवाह नहीं करता, न वो इस बात की बहुत परवाह करता है कि दुनिया बड़ी संपन्न हो गई है, पैसा ही पैसा बिखरा हुआ है, न वो इस बात की परवाह करता है कि हम जिस परंपरा
00:15:44कि हमारे माबाप हमसे किस तरह की उमीदें रखते हैं न वो बाहरी तथ्थे को बहुत मोल देता है न भीतरी तथ्थे को
00:15:52अब यह फैसला आपको करना होता है कि आप इस त्रिकोंड में किसको चुनेंगे किसी भी त्रिकोंड की तरह है
00:16:05इसमें दो बिंदु तो होते हैं जो जमीनी होते हैं और एक होता है जो आस्मानी ठीक है आप चुन सकते हो कि मेरी प्रथा परंपरा क्या रही है या मेरी व्यक्तिकत कामनाएं क्या रही है या वो सब क्या जिसको मैं अपनी व्यक्तिकत जिम्मेदारी मानता हूं कि वहा होने क
00:16:35आप कह सकते हो मैं देख रहा हूं कि बाहर अर्थ व्यवस्था के फलाने ख्षेतर में फलाने सेक्टर में आने वाले समय में ज्यादा अवसर होंगे तो मैं जा रहा हूं उस ख्षेतर में MBA करने
00:16:46आप ये कर सकते हो
00:16:48या आप चुन सकते हो
00:16:50कि वो कोई है जो पुकार रहा है
00:16:53और वो कह रहा है कि पैदा हुए हो
00:16:56जितने भी बंधन है
00:16:58चाहे भीतर के चाहे बाहर के उनको तोड़ने के लिए
00:17:01हाँ, इतनी ताकत तुम में नहीं है
00:17:04कि उन बंधनों को एक जटके में एक साथ तोड़ दो
00:17:08क्योंकि उन बंधनों का स्वरूप अभी तुम ठीक ठीक पहचानते भी नहीं हो
00:17:12पर इतना तो कर सकते हो न
00:17:14कि बंधनों को हार न मान लो
00:17:17बंधनों को आभूशना न समझ लो
00:17:20इतना तो कर सकते हैं और जितना समझ में आता जाए कि फलानी चीज हम पकड़के बैठे हैं
00:17:25है ये हद कड़ी ही कम से कम उस हद तक तो उसको तोड़ते चलो
00:17:29तो ऐसे करते हुए मेरी यात्रा आगे बढ़ी
00:17:33भीतर के तथे उपलब्ध थे और तथे तो तथे होते हैं
00:17:38और बाहर के भी तथे उपलब्ध थे और कोई तरीका नहीं था
00:17:43कि एक जटके में जिस हालत में हूँ उससे आजाद हो सकूँ
00:17:49तो शने शने कदम दर कदम जितने भी प्रलोभन हो सकते थे
00:17:58जितनी भी पुरानी प्रथाएं हो सकती थी
00:18:02किसी को चनौती दी, किसी को लांगा, किसी को तोड़ा, किसी के नीचे से निकल गया
00:18:08किसी के उपर से फांद गया, ऐसे करते हुए आगे बढ़ता रहा
00:18:13और अभी भी वही कर रहा हूँ
00:18:17मैं नहीं कह सकता कि जो कुछ था उसको लांग गया हूँ
00:18:20बहुत कुछ है जो अभी बाकी है, बहुत बंधन है, जो शेश है, धीरे-धीरे मैं प्रयास कर रहा हूँ कि उनको लांगता चलूँ, ये आप लोगों ने भी जो मेरा स्वागत किया और मैं बहुत विनमरता से उसको स्वीकार करता हूँ, वास्ताव में आप मेरा स्वागत �
00:18:50संभावना की अनुगूँज पहुचती है न, आप उसका सम्मान कर रहे थे, एक काम करा है मैंने अपनी जिंदगी में, कि किसी भी बिंदु पर, किसी भी तल पर थमकर नहीं बैठ जाना है, कि हो गया, यही आखिरी है, अब रुक जाओ, सेटल हो जाओ, वो नहीं करना है,
00:19:20वही मेरा आपके लिए भी संदेश है, और आपके लिए उसंदेश और प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि जब आप आपकी उमर में होते हैं, आप में से अधिकांश लोग मुझे 35-40 से नीचे के ही दिख रहे हैं, तो भीतरी बाहरी प्रिकोण का जो आधार है, उसके दोनो
00:19:50और फिर जीवन को भोगना शुरू कर दो, वो कभी मत करिएगा, जीवन किसी भी तल पर रुकने के लिए नहीं है, चरौती देते रहिए, आगे बढ़ते रहिए, इस यातरा की कोई मन्जिल नहीं है, आगे बढ़ना ही लगातार मुक्ति है, बस यही है
00:20:09आचारी जी मेरा अगला प्रस्णी यह है कि अगर आज की व्यक्ति को यह तैं करना हो, कि वह भारतिय दर्शन में किस बात को चुने, अपने आपको, यानि मैं कौन हूँ, उसकी तलास करे,
00:20:33अपने परिवार की और उनमुक हो, और सामाजिक बंधनों को देखे, या इस बात को चुनना हो, कि समाज को परिवर्तित कैसे करे, तो उसे किस बिंदु को चुनना चाहिए?
00:20:51कि वही बिंदु जो आधार भूत है, समाज को अगर मैं चुनू भी, तो समाज मैंने और मेरे जैसों नहीं बनाया है, यह समाज मेरे ही लिये है,
00:21:07मैं ही इस समाज का दृष्टा भी हूँ, सचन करता भी हूँ
00:21:11और मैं ही हूँ जो इस समाज की रवायतों को बनाता बिगाडता भी रहता है
00:21:17तो समाज को भी अगर मुझे सुधारना है तो मैं की तरफ तो आना पड़ेगा
00:21:22दूसरा आपने कहा कि अपनी कामनाओं को देखूं तो कामनाओं भी तो मेरी ही है
00:21:29अपनी परंपराओं को देखूं तो वो परंपराएं भी तो मेरी ही है
00:21:33तो ले दे करके अपने आपको देखने के अलावा दर्शन में कोई विकल्प होता ही नहीं है
00:21:40क्योंकि दर्शन सत्य की तलाश है
00:21:44जूट तो नंगी आँखों से भी दिख जाता है
00:21:50जूट के लिए तो आँखें खोले रखना भी ज़रूरी नहीं
00:21:53आँख भी बंद करो तो भी कुछ न कुछ दिखी रहा होता है
00:21:56जूट के लिए तो दर्शन चाहिए ही नहीं
00:21:58दर्शन माने सत्य और सत्य क्या है क्या नहीं उसका असर मुझे पर पढ़ना है जूट में फसूँ तो दुख मुझे जेलना है तो मैं ही जाकरके कभी कभार बलकि अकसर बलकि लगभग हमेशा जूट कोई सच बोलाता हूं दर्शन
00:22:22यदि सत्य की तलाश है
00:22:24तो मैं ही तो वो हूँ न
00:22:26जिसने जूट को ही
00:22:28सत्य घोशित कर रखा है
00:22:30तो सत्य को तलाश हूँ
00:22:32या अपने आपको
00:22:34तराश हूँ
00:22:35अगर मैं ही जूट
00:22:38में डूबा हुआ हूँ और मैं कहूँ
00:22:40कि मैं बाहर सत्य की तलाश करने निकला हूँ
00:22:42तो मुझे पता भी कैसे चलेगा
00:22:44कि मैंने जिसको सत्य घोशित कर दिया
00:22:47वो सत्य है
00:22:48या मेरा ही कोई जूट
00:22:50जिसको मैं सच बोल करके पूज रहा हूँ
00:22:52तो दर्शन में
00:22:55आत्म अनुसंधान का
00:22:56कोई विकल्प नहीं है
00:22:57आत्म ज्यान
00:23:00दर्शन
00:23:01की मंजिल है और आत्म
00:23:04अवलोकन उसकी विधी है
00:23:05इसके अलावा बाकी सब
00:23:08जो किया जा रहा है वो
00:23:09वो एक अच्छी जिग्यासा हो सकती है
00:23:12वो समाज शास्त्र
00:23:13या मनो विज्यान
00:23:15में किया गया शोध हो सकता है
00:23:26चाहता था और
00:23:27सन्योग ये कि आपने उत्तर में
00:23:30उन दोनों प्रस्नों को
00:23:31समाहित कर लिया तो मैं इस बात पर हसा
00:23:34था कि मेरे अगले प्रस्न
00:23:36के लिए मुझे कुछ और
00:23:38सोचना पड़ेगा और मैं ये जानना
00:23:40चाहता हूँ कि जो दुनिया
00:23:42भर में दर्शनिक
00:23:56इस बात को मैं घुमा
00:23:58कर प्रस्न करूँ की
00:23:59इस समाहित दुनिया की सबसे बड़ी
00:24:02चुनोती क्या है
00:24:03आपकी दरिस्टी में
00:24:06वह क्या है
00:24:08देखिए
00:24:11विवाद
00:24:13माननेताओं के बीच होते हैं
00:24:16उुर्वा ग्रहों के बीच होते हैं
00:24:18कामनाओं और स्वार्थों के बीच होते हैं
00:24:24सत्य और सत्य में तो कोई विवाद हो नहीं सकता ना
00:24:27तो जब भी कभी धर्म का आधार मान्यता बनेगी परमपरा बनेगी तो विवाद होकर रहेगा
00:24:42उनको धार्मिक विवाद कहा भी नहीं जाना चाहिए। वास्तों में धर्म के नाम पर अगर विवाद हो रहा है तो ये सारे विवाद अधार्मिक हैं।
00:25:12कुछ करने कुछ न करने का कुछ नियम कुछ अनुशासन जिसका वह उलंगन नहीं कर सकता। और दूसरे व्यक्ति ने उससे विपरीत मानने था उससे विपरीत कहानी कुछ पकड़ रखी है।
00:25:29अब एक कहानी और दूसरी कहानी कभी मेल खाएं कैसे आप ये बताइए।
00:25:36और कहानीों में कोई समस्या नहीं है, बोध कथाएं बड़ी अच्छी होती है।
00:25:41धर्म अध्यात्म के क्षेत्र में बोध कथाओं का बड़ा महत्तो रहता है कहानी सुना करके कोई उची बात समझा जाती है।
00:25:49तो कहानी से अगर आपको बोध पराप्त करना हो तो ठीक है, पर आप कहानी को ही सत्य घोशित कर दें, तो बड़ी गड़बड हो जाती है।
00:25:58आप मिथ को इतिहाज घोशित करने लग जाए, तो अब तो स्ट्राइफ होगी, अब कन्फिक्ट होगी, अब दुवन्द होगा।
00:26:09इन्होंने कह दिया कि सहब चार आसमान होते हैं और यह कह रहे हैं नहीं, दो ही आसमान होते हैं।
00:26:16इन्होंने कह दिया हमारी हूरे हैं उनका रंग हरा होता है इन्होंने का नहीं उनका जो रंग है वो सफेध होता है कपड़ों का रंग या कुछ भी
00:26:27और इस बात को सत्य कहा जा रहा है कि ऐसा तो है ही ये कह रहे हैं कि आप जब चलना शुरू करें तो पहले बाया कदम आगे बढ़ाएं ये कह रहे हैं कि पहले दाया कदम आगे बढ़ाएं वो कह रहा है तुमारी टांक काड़ दूँगा अगर तुनने दाया कदम आगे बढ
00:26:57धर्म के शेत्र में बड़ी गड़वड हो गई है
00:26:59हमें धर्म के
00:27:01नाम पर किसे कहानियां
00:27:04दे दिये गए हैं, नियम काइदे दे दिये गए हैं
00:27:06कर्मकांड दे दिये गए हैं
00:27:08जीवन
00:27:10की एक बंधी-बंधाई
00:27:11पद्धत ही दे दी गई है कि अगर
00:27:13तुम जैन हो, बौध हो, हिंदू हो, मुसल्मान हो, पार्सी हो, इसाई हो, तो तुम्हें ऐसे जीना है, तुम्हें ऐसे जीना है, तुम्हें इस गली में चलना है, तुम्हें इस गली में चलना है, ये सब दे दिया गया है, लेकिन धर्म दर्शन से उठता है सदा, और धर्म
00:27:43कहते हैं हमारा धर्म वैदिक है वैदिक है और यहां पर बात बिल्कुल स्पष्ठ हो जाती है कि इस वैदिक धर्म के पीछे दर्शन क्या होगा वेदों का शिखर और वेदों का दर्शन है वेदांत तो अब यहां समीकरण विल्कुल पराबर हो जाता है कि सनातन धर्म है वै
00:28:13वेदों का ही हिस्सा है और वेदों को ही सनातनी कहता है कि हमारे पवितर गरंथ है तो ठीक है तुम्हारे पवितर गरंथ है तो उन्हीं गरंथों में तुम्हारा दर्शन भी उल्लिखित है और वो दर्शन धर्म का अधार है वेदान्त नहीं तो वेद अपनी धार खो देते ह
00:28:43करके अपनी निश्पति पा लेते हैं वेद भी जैसे वेदांत की प्रतीक्षा करते हैं कि आए और हमें पूर्णता दे तो आप दुनिया भर में कहीं भी सड़क पर चलते आम आदमी से पूछी कि तुम्हारा धर्म किन दार्शनिक सिध्धानतों पर खड़ा हुआ है तो अ�
00:29:13अब इस कारण दुनिया भर के सारे विवाद होते हैं और द्वन्ध होते हैं दर्शन तो आपस में बाचीत कर सकते हैं क्योंकि दर्शन में एक प्रमुख तत्व होता है ज्ञानमी मानसा अपिस्टेमोलोजी आप कोई दर्शन लेकर के आएंगे आप सांख लेयाए मैं यो
00:29:43वो पूरवाग्रह से निकल के अगर आएगी तो हमने पहले ही आपस में ये निर्णा कर लिया है ये समझा था ये करार कर लिया है कि भाई देखो हम आप बात करने बैठे हैं लेकिन पूरवाग्रह ना आपका चलेगा ना हमारा चलेगा आप जो भी बात यहां सामने मेज �
00:30:13अनुमान को भी हम प्रमान बोल देते हैं
00:30:15तो अलग-अलग दर्शन, अलग-अलग तरे के प्रमानों को स्विक्रति देते हैं
00:30:19लेकिन क्या प्रमान हो सकता है
00:30:22इस पर भी बाकाइदा चर्चा हो सकती है
00:30:24जिसे कहिए शास्त्रार्त हो सकता है
00:30:26लडाई नहीं होगी
00:30:28लडाई तो सिर्फ होती है जब ऐसा है हम ऐसा मानते हैं जी हम ऐसा मानते हैं जी यही धर्म है
00:30:35belief systems लड़ते हैं आपस में और सिर्फ लड़ते नहीं है
00:30:40अफसोस की बात है कि उन्हें लड़ना पड़ेगा
00:30:45क्योंकि एक धारणा एक माननता आप कितनी भी कोशिश कर लीजिए
00:30:53आप कह दीजिए सर्वधर्म संभाव लेकिन एक धारणा कभी दूसरी धारणा
00:30:59से मेल कैसे खाएगी हाँ आप यह कर सकते हैं कि किसी तरीके से बरदाश्ट कर लें
00:31:05और इसी लिए फिर हम बात करते हैं रिलीजियस टॉलरेंस की बरदाश्ट तो उसी को किया जाता है जो चुब रहा हो जब हम कहते हैं कि किसी को बरदाश्ट करना है तो यह तो अपने आप में हिंसा हो गई आपको अच्छा लगए मैं कहूं कि मैं आपको बरदाश्ट कर र
00:31:35करते हैं बरदाश्ट करने की जरूरत क्या है आओ बात करते हैं जब बात कर सकते हैं तो बरदाश्ट क्यों करें हाँ
00:31:45कि बात्चीत का हमारा परस्पर आधार यह होना चाहिए कि तुम भी हवा हवाई बात नहीं करोगे और हम भी हवा हवाई बात नहीं करेंगे
00:31:54भारती दर्शन का मूल तत्व क्या है आपने बेदान्त की बात किई
00:32:05युवाओं के लिए मुझे ऐसा आभास होता है हलाकि आपसे मेरा अनुवह इतर होगा
00:32:14क्योंकि आप भारत के वेस्ट ब्रेंस के बीच जा रहे हैं
00:32:20और मैं हर तरह के युवाओं के बीच हूँ तो मुझे लगता है कि दर्शन नाम सुनते ही
00:32:27युवाओं को बड़ी असाहजता होती है परंपरा से भी कोई बहुत आज का युवा प्रें नहीं करना चाहता
00:32:36कहीं ने कहीं किसी भी उम्र में उसे ये लगता है कि उससे पहले की जो पीड़ी है वो थोड़ी कम जानकार है
00:32:47तो ये जो बोध है जबकि सच बात यह है जहां से हमने अपनी बात्चित की सुरुवाद की थी
00:32:55संकट उस युवा के सामने है लेकिन वो एक तरह से दर्शन समझना नहीं चाहता
00:33:04धर्म उसके लिए दुरू है परंपरा का बोज़ हो डोना नहीं चाहता
00:33:08और प्राप्ति की जो उसकी आकांचा और तलास उसे ये पता ही नहीं है कि उसे क्या पाना चाहिए
00:33:15मैं ये इस प्रस्ण का उत्तर जो भारतिय दर्शन का मूल संदेश और जिस वेदान की आप बात कर रहे हैं
00:33:24जहां वेद भी अपनी इनिस्पक्ती प्राप्त कर लेते हैं वह क्या है और युवाओं के बीच कैसे उत्रे उसे युवा कैसे आत्मसाध करे उसका आकरसन कैसे बड़े
00:33:37कैसे वो आग रही हो कि नहीं मुझे
00:33:40सारी बातों के बीच इन बातों को भी जानना चाहिए
00:33:43और इन्हें ले कर चलना चाहिए
00:33:45बहुत सुन्दर प्रशन है
00:33:48देखिए आपने मुख्यता जो दो बाते कहीं
00:33:53युवाओं के विशह में कि
00:33:55दर्शन से थोड़ा बच कर चलते हैं
00:33:58और परंपरा का पालन नहीं करना चाहते
00:34:02दीरी दीरे ठुकरा रहे हैं परंपरा को
00:34:04मेरे देखिए ऐसा है नहीं
00:34:08लिव लाइफ किंग साइज
00:34:14इनके इंस्टाग्राम हैंडल पर लिखा हुआ है
00:34:17ये दर्शन नहीं है तो क्या है
00:34:20ये थोड़ा सा घटिया दर्शन हो सकता है
00:34:26पर है तो दर्शन ही
00:34:27वहाँ उन्होंने लिख रखा था
00:34:33उन्होंने कोई रील बनाई और उसमें आकर के
00:34:35बोल रहे हैं लव मेक्स लाइफ लिव
00:34:37ये दर्शन नहीं है तो क्या है
00:34:39कोई पीछे से आकर के अपना उनका कहना ये है कि भगवान सब समाल लेगा ये दर्शन नहीं है तो क्या है
00:34:52वो वहाँ पर कह रहे हैं कि भला कर भला होगा और बुराई के बदले बुरा मिलेगा ये दर्शन नहीं है तो क्या है
00:35:04बस ये अप्र परिक्षित दर्शन है अन इग्जामिन्ड फिलोसफी है ये वो दर्शन है जो दर्शन एक को पता भी नहीं है कि उसने पा कहां से लिया
00:35:22ये वो दर्शन है जो हवाओं से हम उठा लेते हैं तुम लड़की हो घर को बचा कर चलना तुम्हारा काम है तुम घर की जान हो पती की सिवा करो बचों को पालो पोसो और घर को एक जूट करके चलो क्या इसमें दर्शन नहीं है
00:35:52पर आपको कैसे पता कि ये आपने कहां से उठा लिया आपको पता नहीं है देखिए कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है मेरे देखे हो दार्शन एक प्राणी है
00:36:10मनुष्य बिना दर्शन के रह नहीं सकता बस ये है कि अच्छा दर्शन नहीं है हमारे पास यहां एक विकते ऐसा नहीं है जो फिलोसोफर नहीं है
00:36:24सब कोई अपने खेट से उठता फिलोसोफर है कोई गली महले से उठ रहा है
00:36:33स्कूल कॉलेज के फिलोसोफर है
00:36:36चौरहें पर फिलोसोफर है
00:36:38नुकड पर फिलोसोफर है
00:36:39चाय के अड़ों पर फिलोसोफर है
00:36:41बातरूम में फिलोसोफर है
00:36:42इंस्टाग्राम में फिलोसोफर है
00:36:44उस स्तर की फिलोसोफी चल रही है
00:36:47समस्या यह नहीं है कि फिलोसफी नहीं है
00:36:49समस्या यह है कि फिलोसफी में स्तर नहीं है
00:36:52मेरा काम किसी को फिलोसफर बनाना नहीं है
00:37:03मेरा काम है उनसे कहना कि फिलोसफर तो तुम होई
00:37:06चेतना को प्यार होता है सत्य से
00:37:12आप से कोई जूट बोले आपको कैसा लगता है
00:37:16बुरा लगता है न
00:37:17तो जो मनुश्य की छेतना है
00:37:19ये सच से प्यार करती है
00:37:22और फिलोसोफी शब्द का भी
00:37:25बिल्कुल यही अर्थ है
00:37:26सच से प्रेम
00:37:28सच से प्रेम
00:37:31ये जो
00:37:33पी एच आई लो ओ है
00:37:35इसका अर्थ ही है आकर्शन
00:37:37दूसरे शब्दों में प्रेम
00:37:39सच से प्रेम
00:37:42और हम कहा रहे हैं मनुष्य की चेतना तो सच से प्रेम करती ही है
00:37:45तो माने हर मनुष्य है ही फिलोसफर
00:37:48तो मेरा काम नहीं है इनको फिलोसफर बनाना ही पहले से हैं
00:37:51मेरा काम है जो फिलोसफी है सबकी
00:37:55उसको एक उठा हुआ दर्जा देना
00:37:58तुम कैसे करता हूँ, मैं कहता हूँ तुम अपनी बताओ फिलोसफी और मैं प्रतिप्रश्ण करूँगा
00:38:04तुमने जो भी एक दिमागी मॉडल बना रखा है उसमें जब जो छेद हैं और विसंगतियां हैं मैं उनकी और इशारा करूँगा
00:38:16तो इनसान हो और सच ना मांगे, इनसान हो और विचार ना करे, ये संभव नहीं है
00:38:26दिक्कत बस ये होती है कि इनसान विचार के किसी निचले तल पर अटक जाता है उसी तल को सच मान करके
00:38:35तब उसको क्या ऐसे की जरूरत होती है
00:38:38जो उसके सच को जूट सावित कर दे
00:38:41वो काम मैं विनमरता से करने की कोशिश कर रहा हूँ
00:38:45मेरे सामने जो कोई अपना सच लेकर आता है
00:38:48मैं कहता हूँ यह सच नहीं है तुम्हारा सच है
00:38:50यह टृथ नहीं है योर टृथ है
00:38:52और योर टृथ
00:38:54माइट एक्चुली बी वेरी फार फ्रॉम दे टृथ
00:38:57हाँ, कैन भी डिस्कुस देट
00:38:58यह मेरा काम है
00:39:00तो दारशनिक तो अब है
00:39:02अब दूसरी बात आपने परंपरा की कही
00:39:04परंपरा का पालन युवा कैसे नहीं कर रहे है
00:39:08मैं तो प्रशन करता हूँ
00:39:09इनसे मैं पूछता हूँ
00:39:10तुम बताओ अपनी जिंदगी में
00:39:12कोई काम
00:39:14जो मौलिक रूप से
00:39:16उस काम से भिन हो जो तुमारे दादा पर दादा
00:39:18या दादी पर दादी भी कर रहे थे
00:39:20तुम पूरे परंपरावादी हो
00:39:22तुमारे कपड़े बदल गए है बस
00:39:24तुमारे कपड़े बदल गए है
00:39:27भाशा बदल गई है
00:39:28इंटरनेट आ गया है
00:39:29AI आ गया है
00:39:29ये सब बदल गया है
00:39:30पर मूल रूप से
00:39:33जो मनुष्य की आदेम वृत्तियां है
00:39:36तुम उन्हीं का पालन कर रहे हो
00:39:38तो परंपरा तो चली रही है
00:39:39वही नर का नारी के पीछे दोड़ना
00:39:43वही नारी का एक तरीके से
00:39:46व्यवहार करना प्रतिक्रिया करना
00:39:48वही पैसे की भूक
00:39:49वही घोसला बनाने की इच्छा
00:39:52मेरा भी अपना घर होना चाहिए
00:39:53वही जमीन जायजाद के लपड़े पचड़े
00:39:56ये सब काम तो सदा से चलता आया है ना
00:39:59परंपरा में और तुम भी वही कर रहे हो
00:40:02बस वो अलग तरीके से पैसा बनाने की सोचते थे
00:40:04तुम अलग तरीके से पैसा बनाने की सोचते हो
00:40:07उन्हें भी प्रभूत तो चाहिए था येश चाहिए था तुम influencer बनने की सोचते हो
00:40:11उन्हें भी होता था कि किसी तरह हमारा नाम येश कीरती बढ़ जाए
00:40:15तुम भी कहते हो हमारी reach कितनी है हमारे followers कितने हो गए
00:40:19वो भी गिनते थे कि हम सड़क पर चलते हैं तो हमें कितने लोग नमस्कार करते हैं
00:40:24तुम गिनते हो तुम्हें like कितने आ गए तुम्हारे post पर
00:40:28तो बदल क्या गया है परंपरा तो चल ही रही है
00:40:31जिन बातों से वो डरते थे उन्ही बातों से तुम भी डरते हो
00:40:36जिस अज्ञान में वो फसे हुए थे आज से 100, 500, 5000 साल पहले वाले उन्हीं अज्ञान में हम भी फसे हुए है
00:40:43तो अज्ञान की जो धारा है वो परंपरा बन करके तो बही रही है मनुष्य की अहम वृत्ति के रूप में
00:40:51तो सब परंपरवादी है
00:40:52परंपरा का उलंगन करना तो किसी बिरले की बात होती है
00:40:57इतना असान नहीं होता कि आज के युवाँ है तो परंपरा नहीं मनते है इतना नहीं आसान होता
00:41:01आप अपने ब्ल्यक्यानों में और संबाद में
00:41:14सत्यनिष्ठ आध्यात्म भग्यानिक दुरिष्टिकूण और तर्क की बात करते हैं और आपका मानना है कि यवाओं को इस कप आलन करना चाहिए अपने जीमन में
00:41:34अगर मैं पूछूँ आचारे प्रसांत से कि उनके स्वैंग के लिए सत्यनिष्ठ आध्यात्म तर्क और वग्यानिक दृष्टि उनकी निजर में क्या है तो उनका उत्तर क्या होगा
00:41:53दो ही जगहें हैं जहां जूट पाला जा सकता है एक तो ये के ये सामने खड़े हुए हैं उन्हें उन्हें काले रंग की जैकेट पहनी हुई है और मैं कह दूँ काला नहीं साहब पीला है तो एक ये भारी जगह हो गई बाहर मुझ से जहां मैं कह सकता हूं कि जूट का अस
00:42:23और उस बाहरी जगह से ज्यादा खतरनाक जगह जहाँ जूट पाला जा सकता है वो भीतर है।
00:42:31मैं अपने आपको घोशित किये हुए हूँ कि मैं तो बहुत निर्भीक हूँ।
00:42:38मैं बहुत करुण हूँ, बहुत प्रेमपूर्ण हूँ, बहुत निस्वारत हूँ।
00:42:42और हूँ मैं एक नंबर का स्वारती, शुद्र, कामी इनसान इन दो जगहों पर वो जो बाहर का जूट है, उसको हटाने का काम विज्ञान करता है।
00:42:55लेकिन विज्ञान के पास भी आपको जाना पड़ेगा।
00:42:59अन्यथा, आप बहुत मजे में अपनी कलपनाएं, अपनी माननेताएं पाले बैठे रह सकते हैं, आप बिलकुल कह सकते हैं कि ताब आसमान का रंग नीला इसलिए है, क्योंकि एक परी है, उसने बड़ा अपना लंबा चोड़ा दुपट्टा जो है, वो फैला रखा है, औ
00:43:29कर विज्ञान की किताब पढ़ूंगा ही नहीं, क्योंकि मैं अपना बाहरी भरम यथावत रखना चाहता हूं, और अपने भीतर क्या चल रहा है, ये तो विज्ञान भी न बतावाए, ये तो खुद को ही मानना पड़ता है, ये और कठिन पड़ता है, सत्यनिष्ट अध्य
00:43:59विज्ञान और तमाम जो शोध के क्षेत्र हैं, उनके निकट जाओंगा, कुछ भी बस यूही मान नहीं लूँगा, कि साब किसी ने कहा कि चीन की आवादी कितनी है, किसी ने आगर कि कहा 160 करो, हमने कहां ठीक है, अरे भई तुम्हारे पास साधन उपलब्ध हैं, जा करके
00:44:29आपसे बात इसलिए करने आया हूँ, ताकि हम जरा परस पर विमर्ष करके एक दूसरे के मन को शुद्ध कर सकें, और भीतर मैंने ये पाल रखा है, कि मैं हाँ आउंगा, तो कुछ यश कमाऊं, कुछ पैसा कमाऊं, कुछ और करूं, राजनीती में प्रवेश कर जाऊं, य
00:44:59है कि मैं बहुत अच्छा आदमी हूँ, वो अपने सारे इरादे भीतर रखते हुए भी मैंने स्वयम को आश्वस्त कर रखा है, कि आदमी तो मैं साधू हूँ, यहां कोई विज्ञान आपकी मदद नहीं कर सकता, यहां तो आत्म अवलोका नहीं करना पड़ता है, सत्यनि�
00:45:29करूँगा, समरपन जरूरी है, जो दिख गया उसके सामने सर जुका दूँगा, तथ्यों से फाल्तू बहस नहीं करूँगा, लड़ूँगा जगड़ूँगा नहीं, जब तक बात पता नहीं चली है, जुकूँगा नहीं, और जब बात पश्ट दिख गई है, उसके बा�
00:45:59लगातार पाठिक्रम आप संचालित कर रहे हैं, और आपकी लगातार इस बात की कोशिश है कि युवाओं के बीच यह लुक प्री हो वो जाने, मैं ये मेरा प्रस्ण ये है कि अगर मैं सार संचेप में पूछूं कि आज का युवा, उन पाठिक्रमों के मूल तत्व को कैस
00:46:29हो तो क्या कहेंगे?
00:46:30नहीं, देखिए, आकरशन जरूरी नहीं है, विकरशन जरूरी है, जब तक मैं माने बैठा हूँ कि जैसा मैं हूँ, मैं ठीक हूँ,
00:46:46मुझे सिर्फ मेरी ही चाया, मेरा ही प्रतिबिम बाकरशित करेगा, क्योंकि मैं ठीक हूँ, मैं ही सुंदर हूँ, मैं ही बढ़िया हूँ, तो जो मेरी इच्छा है, विचार है, कामना है, वही ठीक है, विकरशन होना चाहिए, अपनी बुरी हालत साफ दिखनी चाहिए, मै
00:47:16विकर्षण जरूरी है विकर्षण नहीं होता है इसलिए चाहे भगवद गीता उपनिशद हो दुनिया भर के तमाम बोध ग्रंत हैं वो विफल चले जाते हैं क्यों चले जाते हैं
00:47:27मैं यहां बैठा हुआ हूँ आत्म विश्वास से भरा हूँ आत्म संतुष्ट मैं कह रहा हूँ मैं जिन्दगी में बहुत बढ़ियां आदमी हूँ सफल आदमी हूँ सब हासिल कर रखा है समाज में इजजत है मेरे पास बैंक में पैसा है मेरे पास मैं बहुत अच्छा आद
00:47:57आएगा मुझे बताई है क्यों आएगा यह नहीं आएगा यह आएगा पर तो खाना पूर्थी करने आएगा यह आएगा है यह उपनिशाथ है दिखाओ हाँ दो-चार पन्ने पल्टेगा जम्हाई मारेगा भाग जाएगा जादातर लोगों का यही चला है इसलिए तो आप �
00:48:27आप किसी दिशाद चला जाएं लोगों को नहीं पता होगा क्यों नहीं पता होता क्योंकि हमें लग रहा होता है कि हमारा हिसाब किताब जैसा चल रहा है उसमें थोड़ी बहुत कुछ खोट हो सकती है पर मूलत वो ठीक ही है हमारे जीवन का आधार ठीक है हाँ इमारत में �
00:48:57जी ही गलत बुनियाद पर रहा हूं कि मेरे एक दो फैसले गलत नहीं हो गए, मेरे सब फैसलों का आधार ही गलत है, मेरे कर्म उल्टे नहीं पड़ गए, मुझसे अनायास कुछ गलतियां नहीं हो गई, करता जो भीतर बैता है, the doer, वो doer ही false है, वो doer ही जूटा है, जब य
00:49:27तो वो चाहिए, और आज का जो यूग है, वो आपको अच्छा अनुभव करने के, feel good करने के, इतने साधान और इतने मुरूरंजन देता है, कि आपकी हालत कितनी भी खराब हो, आपको फिर भी ऐसा लगता है, मेरी जिन्दगी तो ठीक ही चल रही है, कितनी भी हालत खराब
00:49:57वो जो टोटल डिसिलूजन मेंट है न, वो किसी वास्तविक शुरुवार्प के लिए बहुत आवश्यक है, आचाहरे जीब, एक प्रस्न जो हमारे मैं संबाद से थोड़ा सा हीतर है, वरतमान में हम जहां भी जाते हैं, बहुत सारे मठ, धार्मिक गुरू, अध्यात्मिक
00:50:27इंदू वंगमे में जितनी भी मध्यम हैं, जहां आपने एक प्रस्न के उत्तर में वियह बाद कही थी, कि जितनी भी हमारे बेदांग और दर्शन के जितनी भी हमारे पत्व हैं, इन सब के नाम पर बहुत सारे लोग एक तरह से, अपनी तरह से प्रयास करने की कोशिस कर र
00:50:57वो एक बड़ी बाजार के रूप में परिवर्थित हो चुका है
00:51:02ऐसी इस्तिती में आप क्या देखते हैं कि आज का युवा
00:51:07या आज के लोग उसमें सचे प्रशिक्षक को
00:51:14सचे धर्मगुरु को या सचे शिक्षक को कैसे चुनेंगे
00:51:23और ये बाजार के रूप में परिवर्थित हो रहा है ये सही है या गलत है
00:51:28ये बाजार के रूप में सदा से रहा है
00:51:31बस आज साधन आ गए हैं उस बाजार के आकार के बढ़ने के
00:51:37एक तो दुनिया के अर्थवस्ता ही बहुत बड़ी हो गई है इतिहास में इतनी बड़ी कभी रही नहीं
00:51:41और दूसरा संचार के समवात के माध्यम बहुत बढ़ गए है तो वो जो बाजार है उसका आकार बढ़ गया है
00:51:48मार्केट साइज बढ़ गया है वरना बाजार हमेशा से था धर्म के नाम पर लूट हमेशा से मची है
00:51:53आपने पूछा कैसे पैचाने कि सच्चा शिक्षक ठीक है कि नहीं क्या से जाएं उसके पास ज़रूरत ही नहीं है
00:52:01मुझे अपनी बीमारी नहीं पता
00:52:03मुझे डॉक्टर क्या पता
00:52:07पहले मैं क्या जानू
00:52:11देखिए शरीर की बीमारी जुटला ही नहीं जा सकती क्योंकि तथ्थे होती है भौतिक स्थूल तथे होती है
00:52:18आपके यहां जांग में इतना बड़ा पोड़ा निकला है आप जुटला नहीं पाओगे दिख रहा है
00:52:23ठीक है आप जुटला होगे कोई और पूछेगा कि यह क्या हो गया
00:52:26पर भीतरी बीमारी अंतह करण का रोग हम दबाए रहते हैं
00:52:32हम उसको मानते ही नहीं
00:52:34तो हमें अपनी बीमारी का ही पता नहीं होता हम नहीं स्विकार करना चाहते कि हम भीतर से बहुत बहुत रोगी है जिसको अपनी बीमारी का पता होगा वो किसी घटिया चिकितसक के पास फसी नहीं सकता
00:52:47क्योंकि अब बीमारी ही फैसला कर देगी कि चिकितसद ठीक है कि नहीं
00:52:54बीमारी ही फैसला कर देगी न मैं जिसके पास गया हूँ अगर वो बेरी बीमारी का इलाज कर सकता है तो चिकितसद ठीक है
00:53:01मुझे गुरु को पहचानने की कोई
00:53:05जरूरत नहीं है, मुझे सुयम को पहचानने
00:53:16ऑब 사ल के बाजारू गुरु है, जो लूट लाट रहे हैं, जेल भी चले जा रहे हैं।
00:53:19इनको तुम्हें दोश देते ही नहीं बिलकुल. क्योंकि वो सिर्फ सप्लायर है
00:53:23उन्होंने आपको वही दिया जो आपने मांगा, आप उनके पास मनोरंजन मांगने गए थे, उन्होंने मनोरंजन दिखा दिया, आप गए थे उनके पास कि हमें भूत चढ़ा है, उन्होंने का लो भूत भगाए देते हैं तुम्हारा, आप उनके पास मनोकामना पूरी करने �
00:53:53यह जो पूरी भक्त जनों की टोली बैठी होती है ये अगर थोड़ी जाग्रुख हो तो फर्जी बाबा इन्हे ठक पाइबा क्या कुछ रहा हूं बस बताईए
00:54:04अब एक और बात पूछ रहा हूं ये जो भक्त जनों की भक्त माने अंधभक्त ये जो अंधभक्तों का जमावड़ा लग जाता है बड़े-बड़े शामियानों में बड़े कई बार तो लाखों में तादात पहुंचती है भाई
00:54:19ठीक है ये गए ही है अपने भ्रम को पोशन देने इनमें साहस नहीं कि अपनी धारणाओं को दी गई कोई चनोती बरदाश्ट कर पाए मान लीजिए मंच पर कोई आगया ऐसा जो कहे कि तुम सब के सब फर्जी हो
00:54:40ये जो तुम यहाँ पर एक लाख लोग जमा हो तुम सब यदे अध्यात्म की तरफ भी आए हो तो सिर्फ अपनी वही पुरानी गंधाती कामनाएं पूरी करने आयो तुम लोगी गड़बड़ो तो वो पंडाल कितनी देर में खाली हो जाएगा ये बताएगे
00:54:57अरे सब भगेंगे सब भगेंगे क्योंकि हम तो मंदिर भी इसलिए जाते हैं कि हे इश्वर मेरी मुरादे पूरी कर दे
00:55:08कौन जाता है
00:55:10कौन जाता है
00:55:12मंदिर ये कहने
00:55:14कि अगर मेरे भीतर जूटी
00:55:16जूट भरा है तो तोड़ दे
00:55:18मुझको भीतर से किसने जा करके
00:55:20कहा ये मंदिर में तो बाबाओं
00:55:22के पास भी हम बस इसलिए जाते हैं कि
00:55:23सस्ता मनुरंजन मिल जाए
00:55:25मनुकामना पूर्ति का कुछ मिल जाए
00:55:28जो हमारी पहले से ही धारणाएं चल रही है
00:55:30बाबा उनकी पुष्टी कर दे
00:55:31जो रास्ते जो साधानम पहले से ही अपनाते आ रहे है
00:55:36बाबा कह दे हाँ हाँ इसी रास्ते पर और तेजी से चलो
00:55:39और उसका यह रहा मंतर, इस मंतर का उप्योग कर लो,
00:55:42जिस रास्ते पर पहले ही चल रहे हो,
00:55:44वो रास्ता और साफ हो जाएगा तुम्हाइर लिए,
00:55:46जो कहानिया तुम पहले सही मानते आ रहे हो,
00:55:48बाबा उन कहानियों को और ज्यादा सत्यापित कर देता है,
00:55:52तो जब तक लोग नहीं जागरुख होंगे
00:55:57बाबाओं की सप्लाई लाइन वैसे ही चलती रहेगी
00:56:00जैसी है एक को हटाएंगे दूसरा आ जाएगा
00:56:03एक के बाद एक नए नए पैदा होते रहेंगे अब तो बच्चे भी आ जाते हैं
00:56:06क्यों आ जाते हैं बच्चे क्या उस बच्चे में कुछ खास है नहीं
00:56:11बच्चे में कुछ खास नहीं है मैं तो कह रहा हूँ बच्चे का बच्चपन मारा जा रहा है
00:56:14बच्चे का तो बच्चपन मारा जा रहा है ये लोग दोशी हैं
00:56:19जिनको इस तरह का आध्यात्मिक मनुरंजन भोगना है ये spiritual entertainment है उसका consumption चल रहा है और शिकार हो रहा है बच्चा उसका ये चल रहा है तो मैं क्या किसको दोश दूँ भई रोगी को पता होना चाहिए मुझे ठीक होना है क्योंकि गरज किसकी है गरज किसकी है रोगी की मैं अ�
00:56:49ये बाबाओं के सामने बैठते हैं लोग ये कभी सवाल करते हैं ये अपना रोग प्रदर्शित तक नहीं करते ये बस बैठ जाते हैं कि हमें प्रवचन दे दो हमें कथा सुना दो हम चले जाए जो रोगी अपना रोग प्रदर्शित भी नहीं कर रहा उसे कैसे पता चले�
00:57:19युवाओं से कि आज के युवाओं को गुलामी पसंद है
00:57:23या आज के युवाओं किस तरह से किन चीजों के गुलाम है
00:57:29वो अपने मानस के गुलाम है, अपने समय के गुलाम है
00:57:33अपनी सूज के गुलाम है, अपने अंतरमन के गुलाम है
00:57:36किसी इसके गुलाम है
00:57:37देखिए गुलामी नहीं पसंद होती किसी को
00:57:40मुक्ति तो सुभाव है
00:57:42पर
00:57:45दाम के मज़े लूटने की
00:57:48बुरी आदत लग जाती है
00:57:50गुलामी के साथ
00:57:53दुर्भा के पूर्ण बाती है
00:57:56कि उसके दाम मिलते हैं
00:57:58गुलामी नहीं पसंद Hai
00:57:59दाम पसंद Hai
00:57:59अब क्या करें अगर बिना दाम की कोई गुलामी करवाए तो एक आदमी न करे
00:58:06कोई आप से गुलामी करवाए और कहे दाम भी नहीं दूँगा कोई सुक्सोईधा नहीं दूँगा
00:58:12बदले में तुम्हें किसी तरह कि कोई स्वार्थ पूर्ती नहीं मिलेगी, कोई करेगा गुलामी
00:58:19लोग आते हैं कहते हम यहां फसे हुए हैं, हमारी हालत भाहती हम बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, हमारी हालत खराब है
00:58:25मैं गहता हूँ ये मत बताओ कि फसे कहाओ
00:58:27ये बताओ कि वहाँ फसने के तुमको दाम कितने मिल रहे है
00:58:31कोई भी व्यक्ति गुलामी सिर्फ एक कारण से सुईकार करता है
00:58:36कि उस गुलामी के एवज में उस कुलामी के बदले में
00:58:41उसे कुछ दिया जा रहा होता है
00:58:44और वेक्ते मूलांकर नहीं कर पा रहा होता
00:58:46कि जो कुछ भी उसको दिया जा रहा है
00:58:48वो बहुत कम है
00:58:50उस नुकसान की अपेक्षा
00:58:52जो वो गुलामी बरदाश्ट करके जहल रहा है
00:58:54यह समस्या है
00:58:56अब आज कही हुआ
00:58:57दुनिया इतनी सम्रुद संपन
00:59:00कभी भी नहीं थी इतनी आज है
00:59:01तो आज गुलामी के जो दाम
00:59:04मिलते हैं उतने कभी नहीं मिलते थे
00:59:05तो आज
00:59:07आज गुलामी को ठुकराना
00:59:10और मुश्किल होता जा रहा है
00:59:11आपने तो खुद छोड़ दिया
00:59:14और युवाओं को कह रहे हैं
00:59:16कि दाम मिल रहे हैं, इसलिए उन्होंने पकड़े रखा है, तो इसलिए तो हमारा इनका प्यार है, ना, इनके सामने कोई तो खड़ा होता है, जो कि अभी दाम लेकर बिखने को तयार नहीं है, तो यही बात ने अच्छी लगती है,
00:59:35नमस्ते आचारे जी, मेरा नाम सावन है, आपको जितना सोना है, उसमें ये पाया है कि भारतिय दर्शन, परंपरा, संस्कृति को बचाने के लिए नहीं, बलकि मनुष्य के भीतर की दास्ता और बंधनों से मुक्त करने के लिए है, आज जो भारतिय संस्कृति और परंपरा ह
01:00:05और इसका क्या प्रभाव साहित्य पर पड़ा है, क्योंकि ये साहित्य का मन्च है, तो साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है, बहुत बड़ा स्कोप है, जो इसका, आपने प्रशन पूछा है, इसके उत्तर को बड़ी व्यापक्ता चाहिए होगी, उत्तरा शायद हमारे �
01:00:35तो किसी समय में किसी समाज में कैसा साहित्य रचा जा रहा है ये बात सायोगिक के अनायास नहीं होती है
01:00:46सामाजिक परिस्थितियां बहुत हट तक तै करती है कि साहित्य रचा कैसा जाएगा
01:00:52और कौन सा साहित्य है जो प्रकाश में प्रमुक्ता में आएगा जन्मानस के बीच लोप्रिय हो पाएगा बिलकुल हो सकता है आज कोई उदियमान लेखक हो प्रतिवावान और बहुत अच्छी किताब लिखे और वो किताब बिलकुल धारदार है और सच बोल रही है लेकिन �
01:01:22समाज में कलाओं का क्या स्थान और स्तर होगा ठीक है तो ये ये आपने श्चित जान लीजिए तो साहित्य हो संगीत हो कलाकृतियां हो तरह तरह की जिसमें सिनिमा भी शामिल है ये सब की सब प्रदर्शित कर रही है आज आम आदमी के मानसिक स्तर को तो आप उनको जब द
01:01:52बाकी आपने जो बोला उस पर बात आधे एक गंटे हो सकती है कोई उसमें विशेश बिंदु हो जो आप पुछना चाहते हो तो वो बोल दीजिए युआओ के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है जो विक्रिती आई है देखिए हमारे ज्यादा तर लोग ना अपन
01:02:22बहुत सारा समय मोबाइल की स्क्रीन के सामने बिता रहा है टीवी नहीं देखते युआ बहुत कम देखते हैं मोबाइल देखते हैं और टीवी में तो फिर भी प्री प्रोग्राम्ड कारिक्रम आता है आपके सामने कि साड़े नौ बजे इस चानल पर यह आएगा तो वही �
01:02:52ज्यादा जो आप पहले से हो लालची आदमी को लालच से भरी सामगरी दिखा देगा सोशल मीडिया आपकी फीड में वही सब आएगा डरे आदमी को डरी चीजे हिंसक आदमी को हिंसक नफरती आदमी को नफरत बढ़ाने वाली चीजे दिखा देगा जो जैसा है उसको वह
01:03:22तो धलान पर गिरना असान होता है कोई भी वेक्ति जा करके आम तोर पर उची उठने वाली चीज तो सर्च करता नहीं न अल्गॉरिदम में आदमी ज्यादा तर सो में से 99 मौकों पर कोई व्यरत की चीज़ी सर्च करता है और अल्गॉरिदम आपको वही वही चीज़ें बार
01:03:52आपको जीवन हो गया आपका वो आरी बात समझ में तो आज का जो आज एक इंस्टाग्राम पर रील चल रही है उसको साहित्य क्यों ना माना जाए वो भी साहित्य है यूट्यूब पर कोई वीडियो आ रहा है उसमें जाकर कोई कुछ बोल रहा है पॉड्कास जैसा है वो �
01:04:22जो आप चुनोगे वो और ज्यादा आपको मिलेगा और वो चीज आपकी जिन्दगी बन जानी है तो सावधान रही है
01:04:52का टी भर जादा है आपकी जापकी जानी है और जी है है उड़ि़घ घादा प्रादा थार जापकी जापकी आपकी जापकी जापकी है
01:05:22कि अजया भाल फिर है।
01:05:48फराज से आए ऴाजो away
01:05:52तो उतलब जिसे कहते है ना चित्त का आरंदित हो जाना है
01:05:56बहुत संदर दिए
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