वीडियो जानकारी:
शब्दयोग सत्संग
१९ अक्टूबर, २०१४
अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा
दोहा:
कुल करनी के कारने, ठिग हो रहिगो राम ।
तब कुल का को लाज है, जब जम की धूम धाम॥ (संत कबीरदास)
प्रसंग:
क्या आध्यात्मिकता और सामाजिकता एक साथ चल सकते हैं?
घरेलू झंझटों से बाहर कैसे आए?
गृहस्थ जीवन जीते हुए भी आध्यात्मिक कैसे बने रहें?
क्या आध्यात्मिकता भगोड़े लोगो के लिए?
कबीर ने आध्यात्मिक आदमी को सुरमा /योद्धा क्यों कहे है?
क्या अध्यात्म परिवार से पलायन करने का नाम है?
प्रेम क्या है?
डर क्या है?
मृत्यु का डर इतना सघन क्यों है?
संगीत: मिलिंद दाते
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