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  • 2 days ago

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00:00स्त्री के लिए तो बहुत बहुत बहुत जरूरी है अपने पाउं पे खड़ा होना
00:05शादी हो गई तो नौकरी छोड़ दो क्योंकि पती दूसरे शहर में रहता है
00:10पती थोड़ी नौकरी छोड़ता है कभी
00:12नौकरी हमेशे कौन छोड़े? लड़की छोड़े
00:14कि प्रिये जब हम कमा ही रहे हैं तो तुम्हें क्या जरूरत बेगम घर में रानी बनके बैठागा लो हो गई विरोजगार हो जाए तो दुनिया लानते भेशती है और बिरोजगार घर में पड़ी है उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं कोई ताना नहीं मारेगा घर में अपन
00:44तो उसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती है बाहर निकलो ढूंडो कम कमाओ लेकिन इतना तो जरूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ
00:55स्तरी के लिए तो बहुत बहुत बहुत जरूरी है अपने पाओँ पे खड़ा होना हर चीज से समझगोता कर लेना कमाने से मत करना आदमी के लिए भी जरूरी है और लिड़कियों के लिए इस्तरी
01:23काम पर आर्थिक रूप से पर निर्भर ना हो जाएं और प्रक्रतिका खेल कुछ ऐसा है कि आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा पराश्रित इस्त्रियों को होना पड़ता है
01:40शादी हो गई तो नौकरी छोड़ दो क्योंकि पति दूसरे शहर में रहता है लो हो गई विरोजगार हो गई न विरोजगार पति थोड़ी नौकरी छोड़ता है कभी नौकरी हमेशा कौन छोड़े लड़की छोड़े अब इतना असान है दूसरी जगे पे नौकरी मिल जान
02:10और अगर दोड़धूप कर रहा है तो साथ ही साथ घर को भी देखो
02:25दूना बोज लो जब दूना बोज रहेगा तो बाहर सफलता मिलने कि संभावना कम हो जाएगी
02:33सफलता ना मिले तो ये ठपा लग जाएगा कि इनसे बाहर का कोई काम तो होता नहीं
02:37चली थी बहुत फन्ने खा बनने लो पैसा भी डुबो दिया और सफलता भी मिली
02:45और उसके बाद अगर मातरत तो आ गया तो महीनों महीनों तक घर पे बैठो वो भी जिंदिगी में एक बार नहीं
02:57हो सकता है दो बार चार बार अब बैठे रहो घर पे और एक बार घर पे बैठ जाओ
03:07कुछ महीने या कुछ साल तो उसके बाद अपनी जो तीक्षनता होती है जो शार्पने सोती है वो भी कुंध हो जाती है तलवार को जंग लग जाता है फिर बाहर निकलने का खुदी मन नहीं करता
03:26एक बार तुम्हारा ग्रहिनी बनने में मन लग गया उसके बाद तुम चाहोगी नहीं कि मैं बाहर निकलो और अपना आराम से घर में ग्रहिनी बनकर पराश्रित बनकर पड़ी रहोगी
03:46आदनी बिरोजगार हो जाए तो दुनिया लानते भेजती है तो हंकार की खातेरी से ही लेकिन उसे उठकर के बाहर निकलना पड़ता है कि कुछ कमा हूँ
04:06और बिरोजगार घर में पड़ी है उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं कोई ताना नहीं मारेगा
04:14तो पड़ी हो यह पड़ियां यह खतरनाक बात है इससे बचना
04:24समझ रहे हो
04:27तम कमाओ लेकिन इतना तो जरूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ
04:36कोई हो घर में तुमारा पिता हो पती हो
04:43वो हो सकता है एक लाग कमाता हो पाँच लाग कमाता हो
04:48उससे तुलना मत करो अपनी अगर तुम बहुत नहीं कमा पा रहीं तो दस ही हजार कमाओ
04:57पर इतना तो रहे ना कि मुझ में जो टुकडा जा रहा है वो अपना है
05:05ये मत कहा दे ना कि जब पती दस हजार पती जब एक लाग कमाता है तो मुझे कमाने की क्या जरूरत है
05:18और इस तरह की बाते अक्सर प्रेम के नाम पर चल जाती है कि प्रिये प्रिये
05:26ये मान्श पूरा करेगा मेरी बात को करो बिटा
05:34सुना हम जब हम कमा ही रहे हैं तो तुम्हें क्या जरूरत है
05:45बेगम घर में रानी बन के बैठो
05:48अरे तब तो अच्छा लगता है ना सुनने में
05:53कि बिना मेहनत के ही हुजूर बोल रहे हैं कि
05:57घर में रानी बन कर बैठो
06:01और तब तो लगता है कि पुरुष इतने प्रेम से आग्रह कर रहा है
06:05कि घर में ही बैठो और हम कमाने निकल जाएं तो इस बिचारे का दिल तूट जाएगा
06:09तो इसका दिल रखने के लिए हम घर में बैठते हैं
06:13वो जड़ा साल, दो साल, चार साल बात पता चलता है कि
06:17खेल तो दूसरा था
06:29बाहर निकलो ढूंडो
06:30शुरू करने के लिए कोई काम छोटा नहीं होता
06:36और तुलना मत करना
06:39फिर कह रहा हूं कि पती इतनी बड़ी नौकरी करते हैं तो मैं कोई छोटी सी नौकरी कैसे कर लो
06:46बात तुलना की नहीं है, बात आत्मे निर्भरता की है
06:49तुम पाँच हजार, दस हजार जितना नियूनतम कमा सकती हो उतने से ही शुरू कर लो, बात में बढ़ता रहेगा
06:58अभी शुरुआत तो करो
07:00और किसी को बेरोजार रखने का ये बड़ा अच्छा तरीका होता है
07:08कि हाँ, कर लेना नौकरी, जब कम से कम पचाहँजार की मिल जाए तो कर लेना
07:14न नौमन तेल होगा, न राधानाचेगी
07:17न तुम्हें पचाहँजार वाली मिलेगी
07:21न करने की नौबताएगी
07:23ऐसे नहीं, बाहर निकलो
07:30पूरा व्यक्तित तो बदल जाएगा
07:33घर में घुसे घुसे, व्यक्तित तो कुंठित हो जाता है
07:37समझ रहे हो, बाहर निकलो
07:43मैं घर के काम को छोटा नहीं कहरा
07:53मैं सिर्फ यह कहरा हूँ कि जो घर में कैद है
08:02उसे दुनिया का कुछ पता ही नहीं चलेगा
08:04उस काम का प्रकार कुछ ऐसा है
08:08कि वो तुम्हारे विकास में बाधा बनता है
08:11वही काम तुम्हिरंतर करते रहते हो
08:21दुनिया में बाहर निकलते हो तो विकास की पचास संभावनाएं होती है
08:24घर में अपनी माओं को देखा होगा
08:27वो 40 साल पहले भी रोटी ही बनाती थी और आज भी
08:31रोटी ही बनाती है
08:33यह बाहर निकलते हो तो प्रोन्नत ही होती है न, प्रमोशन, क्रहणी का कोई प्रमोशन होता है, काम में बुरा ही नहीं है, पर काम में विकास भी तो हो, वो पहले भी दाल बनाती थी, आज भी दाल ही बनाती है, फिर उसने सीखा क्या, उसकी तरक्की कहां हुई, और घर में �
09:03जब तक तुम दुनिया में निकल नहीं रहे, सडकों की दूल नहीं फाक रहे, बाजारों से रूबरू नहीं हो रहे, तुम्हें क्या पता चलेगा?
09:19घर का काम भी करो, मैं पुरुशों से भी कहता हूँ, घर का काम भी करो, और स्त्रियों से भी कहता हूँ, घर का काम भी करो,
09:40पर अगर तुम ऐसे हो कि घर का काम ही कर रहे हो
09:45तो तुम्हारा विकास बाधित हो जाएगा
09:52मैं दोरा के कह रहा हूँ
09:57ताकि किसी यो गलत फैमी न हो जाए
09:58मैं घर के काम को छोटा नहीं मानता
10:00घर अपना है तो घर के सारे काम अपने है
10:07छोटे कैसे हो सकते हैं
10:09किसी और का घर थोड़े, यह अपने ही तो घर है, तो उनको मैं छोटा नहीं कह रहा, पर घर के काम की सीमाओं को समझना आवश्यक है,
10:23समझ रहे हो, कमाओ, बाहर निकलो और कमाओ,
10:39झालिष है, यह अपने ही तो खला झालिष और को समझना आवश्यक है,
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