00:00आरव को पता नहीं था। इस मंदिर में आखरी पूजा किसने की थी। आरव मंदिर के अंदर कदम रखता है। उसका पैर एक सूखे फूलों की चड़ावट पर पड़ता है। जो चटक जाती है। आरव हसते हुए कहते हैं। यहां तो कोई है भी नहीं। घूतों का डर दि
00:30एक भयानक आवाज गूंचती है, मेरे फूल क्यों तोड़े। मूर्ती का हाथ आरव की गर्दन पर आ जाता है। दर्वाजा अपने आप बंध हो जाता है। दिया बुझ जाता है। दूर से आरती की घंटिया सुनाई देती हैं। कुछ जगे सुनसान नहीं। बस इंतज
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