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काल के गहन रहस्यों को समझने के बाद, गरुड़ अब नियति और कर्मों के अंतिम नियंत्रक, ईश्वर के संकल्प को जानना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने बताया कि कैसे नियति (दैवीय भाग्य) और ईश्वर का संकल्प, काल और कर्म से भी परे है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करता है। इस एपिसोड में, हम जानेंगे राजा अंबरीष की अद्भुत कथा, जिन्होंने अपनी अटूट भक्ति और शरणागति से काल और कर्म के बंधनों को तोड़ दिया, और कैसे ईश्वर की असीम कृपा से एक भक्त हर बाधा को पार कर जाता है। यह रहस्यमय ज्ञान आपको जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों का उत्तर देगा और बताएगा कि कैसे परम समर्पण ही मुक्ति का अंतिम द्वार है। #गरुड़पुराण #विष्णुपुराण #नियति #कर्मफल #ईश्वरसंकल्प #भक्तिमार्ग #मोक्ष #दिव्यलीला #अंबरीष_कथा #कालचक्र
Transcript
00:00काल के अनन्द चक्र और उसके सुख्ष्म रहसियों को समझने के पश्चात पक्षीराज गरुड के मन में नेती की अचलता
00:07को लेकर एक गहरा कौतुहल उत्पन होता है।
00:11हाथ जोड कर अत्यंत विनमर्ता पूर्वक गरुड पूचते हैं कि हे प्रभु क्या संसार में सब कुछ पहले से ही
00:18निश्चित है और क्या कोई भी जीव अपनी नेती को बदल नहीं सकता।
00:24जिग्यासा की पराकाष्ठा में गरुड के विशाल सुनहरे पंक श्रद्धा से जुख जाते हैं, मानो विस रिष्टी के सबसे बड़े
00:31सत्य को सुनने के लिए आतुर हों।
00:35तभी आकाश में नेती का एक अद्रिष्य चक्र घूमता हुआ प्रतीत होता है, जो प्रत्येक जीव के कर्मों को एक
00:42अद्रिष्य दोर से बांधे रखता है।
00:46भगवान विष्णु अपने शांत और करुणामई मुख मंदल पर एक मंद मुस्कान लाते हैं, जिससे संपूर्ण वैकुंठ लोक अलोकिक प्रकाश
00:55से जगमगा उठता है।
00:58नारायन अपनी अमरित्मई वानी में कहते हैं कि हे गरूर्ट नेती कोई निर्दई बंधन नहीं, बलकि परमेश्वर के संकल्प और
01:06जीव के कर्मों का एक सुन्दर समनवय है।
01:10भगवान विश्णु अपने दाहिने हाथ से वरद मुद्रा बनाते हैं, जिससे एक स्वर्णिन प्रकाश पुंज निकलकर स्रिष्टी के विभिन लोकों
01:19की ओर प्रवाहित होने लगता है।
01:22इस प्रकाश के स्पर्ष से कर्म और भाग्य की जटिल रेखाएं एक दूसरे में विलीन होकर एक सुव्यवस्थित ब्रहमांडिय मार्क
01:31का निर्मान करती हैं।
01:33गरुर विस्मित होकर पूछते हैं कि यदी सब कुछ ईश्वर की इच्छा से ही संचालित है तो फिर जीव के
01:40पुरुशार्थ और अच्छे बुरे कर्मों का क्या महत्व रह जाता है।
01:45गरुर के चहरे पर उठते संच्यों को देखकर नारायन अत्यंत धैर्यपूर्वक उनके समाधान की ओर बढ़ते हैं, जिससे उनके नेत्रों
01:54की सौमयता और बढ़ जाती है।
01:57विश्नु समझाते हैं कि कर्म वह बीज है जिसे जीव बोता है और नेती वह भूमी है जो उस बीज
02:05को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करती है।
02:09इस गहरे रहस्य को समझाने के लिए वैकुंठ के आकाश में कर्म और फल के सिध्धान्त को दर्शाते हुए कुछ
02:17दिवेद्रिश्य प्रकट होने लगते हैं।
02:21नारायन आगे कहते हैं कि अज्ञानी मनुष्य अपने कर्मों के फल को नपाकर नेती को कोसता है परंतु ज्ञानी पुरुष
02:29हर परिस्थिती को इश्वर का प्रसाद मानकर स्विकार करता है।
02:34गरूर के हृदय में ज्ञान का प्रकाश फैलने लगता है और उनके मुखमंडल पर संशय के स्थान पर संतोष का
02:41भाव उभराता है।
02:44भगवान विष्णु के चर्णों के समीप पड़े एक अलौकिक दिव्य कमल से अत्यंत सुंगधित और चमकीली उर्जा प्रवाहित होकर गरूर
02:52को स्पर्श करती है।
02:55यह अलौकिक उर्जा गरूर के भीतर के संपून संशय को समाप्थ कर देती हैं, जिससे वे नेती के वास्तविक और
03:03कल्यानकारी स्वरूप को समझ पाते हैं।
03:07वैकुंठ लोग के सभी गंधर्व और देवता अदरिश्य होकर इस ज्यानमई चर्चा को सुनते हैं और नारायन के वचनों की
03:15प्रशनसा करते हुए पुश पवर्शा करते हैं।
03:19गरूर भगवान विश्नों के समक्ष साष्टान प्रणाम करते हैं और स्विकार करते हैं कि इश्वर की इच्छा ही सर्वोप्री है
03:27और वही परमनेती है।
03:30नारायन अपने भक्त को अभयदान देते हुए अपने सुदर्शन चक्र को शांत करते हैं जो समय और नेती के संतुलन
03:38को बनाए रखता है
03:41इस प्रकार वैकुंट मेकाल, कर्म और नेती का यह परम रहस्य गरोड के माध्यम से संपूर्ण मानवता के कल्यान के
03:49लिए प्रकट होता है
03:51भगवान विश्नु वैकुंट के अनन्त विस्तार की ओर संकेत करते हुए गरोड को समझाते हैं कि ब्रहमान्ड की हर गती
03:59उनके परम संकल्प से ही संचालित होती है
04:03नारायन के दिव्यमुख पर मंडराती मंद मुस्कान उनके शांत, चित्त और उस अनन्त सक्ता को दर्शाती है जो काल और
04:11कर्म से भी परे है
04:14भगवान श्री हरी अपनी हथेली पर ब्रहमान्डिय नेती के स्वर्ण धागों को जागरित करते हैं, जो समस्त जीवों के प्रारब्ध
04:22को एक सूत्र में बांधते हैं
04:26समय का विशाल चक्र, जिसे काल चक्र कहा जाता है, नारायन की इच्छा के अधीन होकर बिना किसी शोर के
04:33अत्यंत सुचारू रूप से घूंता है
04:37वैकुंट के चारों और बहती हुई समय की अध्रिश्य नदी नारायन के संकल्प से दिशा पाकर शांत और स्थिर होकर
04:44बहने लगती है
04:46पक्षी राज गरुड अपने विशाल पंखों को समेट कर अत्यंत विनमर्ता से पूछते हैं कि क्या काल भी इस परम
04:54सत्ता के सामने अपना मार्ग बदल लेता है
04:58भगवान विश्णु अपनी उंगलियों के एक हलके संकेट से ब्रहमांड के रितुचक्र और प्राकृतिक संतुलन को नया रूप देते हैं
05:07इस परम संकल्प के अंतरगत स्रिष्टी और सहार के दोनों छोर एक अत्यंत सुन्दर और रहस्यमे संतुलन में बंधे दिखाई
05:16देते हैं
05:18वैकुंट के स्वर्ण शिखरों के ऊपर से कर्म की अद्रिष्य तरंगे निकलती हैं जो समस्त लोकों में नयाय और धर्म
05:25की स्थापना करती हैं
05:28नारायन स्पष्ट करते हैं कि कर्म कोई कठोर गंड नहीं बलकि आत्मा को उसकी वास्तविक शुद्धी की ओर ले जाने
05:36का एक दिव्य माध्यम है
05:39भगवान के आशिर्वाद से एक शुद्ध आत्मा का प्रतीक दिव्य जोती पुंच बनकर वैकुंट की ओर अग्रसर होता है
05:48माया जो अग्यानियों के लिए बंधन है नारायन के संकल्प से इस ब्रहमांडिय नाटक की एक सुन्दर रंगमंच की प्रिष्ठ
05:56भूमी बन जाती है
05:59वैकुंट का पूरा वातावर्ण अब उस परम सत्य की गूँच से भर जाता है जहां सभी देवता और सिध्ध पुरुष
06:06इस संकल्प को प्रणाम करते हैं
06:10गरुर के चहरे पर अब कोई संशय नहीं रह जाता और उनका हृदय केवल भगवान के परम संकल्प के प्रती
06:17अटूट विश्वास से भर उठता है
06:21भगवान श्री हरी अपना वरध हस्त उठा कर गरुर को परम ज्यान और अभय का वरदान प्रदान करते हैं
06:28इस क्षण में काल, कर्म और निती तीनों एक साथ मिलकर नारायन के चर्णों में लीन होते हुए प्रतीत होते
06:36हैं
06:38वैकुंठ का कंकन उस दिव्य संकल्प की महिमा से जगमगा उठता है जो पूरे ब्रहमांड को अपने सने और सुरक्षा
06:46में समेटे हुए है
06:48नारायन अपनी शांत और गयालू द्रिष्टी से स्रिष्टी के सभी जीवों को देखते हैं, जो उनके इस संकल्प के साए
06:56में सुरक्षित और पोशित हैं
06:59गरुड अब एक नए आत्म विश्वास के साथ उठ खड़े होते हैं, उनका प्रत्येक पंख भगवान के संदेश को प्रसारित
07:07करने के लिए तत्पर दिखाई देता है
07:10इस प्रकार इश्वर का संकल्प ही वह परम सत्य सिद्ध होता है, जिसके आगे ब्रहमांड की हर शक्ती अत्यंत आदर
07:19और प्रेम से जुक जाती है
07:22भगवान विश्णु गरूर को समझाते हैं कि यद्यपी मनुष्य अपने कर्म करने के लिए स्वतंत्र है, परंतु उन कर्मों के
07:29फल की अंतिन दिशा और समय केवल इश्वरिय संकल्प के महाधाचे के भीतर ही निर्धारित होते हैं
07:37अपनी चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन की ये भगवान नारायन अत्यंत करूनामई द्रिश्टी से गरूर की ओर
07:46देखते हुए कर्म और काल के इस गहन रहस्य को प्रकट करते हैं
07:51प्रभु के दिव्य संकल्प से उनके सामने एक विशाल जोतिर्मय चक्र प्रकट होता है जिसमें प्रिथवी पर मनुश्यों को अपने
07:59अपने कर्मों का चुनाफ करते हुए देखा जा सकता है
08:04संसार में न्याय की देवी शक्ती और कर्मों का तराजू कभी नहीं डग्मगाते क्योंकि प्रतेक क्रिया का फल एक सुनिश्चित
08:12समय पर ही आत्मा को परिपक्व करने के लिए लोटता है
08:17गरूर विस्मय से उस अनन्त आकाश को देखते हैं जहां कोटी-कोटी जीवों के कर्मों के मार्ग आपस में मिलकर
08:24एक विशाल ब्रहमांडिये चित्रपट का निर्मान कर रहे हैं
08:29विश्नु अपने दाहिने हस्त को अभय मुद्रा में उठा कर कहते हैं कि आत्मा की उन्नती के लिए कभी-कभी
08:36कठिन परिस्थितियां भी उसी परम योजना का हिस्सा होती हैं
08:41एक पीडित आत्मा का प्रतीक धीरे-धीरे अपनी सांसारिक मैल को छोड़कर वैकुंट की परम उर्जा में विलीन होकर एक
08:49दैविय प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो जाता है
08:53काल का पहिया स्वयन उस परमेश्वर के चर्णों के नीचे धीरे-धीरे घूंगता है जिससे यह सिद्ध होता है कि
09:01समय भी इश्वर के संकल्प का केवल एक उपकरण मात्र है
09:07वैकुंट के इस पावन वातावर्ण में गंगा के समान पवित्र ज्ञान की धाराएं बह रही हैं जो हर जिग्यासु के
09:14मन के अंधकार को सदा के लिए मिटा देती हैं
09:18गरुड अपने विशाल पंखों को समेट कर भगवान के चर्णों के निकट बैठते हैं और उनका हृदय इस शाश्वत सत्य
09:26को सुनकर कृतग्यता और अगाद श्रधा से भर जाता है
09:31नारायन अपनी हथेली पर ब्रहमांड की सुख्ष्म रचना को प्रकट करते हैं जिसमें असंख्य तारे और आकाश गंगाएं उनके एक
09:40इशारे पर घूमती हुई दिखाई देती हैं
09:44विश्नु के पीछे घूमता हुआ सुदर्शन चक्र अपनी अलोकिक आभा से पूरे वैकुंट को आलोकित करता है जो बुराई के
09:52दमन और सृष्टी के सनरक्षन का प्रतीक है
09:56देवता और रिशिमुनी भी अद्रिश्य रूप से इस सभा में उपस्थित होकर सृष्टी के इस महांतम समवाद को अत्यंत मौन
10:04और आदर के साथ सुन रहे हैं
10:08परमेश्वर मुस्कुराते हुए कहते हैं कि जब जीव पूरी तरह से मेरी इच्छा को समर्पित हो जाता है तो उसके
10:15सारे संचित कर्मों का भार मैं स्वयन हर लेता हूँ
10:19इस परम आश्वासन को पाकर गरुर का संशय पूरी तरह समाप्थ हो जाता है और वे आदर पूर्वक अपना मस्तक
10:27भगवान के श्री चर्णों में रख देते हैं
10:31उसी क्षन्क वैकुंट के मध्य में एक विशाल स्वर्णिन कमल खिल उठता है जो जीवात्मा के अज्ञान से मुक्ती और
10:39परमचेतना के जागर्ण को दर्शाता है
10:43वैकुंट का क्षितिज एक बार फिर उस उशाकाल की स्वर्णिन किर्णों से सज उठता है जो यह दर्शाती है कि
10:50अज्ञान की रात के बाद सदैव ज्ञान का सूर्योदय होता है
10:55भगवान नारायन करूर को विजय और अभय का आशिर्वाद देते हैं जिससे यह निश्चित होता है कि सत्य के मार्ग
11:03पर चलने वाली हर आत्मा सुरक्षित है
11:07स्वर्ग से देवगण इस द्रिश को देख कर प्रसन होते हैं और वैकुंट के उपर मंदार और पारिजात के सुगंधित
11:15पुष्पों की वर्षा होने लगती है
11:18इस प्रकार स्रिष्टी का प्रत्येक कन शान्ती और संतोष की मुद्रा में आ जाता है यह स्विकार करते हुए कि
11:25इश्वर का परम संकल्थी अंतिम और सर्वोत्तम सत्य है
11:31इसी सार्वभामिक सत्य को स्पष्ट करने के लिए भगवान विश्णु गरूर को राजा अंबरीश की अमर और पावन कथा सुनाना
11:39प्रारंभ करते हैं
11:41राजा अंबरीश परम ज्यानी और निश्काम भक्त थे जो सदैव भगवान हरी की भक्ती और प्रजा के कल्यान में लीन
11:49रहते थे
11:51एक बार राजा अंबरीश ने वर्ष भर चलने वाले कथिन एकादशी व्रत का अनुष्ठान पूरा किया और पारण के शुब
11:59समय की प्रतीक्षा करने लगे
12:01उसी समय अपने प्रचेंड क्रोध के लिए प्रसिध महर्षी दुर्वासा अपने सहसरों शिश्यों के साथ अंबरीश के द्वार पर पधारे
12:10राजा ने महर्षी का सहर्ष स्वागत किया और उनसे भोजन द्रहन करने का नमरता पूर्वक निवेदन किया जिसे दुर्वासा ने
12:19स्विकार कर लिया
12:21महर्षी दुर्वासा नदी किनारे संध्यावंदन और सनान के लिए चले गए परन्तु काफी समय बीट जाने के बाद भी वे
12:29वापस नहीं लोटे
12:31एकादशी पारण की शुब्तिथी समाप्त होने में कुछ ही क्षण शेश थे जिससे राजा अंबरीश धर्म संकट में पड़ गए
12:40ब्राहमनों की सलाह पर राजा ने केवल एक बून्द तुलसीयुक्त जल्ग रहन करके अपने वरत का मान रखा और अतिथिधर्म
12:48की भी रक्षा की
12:50स्नान के उपरांत जब महर्शी दुर्वासा लोटे तो उन्हें अपनी योगद्रिष्टी से ग्यात हुआ कि राजा ने जल्ग रहन कर
12:58लिया है
13:00अपने अहम को आहत मान कर दुर्वासा रिशी का क्रोध अगनी के समान धधक उठा और वे राजा को भस्न
13:07करने पर उतारू हो गए
13:09क्रोध के अतिरेक में दुर्वासा ने अपनी जटा से एक बाल उखाड कर भूमी पर पटक दिया जिससे एक भयानक
13:17क्रित्या राक्षसी प्रकट हुई
13:20वह विशाल और ज्वाला में क्रित्या हाथ में जलती हुई तलवार लिये राजा अंबरीश की ओर हत्या करने के धे
13:27से बढ़ी
13:29संकट की इस चरम घडी में भी राजा अंबरीश तनिक भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने शांत भाव से श्री
13:36हरी का स्मरण किया
13:38भक्त की अटूट श्रद्धा देखते ही सर्वव्यापी भगवान विश्नु का परम शक्तिशाली सुदर्शन चक्र आकाश में प्रकट हो गया
13:48सुदर्शन चक्र नेक्षन भर में उस भयंकर कृत्या राक्षसी को भस्म कर दिया और उसकी राख हवा में उड़ा दी
13:56कृत्या का अंत करने के पश्चात वह प्रचंड सुदर्शन चक्र रिशी दुर्वासा की ओर बढ़ा ताकि उनके अन्याई व्यवहार का
14:04दंड दिया जा सके
14:06भयभीत दुर्वासा मुनि प्रान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागे किन्तु सुदर्शन चक्रकाल बनकर निरंतर उनके पीछे लगा रहा
14:15जब दुर्वासा वैकुंठ पहुँचे तो भगवान विश्णु ने कहा कि वे अपने अनन्य भक्तों के अधीन हैं और केवल अम्बरीश
14:24ही उनकी रक्षा कर सकते हैं
14:27विवश होकर दुर्वासा रिशी पुनह राजा अम्बरीश के पास लोटे और लज्जित होकर उनके चर्णों में गिर पड़े
14:36राजा अम्बरीश ने सुदर्शन चक्र की स्तुती की जिससे वह शान्थ हुआ और यह सिद्ध हो गया की प्रेम्मई भक्ती
14:43ही सर्वोत्तम नेती है
14:46सुदर्शन चक्र के शान्थ होते ही दुर्वासा रिशी ने अत्यंत राहत की सांस ली उनका भैभीट हृदय अब प्रेम और
14:54कृतग्यता से भर गया था
14:56इस चमतकारी क्षण को देखकर भगवान विश्णू ने अपने परम भक्त अम्बरीश की अटल भक्ती को मन ही मनसराहा जो
15:05काल के बंधनों से भी परे थी
15:08अपनी तपस्या और प्रतिष्ठा पर गर्व करने वाले दुर्वासा ने पहली बार अपने अहंकार को तूटा हुआ महसूस किया जैसे
15:16कोई विशाल परवत रेट में मिल गया हो
15:20भक्ती की इस पराकाष्ठा ने यह स्थापित कर दिया कि सक्ची श्रद्धा और शर्नागती ही सबसे बड़ी शक्ती है जिसके
15:28सामने ब्रहमांड के भी नियम जुग जाते हैं
15:32अपनी भूल का भान होने पर दुर्वासा रिशी ने लजजित होकर उन्ह राजा अम्बरीश के समक्ष साष्टान प्रणाम करते हुए
15:40सक्चे हृदय से क्षमा याचना की
15:43राजा अम्बरीश ने अपनी असीम करुना और वैशनव धर्म के सिध्धानतों का पालन करते हुए दुर्वासा को ततकाल अपने हृदय
15:52से क्षमा कर दिया
15:54दुर्वासा ने अम्बरीश की महानता को स्वीकार किया जिसने उन्हें न केवल जीवनदान दिया बलकि अहंकार के बंधन से भी
16:02मुक्ती दिलाई
16:04यह घटना एक गहन प्रतीक बन गई की कैसे सक्ची नमरता और भक्ती बड़े से बड़े विद्वान और शक्तिशाली व्यक्ती
16:12को भी सही मार्ग दिखा सकती है
16:16इस घटना के बाद दुर्वासा रिशी ने अम्बरीश का आशिरवाद लिया और अपने आश्रम की ओर प्रस्थान किया एक बदले
16:24हुए और विनमर हृदय के साथ
16:27भगवान विश्नु ने गरूर से कहा कि यह कथा भक्तों के प्रती उनके असीम प्रेम और उनके सनरक्षन की प्रतिग्या
16:35का प्रमाण है
16:37उन्होंने समझाया कि कैसे सुदर्शन चक्र जो उनकी शक्ती का प्रतीक है भक्तों की रक्षा के लिए बिना किसी संकोच
16:45के कार्य करता है
16:48विश्णू ने कहा कि उनका चक्र केवल बुराई का नाश ही नहीं करता बलकि यह उनके भक्तों के लिए सुरक्षा
16:55कवच भी है जो किसी भी संकट से उन्हें बचाता है
17:00भगवान ने गरूर को समझाया कि कैसे भक्ती काल के बंधन से परे है और कर्मों के फलों को भी
17:07बदल सकती है यदि वह शुद्ध और निस्वार्थ हो
17:11गरूर ने अत्यंत ध्यानपूर्वक भगवान विश्णू के इन गूर वचनों को सुना उनके मन में भक्ती और काल के रहस्य
17:19और स्पष्ट होते जा रहे थे
17:22विश्णू ने बताया कि शुद्ध भक्ती से किया गया कोई भी कर्म चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो
17:28अनन्त पुन्य प्रदान करता है और मोक्ष का द्वार खोलता है
17:34उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भक्ती एक ऐसा सुरक्षा कवच है जो भक्त को हर प्रकार के लौकिक
17:41और अलौकिक संकटों से बचाता है
17:45भग्वान विश्णू ने अपनी शिक्षा समाप्त करते हुए कहा कि उनके भक्त उनके लिए अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय
17:52हैं और वे हमेशा उनकी रक्षा करते हैं
17:57गरुर ने भग्वान के दिव्य शब्दों को अपने हृदय में आत्म साथ किया और उनके सर्वोच प्रेम तथा न्याय को
18:04गहराई से समझा
18:06दूर अपने राज्य में राजा अंब्रीश ने अपनी नित्य भक्ती और सेवा जारी रखी उनके जीवन में कोई बाधा नहीं
18:14आई केवल इश्वरिय कृपा बर्सती रही
18:18इस प्रकार अंब्रीश की कथा ने यह परम सत्य स्थापित किया कि इश्वर का संकल्प प्रेम्मई भक्ती से बंधा हुआ
18:26नियती और काल के सभी बंधनों से परे हैं
18:31महाकाल के चक्रवियों से भागते हुए रिशी दुर्वासा अपनी सारी तपस्या और अहंकार प्याग कर अंत्य राजा अंब्रीश के धर्म
18:40प्रायन राज्य की ओर तीवर गती से बढ़े उनके पीछे सुदर्शन चक्र की भयावह गर्जना गूंज रही थी
18:47अपने दिव्य सिनहासन पर बैठे राजा अंब्रीश ने अपनी नित्य पूजा के दौरान ही अपने राज्य में प्रवेश कर रहे
18:55उस महान रिशी के अगाध भय और पीडा को अपने अंतरग्यान से अनुभव किया
19:02अपनी पूरी शक्ती खो चुके दौर्वासा महल के भव्य प्रवेश द्वार पर लडखडाते हुए गिरे उन्होंने हताशा में पहरेदारों से
19:10राजा से मिलने की भीख मांगी जबकि सुदर्शन चक्र उनके सिर के ठीक उपर प्रचंड उर्जा के साथ चक्कर लगा
19:18र
19:19सुदर्शन चक्र की प्रचंड चमक और उससे निकलने वाली गर्मी ने वातावर्ण को जलाना शुरू कर दिया जो दिव्य न्याय
19:27की अप्रिहार्य शक्ती और दुर्वासा के अहंकारी कर्मों का प्रतिकात्मक परिनाम दर्शा रहा था
19:33यह जानकर की दुर्वासा अंत्ह अपने ही अहंकार का शिकार होकर उनके द्वार पर आये हैं राजा अंबरीश ने अपने
19:42अंतरग्यान से उठकर उस महान रिशी की ओर असीम सम्मान और करुना के साथ कदम बढ़ाए
19:49अपने समस्थ तप और गर्व को त्याग कर दुर्वासा ने राजा अंबरीश के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया उनके मुख
19:57पर अश्रुधारा बह रही थी और उनकी आखों में केवल मोक्ष की अदमय याचना थी
20:03अंबरीश ने दुर्वासा को अत्यंत को मलता और सम्मान के साथ उठाया उनके हृदय में उस महान तपस्वी के कष्टों
20:11के प्रती गहरी सहानु भूती उमड रही थी जिसने उनके प्रती पहले कटुता दिखाई थी
20:18अंबरीश के चारों और एक सुक्ष्म सुनहरी आभा धीरे-धीरे फैल रही थी जो सुदर्शन चक्र की तीवर विनाशकारी चमक
20:27के विप्रीत उनकी निस्वार्थ भक्ती और सुरक्षात्मक करुना का प्रतीक थी
20:33अपनी अगाध विनमर्ता के साथ अंबरीश ने दुर्वासा को अपने निजी पूजा कक्ष की ओर ले जाना शुरू किया जहां
20:40उनका अराध्य देव विश्नु निवास करते थे
20:43सुदर्शन चक्र अभी भी उनके पीछे पीछे आ रहा था पर अब वह केवल प्रतीक्षा कर रहा था
20:51राजा अंबरीश एक भव्य स्वर्ण जडित वेदी के समक्ष घुटनों के बल बैठ गए जहां भगवान विश्नु की एक अलौकिक
20:59प्रतिमा स्थापित थी उनकी दृष्टी में गहरा सम्मान और करुणा थी
21:04दुर्वासा पहली बार अपने जीवन में इतने निस्वार्थ भक्ती के प्रदर्शन के साक्षी बने वे विस्मय और पश्चाताप से भरे
21:12हुए राजा के पीछे खड़े होकर अंबरीश के आराध्य देव के प्रती प्रार्थना को देख रहे थे
21:20जैसे ही अंबरीश ने अपनी आखें बंद करके गहन ध्यान में प्रवेश किया, पूरा पूजा कक्ष एक कोमल अलौकिक प्रकाश
21:28से भर गया, जो उनकी अनूठी भक्ती और इश्वर के साथ उनके गहन आध्यात्मिक संबंध का द्रिशमान प्रतीक था
21:37अंबरीश की निस्वार्थ प्रार्थना एक सुनहरी उर्जाधारा के रूप में उनके कक्ष से उपर की ओर उठी और ब्रहमांड के
21:45नीले सुनहरे विस्तार में तैरते हुए वैकुंठ धाम की ओर बढ़ी
21:50वैकुंठ के अनन्त विस्तार में भगवान विश्नु आदिशेश की कुंडलियों पर विराजमान अंबरीश की प्रार्थना को एक शांत सरवग्य मुस्कान
21:59के साथ स्वीकार करते हुए प्रतीत हुए
22:03गहरी समाधी में लीन अंबरीश ने अत्यंत विनमर्ता पूर्वक भगवान विश्नु से दुर्वासा को क्षमा करने और अपने अमोग सुदर्शन
22:11चक्र को वापस बुलाने की प्रार्थना की जो अब तक दुर्वासा का पीछा कर रहा था
22:18अंबरीश की प्रार्थना के साथ ही सुदर्शन चक्र की तीवर विनाशकारी चमक धीरे-धीरे क्षीन होने लगी यह दर्शाता है
22:26कि भगवान विश्नु ने अपने भक्त की निस्वार्थ याचना को स्वीकार कर लिया है
22:33वैकुंट से एक अद्रिश्य दिव्य उर्जा की लहर सुनहरी आभा के साथ अंबरीश के राज्य की ओर नीचे की ओर
22:41प्रवाहित हुई जिसने हर कन को पवित्रता और शांती से भर दिया
22:46चक्र के शांत होने के साथ ही दुर्वासा ने गहरी राहत की सांस ली और उनके चहरे पर अशुरुधारा बह
22:53निकली उनके भय का स्थान अब कृतग्यता और विस्मय ने ले लिया था
22:59और अंत में सुदर्शन चक्र अब एक कोमल चमकती हुई डिस्ट के रूप में राजा अंबरीश के राज्य के उपर
23:06शांती पूर्वक ठहरा और फिर धीरे धीरे आकाश में विलीन हो गया जैसे कोई दिव्य स्वपन भंग हुआ हो
23:14राजा अंबरीश ने अपनी आखें खोली उनके मुख पर एक गहरी शांती और संतुष्टी का भाव था उनके राज्य को
23:22निस्वार्थ भक्ती की शक्ती से प्राप्थ हुई दिव्य कृपा ने चारों और से घेर लिया था
23:29वैकुंठ के परम पावन धाम में जहां दिव्य नीली तरंगें और स्वर्णिन कमल चारों और बिखरे हुए थे भगवान विश्णु
23:37ने अपने परम वाहन गरुड की और मंद मुस्कान के साथ देखा
23:42गरुड ने अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने विशाल पंखों को समेट कर भगवान के चर्णों में शीश जुकाया और पूछा की
23:50राजा अंबरीश का यह संकट काल के किस नियम के अधीन था
23:54तब भगवान विश्णु ने अपने अभय हस्त को उठाने हुए गरुड को समझाया कि अंबरीश की यह गाथा केवल एक
24:02राजा की रक्षा की नहीं बलकि पूर्ण शर्णागती के परम विज्ञान की अभिव्यक्ति है
24:09जब कोई जीवात्मा अपनी सम्पूर्ण करतापन की भावना और अपनी सारी व्यक्तिगत चेश्टाओं को मेरे चर्णों में समर्पित कर देती
24:17है तो वह काल के करूर बंधनों से परे हो जाती है
24:22भगवान ने विस्तार से बताते हुए कहा कि कर्मों का चक्र कितना भी जटिल क्यों न हो शर्णागत भक्त के
24:29लिए वह चक्र स्वतही शिथिल और शान्थ हो जाता है
24:34गरुर के मुख पर विस्मय और गहरे बोध के भाव उभराए क्योंकि वे समझ रहे थे कि कैसे भक्ती स्वयंकाल
24:42की संप्रभुता को भी चुनौती दे सकती है
24:46श्रीहरी ने अपने चर्णों की ओर संकेत किया जहाँ पारिजात के पुश्प स्वतही अर्पित हो रहे थे और कहा कि
24:54इन चर्णों का आश्रय ही अंतिम गंतव्य है
24:58समर्पन करने पर कर्मों की द्वंद्वात मक्ता जैसे पाप और पुन्य, सुख और दुख भक्त के चेतना पटल से मिट
25:06जाती हैं और केवल मेरी असीन कृपा का वास होता है
25:11व्यकुंट के भव्यस्वर्ण महलों की भित्तियों से निकलती हुई दिव्यध्वनिया मानो इस शाश्वत सत्य की पुष्टी कर रही थी कि
25:19इश्वर का संकल्प ही अंतिम सत्य है
25:23भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि दुर्वासा जैसे तपोबल से संपन्न महर्शी भी जब तक अपने अहंकार के अधीन थे
25:30तब तक वेभाय और असुरक्षा के चक्र में भटकते रहे
25:35लेकिन जैसे ही दुर्वासा ने अपने तपोबल का मद त्याग कर एक निश्चल भक्त के समक्ष मस्तक जुकाया उनका सारा
25:43भय कपूर की भाती उड़ गया
25:46सुदर्शन चक्र वास्तव में मेरी उसी दिव्यक्रिपा का सक्रिय रक्षक है जो शर्नागत की रक्षा के लिए प्रकृती के नियमों
25:54को भी बदल सकता है
25:57गरुर ने अब समझ लिया था कि ब्रहमांड का नियंतरण केवल नियमों और न्याय से ही नहीं बलकी दया और
26:04क्षमा की सर्वोच शक्ती से संचालित होता है
26:09गरुर ने अपने हाथ जोड कर पुनह प्रश्न किया कि हे प्रभु क्या मनुष्य के पास अपनी नेती बदलने के
26:16लिए कोई भी स्वतंत्र चेश्टा शेश नहीं रह जाती
26:20विश्णु जी ने मंद स्वर में उत्तर दिया कि मनुष्य की स्वतंत्रता इसी निर्णय में है कि वह अपने अहंकार
26:28को चुनेया मेरे चर्णों की परमशरण को
26:31जैसे एक छोटी सी जल की बून्द समुद्र में मिलकर स्वयन समुद्र बन जाती है वैसे ही समर्पित आत्मा मेरे
26:39संकल्प में मिलकर अजे हो जाती है
26:43संपूर्ण देवलोक और ब्रहमांड के अद्रिश्य लोक इस पावन समवाद की तरंगों से स्पंदित हो रहे थे जिससे स्रिष्टी में
26:51एक नई चेतना का उदे हो रहा था
26:54भगवान विश्णों ने गरोड के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा जिससे गरोड की पूरी चेतना में ज्ञान का एक नया
27:02प्रकाश फैल गया
27:04गरोड का हृदय अब पूर्णत है शान्त था उनके भीतर संशियों का जो अंधकार था वह पूर्ण रूप से बिलीन
27:11हो चुका था
27:13इस प्रकार काल और कर्म के बंधनों को पार कर शर्णागती का यह पावन संदेश स्रिष्टी के कणकण में सदा
27:21के लिए अनकित हो गया
27:23भगवान विश्णु ने पुना शान्त गंभीर स्वर में बोलना आरंभ किया जिसमें अनंत ब्रहमांडों का सत्य समाहित था
27:31हे गरूर, जिसने स्वयं को मुझे पूर्णत है समर्पित कर दिया, उसके लिए काल के चक्र अपना बल्खो देते हैं
27:41कर्मों का संचय जो आत्मा को बंधनों में जकरता है, ऐसे भक्त के लिए केवल एक धूमिल स्मृती मात्र रह
27:49जाता है
27:51क्योंकि जिसने परम सत्य को जान लिया, उसके लिए जन्म और मृत्यू केवल देह का परिवर्टन है, आत्मा का नहीं
28:00सच्चा मोक्ष इन काल्चक्रों से मुक्ती मात्र नहीं, अपितु मेरी उपस्थिती में शाश्वत निवास है
28:07यह वह अवस्था है, जहां आत्मा मेरे सर्वोच्च संकल्प के साथ एकाकार होकर अनंत आनंद का अनुभव करती है
28:17उस परम अवस्था में इच्छाएं शान्थ हो जाती हैं, द्वंद्व समाप्थ हो जाते हैं और केवल एक शुद्ध चेतना शेश
28:25रहती है
28:27यह विलय है एक बूंद का महासागर में मिल जाना, जहां बूंद अपना अस्तित्व खोकर भी महासागर बन जाती है
28:36उस अवस्था को प्राप्थ आत्मा फिर कभी माया के भ्रमजाल में नहीं फंस्ती, नहीं कर्मों के फल उसे बांधते हैं
28:46वह हर पल मेरी अनन्त लीला का साक्षी बनती है, मेरे हर संकल्प में स्वयन को जुड़ा हुआ पाती है
28:54यह कोई स्वर्ग्या वैकुंट का भौतिक स्थान नहीं, बलकि चेतना का वह आयाम है, जहां इश्वर ही सर्वस्व है
29:03जैसे सूर्य की किर्ने सूर्य से अभिन होकर भी उसकी ही महिमा को प्रकाशित करती है, वैसे ही वह आत्मा
29:11मेरी ही जोती बनती है
29:14यही है परम मोक्ष, जहां स्वयन काल भी अपनी सीमाएं स्विकार करता है और कर्म का बंधन निरर्थक हो जाता
29:22है
29:23तब आत्मा स्वय ही मेरा स्वरूप बन जाती है, मेरी ही चेतना में विलीन होकर स्रिष्टी के परम सत्य का
29:31अनुभव करती है
29:33इस अवस्था में हर कन, हर स्रिष्टी मेरी अभिव्यक्ती बन जाती है और आत्मा उस अभिव्यक्ती को स्वय में पाती
29:41है
29:43यह वह परम लक्ष्य है जिसकी प्राप्ती के लिए युगो युगो से रिशिमुनित अपस्या करते आए हैं
29:51गरूर ने यह रहस्यमय ज्ञान प्राप्त कर स्वय को धन्य महसूस किया और उनकी आत्मा मेरे चर्णों में समर्पित हो
29:59गई
30:00भगवान विश्णुने प्रेम से मुस्कुराते हुए गरूर को उठाया उनके समर्पन को स्विकार करते हुए
30:08उसक्षन काल की हर बाधा और कर्मों की हर ग्रंथी गरूर के लिए सदा के लिए अद्रिश्य हो गई
30:15और इस प्रकार गरूर ने परम मोक्ष का अनुभव किया, जहां वे स्वयें इश्वर की अनन्ता में विलीन हो गए
30:23गरूर ने अनुभव किया कि वे अब मात्र एक पक्षी नहीं, बलकि समस्त ब्रहमांड के स्पंदन का अविभाज अंग हैं,
30:31जहां हर कण में इश्वर का अनन्त स्वरूप व्याप्थ है
30:36भगवान विश्णु अपने अनन्त स्वरूप में स्थित, गरूर की आत्मा को अपनी चेतना में पूर्णतर समाहित होते देख प्रेम और
30:44शान्ती से मुस्कुराएं, जैसे एक पिता अपने शिशु को अपनी बाहों में समेटे
30:50इस विलय के साथ, गरूर ने ब्रहमांड के हर छोटे ब्डेक्षन को एक दिव्यन रित्य के रूप में देखा, जहां
30:57प्रत्येक जीवन और मृत्यु एक अनन्त नाटक का अभिन्न अंग थे
31:02भय और आसत्ती की प्रत्येक बेडी, जो अब तक आत्मा को बांधे रखती थी, अब निर्मल जल में विलीन होते
31:10हुए हिंखंड के समान पिघल गई
31:13इस गेहन बोध के पश्चात गरुर ने एक शाश्वत शांती का अनुभव किया, जो समय और स्थान की सीमाओं से
31:21परे थी, एक असीमित अविचलित स्थिर्ता
31:25भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरुर को समझाया कि यह परम अवस्था ही जीवन मुक्त की स्थिती
31:32है, जहां प्राणी जीते हुए भी माया के बंधनों से मुक्त होता है
31:38अब प्रत्येक कर्म, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक मात्र एक खेल बन गया था, जिसके परिणाम से कोई अपेक्षा
31:46नहीं, कोई चिंता नहीं
31:49द्वैत का भ्रम तूट गया था, और केवल एक ही सत्यशेश था, अह ब्रहमास में मैं ही ब्रहमा हूँ
31:57इस अवस्था में भक्त के लिए जीवन अब संघर्ष नहीं, अपितु एक दिव्य लीला में सक्रिय भागिदारी का मार्ग बन
32:05जाता है
32:07भगवान विश्णू ने संकेत किया, कि यह बोध ही वास्तविक भक्ती का शिखर है, जहां भक्त और भगवान के बीच
32:14कोई भेद नहीं रह जाता
32:17हर घटना, चाहे वह सुखद प्रतीत हो या दुखद, अब दिव्य योजना का एक अटूट परिपूर्ण अंश मानी जाती है
32:26यह दृष्टिकों जन्ममर्ण, लाभानी, सुखदुख जैसे द्वंद्वों से मुक्ती दिलाता है, आत्मा को परम स्वतंत्रता प्रदान करता है
32:37अंतह यह ज्ञान जीव को समस्त चिन्ता और संताप से मुक्त कर, शाश्वत और अविनाशी शान्ती की ओर ले जाता
32:45है
32:46भगवान विश्णु ने अपनी द्रिष्टी में अनंत करुणा लिये, गरुर को आशिरवाद दिया कि वे अब सदैव इस लीला के
32:54साक्षी और भागीदार रहेंगे, काल के परे
32:58गरुर ने महसूस किया कि वे अब न केवल इश्वर के वाहन हैं, बलकि स्वया उनकी चेतना का एक अविभाज्य
33:06विस्तार हैं, जो हर क्षण दिव्य इच्छा को पूर्ण करते हैं
33:11इस प्रकार उन्होंने स्रिजन और विनाश के अनन्द चक्र को केवल एक भव्य शाश्वत नाटक के रूप में देखा, जिसमें
33:19प्रत्येक भूमी का समान रूप से महत्वपून थी
33:23अब उनका हर उर्ना, हर विचार, हर सेवा उस परम लीला का एक पवित्र अंश था, जो बिना किसी व्यक्तिगत
33:31लाभ की इच्छा के संपन्न हो रहा था
33:34भगवान विश्णु ने अपनी मौन उपस्थिती से यह सिद्ध किया कि प्रेम और भक्ती ही वह सेतु है, जो आत्मा
33:42को परम सत्य से जोडता है
33:45गरूर की व्यक्तिगत पहचान अब ब्रहमांडिये चेतना में घुल मिल गई थी, जैसे नदी का जल सागर में मिलकर अपना
33:53प्रिथक अस्तित्व खो देता है
33:56और इस प्रकार गरूर ने न केवल काल के बंधन से मुक्ती पाई, बलकि स्वयन को इश्वर की अनन्त लीला
34:03का एक शाश्वत आनंदमय हिस्सा पाया
34:07उस परमख्षण में गरूर ने अनुभव किया कि वह अब केवल एक सेवक नहीं, बलकि स्वयन नारायन की चेतना का
34:15एक अविभाज अंश है, जो असीम ब्रहमांडिये प्रेम से उतप्रोथ था
34:21भगवान विश्णू ने अपनी शांत, नीली आखों से गरूर की इस आंतरिक जागरिती को निहारा, उनकी दिव्यमुस्कान पूरे ब्रहमांड में
34:29ज्यान की किरने बिखेर रही थी
34:32इस गेहन अंतरद्रिष्टी से अभिभूत होकर, गरूर ने अपने विशाल शरीर को जुकाया और परम श्रद्धा में भगवान के चर्णों
34:41में स्वयं को समर्पित कर दिया, जहां सभी संदेह और प्रश्न विलीन हो गए
34:46यह मात्र एक समर्पन नहीं था, बलकि एक आत्मा का ब्रहमांडिये चेतना के साथ एक हो जाना था, जहां व्यक्तिगत
34:55में परम हम्में विलीन हो गया
34:57इस आत्मिक मिलन के बाद भगवान विश्नों ने अपनी दिव्यवानी में भक्ति के उस परम मार्क का उदगाटन किया, जो
35:05ग्यान और योग से भी परे था
35:08उन्होंने समझाया कि ज्यान का मार्क बुद्धी को प्रकाशित करता है और योग शरीर वमन को साथता है, किन्तु भक्ति
35:16आत्मा को सीधे इश्वर से जोडती है
35:20भग्वान ने अपने एक हाथ से ज्यान की पुस्तक की ओर इशारा किया और दूसरे से ध्यानरत योगी की ओर
35:28फिर अंत्ता अपना हृदय खोलते हुए भक्ति का मार्क गर्शाया
35:32उनकी वानी से निकली हर बात एक अमरित धारा के समान थी, जो गरुड के हृदय में प्रवाहित होकर उसे
35:40परम प्रेन से भर रही थी
35:42विश्णू ने कहा ज्यान का सागर असीम है और उसका चिंतन मन को शांत करता है परन्तु वह स्वय में
35:50पूर्णता नहीं बल्की एक मार्क गर्शक मात्र है
35:54गरुड ने सुना की कैसे शुद्ध ज्यान भी कभी-कभी अहंकार का कारण बन सकता है यदि वह भक्ती की
36:02विनमरता से रहित हो
36:04जैसे एक विद्वान अपनी पुस्तकों पर गर्व करता है वैसे ही ज्यान मार्क का अनुयाई भी कभी-कभी अपनी बुद्धी
36:12की श्रिष्ठता में खो जाता है जबकि भक्ती अहंकार को पिघला देती है
36:18एक कमल का फूल अपनी समस्थ सुंदर्ता और सुगंध के साथ बिना किसी अहंकार के सूर्य को अपनी शर्नागती अर्पित
36:26करता है यही सच्ची भक्ती है
36:30धगवान ने आगे समझाया कि योगिक क्रियाय शरीर और प्राण को नियंत्रित करती हैं
36:36वे मन को स्थिर्ता देती हैं पर वे भी स्वय में लक्ष्य नहीं है
36:41गरुर ने देखा कि कैसे कठोर तपस्या और आसन से प्राप्त सिध्धी भी कभी कभी सुक्ष्म आ सकतियों को जन्म
36:49दे सकती है
36:50यदि हृदय में प्रेन न हो
36:53जैसे एक परवत अपनी द्रिडता से खड़ा रहता है
36:56परंतु यदि उसमें जीवन्तता न हो तो वह केवल एक निर्जीव शिला ही रहता है
37:02वैसे ही योग बिना भक्ती के निरस हो सकता है
37:07भक्ती वह मधुर रस है जो हर ज्यान को स्वादिष्ट और हर योग को प्राणवान बना देती है
37:13उसे सीधे परमात्मा से जोर देती है
37:17इस प्रकार भगवान विश्णू ने अपने निशकर्ष में स्पष्ट किया
37:22कि शुद्ध भक्ती और शर्नागती ही वह सर्वोच मार्ग है
37:25जो आत्मा को काल, कर्म और नेती के बंधनों से मुक्त कर देता है
37:31उन्होंने कहा, जो मुझ में अपना सब कुछ अर्पित कर देता है
37:36मैं उसे हर भय से मुक्ती दिलाता हूँ और उसे अपने परम आश्रे में स्थान देता हूँ
37:43गरुर के नेत्रों में अब कोई प्रश्ण नहीं था
37:45केवल असीम कृतग्यता और एक दिव्य चमक थी जिसने उसके पूरे अस्तित्व को आलोकित कर दिया था
37:53और इस प्रकार गरुर ने स्वयन को उस परम आश्रे में पाया
37:58जहां काल की कोई सीमा नहीं, कर्म का कोई बंधन नहीं
38:02और केवल इश्वर की अनंत लीला का शाश्वत आनंद है

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