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नृसिंह अवतार द्वारा अधर्म के नाश के बाद, ब्रह्मांड में धर्म की नई आशा जगी। लेकिन शांति क्षणभंगुर थी। इस बार, दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुण्यात्मा पौत्र, महाबली, अपनी अभूतपूर्व शक्ति और दानशीलता से तीनों लोकों पर राज कर बैठे। देवराज इंद्र का सिंहासन डगमगाया, और देवताओं ने अपनी महिमा खो दी। क्या कोई ऐसा था जो महाबली के प्रचंड पराक्रम और उनकी अटूट प्रतिज्ञा का सामना कर सके? देखिए पद्म पुराण के इस नए अध्याय में, जब भगवान विष्णु ने अपने पांचवें अवतार, वामन के रूप में एक ऐसी लीला रची, जिसने पूरे ब्रह्मांड के भाग्य को हमेशा के लिए बदल दिया। यह कहानी केवल एक राजा के पतन की नहीं, बल्कि एक भक्त की अटूट आस्था और ईश्वरीय न्याय की है।
Transcript
00:00निरिसिन्य के प्रचंड अवतरण के उपरांत भक्त प्रहलाद ने ब्रहमांड में धर्म और न्याय का एक नया युग स्थापित किया,
00:07जहां शांती और समरिध्धी का स्वर्णिन प्रकाश हर दिशा में फैल गया था.
00:13देवलोक से नारद मुनी और ब्रहमाजी प्रहलाद के धर्म प्रायन शासन को देख कर विस्मय और संतुष्टी से भरे हुए
00:21थे, उनके मुख पर दिव्य शान्ती चाई थी.
00:25अपने भव्य सिनहासन पर विराजमान प्रहलाद न्याय की तुलाथा में विनमर्ता और करुना से अपनी प्रजाकी समस्याओं का समाधान करते
00:34हुए, उन्हें आशिरवाद प्रदान कर रहे थे.
00:38प्रहलाद के शासन में अजे धर्मचक्र स्वर्ग और प्रित्वी के बीच एक अटूट सेतू की तरह घूम रहा था, जो
00:45समरिध्धी और आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक था.
00:50सदियों तक प्रहलाद का न्यायपूर्ण शासन चला, उनके वर्षों ने एक सुनहरा अध्याय लिखा, और अब व्रिध्ध होते प्रहलाद अपने
00:58भव्य सामराज्य को अपने योग्य पौत्र महाबली को सौंपने की तयारी कर रहे थे.
01:05एक शांत कक्ष में व्रिध्ध प्रहलाद अपने पुत्र विरोचन और पौत्र महाबली के साथ उत्तराधिकार की गंभीर चर्चा कर रहे
01:14थे, उनके शब्दों में ज्यान और दूरदर्शिता थी.
01:17एक भव्य समारोह में स्वर्णिन सिनहासन पर आरूड प्रहलाद ने स्वया अपने हाथों से महाबली को राजमुकुट पहनाया, जिससे दैत्यराज
01:27का नया अध्याय आरंभ हुआ.
01:31महाबली ने अपने दादा का राजगंड ग्रहन किया, उसक्षण उनके मन में भक्ती, सम्मान और दैत्यों के खोए हुए गौरव
01:38को पुनह स्थापित करने की महत्वाकांग्शा का संगम था.
01:43महाबली के शासनकाल के आरंभिक वर्ष अपने दादा की विरासत का सम्मान करते हुए व्यतीत हुए, किन्तु धीरे-धीरे उनके
01:51महल की वास्तुकला में भी उनकी बढ़ती महत्वाकांग्शा की चाप दिखने लगी.
01:57एक एकांट ध्यानकक्ष में, व्रिद्ध प्रहलाद अपनी आखों में एक हलकी सी चिन्ता के साथ महाबली के राज का अवलोकन
02:05कर रहे थे, जैसे किसी आने वाली घटना को भांप रहे हुँ.
02:11महाबली अपने भव्य दर्बार में उचे सिन्हासन पर बैठे थे, अपने विश्वस्निय मंत्रियों और योध्धाओं से परामर्ष लेते हुए, उनकी
02:20आखें दैत्यों के लुप्त गौरव को पुनह प्राप्थ करने के स्वपन से चमक रही थी.
02:26राजमहल की दीवारों पर अनकित प्राचीन भित्तिचित्रों को महाबली ध्यान से निहार रहे थे, जो दैत्यराज हिरन्यक्षिपु के स्वर्णिन काल
02:35और उसकी अदमय शक्ती को दर्शाते थे.
02:39महाबली अपने विशाल सामराज्य का सर्वेक्षन कर रहे थे, जहां नई-नई किलेबंदी और भव्य संरचनाये उनकी बढ़ती शक्ती और
02:47विश्वविजय की महत्वा कांशा का प्रमान दे रही थी.
02:52स्वर्गलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन चिंतित मुद्रा में महाबली की बढ़ती शक्ती और उनके सामराज्य के विस्तार का
03:00अवलोकन कर रहे थे, उनके चहरे पर भय की हलकी रेखाए उभर आई थी.
03:07शक्ती और प्रभुत्व की अदमय इच्छा से प्रेरित होकर महाबली गेहन तपस्या में लीन थे, ब्रहमांडी उर्जा को स्वय में
03:15समाहित करने के लिए ध्यानस्थ बैठे थे.
03:18उनकी तपस्या की प्रचंड अगनी से ब्रहमांड काप उठा और महाबली के भीतर एक अदमय संकल्प ने जन्म लिया, तीनों
03:27लोकों पर अपना ध्वच फहराने का.
03:30महाबली ने अपनी विशाल असुर सेना को संबोधित किया, उनके उद्घोश से धर्ती और आकाश गुंद उठे और उनके शब्ध
03:39हर सैनिक के हरिदय में विजय की ज्वाला प्रजवलित कर रहे थे.
03:44शीरसागर के मध्य, भगवान विश्नु और देवी लक्षमी अनंत शया पर विराजमान होकर महाबली की महत्वा कांक्षा से उत्पन ब्रहमांडिय
03:53हल्चल को अनुभव कर रहे थे.
03:56सर्वोच प्रभुत्व स्थापित करने के लिए महाबली ने एक भव्य अश्वमेध यग्य आरंभ किया, जिसकी अगनी कुन से उठती लप्टे
04:05तीनों लोकों में अपनी विजय का संदेश दे रही थी.
04:09इस महायग्य के प्रभाव से ब्रहमांडिय संतुलन डगमगाने लगा, स्वर्ग और प्रित्वी के बीच की नाजुक्तुला महाबली की बढ़ती शक्ती
04:18की ओर जुकने लगी.
04:20यग्य की प्रचेंड उर्जा ने महाबली के सामराज्य को अद्भुत वैभव और असीम शक्ती से भर दिया, जिससे उसके राजसी
04:28ठाठ और बढ़ गए.
04:31शीरसागर में भगवान विश्णु अपनी गंभीर मुद्रा में महाबली की बढ़ती शक्ती से उत्पन होने वाले ब्रहमांडी असंतुलन को गहनता
04:40से अनुभव कर रहे थे.
04:42अपनी तपस्या से प्राप्ट अलौकिक तेज से युक्त महाबली ने अपने दर्बार में याचकों को स्वर्ण, क्रत्न और भूमी का
04:50उदारता पूर्वक दान किया, जिससे उसकी दानवीर्ता की ख्याती फैल गई.
04:56महाबली की कीर्टी अब एक ज्वलंत सूर्य की तरहे तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थी, जिसकी आभा देवलोक तक
05:04पहुँच रही थी.
05:06महाबली के न्यायपूर्ण शासन में उसके राज्य की प्रजा सुखसमरिधी से परिपूर्ण थी, जिससे उसके प्रती लोगों का अटूट विश्वास
05:14और प्रेम बढ़ गया.
05:17स्वर्गलोक में देवराज इंद्र, अपनी स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान, महाबली के बढ़ते प्रभाव और अपनी शक्ती को लेकर गहरी चिंता
05:26में डूबे हुए थे.
05:28महाबली ने अपने गुरु शुक्राचार्य से गहन मंत्रणा की, जहां गुरु ने उसे तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित करने के
05:36लिए उचित मार्ग का निर्देश दिया.
05:39गुरु के आशिर्वाद और अपनी महत्वा कांग्षा से प्रेरित होकर महाबली के मन में स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने की
05:47अटूट इच्छा प्रबल हो उठी.
05:50महाबली की विशाल सेना, जिसमें पराक्रमी दैत्य योध्धा शामिल थे, युध के लिए तैयार होकर भव्यद्वार के सामने एकत्र हुई,
05:59उनकी गर्जना से धर्ती काप उठी.
06:02कमल पर विराजमान ब्रहमा, स्रिष्टी के रच्चिता, महाबली की आसन, विजय की तैयारी को ब्रहमांडिय योजना के एक अनिवार्य चरण
06:11के रूप में देख रहे थे.
06:14युद्ध भेरी की ध्वनी के साथ, महाबली अपने स्वर्ण रत पर सवार होकर, अपनी सेना का नेत्रित्व करते हुए स्वर्गलोग
06:22की ओर अग्रसर हुआ.
06:24स्वर्गलोग की ओर बढ़ती हुई दैत्य सेना, एक अजे लहर की तरह समस्त ब्रहमांडिय शक्तियों को चुनौती दे रही थी.
06:33स्वर्ग के विशाल मैदानों में देवताओं और दैतियों के बीच एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिससे आकाश में अस्त्रों की
06:42चमक और योध्धाओं की चीखें गूंज उठी.
06:46कैलाश परवत पर ध्यानमग्न भगवान शिव अपनी तीसरी आक से इस भयंकर संधर्ष को ब्रहमांडिय संतुलन के एक महत्वपूर्ण मोड
06:55के रूप में देख रहे थे.
06:58युद्ध के चरम पर महाबली और देवराज इंद्र आम ने सामने आये, उनकी आखों में प्रतिशोध और प्रभुत्व की अगने
07:06धधक रही थी.
07:07एक भयंकर द्वंद्व के बाद महाबली ने देवराज इंद्र को पराजित कर उनके सिनहासन से हटा दिया, जिससे स्वर्गलोक में
07:16देवताओं का गौरव खंडित हो गया.
07:19स्वर्ग लोग की विजय पता का फहराते हुए महाबली ने गर्व के साथ इंद्र के सिनहासन पर कदम रखा जिसकी
07:27गूंच तीनों लोकों में फैल गई
07:30पराजित और हताश देवता अपने स्वर्गिक आवासों को छोड़ कर ब्रह्मा और विश्नु की शरण लेने के लिए विवश हो
07:37गए
07:39महाबली ने अब तीनों लोकों पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया था और गुरु शुक्राचार्य उनके बगल में खड़े
07:47होकर विजय का जश्न मना रहे थे
07:50ब्रह्मांडिय संतुलन अब पूरी तरह से महाबली के पक्ष में जुप गया था उसकी शक्ती और सामराज्य की कोई सीमा
07:58नहीं थी
07:59तीनों लोकों पर महाबली के एक आधिकार के बाद पराजित देवताओं का स्वर्गिक दर्बार अब एक मौन शोकसभासा प्रतीत हो
08:08रहा था जहां उनकी दिव्या आभा धूमिल पड़ चुकी थी
08:12अपने कमल आसन पर विराजमान भगवान विश्णु ने अपने गंभीर मुख मंडल पर चिन्ता की जलक लिए स्रिष्टी के बिगड़ते
08:21संतुलन पर ब्रहमाजी से गहन विचार विमर्ष किया
08:25स्वर्ण सिन्हासन खाली पड़े थे और इंद्र सहित अन्य देवता अपने स्वर्णिन वस्त्रों में भी अपनी गरिमा खो चुके थे
08:33उनके चेहरों पर गहन निराशा चाई हुई थी
08:38ब्रहमांडिय न्याय का तराजू जो कभी देवों के पक्ष में जुका था अब महाबली की निरंकुष शक्ती के भार से
08:45एक और भयानक रूप से डग्मगा रहा था
08:48इस विवश्ता भरे द्रिश्य के बीच देवमाता अदिती का हरिदय अपने पुत्रों की दैनिय दशा देख असहनिय पीडा से विदीर्न
08:57हो रहा था उनकी आखों में अश्रु भराय थे
09:01देवमाता अदिती जिनकी दिव्यकानती भी अब दोहक से मन्द पड़ चुकी थी अपने अश्रुपूर्ण नैनों से भगवान विश्नु की और
09:10आशा भरी द्रिश्टी से देख रही थी
09:13अपने पुत्रों के उद्धार हेतु उन्होंने मन ही मन एक कठोर प्रतिज्याली की वे तपस्या द्वारा भगवान विश्नु को प्रसंद
09:21कर उनकी सहायता मांगेंगी
09:24उनकी द्रिड इच्छा शक्ती ने उस निराशा भरे वातावर्ण में भी एक ख्षीन किन्तु शक्तिशाली दिव्य प्रकाश की किरन जगा
09:32दी जो उनके संकल्प की प्रतीक थी
09:36देवमाता अदिती ने अत्यंत एकागरता से पयोवरत का अनुष्ठान आरंभ किया जिसमें उन्होंने केवल दूढ का ही सेवन कर भगवान
09:45विश्नु का अथक स्मरण करना शुरू किया
09:49स्रिष्टी के रचिता ब्रहमाजी ने अपने चतुर्मुखी ध्यान से अदिती की इस घोर तपस्या को देख कर उनके अटल भक्ती
09:57भाव की सराहना की
09:59अनेक वर्षों तक उन्होंने बिना किसी विचलिक भाव के अपने मन को भगवान विश्नु में लीन कर दिया, उनकी तपस्या
10:07की अगनी लगातार प्रजवलित होती रही
10:10उनकी निष्ठा और समर्पन की शक्ती इतनी प्रबल हो गई थी कि स्वयन ब्रह्मांड की उर्जाएं उनके चारों और केंद्रित
10:18होने लगी, एक अद्भुत आभा उत्पन करते हुए
10:23अंतह उनकी भक्ती से प्रसन होकर शंक, चक्र, गदा, पद्मधारन किये हुए नीले वर्ण के भगवान विश्नु एक तेजोमय स्वरूप
10:32में उनके समक्ष प्रकट हुए
10:35भगवान विश्नु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ देवमाता अदिती से वर्दान मांगने को कहा और उनके त्याग तथा तपस्या
10:43की भूरी-भूरी प्रशन साकी
10:46अदिती ने श्रद्धा और कृतज्यता से अपने अश्रुपूर्ण नैनों से भगवान को निहारा और उनसे अपने पुत्रों के उध्धार के
10:55लिए प्रार्थना की
10:57करुणा सागर भगवान विश्णू ने उन्हें वचन दिया कि वे स्वयां उनके गर्ब से अवतार लेंगे और देवताओं को उनके
11:04कश्टों से मुक्ती दिलाएंगे
11:07देवमाता अदिती का हरिदय आशा और प्रसन्नता से भर उठा उनकी कांती पुनह चमक उठी और उन्होंने देवताओं को शीघ्र
11:16ही आने वाले शुब समाचार की सूचना दी
11:20देवताओं ने महाबली के भय से मुक्त होने की आशा में अदिती के चहरे पर उभी उस नई चमक को
11:27देखा और उनके मन में एक नई उम्मीद जगी
11:31कुछ समय बाद देवमाता अदिती के गर्भ में स्वयन परम्पिता परमात्मा ने प्रवेश किया जिससे एक अद्वितिय दिव्यप्रकाश और उर्जा
11:40का संचार हुआ
11:42ब्रहमांड के सभी लोकों में एक अद्वित उर्जा का संचार हुआ
11:47यह संकेत देते हुए कि शीघर ही एक ऐसे अवतार का जन्म होने वाला है जो तीनों लोकों का उद्धार
11:54करेगा
11:56देवमाता अदिती के गर्ब से उचसर्जित दिव्यप्रकाश तीनों लोकों में फैलने लगा
12:01जैसे स्वयन सूर्य अपनी पराकाश्था पर पहुँचकर ब्रहमांड को आलोकित कर रहा हो एक नए युग के आगमन की घोशना
12:09करते हुए
12:10इस अलोकिक उर्जा के संचार से भयभीत और विस्मित देवगन तथा रिशिमुनी अपनी तपस्या भंकर उस दिव्यप्रकाश की ओर मुखातिब
12:19हुए उनके चहरों पर श्रद्धा और आशा का अध्भुत मेल झलक रहा था
12:25देवमाता अधिती का गर्भ जो अब स्वय परमधाम बन चुका था एक सहस्त्र सूरियों के समान तेजस्विता से दमक रहा
12:33था उनके चहरे पर मात्रित्व की दिव्य आभा और ब्रहमांडिय शक्ती का संगम स्पष्ट दिख रहा था
12:41समस्थ ब्रहमांड अपनी धुरी पर घूमते ग्रहों और नक्षत्रों के साथ इस दिव्य घटना का साक्षी बनने के लिए जैसे
12:49थमसा गया था
12:50हर कन एक अध्भुत और शांत प्रतीक्षा में लीन था
12:54अधिती की तपस्या का चरम बिंदु निकट आ रहा था और उनके चहरे पर एक ऐसी दिव्य शांती और द्रिड
13:01संकल्प था जो यह दर्शाता था कि यह न केवल एक जन्म है बलकि एक ब्रहमांडिय प्रतिग्या की पूर्ती है
13:10देवलोक में बैठे परम्पिता ब्रहमा और भगवान विश्नु इस अध्वितिय अक्षन की प्रतीक्षा में अपनी दिव्य द्रिष्टी से तीनों लोकों
13:19का अवलोकन कर रहे थे उनके मुखमंडल पर संतोश और करुना का भाव था
13:25अधिती को प्रसव की तीवर वेदना होने लगी किन्तु हर पीडा के साथ एक अध्वितिय दिव्य उर्जा उनके शरीर से
13:33निकल कर ब्रहमांड में समाहित हो रही थी जैसे स्वयन स्रिष्टी का सर्जन हो रहा हो
13:39धर्ती ने अपनी छाती पर कमपन महसूस किया आकाश ने अपने तारों को जुका दिया और नदिया अपनी धाराओं में
13:47एक पवित्र गर्जना ले आई जैसे सभी प्रकृती उस महान अवतार का स्वागत करने को आतुर हो
13:54और फिर एक स्वर्णिन प्रकाश के भयंकर विस्पोट के साथ जोक्षन भर के लिए तीनों लोकों को चकाचौंध कर गया
14:03देवमाता अधिती ने एक ऐसे शिशु को जन्म दिया जिसने ब्रहमांड की नियती को सदा के लिए बदल दिया
14:10अपनी गोद में स्वयम परम्पिता परमात्मा को एक दिव्य शिशु के रूप में देखकर देवमाता अधिती के नेत्रों से आनंद
14:18के अश्रु बहने लगे
14:19और उनके हृदय में अध्वितिय वातसल्य और ब्रहमांडिय प्रेम उमड पड़ा
14:25यह शिशुक जिसका नाम वामन रखा गया आकार में अत्यंत लगु था परन्तु उसकी आखों में तीनों लोकों का ज्यान
14:33और उसके मुखमंडल पर एक अलोकिक तेज था जो भविश्य की महान लीलाओं का संकेट दे रहा था
14:41स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा हुई दिव्य दुन्दुभिया बज उठीन और गंधरवों ने ऐसे मधुर गीत गाये की समस्त ब्रहमांड
14:49उस नवजात उधार करता के जन्म का जश्न मनाने लगा
14:53इस शुब समाचार को सुनकर दूर दूर से देवता, रिशी और सिधजन देवमाता अधिती के पवित्र आश्रम में एकत्रित हुए
15:02सब उस ननहे वामन के दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे
15:08भगवान ब्रहमा और भगवान शिव अपनी अपनी दिव्य शक्तियों के साथ वहाँ पधारे और उस शिशु वामन को अपने आशिरवाद
15:16से सित्त किया
15:17यह जानते हुए कि वह स्वय नारायन का अवतार है
15:22अपने दिव्य माता पिता के संरक्षन में वामन धीरे धीरे बढ़ने लगे हालांकि उनका आकार बौना ही रहा परंतु उनकी
15:31बुद्धी और ज्यान की चमक दिनों दिन बढ़ती जा रही थी
15:35उनकी उपस्थिती मात्र से तीनों लोकों में शान्ती और सद्भाव की एक अद्रिश लहर दोड़ गई
15:42असुरों के बढ़ते प्रभाव के बावजूद देवताओं के हरिदय में एक नई आशा का संचार हुआ
15:49वामन के उपनेयन संसकार का समयाया एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान जो उन्हें एक पूर्ण ब्रहमचारी के रूप में स्थापित करेगा
15:57जिसके लिए दिव्य लोक में विशेश तयारियां की जाने लगी
16:02सूर्यदेव ने उन्हें गायत्री मंत्र का उपदेश दिया ब्रिहस्पती ने उन्हें पवित्र यग्योपवीत प्रदान किया और कशप मुनी ने उन्हें
16:11मेखला दी जिससे वामन एक पूर्ण ब्रहमचारी के रूप में सुसजित हुए
16:17इस शुब संसकार के बाद वामन देव एक छोटे तेजस्वी ब्रहमचारी के रूप में तयार थे जिनके हाथ में दंड
16:25और कमंड लुथा और उनकी आखें एक महान उद्देश की ओर केंद्रित थी
16:31अब यह ननहा ब्रहमचारी तीनों लोकों के उद्धार के लिए अपनी दिव्य यात्रा पर निकलने को तयार था जहां उसे
16:39महाबली के अहमकार का सामना करना था और स्विष्टी में धर्म को पुनस्थापित करना था
16:46ननहें वामंदेव ने तीनों लोकों को अपने संकल्प की शक्ती से धारण करते हुए देवत्व और धर्म की पुनस्थापना के
16:54लिए अपनी अलोकिक यात्रा का आरंभ किया उनके हर कदम में ब्रहमांड का मौन आवाहन समाया था
17:02दूरक्षीर सागर में भगवान विश्नु अपने शेशनाग पर विराजमान इस ननहे ब्रहमचारी की प्रत्येक पच्चाप को मुस्कान के साथ निहार
17:11रहे थे जानते हुए कि यह उनकी ही लीला का आरंभ है
17:17प्रत्येक कदम के साथ वनस्पती और जीवजन्तु उनके दिव्य तेज से प्रकाशित हो उठते थे जैसे स्वयं प्रकृती उनके आगमन
17:26का जयगोश कर रही हो
17:28आकाश में सब्तरिशियों ने आशिर्वाद के रूप में पुष्प वर्शा की और दिशाओं ने उनके महान उद्देश की घोशना करते
17:36हुए मंगल ध्वनी की
17:39अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते हुए वामन देव अब एक ऐसे च्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे जहां दैत्यों का
17:46एश्वर्य और भव्यता धर्म के नियमों से विमुख होकर अपने चरम पर थी
17:52स्वर्ग में इंद्रदेव और अन्य देवतागन अधीर्ता से इस अध्भुत लीला के सूत्रपात की प्रतीक्षा कर रहे थे उनके हृदय
18:00आशा से स्पंदित थे
18:03दूर से ही उन्हें भव्य अश्वमेध, यग्य के धुए के बादल और वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनी सुनाई देने लगी जो
18:11महाबली के विराट यग्यकुंद से उठ रहे थे
18:15एक और जहां साद्गी और ब्रहमचर्य की प्रतिमूर्ती वामंदेव थे, वहीं दूसरी और अदमय शक्ती और सांसारिक वैभव का प्रतीक
18:24महाबली का यग्य चल रहा था, दोनों में एक अद्रिश्य संधर्ष आरंभ हो चुका था
18:30अंतह ननहे ब्रहमचारी ने उस विशाल यग्य मंडप के द्वार पर कदम रखा, जहां सहसरों दैत्य, रिशी और गणमान्य व्यक्ती
18:39महाबली के यग्य में भाग ले रहे थे
18:42यग्य वेदी पर आसीन, महाबली, अपने गुरु शुक्राचार्य के साथ, अपने दान और पराक्रम के सर्वोच शक्षनों में लीन थे,
18:51अन्भिग्य की उनका भाग्य अब एक नया मोड लेने वाला था
18:56मंडप में प्रवेश करते ही, उनके दिव्य तेज से वातावर्ण में एक अध्भुत शान्ती फैल गई, और उपस्थित सभी की
19:04दृष्टी स्वतह ही इस नन्हे ब्रहमचारी पर टिक गई
19:08जैसे ही वामंदेव ने कदम रखे, यग्य की अगनी और मंत्रों की ध्वनी में एक शनिक ठहराव आया, जैसे स्वयनकाल
19:16भी इस महत्वपूर्ण आगमन का साक्षी बनने को उच्सुखो उठा हो
19:22अपनी द्रिड़ता और विन्मरता के साथ वामंदेव ने धीरे-धीरे यग्य वेदी की ओर बढ़ना आरंब किया, जहां महाबली अपने
19:30मंत्रियों और पुरोहितों से घिरे हुए थे
19:34आचार्य शुक्राचार्य ने अपनी दूर्द्रिष्टी से तुरंत इस ननहे बालक के पीछे छिपी अद्भुत शक्ती को भाप लिया और उनके
19:42माथे पर चिन्ता की लकीरें उभराई
19:46महाबली ने अपने अतिथी धर्म का पालन करते हुए उस तेजस्वी बालक को सादर आमंत्रिप किया और अपने सिन्हासन से
19:54उठकर उसका अभिनंदन किया, अपने नेती से अन्भिग्य
19:58यह वह क्षण था जब दाता और याचक के बीच का अंतर मिकने वाला था, एक ऐसा दान मांगा जाने
20:06वाला था जो तीनों लोकों के भाग्य को बदलने की क्षमता रखता था
20:11के तेजस्वी ब्रहमचारी आपका स्वागत है, महाबली ने अपने पराक्रम और दानवीर्ता के गर्व के साथ कहा, आपकी इच्छा क्या
20:20है?
20:21मैं आपको वह सब कुछ देने के लिए तयार हूँ जो मेरे सामर्थ्य में है
20:28वामंदेव ने मंद मुस्कान के साथ महाबली की ओर देखा, उनकी आखों में ब्रहमांड की समस्ट शांत शक्ती और ग्रिड़ता
20:36भरी हुई थी, जैसे उन्हें अपने उद्देश का पूर्ण ज्यान हो
20:41ननहे ब्रहमचारी ने अपने कमंडलों को थोड़ा उपर उठाया और अत्यंत विनमर्ता से अपनी अलोकिक मांग रखने की तयारी की,
20:50जो महाबली के दानवीर्ता की परीक्षा थी
20:54समस्त ब्रहमांड ने अपनी सासे थाम ली थी, क्योंकि इस ननहेंग बालक की अगली वानी ही युगो युगो तक गुंजने
21:01वाली एक ऐसी प्रतिग्या को जन्म देने वाली थी, जो तीनों लोकों का भविश्य निर्धारित करती
21:09वामंदेव ने अपनी मधुर्वानी में तीनों लोकों को आश्चर यच्कित करते हुए महाबली से केवल तीन पक भूमी की याचना
21:17की, जो उनकी दानवीर्ता की परीक्षा थी
21:21महाबली ने अपनी सार्वभौमिक प्रतिग्या के अनुरूप ननहे वामन की विनमर याचना को ततकाल स्विकार कर लिया, बिना उसके पीछे
21:29की दिव्य युक्ती को समझे
21:33शुक्राचार्य दूर्दर्शिता से युक्तर ने तुरंक महाबली को इस अप्रत्याशित याचक की वास्तविक पहचान और उसके भयावह परिणामों के प्रति
21:42आगाह किया
21:43परंतु महाबली अपनी प्रतिग्या और दानवीर्ता के आदर्शों पर अटल ने अपने गुरु की चेताबनी को अनसुना करते हुए वामन
21:52को अपना वचन निभाने का द्रिड संकल्प दोहराया
21:57महाबली के वचन बद्ध होते ही ननहे वामन देव का दिव्य रूप धीरे धीरे बढ़ने लगा उनकी काया ब्रहमान्डिय शक्ती
22:05से भर कर अकल्पनिय विस्तार लेने लगी
22:09देवताओं ने अपने स्वर्ग से इस अध्भुत परिवर्तन को विस्मय से देखा जबकी महाबली और उनके दर्बारी भय और श्रद्धा
22:17के मिश्रन से स्टब्ध रह गए
22:20विराट वामन ने अपना पहला पग रखा और उनकी विशाल काया ने पलक जपकते ही पूरी प्रिथवी को अपने नीचे
22:27समेट लिया जिससे धरा काम उठी
22:30यह एक ऐसाक्षन था जब संपूर्ण ब्रहमांड ने स्वयं को एक ननहे बालक के पक तले सिमटते हुए महसूस किया
22:38उसकी दिव्य शक्ती की अनन्ता का साक्ष्य बन रहा था
22:43वामंदेव ने अपना दूसरा पग आकाश की ओर उठाया और उनके इस पग ने संपूर्ण स्वर्गलोग को अपनी परिधी में
22:51समाहित कर लिया जिससे देवगण चकित रह गए
22:55महाबली अब अपनी भूल का आभास करते हुए उस विराट स्वरूप के सम्मुक हाथ जोड कर खड़े थे जिनकी माया
23:03ने तीनों लोकों को एक ही क्षण में नाप दिया था
23:07तीसरे पक के लिए कोई स्थान न मिलने पर वामन देव ने महाबली से पूछा कि अब वह अपना अंतिम
23:14पक कहा रखें और ब्रहमांड का संतुलन एक नाजुक धागे पर लटक गया
23:20समस्त देवगण, रिश्यमुनी और दानव सभी इस अद्वितिय दुविधा को देख रहे थे जहां एक नन्हा बालक अपनी प्रतिग्या से
23:29पूरे ब्रहमांड को नियंत्रित कर रहा था
23:32अपनी प्रतिग्या और धर्म का पालन करते हुए महाबली ने बिना किसी हिचकी चाहट के वामंदेव को अपना शीश अर्पित
23:40कर दिया ताकि वे अपना तीसरा पग रख सकें
23:44वामन देव ने अपना तीसरा पग महाबली के शीश पर रखा और उन्हें ततकाल पाताल लोक में धकेल दिया, जिससे
23:52तीनों लोकों में पुनह संतुलन स्थापित हुआ
23:56जैसे ही वामन का पग महाबली के शीश पर पड़ा, दानवराज अपनी पूरी गरिमा के साथ पाताल लोक के अंधकार्मई
24:04डेप्स में विलीन होने लगे, एक नई दुनिया की ओर
24:08पाताल लोक के द्वार खुले, जो महाबली के लिए एक नई सत्ता और एक नए सामराज्य का प्रतीक थे, जहाँ
24:16वे धर्म पूर्वक शासन करने वाले थे
24:19माता अधिती ने अपने पुतर की विजए पर अशुर्वपूर्ण नेतरों से हर्ष व्यक्त किया, जबकि स्वर्गलोक में इंद्र ने अपना
24:27सिंहासन पुनह प्राप्त कर शांती की सांस ली
24:31ब्रह्मा अपने कमल सिनहासन पर विराजमान और शिव अपने कैलाश पर ध्यानस्थ दोनों ने इस दिव्य लीला पर अपनी मौन
24:40स्वीकृती और आशिरवाद प्रदान किये
24:43वामन देव अब अपने सामान्य रूप में लोटकर महाबली की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हीं चिरकाल तक पाताल के शासक
24:52बने रहने का अध्वितिय वर्दान दिया
24:55इस दिव्य लीला के साथ ब्रहमांडिय संतुलन पुनस्थापित हुआ और वामन अवतार ने दर्शाया की धर्म की रक्षा के लिए
25:03भगवान किसी भी रूप को धारण कर सकते हैं
25:08वामन अवतार की इस अध्वुत लीला के उपरांत तीनों लोकों में शान्ती और धर्म की पुनर्स्थापना हुई जिससे सभी देवगण
25:16आनंदित थे
25:18भगवान विश्णु अपने शेशनाग शया पर दिव्य मुस्कान के साथ विराजे उनकी आखों में ब्रहमांडिय प्रेम की गहरी चमक थी
25:28देवराज इंद्रक अब अपने सिनहासन पर पुनह प्रतिष्थित होकर वामन के शौर्य का बखान कर रहे थे उनके चहरे पर
25:36गर्व और कृतग्यता जहलक रही थी
25:40ब्रहमांडिय आकाश में दिव्य पुष्पों की वर्षा हो रही थी जो इस महान विजय के प्रतीक स्वरूप नीचे उतर रहे
25:47थे
25:49पाताल लोक में महाबली यद्यपी अपने राज्य से वंचित थे फिर भी वामन के प्रती अपनी प्रतिग्या और निष्था पर
25:57अडिग थे
25:59शुक्राचार्यत महाबली के गुरु अपने शिश्य की इस ग्रिडता और धर्म प्रायंता को देखकर मन ही मन विस्मित थे
26:07दैत्यगण अपने राजा के पराजय से हताश परंतु उसकी सत्यनिष्था से प्रेरित होकर एक नए भविश्य की ओर देख रहे
26:15थे
26:17समय की धारा शांत बह रही थी जो ब्रहमांडिय चक्र के एक और महत्वपूर्ण मोर का संकेट दे रही थी
26:25स्वर्ग में देवरिशी नारद अपनी वीना पर दिव्यधुन बजाते हुए वामन लीला का गुनगान कर रहे थे उनके कंट से
26:33अमरित्वानी प्रवाहित हो रही थी
26:36स्वयम ब्रहमा अपने कमल सिनहासन पर आसीम और शिव कैलाश पर ध्यानस्थ दोनों ने नारत की वानी पर अपनी सहमती
26:45जताई
26:46प्रत्येक तारा और ग्रह अपनी धुरी पर अधिक सामंजस्य से घूमने लगे मानो स्वयम ब्रहमांड ने एक गहरी सांस ली
26:54हो
26:56यह वामन लीला केवल एक कहानी नहीं बलकि अनंत काल तक गूंजने वाला धर्म और सत्य का शाश्वत संदेश बन
27:04गई
27:05प्रिथवी पर रिशिमुनियों ने इस अध्भुत घटना को अपनी तपस्या के माध्यम से अनुभव किया और ज्यानवर्धक प्रवचन दिये
27:15समुद्र देव अपनी लहरों के माध्यम से इस दिव्य लीला का गुंगान कर रहे थे, हर बूंद में शान्ती का
27:22संगीत था
27:24व्रिक्षों की हर पत्ती और फूलों की हर पंखुडी इस नवस्थापित ब्रहमांडिय व्यवस्था की गवाही दे रही थी
27:32चारों दिशाओं में एक पवित्र उर्जा का संचार हो रहा था, जो सभी प्राणियों को आशा और सध्भाव प्रदान कर
27:39रहा था
27:41वामन अवतार की गाथा, अब युगो-युगो तक सुनाई जाने वाली धर्म की विजय और विनमर्ता की शक्ती का प्रतीक
27:49बन गई
27:50यहां तक की कुछ दानव भी वामन के इस कृत्य से धर्म और मर्यादा का महत्व समझने लगे थे
27:58प्रत्येक हृदय में एक नई आशा का संचार हुआ, यह विश्वास की धर्म सदा अधर्म पर विजय प्राप्त करेगा
28:06इस प्रकार वामन लीला ने न केवल ब्रहमांडिय संतुलन बहाल किया, बल्कि अमर्ता का वह बीज बोया जो प्रत्येक युग
28:15में धर्म की रक्षा करेगा
28:17ब्रहमा के आशिर्वाद से प्राप्त असीम शक्तियों के साथ, दैक्यराज महाबली ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित करने हेतु
28:26अश्वमेध यग्य का भव्य अनुष्ठान आरंभ कर दिया था
28:31इसी भव्य यग्यस्थल पर एक तेजस्वी दिव्य शिशु रूप में भगवान विश्णू स्वय वामन के रूप में प्रकट हुए, जिनका
28:39आगमन तीनों लोकों के भाग्य को बदलने वाला था
28:44अपनी विनमृता से मोहित करते हुए, वामन ने महाबली से मात्र तीन पग भूमी का दान मांगा, जो देखने में
28:51एक साधारन सी इच्छा थी पर जिसका नहितार्थ गहरा था
28:56परंतु दैत्यगुरु शुक्राचार्य अपनी दिव्यद्रिष्टी से वामन के भीतर छिपी ब्रहमांडिय शक्ती को भाप चुके थे, उनके मन में गहरी
29:05चिन्ता घर कर गई थी
29:08भयभीत शुक्राचार्य ने ततकाल महाबली को एकांत में बुलाया, ताकि वह उसे इस असाधारन दान के परिनामों के प्रती आगाह
29:16कर सके
29:18गुरु शुक्राचार्य ने कम्पित स्वर में महाबली को बताया कि वामन कोई साधारन बालत नहीं, बलकी स्वय भगवान विश्णु है,
29:27जो छल से उसका सर्वस्व छीनने आये हैं
29:31महाबली ने अपनी दानशीलता और शौर्य के अभिमान में डूबा हुआ, गुरु की बात पर विश्वास करने से इनकार कर
29:39दिया, उसे यह एक निराधार भय लगा
29:43शुक्राचार्य का हृदय महाबली की इस अडिग मूर्खता पर पीड़ा से भर उठा, क्योंकि उन्हें भविश्य का भयावः चित्रस पष्ट
29:51दिख रहा था
29:53गुरु की चेतावनी को अनसुना करते हुए, महाबली अपनी प्रतिग्या पूरी करने के लिए वापस यग्य मंडप में वामन के
30:01समीप लोटा
30:03वामन अपनी दिव्य आभा से मंडप को आलोकित करते हुए, शान्ती और धैर्य के साथ महाबली के निर्नय की प्रतीक्षा
30:11कर रहे थे
30:13महाबली ने अपनी दानशील्टा की मर्यादा बनाये रखने के संकल्प से वामन को दिये गए वचन को दोहराया और दान
30:21देने की तैयारी की
30:23यग्य की पवित्र अगनी के समक्ष महाबली का द्रिड संकल्प एक अडिक परवत्सा खड़ा था, अपनी प्रतिग्या को पूरा करने
30:31को आतुर
30:33अपने शिश्य को इस विनाशकारी मार्ग पर जाता देख, शुक्राचार्य ने एक अंतिम हताश प्रयास किया और कमंडलू के छिद्र
30:41को बंद कर दिया
30:43वामन अपनी सर्वग्यता से शुक्राचार्य के इस कृत्य को तुरंत समझ गए और एक कुशा के तिनके से कमंडलू के
30:51छिद्र को अवरुध करने वाले गुरु को विवश किया
30:55जैसे ही कुशा का तिनका कमंडलू के छिद्र में प्रविष्ठ हुआ, शुक्राचार्य की एक आख में जाकर वह उन्हें अंधा
31:03कर गया, यह देवत्व की एक सुक्ष्म चाल थी
31:07गुरु के बाधित होने के बाद, कमंडलू से जल की धारा निर्बाध रूप से बह निकली, जो महाबली की प्रतिज्या
31:14के पूल्ण होने का प्रतीक थी
31:17महाबली ने पूल्ण श्रद्धा और निश्ठा के साथ अपने हाथों में जल लेकर वामन को तीन पक भूमी दान करने
31:25का संकल्प विधिवत पूल्ण किया
31:28दान स्वीकृत होते ही वामन का दिव्य रूप क्षन भर में विशालकाय होने लगा, ब्रहमांड के सभी लोकों को अपने
31:35भीतर समाहित करता हुआ
31:38महाबली और उपस्थित सभी दैत्य, वामन के इस अप्रत्याशित विसमेकारी विराट रूप को देखकर स्थब्ध रह गए, उनका अहंकार चूर
31:47-चूर हो रहा था
31:49पहला पग प्रिथवी को नाप गया, दूसरा स्वर्ग को, और तीसरे पग के लिए कोई स्थान ही शिश न रहा,
31:56जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया
32:00हे राजन, दो ही पगों में संपूर्ण स्रिष्टी समा गई, अब बताओ मेरा तीसरा पग कहा रखू
32:08भगवान वामन की यह गंभीर ध्वनी पूरे ब्रहमांड में गूंज उठी
32:13जब वामन देव ने तीसरे पग के लिए स्थान मांगा, तो दानवीर महाबली का मुख मंडल भय के बजाए एक
32:20अध्भुत और अलोकिक कांती से चमक उठा
32:24गुरु शुक्राचार्य ने अपने शिश्य को चेतावनी दी और इस दान को पूर्ण करने से रोकना चाहा, किन्तु दानवीर बाली
32:32ने अपने धर्म और प्रतिग्या को सर्वोप्री माना
32:36महाबली ने अनुभव किया कि यह केवल संपत्ती की हानी नहीं, बलकि स्वयं परंब्रहम द्वारा उनके अंकार का मर्दन करके
32:45उन्हें मोक्ष का मार्ग दिखाने का दिव्य आयोजन है
32:50यग्यमंडप में उपस्थित सभी दैत्य सेनाप्ती कुरुद्ध होकर वामन पर आक्रमन करने के लिए शस्त्र उठाने लगे, परंतु बाली ने
32:58एक ही संकेट से सभी को शांत कर दिया
33:02महाबली ने अत्यंत विनमर्ता से हाथ जोड कर कहा, हे प्रभु
33:07संपत्ती से बड़ा संपत्ती का स्वामी होता है, इसलिए आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिए
33:15इतना कहकर महान दानवीर बाली ने स्वयंको भगवान वामन के श्रीचर्णों में समर्पित करते हुए प्रिथवी पर अपना मस्तक जुका
33:24दिया
33:25दैत्यराज का ऐसा अभूत पूर्व समर्पन देखकर आकाश से देवताओं और गंधर्वों ने अद्भुत पुष पवर्षा प्रारंब कर दी और
33:34दिशाय महाबली के जैकारों से गूंच उठी
33:38सम्पूर्ण ब्रहमांड साक्षी बना जब एक दैत्यराजा ने अपने प्राणों और राज्य से उपर सत्य तथा प्रतिग्या के पालन को
33:46स्थान दिया
33:48भगवान वामन ने मंद मुस्कान के साथ अपने दिव्य और विशाल चरण को महाबली के मस्तक की ओर बढ़ाना प्रारंब
33:56किया
33:57जैसे ही वामन देव का तीसरा पक महाबली के सिर पर स्थापित हुआ, संपूर्ण संसार में एक अत्यंत पवित्र और
34:05अलौकिक प्रकाश फैल गया
34:08प्रभु के श्रीचर्णों के स्पर्ष मात्र से महाबली का बचाखुचा सुक्ष्म अहमकार भी भस्म हो गया और उनका हृदय विशुद्ध
34:16भक्ती से भरूठा
34:18तीसरे पक के दबाव से महाबली पाताल लोक में प्रवेश करने लगे, परंतु उनका चहरा किसी पराजय के दुहकी भाव
34:26से नहीं बलकी अपार आनन्द से दमक रहा था
34:30श्रीहरी विश्णु ने अपने वास्तविक चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर महाबली की सत्यनिष्ठा और दान्शील्ता की भूरी-भूरी प्रशंसा की
34:40भगवान विश्णु ने घोशना की की महाबली को पाताल लोग का सबसे समरिध सुतल लोग प्रदान किया जाता है, जो
34:48स्वर्ग से भी अधिक वैभवशाली होगा
34:51इसके साथ ही प्रभु ने वर्दान दिया कि आने वाले मनवंतर में महाबली इंद्र के पद पर सुशोभित होंगे
35:00भक्ती की पराकाश्ठा से प्रसन्न होकर जगतपालक विश्णु ने स्वयन महाबली के सुतल लोग के द्वारपाल बनने का महावर्दान भी
35:08सहर्ष स्वीकार कर लिया
35:11महाबली ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रभु के चर्णों में पुना नमन किया और समझ लिया कि परमिश्वर जब कुछ छीनते
35:18हैं तो उससे सहस्र गुना अधिक लोटा देते हैं
35:23इस प्रकार भगवान वामन ने देवताओं का स्वर्भी पुना लोटा दिया और अपने परम भक्त महाबली को अमर्यश तथा भक्ती
35:32का वर्दान भी दे दिया
35:34महाबली का यह महान त्याग युगों युगों तक यह संदेश देता रहेगा कि संपून आत्मसमर्पण ही इश्वर की सरवोच कृपा
35:42प्राप्ती का एक मात्र साधन है
35:46भगवान वामन ने जैसे ही अपना तीसरा चरण दानवीर महाबली के सिर पर रखा, संपूर्ण ब्रहमाड में उनकी अनन्य भक्ती
35:55की जैजैकार गूंज उठी
35:57प्रभु के दिव्य चरणकमल का स्पर्ष होते ही राजा बली का समस्थ अहंकार भस्म हो गया और उनका हृदय पराभक्ती
36:05के निर्मल प्रकाश से आलोकित हो उठा
36:08धर्ती धीरे से मार्ग देने लगी और महाबली अत्यंत प्रसंता पूर्वक पाताल लोक की दिशा में गमन करने लगे
36:17स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर और भव्य पाताल लोक का सुतल छेत्र अपने नए धर्मात्मा समराट का स्वागत करने के
36:25लिए दीप्तिमान हो गुठा
36:27जब महाबली ने सुतल लोक में प्रवेश किया तो वहां के सिध्धों और मुनियों ने पुष्पवर्शा कर उनका अभिनन्दन किया
36:36इसी क्षण भगवान वामन अपने परम दिव्य चतूर भुज नारायन स्वरूप में प्रकट होकर पूरे सुतल लोक को अपने तेजों
36:44में प्रकाश से भर देते हैं
36:47श्री हरी ने मधुरवानी में कहा कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी तुमने अपना बचन निभाया जिससे
36:55मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ
36:57भगवान विश्णू ने बली को सुतल लोक का निश्कंटक राज्य सौपा और आने वाले सावर्णी मनवंतर में उन्हें देवराज इंद्र
37:05बनने का वर्दान दिया
37:08महाबली ने प्रभु के इस असीन वात्सले को देख कर अश्रुपूरित नेत्रों से उनके चर्णों में बारंबार साष्टान प्रणाम किया
37:16तब अंतर्यामी नारायन ने महाबली को एक ऐसा वर्दान दिया जिसने तीनों लोकों को स्तब्ध कर दिया
37:24उन्होंने स्वयन सुतल लोक का द्वारपाल बनना स्विकार किया
37:29भगवान विश्नु स्वय गदाधारण कर सुतल लोक के विशाल स्वन द्वार पर राजा बली के प्रहरी के रूप में विराजमान
37:37हो गए
37:38उपर स्वर्ग लोक में खड़े देवराज, इंद्र और समस्त देवता इस अध्भुत द्रिश्य को देखकर भक्तिभाव से नत्मस्तक हो गए
37:47इंद्र को उनका खोया हुआ स्वर्ग का सिनहासन पुनः प्राप्थ हो गया और उनका अहंकार सदा के लिए समाप्थ हो
37:55गया
37:56महर्शी कश्यप और माता अधिती ने वामन प्रभु की आरती उतार कर उनकी इस पावन लीला का गान किया
38:04ब्रहमा जी ने अपने कमंडलू के जल से ब्रहमांड का अभिशेक किया जिससे तीनों लोकों में धर्म की पुनरस्थापना हुई
38:13स्वर्ग पृत्वी और सुतल लोक एक नए धर्मयुक के आगमन का उत्सव मनाने लगे जहां न्याय और सत्य का सर्वोप्रिशासन
38:22था
38:23राजा बली ने सुतल लोक में प्रजा का अपनी संतान की भाती पालन किया और सत्यधर्म का दीप सदा जलाय
38:30रखा
38:32द्वार पर खड़े भगवान विश्नु की उपस्थिती से सुतल लोक पर कोई भी असुरी शक्ती द्रिश्टी डालने का साहस न
38:39कर सकी
38:41भगवान वामन की यह लीला सिखाती है कि जब जीव इश्वर को सब कुछ समर्पित कर देता है तो इश्वर
38:48स्वयन उसका रक्षक बन जाता है
38:51इस प्रकार पद्म पुरान का यह पावन अध्याय वामन अवतार और दानवीर महाबली के अमर यश्की गाथा पूर्ण करता है

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