00:00नमस्कार! चलिए आज बात करते हैं धर्म वीर भारती के क्लासे को पन्यास गुनाहों का देवता की.
00:07ये एक ऐसी कहानी है जो प्यार, करतव्वे और समाज के बीच की एक दर्दनाक कश्मकश को दिखाती है.
00:13और इसके सवाल आज भी उतने ही चुपते हैं जितने आधी सदी पहले चुपते थे.
00:18हम सब जानते हैं, कुछ कहानिया कभी पुरानी नहीं होती.
00:21खास्तोर पर वो दुखद प्रेम कहानिया जो हमारे दिलों में कही न कहीं बस जाती है.
00:25ये सिर्फ किस्से कहानिया नहीं है बलकि हमारी लिटरिचर और सिनेमा की विरासत का एक बहुत बड़ा हिस्सा है
00:32और देखे न हम सब हेजल गस, लिस डार्सी या हीथ क्लिफ और कैथी जैसे किरदारों के प्यार और उनके दर्द में डूब जाते हैं
00:41ये नाम और इनकी कहानिया तो जैसे हमारी पॉप कल्चर का हिस्सा बन गए है
00:45लेकिन क्या कभी चंदर और सुधा की कहानी को महसूस किया है
00:49एक ऐसी भारतिय प्रेम कहानी जो दुनिया की किसी भी महान कृति को टकर दे सकती है पर शायद उतनी मशूर नहीं है
00:57तो चलिए सबसे पहले कहानी के हीरो चंदर से मिलते हैं और देखते हैं कि वो उन टिपिकल रोमांटिक हीरो से कितना अलग है जिनके बारे में हम अकसर पढ़ते या देखते आए हैं
01:08तो देखिए एक तरफ है वो टिपिकल बैड बॉय हीरो थोड़ा घुसेल थोड़ा बागी जिसे प्यार सुधारता है लेकिन दूसरी तरफ हैं चंदर एक शांत गंभीर आदर्श वादी नौजवान उसका प्यार उसे बनाता नहीं बलकि उसके आदर्श ही उसके प्यार क
01:38पर्तों को खोल कर देखते हैं जरा सोच कर देखिए इलाहबाद का वो दौर जब जिन्दगी की रफ्तार थोड़ी धीमी थी एक ऐसा माहल जहां दोस्त एक दूसरे से कवताओं में सौनेट्स में बात करते थे यही वो दुनिया थी जहां चंदर और सुधा का रिष्टा �
02:08के लिए नहीं बलकि उसके उचे आदर्शों और उसके चरित्र के लिए थी उनका रिष्टा आम रोमैंसिक कहीं ज्यादा गहरा था ये सम्मान और एक बौधिक जुडाओं पर टिका था तो उनका रिष्टा था कैसा वो प्लेटॉनिक था उसमें भाई-बहन जैसा प्यार
02:38अब आते हैं कहानी के उस मोड पर जहां सब कुछ बदल जाता है वो केंद्रिय संघर्ष जो उनकी इस आदर्श दुनिया को तोड़ कर रख देता है और यही कहानी में आता है वो टर्निंग पॉइंट सुधा के पिता जो चंदर को अपने बेटे से कम नहीं मानते उसी के क
03:08समाज की उम्मीदों और दिल की चाहत के बीच का संघर्ष चंदर और सुधा के फैसले इस बात से तै होते हैं कि दुनिया उनसे क्या चाहती है ना कि वो एक दुसरे से क्या चाहते हैं तो इस नामुमकिन से चुनाव का नतीजा क्या निकलता है और कैसे एक आदर्शवाद
03:38में उसकी आत्मा एक प्रेत बन जाती है और वो खुद गुनाहों का देवता बन जाता है ये एक क्लासिक नेगिटिव कैरेक्टर आग है जहां एक नेक काम ही किरदार की तबाही की वज़ा बन जाता है और मामला यहीं नहीं रुकता इसी उथल पुथल के भी चंदर की जि
04:08और और भी ज्यादा सवाल उठाने लगता है और सुधा का क्या हुआ वो अपनी एक टिस्मत के पिंचरे में कैद हो जाती है लेकिन वो तूटती नहीं है वो एक ऐसी खामोश ताकत दिखाती है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी उसकी सहन शीलता ही उसकी सबसे बड़ी त
04:38अज़ादी, समाज और एक इंसान की इच्छा के बीच की लड़ाई, जाती और वर्ग की दिवारें और प्यार और बलिदान के असली माइने क्या हैं ये सवाल तब भी थे और आज भी हैं वह सबसे हैरान करने वाली बात जानते हैं क्या है जब धर्मवीर भारदी ने ये क
05:08तो इस उपन्यास की आत्मा भी है ज्यादा बड़ी तरास्दी क्या है एक प्यार का खो जाना या एक आदर्श का तूट जाना
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