सृष्टि के आरंभ में वेदों की वापसी के बाद, ब्रह्मा जी ने जब रचना का कार्य संभाला, तो उन्हें एक नई और विकराल चुनौती का सामना करना पड़ा। क्या थी वो चुनौती जिसने स्वयं ब्रह्मा को भी विचलित कर दिया? जब उनकी मानस संतानों ने सृष्टि को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और क्रोध से भगवान शिव का प्राकट्य हुआ, तब ब्रह्मांड एक नए मोड़ पर खड़ा था। लेकिन असली संकट तो तब आया जब पृथ्वी स्वयं अथाह जल में समाने लगी! कौन बचाएगा सृष्टि के आधार को? इस एपिसोड में देखें भगवान विष्णु के अद्भुत वराह अवतार की गाथा, जिन्होंने महाशक्तिशाली हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को जल से बाहर निकाला और स्थिर किया। यह एक ऐसी कहानी है जो आपको सृष्टि के सबसे बड़े संकट और उसके अलौकिक समाधान से रूबरू कराएगी! #PadmaPurana #VarahaAvatar #HinduMythology #Vishnu #Brahma #Hiranyaksha #PauranikKatha #MysteriesOfCreation #SanatanDharma #YouTubeMythology #EpicStories #DivineIncarnations
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00:00वेदों की पुनरप्राप्ती के पश्चात भगवान ब्रहमा उस असीम शांत ब्रहमांडिय विस्तार में गेहन चिंतन में लीन हो गए, जहां
00:08उनकी आगामी स्रिष्टी का बीज अंकुरित होने को था।
00:12उनके प्रतेक मुख पर एक गेहन संकल्प की आभा थी, जैसे ब्रहमांडिय शूनि में एक नया अध्याय लिखने की आतुर्ता
00:21और उन्होंने अपने भीतर स्रिष्टी की विराट योजना को अनुभव किया।
00:26स्रिष्टी के गेहन उद्देश को साकार करने हेतु, उन्होंने अपनी दिव्य संकल्प शक्ती को केंद्रित किया, और उनके मस्तिष्क के
00:35हरिदय से एक अकल्पनिय उर्जा का प्रवाह होने लगा।
00:38इस दिव्य उर्जा के स्पंदन से संपूर्ण ब्रहमांडिय कमल काम्प उठा, जैसे स्वयंकाल और स्थान भी उस परम संकल्प के
00:47साक्षी बन रहे हो।
00:50ब्रहमा के मन से उध्भूत होने वाली वह निर्मल शक्ती धीरे-धीरे साकार होने लगी, जैसे अंगड हीरे से कोई
00:57अध्वितिय रत्न आकार ले रहा हो।
01:01उनकी एक आग्रता और संकल्प की पराकाष्ठा पर ब्रहमा के दिव्य मन से चार तेजस्वी आकरितिया एक साथ प्रकट हुई,
01:09जो स्वया उनके शुद्ध विचार के अंश थी।
01:13ये चार मानस पुत्र थे, सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार जो लुवावस्था के शाश्वत प्रतीक और परम ज्यान के
01:21मूर्त रूप थे।
01:23उनके आगमन से ब्रहमांडिय वातावर्ण में एक पवित्र शान्ती चा गई, जैसे दिव्य ज्यान की एक अविरल धारा प्रवाहित हुई
01:32हो, और कमल की पम्खुडिया भी उनके तेज से जगमगा उठी।
01:37ब्रहमां ने अपने मानस पुत्रों को देखकर असीम आनंद का अनुभव किया, उनके मुखों पर गर्व और प्रेन का भाव
01:44सपष्ट जलक रहा था।
01:47उन्होंने इस नहपूर्ण दृष्टी से उन्हें निहारा, जैसे एक पिता अपने बच्चों में भविश्य की अनंत संभावनाओं को देखता है,
01:55और उनके मन में सृष्टी के विस्तार की योजना आकार लेने लगी।
02:00ब्रहमा ने अपनी गंभीर और मधुरवानी में उनसे कहा, हे पुत्रों, मैंने तुम्हें सृष्टी के विस्तार के लिए उत्पन्न किया
02:08है, जाओ और जगत को अपनी संतानों से भर दो।
02:12उनकी आज्या एक दिव्य उद्गोशना की तरह ब्रहमांड में गूँच उठी, जिसमें स्रिजन का मूल मंत्र नहित था, जो अस्तित्व
02:21की प्रतेक किरण को प्रकाशित करता था।
02:24किन्तु कुमारों के हृदय में सांसारिक विस्तार से अधिक परमग्यान और वैराग्य की तीवर इच्छा थी, जिसने उन्हें ब्रहमा की
02:33इच्छा के विरुध खड़े होने पर विवश्च किया।
02:36उन्होंने विनमरता पूर्वक ब्रहमा से कहा कि वे केवल परमार्थ के मार्ग पर चलना चाहते हैं, जिसका अर्थ था तपस्या
02:45और आत्मग्यान की साधना, न की भौतिक स्रिष्टी का विस्तार।
02:50ब्रहमा का मुख मंडल एक क्षण के लिए अचमभे से भर गया, फिर उनके मस्तक पर हलकी सी क्रोध की
02:57रेखाएं उभरने लगी, क्योंकि उनकी प्रथम स्रिष्टी ने ही उनके आदेश का उलंधन किया था।
03:04कुमारों ने अपने निर्नय पर अडिक रहते हुए ब्रहमा को प्रणाम किया और परम ज्ञान की खोज में उस शांत
03:11ब्रहमांडिय विस्तार में विलीन हो गए।
03:14अपने मानस पुत्रों द्वारा अस्वीकृत होने के पश्चात, ब्रहमा ने स्वयं को अकेला और अपनी महान स्रिष्टी योजना को अधूरी
03:23पाया, जिससे उनके हृदय में गहराक्शोब उत्पन हुआ।
03:27उनकी असफल्ता के इस क्षण में ब्रहमांडिय कमल के चारों और की दिव्यशांती भंग होने लगी और उर्जा के सुक्ष्म
03:35भंवर बनने लगे, जो उनके आंतरिक अशांती को दर्शाते थे।
03:40उनके अंदर स्रिजन का अदमे आवेग और पुत्रों के वैराग्य के कारण उपजा असंतोष एक साथ टक्रा रहे थे, जिससे
03:49उनके मस्तक पर एक गहन आवेग का दबाव बढ़ने लगा।
03:53यह अव्यक्त क्रोध और स्रिजन के रुके हुए आवेग ने ब्रहमांडिय संतुलन में एक सुक्ष्म दरार पैदा कर दी, जो
04:01आने वाले तीवर परिवर्तनों की प्रस्तावना थी।
04:06ब्रहमा के भीतर का उबलता क्रोध, जो अब तक अव्यक्त था, ब्रहमांडिय कमल के चारों और सुक्ष्म रूप से हिलने
04:13लगा, जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती अस्तित्व के तानेबाने को जखजोर रही हो।
04:19उनके मस्तक के मध्य में, जहां शांत ध्यान की आभा रहती थी, अब क्रोध की एक असहज लालिमा फैलने लगी,
04:27जो एक आसन्न विस्पोट का संकेत थी।
04:31इस अथाह पीडा और अवमानना से उत्पन क्रोध की अगनी से, उनके माथे से अचानक एक गहरे नीले रंग का
04:39शिशु प्रकट हुआ, जिसकी आखें क्रोधा अगनी से लाल थी।
04:43वह शिशु जो ततकाल ही युवा पुरुष में परिवर्थित होने लगा, अपनी उत्पत्ती के साथ ही तीवर गर्जना करने लगा,
04:52जिससे ब्रहमान्डिये शांती भंग हो गई।
04:54उस नवजात उर्जा के क्रोध पूर्ण रुदन से ब्रहमान्डिये कमल का वातावन काप उठा, और ब्रहमाने उसे शांत करने का
05:03प्रयत्न किया, पर वह शिशु शांत नहीं हुआ।
05:07ब्रहमाने उस क्रोधित शिशु को रुदर नाम दिया, क्योंकि वह अपनी उत्पत्ती के क्षण से ही निरंतर रो रहा था,
05:14जिसका अर्थ है रुलाने वाला या चीखने वाला।
05:18रुदर ने अपनी गरजना बंद करते हुए अपने नाम और रहने के लिए स्थानों की मांग की, जैसे एक बालक
05:26अपने अधिकार की मांग करता है।
05:29ब्रह्मा ने उसे शांत करने के लिए ग्यारह नामों और ग्यारह स्थानों का प्रस्ताव दिया, जिससे रुद्र के स्वरूप से
05:37एकादश रुद्रों का प्रादुर्भाव हुआ, प्रत्येक अपनी अनूठी शक्ती के साथ।
05:42ब्रह्मा ने एकादश रुद्रों और उनकी पत्नियों को स्रिष्टी के विस्तार में सहायता करने का निर्देश दिया, परंतु उनके उग्रस्वभाव
05:51ने इस कार्य में बाधा उत्पन्न की।
05:54रुद्रों ने अपनी क्रूर प्रकृती के कारण भयानक और विनाशकारी जीव उत्पन्न करने आरंभ कर दिये, जिससे ब्रह्मा को चिंता
06:03हुई।
06:04ब्रह्मा ने रुद्रों को अपनी विध्वनसक स्रिष्टी रोकने का आदेश दिया, क्योंकि उनके द्वारा उत्पन्न प्राणी ब्रह्मांडिय संतुलन को बिगाड
06:13रहे थे।
06:15ब्रह्मा के आदेश पर रुद्र अपनी पत्नियों सहित तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान कर गए, जिससे स्रिष्टी का
06:22कार्य पुन्ह थम गया।
06:24अब अकेले रह गए ब्रह्मा ने पुन्ह स्रिष्टी के विस्तार के लिए गहन चिंतन किया, क्योंकि उनके प्रारंभिक सभी प्रयास
06:32विफल हो चुके थे।
06:35उनके गहन ध्यान से दस मानस पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें प्रजापती के नाम से जाना गया, जो मन से
06:42उत्पन हुए थे।
06:44ब्रहमा ने इन प्रजाप्तियों को सृष्टी के विस्तार और प्रजा के स्रिजन का आदेश दिया, ताकि ब्रहमांड में जीवन का
06:51चक्र सुचारु रूप से चल सके.
06:55प्रजाप्तियों ने ब्रहमा की आग्या मान कर स्रिष्टी के विस्तार में योगदान देना आरंभ किया, जिससे जीवन के नए रूपों
07:03का प्रादुर्भाव होने लगा
07:05हाला की प्रजाप्ति अपने कार्य में लगे थे, परन्तु स्रिष्टी की गती ब्रहमा की अपेक्षा से धीमी थी, जिससे उनके
07:13मन में पुनह चिंता उत्पन हुई
07:16स्रिष्टी को त्वरित करने के लिए, ब्रहमा ने अपने ही शरीर को दो भागों में विभाजित करने का असाधारन निर्णय
07:23लिया, एक पुरुष और एक स्त्री के रूप में
07:27उनके शरीर के दाहिने भाग से तेजस्वी स्वयंभोव मनु प्रकट हुए और बाए भाग से सुन्दर शत्रूपा ने जन्म लिया,
07:35जो स्रिष्टी की पहली मानव युगल बनी
07:38इस प्रथम युगल ने स्रिष्टी के विस्तार के लिए स्वयं को समर्पित किया, जिससे मानव जाती का बीज बोया गया
07:46और ब्रह्मांड में जीवन की विविधता आरंभ हुई
07:50मनु और शत्रूपा के प्राकटे के उपरांट, ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना के अथा कार्य को आगे बढ़ाने का प्रयास
07:57किया, किन्तु उन्हें अपार चुनोतियों और गेहन एकाकीपन का सामना करना पड़ा
08:03रचना की अनवरत धारा में, जब अज्यानता और अंधकार की बाधाय उत्पन हुई, तो ब्रह्मा के भीतर एक असहनिय निराशा
08:12और क्रोध धीरे-धीरे पन्पने लगा
08:16जैसे जैसे स्रिष्टी के जटिल चक्र उलचते गए, ब्रह्मा ने स्वयां को एक गेहन चक्रवियों में फसा हुआ महसूस किया,
08:23जिससे उनका मन अत्यंत अशांत और व्याकुई हो गया
08:28उनकी बढ़ती हुई व्यथा से, पूरे ब्रह्मांडिय वातावर्ण में एक बेचैनी का संचार होने लगा, मानो स्वयां आकाश भी उनके
08:36आंतरिक संधर्ष से थर्रा रहा हो
08:39यह अवसाद और क्रोध इतना गहरा हो गया कि ब्रह्मा का समस्त मुखमंडल एक दहकते हुए सूर्य के समान लाल
08:47हो उठा, उनकी दिव्य आभा में भी एक भयंकर ज्वाला धधकने लगी
08:53उनके नेत्रों से अगनी की लप्ते निकलने लगी और उनके माथे पर चिंता की गहरी रिखाए क्रोध की पराकाश था
09:01को दर्शाने लगी
09:03और फिर उनके भुरुमध्य से एक अविश्वसनी उर्जा का संचय हुआ, जो एक तेजस्वी बिंदु में केंद्रित होकर तीवरगती से
09:11बढ़ने लगा
09:13जैसे ही वह बिंदु अपनी पराकाश था पर पहुँचा, एक शक्तिशाली विस्फोट हुआ, जिससे ब्रहमांडिय ध्वनी गूंज उठी और एक
09:22भयंकर बालक का प्राकट्य हुआ
09:25जह बालक जिसका तेज सूर्य से भी अधिक था, ब्रहमा के भुरुमध्य से प्रकट होते ही रोने लगा, उसकी चीखें
09:33समस्थ स्रिष्टी में गूंज उठी
09:36ब्रहमा अपनी ही स्रिजन शक्ती के इस अप्रत्याशित रूप को देखकर कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए, उनके चहरे
09:43पर विस्मय और एक नई आशा के भाव उग्रे
09:48बालक ने अपनी तीखी रुदन भरी आवाज में पूछा मेरा नाम क्या है और इस विशाल ब्रहमांड में मेरा स्थान
09:55कहा है
09:57उस बालक का रुदन और प्रश्न इतने शक्तिशाली थे कि वे ब्रहमांड की नीम तक को जख जोर गए, जिससे
10:05नवस्रिजित लोकों में कमपन महसूस हुआ
10:08ब्रहमां ने अपने भीतर एक गहन संबंध को पहचानते हुए, उस बालक की ओर स्नेहपूरवक देखा, उसकी तीवर उर्जा और
10:17अश्रूओं को शांत करने का प्रयास किया
10:20शांत स्वर में ब्रहमां ने उस रोते हुए बालक को संबोधित किया, तुम मेरे क्रोध से उत्पन हुए हो, इसलिए
10:28तुम्हारा नाम रुद्र होगा, जिसका अर्थ है रुलाने वाला
10:32उन्होंने आगे कहा, हे रुद्र, तुम केवल एक रूप में नहीं, बलकि कई रूपों में प्रकट होगे, जो स्रिष्टी के
10:40विभिन पहलूओं का प्रतिनिधित्व करेंगे
10:43रुद्र का रुदन धीरे-धीरे शान्थ होने लगा, क्योंकि उसे अपने अस्तित्व का अर्थ और अपनी भूमिका का संकेत मिलने
10:51लगा था
10:53ब्रह्मा ने उसे साथ अन्य नाम दिये, भव, शर्व, ईशान, पशुप्ती, भीम, उग्र और महादेव, प्रत्येक नाम ब्रह्मांड में उसकी
11:02विविद शक्तियों का प्रतीक था
11:05प्रत्येक नाम के साथ ब्रह्मा ने रुद्र को एक विशेश स्थान और एक अद्वितिय कार्य सौपा, जिससे उसकी बहुआयामी प्रकृती
11:13का बोध हुआ
11:15बालक रुद्र ने ब्रह्मा के वचनों को आत्मसाथ किया, और उसकी आखों में अब केवल संकल्प और अपनी नेती को
11:23पूरा करने की अदमय शक्ती जहलक रही थी
11:26इस प्रकार ब्रह्मा के क्रोध से उत्पन हुए, किन्तु अब अपने दिव्य उत्देश से उत्परोत रुद्र ने स्रिष्टी के संतुलन
11:34और विनाश की शक्ती के रूप में अपनी यात्रा आरंभ की
11:39ब्रह्मा की आग्या पाकर, रुद्र ने अपने भीतर छुपी असीम दिव्य शक्ती का आहवान किया ताकि वे नवस्रिजित ब्रह्मांड में
11:47संतुलन स्थापित करने के लिए अपनी संतानों की रचना कर सकें
11:52अपने महान संकल्प को सिध करने के लिए रुद्र ने अपने तपस्वी स्वरूप को जागरित किया और उनके दिव्य चक्षु
12:00प्रचन्ड तेज से प्रजवलित हो उठे
12:03रुद्र के तेजस्वी शरीर से तुरंथी उनके ही समान पराक्रमी, भयानक और अदमे रुद्रगन उत्पन होने लगे
12:12अंगिनत प्रचन्ड स्वरूपों के प्रकट होते ही दिशाएं गूंज उठीन और संपून ब्रहमांडिय व्योम में तीवर अगनी की लप्तें फैलने
12:20लगी
12:22ब्रहमा लोग के विशाल छेत्र में सहसरों रुद्रगन एकत्रित होने लगे जो अपने हाथों में चमचमाते त्रिशूल और फरसे धारन
12:30किये हुए थे
12:31इन नवनिर्मित रुद्रों की आखों में प्रल्यकारी ज्वाला धधक रही थी और उनका विक्राल रूप देखकर ब्रहमांडिय प्राणी भैभीत होने
12:41लगे
12:41ये भयानक रुद्रगन अपनी हुंकार से दिशाओं को कमपाने लगे और स्रिश्टी के प्रारंभिक धाचे को अपने प्रचंड वेख से
12:50जगजोरने लगे
12:52स्रिश्टी के लालन पालन से पहले ही सर्वत्र विनाश का सामराज जिस्थापित होने का संकट मंडराने लगा
13:00विशाल कमल सिनहासन पर विराजमान ब्रह्मा जी ने देखा कि उनकी पूरी स्रिश्टी इस अनियंतरित और उग्र रुद्र सेना के
13:08प्रकोप से घिरती जा रही है
13:11रुद्रों की विनाशकारी प्रकृती को देखकर ब्रह्मा का चित अत्यंत चिंतित हो उठा और उनके चारों मुखों पर भय एवं
13:19व्याकुलता के भाव छा गए
13:22नवत्पन रुद्र स्रिष्टी के तत्वों का भक्षन करने और अंधकार को नश्ट करने के लिए तत्पर होकर चारों दिशाओं में
13:30जपटने लगे
13:32ब्रह्मा की शान्ति पूर्ण स्रिजन शक्ती और रुद्रों की प्रचंड विनाशात्मक उर्जा के बीच एक तीखा ब्रह्मांडिय तकराव उत्पन हो
13:40गया
13:41ब्रह्मा ने तुरंट अपना दिव्यदाहिना हाथ उठा कर रुद्र को संबोधित किया और उन्हें इस भयानक स्रिजन को रोकने का
13:50आदेश दिया
13:52ब्रह्मा ने रुद्र से कहा कि ऐसी अदमय और उग्र संताने नवस्रिजित संसार का पालन करने के बजाए उसके कोमल
13:59अंकुरों को भस्न कर देगी
14:02पिता ब्रह्मा की गंभीर वानी सुनते ही रुद्र ने तुरंट अपनी स्रिजन प्रक्रिया को रोक दिया और शांत मुद्रा में
14:09उनके सम्मुख खड़े हो गए
14:12ब्रह्मा के आदेश की ध्वनी से उग्र रुद्रगन आकाश में ही ठहर गए और उनकी भयंकर गर्जना एक शांत स्तब्धता
14:20में बदल गई
14:22ब्रह्मा ने रुद्र को निर्देश दिया कि वे अब और ऐसी उग्रसंतानों को जन्म न दें बलकी सृष्टी कल्यान हेतु
14:30कठिन तपस्या में लीन हो जाएं
14:33ब्रह्मा ने समझाया कि तपस्या द्वारा प्राप्त शक्ती ही भविश्य में संपून स्रिष्टी के संतुलन और महाप्रलय के समय काम
14:41आएगी
14:42रुद्र ने ब्रह्मा के इस न्याय संगत आदेश को सहश शिरोधार्य किया और पिता के चर्णों में सादर नमन करके
14:50संहारक स्रिजन का अंत किया
14:52इस प्रकार उग्रस रिजन थम गया और रुद्र घोर तपस्या के मार्ग पर अग्रसर हुए जिससे नवनिर्मित ब्रहमांड में शान्ती
15:01और संतुलन का पुनह संचार हुआ
15:03रुद्र के प्रस्थान के पश्चात ब्रहमा ने नवनिर्मित ब्रहमांड के विशाल रिक्तपन को देखा और संतुलित स्रिष्टी के विस्तार की
15:12आवश्शक्ता को समझा
15:13तब उन्होंने अपनी मानस शक्ती से ऐसे प्राणियों को उत्पन करने का द्रिड संकल्प किया जो उनकी दिव्यचेतना और संतुलन
15:23की भावना से उत्प्रोथ होंगे
15:26ब्रह्मा के मन से सर्वप्रथम तेजस्वी रिशी मरीची का प्राकट्य हुआ जो प्रकाश और गेहन ज्यान के प्रतीक थे
15:35मरीची के उपरांत आध्यात्मिक खोज का प्रतिनिधित्व करते हुए शांत और विचार्शील उजा के साथ अत्री प्रकट हुए
15:43इसके पश्चात, तीवर तपस्या और पवित्र अगनी का प्रतीक महर्शी अंगिरा ने स्वरूप लिया जो भविश्य में यग्यों का मार्गदर्शन
15:52करने हे तु ततपर थे
15:55फिर अपने विशाल ज्यान और महान वंश के लिए विख्यात पुलस्ते का उदे हुआ, जो गेहन वंशावली का बोध लेकर
16:02आए
16:04नमरता और सादे जीवन का प्रतीक पुलह का स्रिजन हुआ, जो अपनी शुधता से स्रिष्टी को आलोकित करने वाले थे
16:13संकल्प शक्ती और यग्यकी सामर्थ्य के प्रतीक क्रतु प्रकट हुए, जो पवित्र अनुष्ठानों को संपन्न करने हेतु तैयार थे
16:22ब्रहमा के हृदय से महान द्रश्टा और अनेक प्रसिध कुलों के आदिपुरुष महर्शी भ्रिगु ने जन्म लिया
16:30दिव्य ज्यान और मार्ग दर्शन के प्रतीक अत्यंत पूजनिय गुरु वशिष्ठ का प्राकट्य हुआ, जो धर्म के मार्ग दर्शक बने
16:38कुशल और शक्तिशाली प्रजाप्ती दक्ष ने स्वरूप लिया, जिन्हें अनेक प्राणियों का नेत्रित्व करने का दायत्व मिला
16:46फिर वीना लिये हुए दिव्यरिशी और ब्रह्मांडिय संदेश्वाहक नारत का प्राकट्य हुआ, जो भक्ती और समवाद के प्रतीक बने
16:56ब्रहमा ने नवनिर्मित सभी प्रजाप्तियों को संबोधित किया और उन्हें स्रिष्टी के विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका समझाई
17:06उन्होंने सभी प्रजाप्तियों को संतान उत्पन कर लोकों को आबाद करने का निर्देश दिया, ताकि जीवन चक्र अबाद गती से
17:14चलता रहे
17:16प्रजाप्तियों ने ब्रह्मा के आदेश को विनमरता पूर्वक स्विकार किया, उनके मुख मंडल संकल्प की आभा से चमक उठे
17:25दिव्य उर्जा का संचार प्रजाप्तियों के भीतर हुआ, जिसने उन्हें स्रिष्टी के विस्तार के लिए आवश्यक शक्ती से भर दिया
17:33इस प्रकार ब्रह्मा ने भविश्य की समस्त पीडियों की नीम रखी, जिससे जीवन का जटिल जाल स्थापित हुआ
17:41ब्रह्मा ने अपनी इस अध्भुत स्रिष्टी को संतुष्टी से देखा, यह जानते हुए कि अब ब्रह्मांड समरिद और जीवन्त होगा
17:51विशाल ब्रह्मांडिय कमल खिलता रहा, जो स्रिष्टी के निरंतर विस्तार और जीवन के प्रवाह का प्रतीक था
17:59प्रजाप्तियों की रचना और उनके दायत्व निर्धारन के साथ नवनिर्मित ब्रहमांड में संतुलन और सुव्यवस्था की गहरी भावना स्थापित हुई
18:09प्रजाप्तियों ने ब्रह्मा के आदेशानुसार स्रिष्टी का कार्य आरंभ किया, जहां नवनिर्मित ब्रहमांड की अथा जलराशियों पर जीवन की पहली
18:18किरने उतरने लगी थी
18:21परंतु शीघर ही उन्हें एसास हुआ कि उनके बनाए गए आधार अस्थिर थे, जैसे कोई नीम्व बिना भूमी के हवा
18:28में निर्मित की जा रही हो
18:31उनके प्रयासों से उत्पन हुए परवत और भूभाग अथा जल में विलीन हो रहे थे, जैसे स्वपनरेट के महल की
18:39तरहे ढह रहे हो
18:41हर बार जब वे कोई आकार देने का प्रयास करते, तो वह अथा जल की गोद में समा जाता, जैसे
18:48अस्तित्व का कोई भी चिन्ह न बचा हो
18:52ब्रह्मा ने अपने दिव्य आसन से प्रजाप्तियों के निरंतर असफल प्रयासों को देखा, उनके हृदय में एक गहरी चिन्ता घर
18:59कर गई
19:01उन्हें यह भली भानती ग्यात हुआ कि वेदों की पुनर प्राप्ती के बावजूद प्रित्वी अभी भी प्रल्यकाल के अथा जल
19:08में डूबी हुई थी
19:10इस अस्थिर और निराधार स्थिती में किसी भी प्रकार की स्थाई स्रिष्टी संभव नहीं थी जिससे भविश्य की सभी आशाएं
19:19धूमिल पड़ रही थी
19:22ब्रह्मा का हृदय गेहन चिन्ता और निराशा से भर गया जैसे उनके सभी स्रिजनात्मक प्रयास इस अथाह जल में व्यर्थ
19:29हो रहे हो
19:31चारो और केवल अथाह जल का विस्तार था जहां कोई द्रिड आधार नहीं था जिस पर जीवन की नीव रखी
19:38जा सके
19:40उन्होंने अपने समीप स्थित प्रजाप्तियों को बुलाया और अपनी गहरी आशंका व्यक्त की कि यह स्थिती स्रिष्टी के लिए एक
19:48अभूतपूर्व चुनौती है
19:52प्रजाप्तियों ने विन्मरता पूर्वक्स विकार किया कि बिनास्थिर पृत्वी के वे अपनी स्रिजनात्मक शक्तियों का पूर्ण उप्योग करने में असमर्थ
20:01थे
20:02ब्रह्मांड की विशालता इस अथा जल में डूबी हुई अब जीवन की आहट के बजाए एक उदास और नीरस शुने
20:10जैसी प्रतीत हो रही थी
20:12समय बीटता जा रहा था और प्रत्येक असफल प्रयास के साथ ब्रह्मा की व्याकुलता और भी बढ़ती जा रही थी
20:21उन्होंने अपनी दिव्यद्रिष्टी और ज्यान का उपियोग कर इस विकट समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया अपनी अंतर्रात्मा में
20:30गहरे उतरते हुए
20:32उनके गहन ध्यान से ब्रह्मान्डिय उर्जाएं हिल उठीन मानो स्वयं प्रकृती उनकी पुकार का उत्तर दे रही हो
20:40अथा जल की गर्जना उनकी आंतरिक अशान्ती का प्रतिबिंब थी एक अविश्वस्निय बाधा जो स्रिष्टी के भविश्य पर मंदरा रही
20:49थी
20:50उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि इस समस्या का समाधान उनकी अपनी शक्तियों से परे था और अब उन्हें परम्पिता
20:58नारायन की सहायता की आवश्शक्ता थी
21:01ब्रह्मा ने अपनी आखें खोली और हृदय से एक तीवर पुकार की हे नारायन इस अगाद संकट से स्रिष्टी को
21:09उबारने में हमारी सहायता करें
21:13उनकी पुकार ब्रह्मांडिय शुन्यता में गूंज हुठी एक शक्तिशाली तरंग के रूप में जो दूर-दूर तक फैल गई
21:21ब्रह्मांड अब एक नई आशा के साथ ठहरा हुआ था महा विश्णु की अद्रिष्य शक्ती के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में
21:30ब्रह्मा की गहन पुकार ने ब्रह्मांड के हरकन को स्पर्ष किया जहां स्रिष्टी एक अद्रिष्य गहन प्रतीक्षा में थमसी गई
21:38थी
21:39शुन्य में एक शनिक शान्ती चा गई जैसे स्वयंकाल भी किसी महान शक्ती के आहवान का उत्तर सुनने को आतुर
21:47हो
21:49ततकाल ब्रह्मांडिय शुन्यता में एक सुक्ष्म उर्जा प्रवाहित हुई जो अनन्त शक्ती के जागर्ण का पहला संकेत थी
21:58धीरे धीरे ब्रह्मा की ध्यानमग्न मुद्रा और भी गहरी होती गई उनका मन केवल भगवान नारायन के नाम का जाप
22:05कर रहा था
22:07चारों और की दिव्यशान्ती अब एक सुक्ष्म कमपन से भर गई जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती स्रिष्टी के केंद्र से जागरित
22:15हो रही हो
22:17ब्रह्मा के हृदय में आशा की एक नई किरन जगी एक अटूट विश्वास की उनकी पुकार व्यर्थ नहीं जाएगी
22:25तभी इक ब्रह्मा को अपनी नासिका में एक विचित्र और रहस्यमय गुद्गुदी का अनुभव हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ
22:33था
22:34इस अनोखे एहसास के साथ ही उनकी नासिका से एक अत्यंत लगुकाय पिघले हुए सोने के रंका वराह शिशु प्रकट
22:42हुआ
22:43वह अती लगुकाय वराह शिशु इतना सूक्षम था कि एक पल को लगा कि वह केवल एक भ्रम था
22:51परंतु यह कोई भ्रम नहीं था वह शिशु प्रकाश के एक कण के समान चमक रहा था जिसमें अनंत शक्ती
22:59का बीज समाहित था
23:01ब्रहमा ने विसमय और श्रद्धा से अपनी आखें चोड़ी कर ली जैसे वह किसी अनकहे रहस्य के साक्षी बन रहे
23:09हो
23:10अगले ही पल वह लगुकाय वराह शिशु अविश्वसनिय गती से बढ़ने लगा जैसे ब्रहमांडिय उर्जा उसे विस्तार दे रही हो
23:19पहले वह एक छोटे सुवर के बच्चे जितना हुआ, फिर एक युवा सुवर के आकार में परिवर्तित हो गया, उसकी
23:27दिव्या आभा बढ़ती जा रही थी
23:30ब्रहमा के समक्ष वह लगु वराह कुछ ही क्षणों में एक विशालकाय तेजस्वी वराह के रूप में स्थापित हो गया,
23:37जिसकी महीमा अपार थी
23:40उस विशालकाय वराह का रंग गहरा सुनहरा था, उसकी देश से ब्रहमांडिय उर्जा की प्रचंड धाराय निकल रही थी
23:48उसके विशाल दांट आकाश गंगाओं से भी बड़े प्रतीत हो रहे थे, जो किसी भी चुनौती का सामना करने को
23:56तयार थे
23:57यह निश्चित रूप से भगवान विश्णु का वराह अवतार था, जो प्रित्वी को बचाने के लिए प्रकट हुए थे
24:06ब्रहमा ने अपने हाथ जोडे और उस दिव्य वराह को प्रणाम किया, उनके मुख पर गहरी कृतग्यता का भाव था
24:14उस विशाल वराह ने एक गंभीर गर्जना की, जो ब्रहमांड के हर कोने में गूँच उठी, जैसे प्रित्वी के उद्धार
24:22का आहवान हो
24:24समस्थ स्रिष्टी ने उस गर्जना को सुना, एक नई आशा और आसन उद्धार की प्रतिध्वनी में, जब वराह अवतार ने
24:32अपनी यात्रा आरंभ की
24:35ततकाल ही, उस दिव्य वराह का ननहा रूप ब्रहमांड को निगलने वाले एक विशालकाय स्वरूप में परिवर्तित होने लगा, जिसकी
24:43गर्जना से पूरा अंतरिक्ष थर्रा हुठा
24:46ब्रहमा अपने चार मुखों से विस्मय और आशा से परिपूर्ण थे, उन्होंने उस अभूत पूर्व काया कल्प को देखा जो
24:54स्रिष्टी के उद्धार का संकेट दे रहा था
24:58वराह का शरीर परवतों की श्रिंखला जैसा विशाल काय हो गया, उसकी प्रत्येक मासपेशी में ब्रहमांड को धारन करने की
25:06शक्ती स्पष्ट जलक रही थी
25:09समस्ट आकाश गंगाएं और नक्षत्र उसके फैलते हुए स्वरूप के सामने बौने लगने लगे, जैसे कोई दिव्य ब्रहमांडिय शक्ती साकार
25:18हो रही हो
25:20वराह का रूप अब इतना विशाल हो चुका था कि वह अथाह जल से भरे ब्रहमांडिय शूनि में एक जीवित
25:27पर्वत के समान खड़ा था, मुक्तिदाता की गरिमा के साथ
25:32उसकी गर्जना इतनी तीवर थी कि उसने ब्रहमांड की गहरी खामोशी को चीर दिया, जैसे आने वाले उद्धार की घोशना
25:40हो
25:41पर्वतों के समान विशाल, वजर के समान द्रिड और समस्त लोकों को धारन करने में सक्षम वह अद्भुत रूप अब
25:49पूर्णत है साकार हो चुका था
25:52उसका विशाल काय मुखमंडल और दिव्य आखें ब्रहमांड के हर रहस्य को जानने वाली प्रतीत हो रही थी, जो एक
26:00अटल संकल्प से भरी थी
26:02वरा भगवान ने एक और गर्जना की फिर बिना किसी हिचकी चाहट के अपने विशाल शरीर को अथा ब्रहमांडिये जल
26:10में डुबोना शुरू कर दिया
26:13जल की उपरी परतें उसके प्रवेश से इतनी तीवरता से विचलित हुई कि वे ब्रहमांड के कोनों तक फैलती हुई
26:20विशाल लहरेंग बन गई
26:23उसने जल की गहराईयों को चीरते हुए नीचे की ओर प्रस्थान किया जहां अंधकार और जलराशी प्रित्वी को निगल चुके
26:31थे
26:32जैसे जैसे वह नीचे गया ब्रहमांडिये जल का दबाव बढ़ता गया लेकिन वराह का दिव्य शरीर अडिक और अदमे रहा
26:41अथा जल के भीतर वराह भगवान अपनी शक्तिशाली इंद्रियों से प्रित्वी की स्थिती का पता लगाने लगे प्रत्येक धारा को
26:50भेदते हुए
26:52उनके सुनहरे नेत्र गेहन अंधकार को भेद रहे थे जैसे वे स्वयम प्रकाश के स्रोथों जो लुप्थ हुई प्रित्वी की
27:00खोज में थे
27:02शक्तिशाली वराह अपने विशालकाय थूथन से जल की पर्तों को टटोल रहे थे, हर कोने को महसूस कर रहे थे,
27:10प्रित्वी के सुक्ष्म संकेत की तलाश में
27:13जल की असीमित गहरायों में एक अटल संकल्प और अध्भुत धैर्य के साथ वराह आगे बढ़ते रहे, हर क्षण प्रित्वी
27:22के निकट आते हुए
27:24यह एक अथक यात्रा थी, जहां ब्रहमांडी अंधकार और जल का विस्तार अनंत प्रतीत होता था, फिर भी वराह का
27:32द्रिढ निश्चे कभी नहीं डग्मगाया
27:35उनके दिव्य शरीर से एक मंद सुनहरी आभा निकल रही थी, जो ब्रहमांडी अंधकार को चीर कर उन्हें सही मार्ग
27:43दिखा रही थी
27:45उनके शक्तिशाली पैर जल की भारी धाराओं को धकेलते हुए आगे बढ़ रहे थे, हर कदम प्रिथवी के उध्धार की
27:53ओर एक नया संकल्प था
27:56अंतर वह विशाल वराह, अनंत जल के सामराज में एक अकेला, अडिग उध्धार करता के रूप में अपने दिव्य मिशन
28:04पर अटल रहा
28:06जैसे ही वराह भगवान गहरे अंधकार में उतरते गए, उन्हें एक अजीब सी कमपन महसूस हुई, जैसे किसी अद्रिष्य शक्ती
28:14का साननिध्य हो
28:16एक क्षण के लिए दिव्य प्रकाश से परिपून उनके शरीर पर क्रोध की एक हलकी लहर दोड़ गई, क्योंकि उन्होंने
28:24उस अधर्म की उपस्थिती को भाम्प लिया था
28:28तभी जल की गहराई से एक विशालकाय चाया उभरने लगी, जिसने समूचे पाताल लोग को अपने भयावह आलिंगन में ले
28:36रखा था
28:38यह हिरन्याक्ष था, जिसका काला सामराज्य प्रिथवी को अपनी क्रूर मुठी में जकड़ कर ब्रहमान्दिय संतुलन को खत्रे में डाल
28:46रहा था
28:48वह भयानक दैत्य अपने अहंकार में चूर प्रिथवी को एक खिलोने की तरहे पकड़े हुए था, उसकी लाल आखों से
28:56दुष्टता बरस रही थी
28:58वराह भगवान अपने विशाल और दिव्य रूप में हिरन्याक्ष के सामने आकर खड़े हो गए, उनकी आखों में एक अटल
29:06संकल्प चमक रहा था
29:09हिरन्याक्ष ने वराह भगवान को ललकारते हुए एक गर्जना की, जिससे गहरे सागर की शांतता भंग हो गई और जल
29:17की धाराय तेजी से हिलने लगी
29:20वराह भगवान ने अपनी दिव्य शक्ती का प्रदर्शन करते हुए एक शांत द्रिढ द्रिष्टी से उसे देखा, जो आसन्य युद्ध
29:28की चेतावनी थी
29:30फिर बिना किसी और शब्द के, हिरन्याक्ष ने अपनी भयानक गदा उठाई और वराह पर एक प्रलन्यकारी वार किया, जिससे
29:38जल में एक तीव्र तरंग उत्पन हुई
29:42वराह भगवान ने अपनी दिव्य शक्ती से उस्वार को रोका, जिससे दोनों शक्तियों के टकराव से पूरा पाताल लोक काप
29:50उठा
29:51जल के भीतर, दो अमर योध्धाओं के बीच एक भयंकर और प्रलन्यकारी द्वंद्व शुरू हो गया, जिसकी गूंज ब्रहमांड के
29:59अंत तक सुनाई दे रही थी
30:02हिरन्याक्ष की प्रत्येक चाल क्रूर्ता और विनाश से भरी थी, जैसे वह स्वयन प्रलै का प्रतीक हो
30:10वरा भगवान ने अपने दिव्यबल और कौशल से हर हमले का सामना किया, अपनी गर्जना से असुर को चुनोती देते
30:18हुए
30:19युद्ध चरम पर पहुँच गया, दोनों योध्धाओं के बीच की शक्ती संतुलन लगातार बदलता रहा, जिससे ब्रहमांडी उर्जाय हिल उठी
30:29अंतहक वराह भगवान ने अपनी पूर्ण शक्ती को उजागर किया, उनके शरीर से एक अभूत पूर्व दिव्य प्रकाश फूट पड़ा
30:38उन्होंने हिरन्याक्ष पर एक अंतिम और निनायक वार किया, जिसने असुर के अहंकार को धूल चटा दिया और उसे गहरे
30:46जल में परास्त कर दिया
30:49हिरन्याक्ष का विशाल शरीर खंडखंड होकर जल में विलीन हो गया, उसके अवशेश ब्रहमांडी अंधकार में बिखर गए
30:57विजी वराह भगवान ने तब धीरे से प्रित्वी की ओर देखा, जो अब असुर की पकड़ से मुक्त होकर स्वतंत्र
31:05रूप से तैर रही थी
31:07अपने विशाल दातों पर प्रित्वी को हलके से टिका कर, उन्होंने उसे गहरे जल से उपर उठाने का पवित्र कार्य
31:14आरंब किया
31:16धीरे धीरे वराह भगवान प्रित्वी को लेकर जल की सतह की ओर बढ़ने लगे, ब्रहमांड में आशा और प्रकाश की
31:24नई सुभ़ लाते हुए
31:27अपने विशाल दातों पर प्रित्वी को थामे हुए, वरा भगवान ने उसे अथा ब्रहमांडिय जल से धीरे-धीरे उपर उठाया,
31:35मानो एक बहुमूल्य रत्न को गेहन निद्रा से जगा रहे हूँ
31:40यह दिव्यद्रिश देखकर, कमल पर विराजमान ब्रहमा जी के चारों मुखों पर संतोश और कृतध्यता का एक गहरा भाव उभर
31:48आया, उनकी तपस्या अब फलदाई सिध्ध हो रही थी
31:53वरा भगवान ने फिर प्रित्वी को एक नवजात शिशु की भाती, ब्रहमांडिय जल के उपर बने एक सुरक्षित दिव्य आधार
32:01पर धीरे से टिकाना शुरू किया
32:04जैसे ही प्रित्वी अपने नए स्थान पर स्थापित हुई, ब्रहमांड के कोने-कोने में शान्ती की एक लहर दोड़ गई,
32:12मानो प्रकृती ने एक लंबी सांस ली हो
32:15प्रित्वी को स्थिर करने के बाद वरा भगवान ने उसे ब्रहमांड के केंद्र में उसके शाश्वत अक्ष पर स्थापित करने
32:23के लिए एक दिव्य स्थान की ओर धीरे-धीरे धकेला
32:28देवताओं और रिशियों का समूह जो दूर से यह अलौकिक प्रित्य देख रहा था, वरा भगवान की महिमा का गुनगान
32:35करते हुए उनके प्रती अपनी असीन श्रद्धा प्रकट कर रहा था
32:40एक अंतिन कोमल धक्का देते हुए वरा भगवान ने प्रित्धवी को उसके नियत ब्रहमांडिय कक्ष में सटीक रूप से स्थापित
32:48किया, जहां वह अपनी धुरी पर घूमना शुरू कर सकेगी
32:53इस स्थापना के साथ ही ब्रहमांडिय संगीत की एक मधुर ध्वनी गूंच उठी, जो स्रिष्टी के नए अध्याय और जीवन
33:01की निरंतर्ता का उद्धोश कर रही थी
33:04प्रित्वी अब अपने अक्ष पर घूमने लगी थी, एक शांत नृत्य में लीन होकर अपने नए स्थिर ब्रहमांडिय घर में
33:12अपनी अंतिन जगह बना रही थी
33:16वैकुंठ धाम से भगवान विश्णू अपने शेशनात पर विराजमान इस भव्य दृष्य को अपलक निहार रहे थे, उनके शांत मुख
33:24पर एक दिव्य मुस्कान चाई हुई थी
33:28प्रिथवी की सतह पर नवोदित परवत अपनी विशालता दिखा रहे थे और नदिया अपने जल को समेट कर जीवन का
33:36मार प्रशस्त करने लगी थी
33:38वायो मंडल में नवजीवन की बयार बहने लगी और सूर्य चंद्र तथा तारों ने प्रिथवी को अपनी शाश्वत रोष्णी प्रदान
33:46करनी शुरू कर दी
33:49अपना करतव्य पूर्ण कर वरा भगवान ने धीरे धीरे अपनी विशाल काया को कम करना शुरू किया, मानो वे ब्रह्मांडीय
33:57उर्जा में विलीन हो रहे हो
34:00ब्रहमा जी ने हाथ जोड़कर वराह अवतार को प्रणाम किया, उनके हृदय में स्रिष्टी के पुनुरुथान के लिए असीम धन्यवाद
34:08और भक्ती का भाव था
34:10वराह भगवान की दिव्य आभा धीरे-धीरे एक स्वर्निम प्रकाश के पुंज में सिमटने लगी, जो अन्ता ब्रहमांड के अनन्त
34:18विस्तार में समाहित हो गया
34:21जहां वराह भगवान विलीन हुए थे, वहाँ एक अत्यंत शांत और पवित्र उर्जा का स्पंदन शेश रह गया, जो पृत्वी
34:29को अनन्त काल तक सहारा देने का वचन दे रहा था
34:33अब पूर्णत स्थापित पृत्वी अपने नीलेहरे वैभव में चमक रही थी, जो ब्रहमा की स्रिष्टी के अगले चरण के लिए
34:41एक आदर्श कैनवास बन गई थी
34:45ब्रहमा जी ने अब अपनी तपस्या पुनह आरंभ की, उनके चारों मुखों से स्रिष्टी के बीज मंत्रों का उच्चारण हो
34:52रहा था, ताकि पृत्वी पर जीवन का विकास हो सके
34:57ब्रहमा के दिव्य मंत्रों के प्रभाव से पृत्वी पर वनस्पतियों और जीवों के सुक्ष्म अंकुर फूटने लगे, जो जीवन की
35:05शुरुवात का संकेत थे
35:07इस प्रकार वरा अवतार ने पृत्वी को विनाश से बचा कर एक स्थिर और समरिध स्रिष्टी के युग की नीव
35:14रखी, जो अनंत काल तक ब्रहमाण में गुंजती रहेगी