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  • 6 weeks ago
गोदान मुंशी प्रेमचंद

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00:00चलिए, एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं, जहां जमीन की हर कहानी मिटी और आंसों से लिखी जाती थी. एक ऐसा दौर, जब लाखों बेयावाज लोगों की जिंदगी एक महादाथा बनने का इंतजार कर रही थी.
00:13तो कोई नौवल, कोई उपन्यास, टाइमलिस कैसे बन जाता है? क्या चीज है जो किसी कहानी को महस कागस के पन्नों से निकाल कर पीडियों की धड़कन मना देती है? तो ये कहानी है उस लेखक की जिसने अपनी कलम से भारत के दबे कुछले लोगों को आवाज दी. एक ऐसा क
00:43जिसके नाम पर हिंदी साहित्य में एक पूरे युग का नाम रखा गया, प्रेमचंद युग. तो ये बात शायद बहुत लोगों को पता नहीं होगी कि उनका असली नाम धनपतराय श्रीवास्तव था. उन्होंने नवाब राय के नाम से लिखना शुरू किया था, लेकिन
01:13असी में वारानसी के पास एक छोटे से गाओं लमही में जन्मे प्रेमचंद ने अपनी जिंदगी के सिर्फ 56 साल देखे. लेकिन इन 56 सालों में उन्होंने जो किया, उसने साहित्य की दुनिया को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया.
01:281918 से लेकर 1936 तक का समय. सोचिए, हिंदी साहित्य में प्रेमचंद यू कहलाता है. ये उनके असर का सबसे बड़ा सबूत है. प्रेमचंद का मकसद क्या था, वो क्यों लिखते थे? इसका जवाब उनके ही इस एक वाक्य में मिल जाता है. उनका मानना था कि साहित्य सिर्फ
01:58बड़ी सबसे शक्तिशाली मिसाल हमें मिलती है उनकी मास्टरपीस गोदान में. गोदान सिर्फ एक नौवल नहीं है. ये भारतिय किसान की जिन्दगी का एक महा काव्य है. और ये 1936 में पबलेश हुआ. उसी साल जब प्रेमचंद गुजर गए. मतलब ये उनकी जिन्द�
02:28इसका मतलब सिर्फ ये नहीं है कि किताब बहुत बड़ी या लंबी है. एक महा काव्यात्मक उपन्यास वो होता है जो अपने समय के पूरे समाज, उसकी राजनीती, उसके संगर्श और उसकी उम्मीदों को अपने उंदर समेट लेता है. तो चलिए इसको थोड़ा और गह
02:58चहरा उतरता है.
03:28और पाचवा इसकी भाषा. एकदम सीधी साधी, लेकिन दिल में उतर जाने वाली है. बिलकुल वैसी ही, जैसे भारत के गाउं बोलते हैं. लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती. गोदान सिर्फ एक किसान की कहानी से कहीं कहीं ज्यादा है. इसकी परतों के नीचे एक और कह
03:58मतलब साहित्य के जरिये उन आवाजों को मंच देना जिने सदियों से दबाया गया था. देखिए, गोदान सिर्फ गरीबी और शोशन का हिसाब किताब नहीं है. ये समाज के पाखंड और जाती ववस्था पर एक बहुत तीखा, जबरदस्थ हमला है. और ये पाखंड दि
04:28है, होरी पर जुर्माना लगता है. लेकिन जब गाउं का पन्निट, दाता दीन का बेटा माता दीन, एक दलित लड़की सिलिया के साथ रहता है, तो पूरा गाउं चुप. यही वो दोहरापन है, जिस पर प्रेम चंद ने उंगली रखी. लेकिन कहानी में दलित किरदार सि
04:58के साहित्य के लिए एक तरह से बगावत का एलान था. और यह सिर्फ खोखली धमकी नहीं थी. सिलिया के लोग मातादीन को पकड़ते हैं, उसका जनेऊं, जिससे ब्रामिन होने का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है, उसे सरयाम तोड़ देते हैं, और उसके मूं में हड�
05:28विद्रोह नहीं दिखाते, वो दलित पात्रों की गहरी इंसानियत को भी सामने लाते हैं. कहानी में एक और दलित किरदार है, चर्खिया. जब जुनिया के बच्चे को दूद नहीं मिलता और वो मरने वाला होता है, तो चर्खिया उसे अपना दूद पिला कर बचाती है. �
05:58प्रेमचन का जो लेखन है, वो कुछ बड़े सिधान्तों पर टिका था. वो आदरशोनमुक यथार्थवाद में यकीन करते हैं. इसका मतलब है, समाज की कडवी से कडवी सचाई दिखाओ, लेकिन साथ में एक बहतर दुनिया की उमीद भी जड़ाओ. वो प्रगतिशील �
06:28और तीन सौ से भी ज्यादा कहानिया. सोचे, कफन, पूस की रात, ठाकुर का कुआ, इदगा, उनकी हर एक कहानी समाज के किसी दुखती रग पर हाथ रखती है. मतलब उनका काम सिर्फ ज्यादा नहीं था, बलकि बहुत गहरा भी था.
06:43और आखिर में, जैसा कि महान साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद दुएदी ने कहा था, प्रेमचंद सिर्फ एक लेखक नहीं थे, वो उन करोडों, किसानों और दलितों की आवास थे, जिन्हें सदियों से दबाया गया, बेईज़त किया गया था.
06:59तो प्रेमचंद की जिन्दगी और उनका काम हमें एक बहुत बड़े सवाल पर लाकर छोड़ देता है, कि साहित्यक क्या है, क्या ये सिर्फ समाज का आइना है, जो दिखाता है कि हम कैसे हैं, या फिर ये वो हतोड़ा है जिससे समाज को बदला जा सकता है, उसे वैसा बना
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