00:00कहानी शुरू होती है राजा इंद्रद्यूम्न से जो भगवान वश्नु के अनन्य भक्त थे एक दिन उने स्वपनाया समुद्र किनारे एक दिव्व लकडी तैरती मिलेगी उससे मेरी मूर्ती बनाओ राजा ने तुरंत खोश शुरू की और आखिरकार वो लकडी मिल ही ग�
00:30जब तक मैं अंदर मूर्ती बना रहा हूं कोई दर्वाजा नहीं खोलेगा वरना मूर्तिया अधूरी रह जाएंगी राजा ने वचन दिया दिन बीटते गए अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी तब रानी घबरा गई आखर आवाज आनी बंद क्यों हो गई राजा स
01:00दिव्यता मानो भगवान स्वैम वहां विराजमान हो राजा को अपनी गलती का पश्तावा हुआ लेकिन तब ही एक आकाश्वानी हुई हे राजन ये मेरा सच्चा रूप है अधूरा नहीं आत्मा से पूर्ण है तब से आज तक जगनात बलभद्र और सुबद्रा की वही
01:30झाल
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