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पद्म पुराण के छठे एपिसोड में हम उस महागाथा का अनावरण करेंगे जहाँ आध्यात्मिक ज्ञान के स्थापित होने के बाद भी, अहंकार और प्रतिशोध की अग्नि ने ब्रह्मांड को घेर लिया! 🌌 क्या होगा जब एक राक्षस राजा अपने ही पुत्र के आराध्य का शत्रु बन जाएगा? एक नन्हा भक्त, अटूट विश्वास से कैसे बचाएगा सृष्टि को? इस एपिसोड में जानिए भगवान विष्णु के चौथे अवतार, श्री नृसिंह का प्राकट्य, जो अधर्म का विनाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। यह कहानी आपको भक्ति की शक्ति और ईश्वरीय न्याय की पराकाष्ठा दिखाएगी। #PadmaPurana #NarasimhaAvatar #Prahlada #Vishnu #HinduMythology #Puranas #Bhakti #ShatrukaSanhar #NewAvatar
Transcript
00:00हिरन्यक्षिपु के राज महल में गेहन शोक की चाया मंदरा रही थी, जहां उसके भाई हिरन्याक्ष की मृत्यू का दुहक
00:07एक भयंकर प्रतिशोध की ज्वाला में बदल रहा था।
00:11वैकुंठ में भगवान विश्णु ने अपने प्रिय भक्त गरुड के साथ धर्ती पर बढ़ रहे अंधकार और एक शक्तिशाली दैत्य
00:20के हृदय में पनप्रहे क्रोध को शांत भाव से देखा।
00:24एक भव्य वेदी के सामने घुटने टेक कर हिरन्यक्षिपु ने अपने मृत भाई हिरन्याक्ष के दिव्य स्वरूप को निहारा। उसका
00:32हृदय अवर्णनिय पीडा और घ्रिना से भरा हुआ था।
00:36उसके लाल आखों में आसु और प्रतिशोध की आग एक साथ जल रही थी, जिसने उसके पूरे अस्तित्व को विश्णु
00:44के विनाश के लिए समर्पित कर दिया।
00:48शोक के अंधकार से निकल कर हिरन यक्षिपु ने एक नए और भयानक संकल्प के साथ अपने शाही दर्बार की
00:55ओर कदम बढ़ाए, उसकी प्रत्येक चाल में अडिक द्रिडता जलक रही थी।
01:01गरुर ने विश्णु से पूछा कि क्या यह दैत्य अब प्रलै का कारण बनेगा, जिस पर भगवान ने केवल एक
01:08शांत मुस्कान के साथ ब्रहमांडिय संतुलन की बात कही।
01:12सभा में उपस्थित अपने दैत्य सर्दारों को संबोधित करते हुए, उसने प्रतिज्याली की वह तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करेगा
01:21और विश्णु के नाम को हमेशा के लिए मिटा देगा।
01:25उसकी गर्जना पूरे सभागार में गूंज उठी, जिससे वहां उपस्थित सभी दैत्य भाय और उत्साह के मिश्रन से काप उठे
01:33एक नए यूग की शुरुवात का संकेत।
01:36अपने महल से निकल कर हिरन्यक्षिपु ने एक ऐसे निर्जन स्थान की ओर प्रस्थान किया जहां वह अपनी तपस्या से
01:44देवताओं को भी जुकाने की शक्ती प्राप्त करना चाहता था।
01:49ब्रहम लोक में चतुर मुखी ब्रहमा ने हिरन्यक्षिपु की आसन्न तपस्या की तीवर कमपन महसूस की, जिससे उन्हें ब्रहमांड के
01:57भविश्य की चिंता सताने लगी.
02:01भीशन ठंड और जुलसाने वाली गर्मी के बीच, हिरन्यक्षिपु ने अपनी तपस्या आरंभ की एक पैर पर खड़ा होकर उसने
02:09ब्रहमांडिये शक्तियों को अपनी ओर आकर्शित करना शुरू कर दिया.
02:14उसके शरीर से प्रचेंड उर्जा निकल रही थी, जो आकाश में एक धूमिल आवर्ण बना रही थी, मानोस्वयं प्रकृती उसके
02:22संकल्प की परीक्षा ले रही हो.
02:25अंगिनत वर्ष बीट गए, हिरन्यक्षिपु का शरीर दुर्बल होकर मात्र अस्थिपंजर रह गया था, लेकिन उसके तब की अगनी अनंत
02:34ब्रहमांड में धधक रही थी.
02:37स्वर्ग लोक में देवतागन हिरन्यक्षिपु की अविनाशी तपस्या से विचलित होकर ब्रहमा से प्रार्थना कर रहे थे, कि वे इस
02:45तब को रोकें, जो त्रिलोक के लिए खत्रा बन रहा था.
02:50देवताओं की पुकार सुनकर, स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा अपने हंस वाहन पर आरूढ होकर हिरन्यक्षिपु की तपस्या भंग करने के
02:58लिए स्वर्ग से नीचे उत्रे.
03:01जैसे ही ब्रहमा का दिव्य प्रकाश हिरन्यक्षिपु की गेहन तपस्या के क्षेत्र में प्रवेश किया, एक अद्भुत उर्जा का तक्राव
03:09हुआ, जिससे वातावर्ण में एक रहस्यमय शान्ती छा गई.
03:13अंतह ब्रहमा हिरन्यक्षिपु के सामने प्रकट हुए, जिसने अपनी आखों को खोला और अपने सामने स्रिष्टी के जनक को देख
03:22कर विस्मय और विजय का अनुभव किया.
03:25एक शान्त और गंभीर स्वर में ब्रहमा ने हिरन्यक्षिपु से पूछा कि वह अपनी कठोर तपस्या के बदले में कौन
03:33सा वर्दान चाहता है, जिसे वह प्रदान करने को तयार थे.
03:38दुर्बल शरीर के साथ भी हिरन्यक्षिपु ने अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से बताई एक ऐसा वर्दान मांगा जिससे वह किसी
03:46भी प्राणी, स्थान या समय से अजय हो जाए.
03:50ब्रह्मा ने ध्यानपूर्वक सुना, उनके चार मुखों पर चिन्ता की एक सुक्ष्म रेखा उभराई, क्योंकि वे जानते थे कि इस
03:58वर्दान के ब्रह्मांडिय परिनाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं.
04:04ब्रह्मा, जिनके चारों मुखों पर चिन्ता की सुक्ष्म रेखाए उभर आई थी, ने अपनी दिव्य द्रिश्टी से वर्दान के ब्रह्मांडिय
04:12परिनामों का गेहन चिन्तन किया, उनके चारों और उनका शांत ब्रह्मलोक असीम ज्यान के साथ स्पंदित हो रहा था.
04:35अंतह, अपनी तपस्या की अविनाशी शक्ती का सम्मान करते हुए, ब्रह्मा ने अपने दिव्य मस्तक को धीरे से हिलाया, इस
04:43कठोर निर्नय को स्विकार करते हुए, जो ब्रह्मांड के भाग्य को हमेशा के लिए बदल देगा.
04:50जैसे ही ब्रह्मा ने निर्नय लिया, ब्रह्मांडिय आकाश में एक सुक्ष्म लहर दोड़ गई, मानो स्वय नेती भी इस अभूत
04:57पूर्व वर्दान के भार से हिल उठी हो.
05:01ब्रह्मा ने फिर से अपनी द्रिष्टी तपस्या से दुर्बल हो चुके हिरन्यक्षिपू पर केंद्रित की, जिसके आखों में अब भी
05:08अदमय प्रतिशोध की ज्वाला प्रजवलित थी, और उन्होंने वर्दान प्रदान करने के अपने इरादे की घोशना की.
05:17हिरन्यक्षिपू अपने क्षीन शरीर के बावजूद ब्रह्मा के समक्ष अडिक खड़ा रहा, उसकी आखों में एक निर्भीक चमक थी जो
05:25उसकी आने वाली शक्ती के पूर्वाभास से चमक रही थी.
05:30ब्रह्मा ने अपना एक हाथ वर्दा मुद्रा में उठाया, और उनके चारों मुखों से एक साथ दिव्य मंत्रों की प्रतिध्वनी
05:38हुई, ब्रह्मान्डिय उर्जा को एक शक्तिशाली धारा में परिवर्तित करते हुए हिरन्यक्षिपू की ओर प्रवाहित किया.
05:45वह दिव्य उर्जा एक सुनहरी नदी के समान हिरन्यक्षिपू के क्षीन शरीर में समा गई, जिससे उसकी हड्डिया और मांस्पेशिया
05:54एक नई राक्षसी शक्ती के साथ स्पंदित होने लगी.
05:59शन भर में तपस्या के कारण जरजर हुआ उसका शरीर असाधारन शक्ती के साथ फूलने लगा, उसकी तवचा कठोर हो
06:07गई और उसकी नसें एक शक्तिशाली राक्षस के रूप में उभरने लगी.
06:13ब्रहमा वर्दान के विनाशकारी प्रभाव को जानते हुए, अपने कमल आसन पर बैठे हुए भी एक शान्त दुहक और भविश्य
06:21की आपदा के बोज तले दपते हुए दिखाई दिये.
06:25हिरन्यक्षिपु की काया से एक भीशन लाल आभा फूट पड़ी, जैसे एक नया भयानक सूर्य ब्रहमांडिय अंधकार को चीरता हुआ
06:34उदे हो रहा हो.
06:36ब्रहमांडिय संतुलन डग्मगा गया, स्वर्गिय संगीत की स्वरलहरिया असहज विसंगती में बदल गई, जो आने वाले तूफान की भविश्यवानी कर
06:46रही थी.
06:47अपनी नई अजे शक्ती का अनुभव करते हुए, हिरन्यक्षिपु ने अपने विशाल राक्षसी रूप में ब्रहमांडिय दायरे का सर्वेक्षन किया,
06:57उसकी आखों में एक अनियंत्रत अहंकार और विजय की चमक थी.
07:02स्वर्गिय प्राणी जो अब तक दूर से देख रहे थे, भय से कापने लगे, उनके चहरे पर वर्दान के भयावः
07:09परिनामों का गहरा अंदेशा स्पष्ट दिखाई दे रहा था.
07:14हिरन्यक्षिपु ने एक क्रूर मुस्कान के साथ अपने होठों को करल किया, उसकी आखें एक नई भयानक चमक के साथ
07:22चमक उठीन जो ब्रहमांड पर अपने प्रभुत्व के अथा आनंद को दर्शा रही थी.
07:28ब्रहमांडी आकाश में चमकीले स्वर्ण और नीले रन के स्थान पर धीरे-धीरे काले बादल इकठा होने लगे, जो आने
07:37वाले अंधकार और विनाश का एक शक्तिशाली प्रतीक थे.
07:41अपने नवप्राप्त वैभव में हिरन एक्षिपू ब्रहमा लोग से नीचे उतरने लगा, उसकी राक्षसी आकरती से इतनी शक्ती का विकिरन
07:50हो रहा था कि स्वर्गिये प्राणी उसके मार्ग से भैभीत होकर छिटक गए.
07:56ब्रहमा लोग के एक शांत कोने में, चिंतित देवताओं का एक समोह इकठा हो गया, उनके चहरे पर भै और
08:04अनिश्चित्ता के भाव थे, क्योंकि वे आने वाले प्रलय पर विमर्ष कर रहे थे.
08:10ब्रहमा अपने सिनहासन पर बैठे, एक गहरी सांस ली, उनके चार मुखों पर अब एक स्पष्ट उदासी थी, जो उनके
08:18द्वारा किये गए कठिन लेकिन अप्रिहार्य चुनाव के बोज को दर्शा रही थी.
08:24ब्रहमा लोग के कभी चमकीले सुनहरे कमल महल अब एक सुक्ष्म बेचैन चाया से ढके हुए थे, जो ब्रहमांडिये व्यवस्था
08:32में अस्थिर्ता का संकेत दे रहे थे.
08:36ब्रहमांड के एक सुदूर, विरान कोने में, दानवराज हिरन्यक्षिपु ने अदमय संकल्प के साथ अपनी घोर तपस्या आरंब की.
08:45देवलोक में देवगण हिरन्यक्षिपु की तपस्या की तीवरता को देखकर भयभीत थे, क्योंकि उसकी शक्ती लगातार बढ़ती जा रही थी.
08:55वर्षों तक उसने भोजन पानी का त्याग किया, केवल एक पैर पर खड़ा रहा, और उसकी तपस्या की अगनी ने
09:03तीनों लोकों को जुलसाना शुरू कर दिया.
09:06उसकी तपस्या से उत्पन ऊर्जा इतनी प्रचंड थी, कि स्वयन ब्रहमांडिय संतुलन डग्मगाने लगा, जिससे देवताओं के हृदय में गहरी
09:15चिंता घर कर गई.
09:17अंतह उसकी अटूट द्रिडता से प्रसन्न होकर, स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा उसे वर्दान देने के लिए प्रकट हुए.
09:25ब्रहमा के दिव्य प्रकाश से विरान भूमी आलो के थोग उठी और उन्होंने अपनी गंभीर शांत वानी में हिरन्यक्षिपु को
09:34संबोधित किया.
09:36अपनी आखें खोल कर हिरन्यक्षिपु ने ब्रहमा को अपने सामने खड़ा पाया और उसके हृदय में विजय की प्रचंड लालसा
09:44जागरित हुई.
09:46ब्रहमांड के स्वामी और एक द्रिढ निश्चय दानव के बीच की यह भेंट आसन्य ब्रहमांड ये परिवर्तन की प्रस्तावना थी.
09:55खिरन्यक्षिपु ने चतुराई से अमर्त्व का ऐसा वर्दान मांगा जो उसे वस्तुत्ह अजे बना सके शब्दों की हर सीमा को
10:03पार करते हुए.
10:05ब्रहमां उसकी शब्दों की जालसाजी को समझते हुए भी उसकी कठोर तपस्या से बंधे थे और एक कठिन निर्नय के
10:13लिए विवश्च थे.
10:15उसने सपश्ट किया कि उसे न मनुष्य मार सके न पशु न दिन में न रात में न अंदर न
10:22बाहर.
10:24प्रत्येक शर्ट के साथ ब्रहमांडिय धागे उलचते गए, एक ऐसा तानाबाना बुनते गए जो मृत्यू की पारंपरिक अवधार्नाओं को चुनौती
10:33दे रहा था.
10:34आगे उसने मांगा उसे न धर्ती पर, न आकाश में, न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से, न किसी
10:42देवता से, न किसी दानव से मार सके.
10:46अपनी तपस्या के नियमों से बंधे, ब्रहमा ने अंतह उस अध्वितिय और घातक वर्दान को प्रदान करने का निर्णय लिया
10:55जैसे ही ब्रहमा ने वर्दान दिया, एक अध्भुत स्वर्निम उर्जा हिरन एक्षिपु में समा गई, उसे अजे कवच से ढख
11:03दिया
11:04यह वर्दान केवल शब्दों का नहीं था, बलकि एक ऐसी शक्ती का हस्तान तरण था जिसने उसे वस्तुतह मृत्यू से
11:12भी उपर उठा दिया
11:14अपना कर्तव्य पूरा कर, ब्रहमा अपने लोग को लोट गए, जबकि हिरन एक्षिपु ने अपनी अजे शक्ती की प्रचंडता का
11:22अनुभव किया
11:24देवलोक में ब्रहमा के लोटने पर देवताओं को इस वर्दान की भयंकर सच्चाई का ज्यान हुआ और वे गहरी निराशा
11:32में डूब गए
11:34अपनी शक्ती से मदमस्त होकर, हिरन एक्षिपु ने ब्रहमांड को अपनी अधिन्ता में लेने की तयारी में एक भयानक विज्यपूर्ण
11:42गर्जना की
11:44इस वर्दान के साथ हिरन्यक्षिपु की क्रूरता ने पूरे ब्रहमांड को अपनी अंधेरी अत्याचारी छाया में ले लिया, जिससे धर्म
11:53और शांती पर संकच्छा गया
11:56अपने अजयवर्दान के साथ हिरन्यक्षिपु ने अपनी असीम असुर सेना के साथ तीनों लोकों पर भीशण आक्रमन शुरू कर दिया
12:05देवराज इंद्र और अन्य देवता असहाय होकर स्वर्ग लोग से पलायन करने पर विवश हो गए जबकि हिरण यक्षिपु ने
12:13उनके दिव्य सिनहासनों को छीन लिया
12:17अमरावती के पवित्र स्वर्ण महलों पर कबजा कर उस दानवराज ने इंद्र के एरावत और उच्चेह श्रवा जैसे दिव्य साधनों
12:25को अपने नियंत्रण में ले लिया
12:27स्वर्ग का पावन वैभव अब असुरों की मदिरा और उददंडता के कोलाहल से कलंकित होने लगा
12:35प्रित्वी पर हिरण यक्षिपु का आतंत इसकदर फैला की नदिया सूखने लगी और प्राकृतिक संतुलन पूरी तरहे छिन्नभिंद हो गया
12:45महर्शी नारद और अन्यदेवर्शी क्षीर सागर की शरण में पहुँचे लेकिन वैकुंठ के द्वार पर गेहन चिन्ता का वातावर्ण चाया
12:53हुआ था
12:55हिरन्यक्षि पुने कठोर फर्मान जारी किया कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड में केवल उसी की पूजा की जाएगी और किसी भी अन्यदेव
13:03का नाम लेना महापाप होगा
13:06वेदियों पर जलने वाली यग्यग्निया बुझा दी गई और विशियों के पवित्र मंत्रों चार भय के सन्नाटे में बदल गए
13:15आश्रमों और गुरुकुलों पर असुर सैनिकों का नियंत्रण हो गया जहां धर्म शास्त्रों के पठन-पाठन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा
13:23दिया गया
13:24भगवान ब्रह्मा अपने सत्यलोक में बैठकर स्रिष्टी के इस अंधकार्मय चक्र को दुख और लाचारी के साथ देख रहे थे
13:33जो भी मानव या मुनी विश्णु का नाम उच्चारन करने की ध्रिष्टता करता उसे कठोर दंड और कारागार में धकेल
13:41दिया जाता था
13:43हरी शब्द का उच्चारन पाप मान लिया गया और संपूर्ण ब्रहमांड केवल हिरणियाय नमह के नारों से गुंजने लगा
13:52पाताल लोक से लेकर उच्च लोकों तक असुरों का एक्छत्र राज्य स्थापित हो चुका था और अन्याय ही नया नियम
13:59बन गया
14:01भगवान शिव कैलाश के हिम्शिकरों पर समाधिस्थ थे और उनकी तीसरी आख ब्रहमांडी असंतुलन की गर्मी से स्पंदित हो रही
14:09थी
14:11हिरन्यक्षिपु के भाय से नक्षत्रों और ग्रहों ने भी अपनी गती बदल्ली और सूर्य चंद्रमा असुर्राज के आदेश पर उगने
14:19लगे
14:20स्रिष्टी की आत्मा घुटन महसूस कर रही थी और धर्म रूपी व्रिशब अपने तीन पाव खोकर अंतिम सांसे गिन रहा
14:28था
14:29त्रिलोग का कुई भी प्राणी इस अत्याचारी शासन का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था
14:37वैकुंठ में भगवान विश्णू अपनी शेशनाग शया पर गंभीर मुद्रा में विराजमान थे यह जानते हुए कि इस अधर्म के
14:45विनाश का समय निकट आ रहा है
14:49हिरन्यक्षिपु के महल में उसकी महारानी कयाधु के गर्ब से एक महान आत्मा का आगमन होने वाला था जो इस
14:56अंधकार को मिटा देगी
14:59अधर्म अपने चर्मोत कर्ष पर पहुँच चुका था लेकिन ब्रहमान्ड के सबसे गहरे अंधकार में भी भक्ती का एक दिव्यबीज
15:07अंकुरित होने के लिए तैयार था
15:10महारानी कयाधु ने अपने कक्ष में एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिसकी आभासे समस्थ असुर महल एक अलोकिक
15:19कांती से जगमगा उठा
15:21महारानी कयाधु ने अपने नवजात शिशु को अपनी गोद में लिया और उसके चहरे पर छाई दिवे शान्ती को देखकर
15:29गगध हो गई
15:31बालक प्रहलाद ने अपनी आखें खोली और उसके नेत्रों से निकले अलोकिक प्रकाश ने महल के कोने-कोने में छिपे
15:39अंधकार को मिटा दिया
15:41उसी क्षण असुर सामराज्य के प्रांगन में एक अध्भूत नील कमल खिल उठा जो ब्रहमांड में एक परमभक्त के आगमन
15:49का प्रतीक था
15:51जब यह समाचार समराथ हिरन यक्षिपु तक पहुचा तो उसका विशाल राजगरबार हर्शोल लास और उत्सव के शोर से गुँझ
15:59उठा
16:01अहमकारी दैत्यराज हिरन यक्षिपु अपने स्वर्ण सिनहासन पर बैठ कर अट्थास करने लगा यह सोचते हुए कि उसका पुत्र उसके
16:10मार्ग का अनुसर्ण करेगा
16:12जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा हुआ, वह खेलकूद छोड़कर ध्यान में लीन हो जाता और अत्यंत प्रेन से ओम नमो नारायनाय
16:21का उच्चारण करता था
16:23माता के गर्भ में रिशी नारद द्वारा दिये गए दिव्य उपदेशों के संसकार बालक प्रहलाद के हृदय में पूर्ण रूप
16:30से जागरित हो चुके थे
16:33दैत्यराज ने अपने पुत्र की शिक्षा के लिए असुरों के कुलगुरु शंड और अमर्क का भव्य आश्रम नियुक्त किया
16:41गुरु शंड और अमर्क ने प्रहलाद को सिखाया कि केवल हिरन्यक्षिपु ही इस जगत का एक मात्र स्वामी और इश्वर
16:48है
16:50परंतु प्रहलाद ने सरलता से मुस्कुरा कर अपने गुरुओं से कहा कि संपूर्ण ब्रहमांड के रच्चिता और स्वामी केवल भगवान
16:58श्री हरी विश्णु है
17:01बालक के इन वचनों को सुनकर असुर गुरु भाय और आश्चर्य से कामप उठे और प्रहलाद का विचार बदलने का
17:09प्रयास करने लगे
17:11कुछ समय पश्चात हिरण यक्षिपु ने अपने प्रिय पुत्र प्रहलाद को अपनी शिक्षा का प्रदर्शन करने के लिए राजसभा में
17:19बुलाया
17:20दैत्यराज ने अत्यंत स्नेह से प्रहलाद को उठा कर अपनी विशाल गोद में बिठाया और पूछा कि उसने अब तक
17:28क्या सबसे उत्तम बात सीखी है
17:31प्रहलाद ने बिना किसी भय के राजा की आखों में देखा और कहा कि भगवान विश्नु की भक्ती में ही
17:38जीवन की सच्ची सार्थकता है
17:41विश्नु का नाम सुनते ही हिरन्यक्षिपु की आखें क्रोध से लाल हो गई और उसका पूरा शरीर ज्वाला की भानती
17:49धधक उठा
17:51क्रोधित होकर दैत्यराज ने गर्जना की जिससे पूरा असुर महल थर-थर कामपने लगा और सभासत भयभीत हो गए
18:00हिरन्यक्षिपु ने प्रहलाद को दूर फैंकते हुए गुरुओं को कठोर दंड की चेतावनी दी और बालक के मन से विश्नु
18:07का नाम मिटाने का आदेश दिया
18:10गुरुशंड और अमर्क अत्यंत दरे हुए बालक प्रहलाद को वापस अपने आश्रम ले गए और उस पर कठोर नियम थोपने
18:18लगे
18:19किन्तु प्रहलाद का मन अपने आराध्य श्री हरी विश्नु के चर्णों में स्थिर रहा जिसे इस संसार का कोई भी
18:26भय या क्रोध हिला नहीं सकता था
18:30गुरु शंड और अमर्क ने प्रहलाद के मन से श्री हरी का नाम मिटाने के लिए उसे कठोर वैदिक शास्त्रों
18:36का ज्यान देना चाहा
18:38पर बालक का ध्यान तो बस ब्रहमांड के पालक पर ही केंद्रित था
18:43वैकुंठ मेक शीरसागर पर शेशनाग की शया पर लेटे भगवान विश्नु अपने भक्त के अटल विश्वास को देखकर मंदमंद मुस्कुरा
18:51रहे थे
18:52उनकी आखों में असीम करुना ज्हलक रही थी
18:56अपने सभी प्रयासों में विफल होकर भैभीत गुरु शंड और अमर्क ने कापते हुए हिरन्यक्षिपु के सम्मुखा कर प्रहलाद की
19:05अविचल भक्ती का समाचार सुनाया
19:08यह सुनकर हिरन्यक्षिपु का क्रोध एक ज्वाला मुखी की तरह फट पड़ा
19:13उसकी आखों में रक्त का संचार होने लगा और समुचा कक्ष उसके भयानक गर्जन से थर्रा उठा
19:20पुनह अपने पुत्र प्रहलाद को अपने क्रूर दर्बार में बुलाकर हिरन्यक्षिपु ने उसे विष्णु भक्ती त्यागने की अंतिम चेताबनी दी
19:29अन्यथा भयंकर परिनामों की धमकी दी
19:33भगवान विष्णु अपने स्वर्णिम रथ पर विराजमान गरुड के साथ धैर्य पूर्वक इस दिव्य लीला का अवलोकन कर रहे थे
19:42प्रहलाद के द्रेड उत्तर से और भी अधिक क्रोधित होकर हिरन्यक्षिपु ने अपने सेनाप्तियों को आदेश दिया कि इस बालक
19:50को कठोर्तम यातनाय दी जाए जिससे इसका मन विष्णु से विमुख हो जाए
19:56किन्तु प्रहलाद, भयमुक्त और शांत चित्थ होकर अपने पिता की सभी धमकियों को अंदेखा करते हुए अपनी आखों में केवल
20:04अपने आराध्य की छवी को संजोए हुए था
20:08हिरन्यक्षिपु के आदेश पर भयानक दैत्यों ने प्रहलाद को पकड़ कर एक उचे परवत के शिखर से गहरी खाई में
20:16धकेल दिया, यह सोचकर की अब उसका अंत निश्चित है
20:21वैकुंट में भगवान विश्णू का मुखमंडल असीम करुणा और अविचल शांती से प्रकाशित था, जैसे वे जानते हों कि उनके
20:29भक्त को कोई हानी नहीं चू सकती
20:32अद्भुत रूप से प्रहलाद ने अपने आराध्य का नाम जबते हुए नीचे गिरते हुए भी कोई पीडा अनुभव नहीं की
20:40और धर्ती ने उसे एक पुष्प की भाती अपनी गोद में ले लिया
20:45उस गहरी खाई में जहां मृत्यू का वास था, प्रहलाद दिव्य प्रकाश से घिरा हुआ शान्तचित बैठा था, जैसे वह
20:53अपने आराध्य की शरण में स्वर्ग में हो
20:57प्रहलाद के जीवित बचने से हतप्रभ हिरनयक्षिपु ने अब उसे मदमस्त हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का आदेश दिया, जो
21:05अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्ध थे
21:09भगवान विश्नु अपने गदा को धारण किये हुए अपने भक्त पर आने वाले संकट को देख रहे थे, पर उनके
21:16चहरे पर कोई चिंता नहीं थी, केवल शाश्वत धैर्य था
21:21किन्तु जैसे ही विशालकाय हाथी प्रहलाद के निकट आए, वे अचानक शान्थ हो गए और अपने सून से उसे स्पर्श
21:29कर नमरता से पीछे हट गए, मानो किसी अद्रिश शक्ती ने उन्हें रोक दिया हो
21:35प्रहलाद हाथियों के बीच भी निर्भय होकर अपनी आखे बंद किये हुए था, उसके चारों और एक अग्रिश सुरक्षा कवच
21:44आभायमान था, जो श्री हरी की क्रिपा का प्रतीक था
21:48इस बार हिरन्यक्षिपु ने प्रहलाद को विशैले सर्पों से भरे एक गहरे कुए में फैंकने का आदेश दिया, यह सोचकर
21:56की अब वह अवश्यम्रित्यु को प्राप्थ होगा
22:00शीर सागर के मध्य में भगवान विश्नु अपने शेशनाग पर विराज मान होकर प्रहलाद के अटूट विश्वास को देखकर प्रसन्नचित
22:08मुग्रा में थे, उनके नेत्रों में दिव्य चमक थी
22:12कुए में गिरते ही, विशैले सर्पों ने प्रहलाद को डसने के बजाए, उसके शरीर के चारों और एक नरम शयासी
22:20बना ली और उसे सुरक्षित रखा
22:24प्रहलाद उस सर्पशया पर शांतचित लेटा हुआ था, उसके मुख पर दिव्य मुस्कान थी, जो यह दर्शाती थी कि परमात्मा
22:32की क्रिपा से कोई भी विश उसे चू नहीं सकता
22:37हिरन्यक्षिपु का क्रोध समुद्र की लहरों सा उमरता हुआ, अपने सिनहासन से उठ खड़ा हुआ, जब उसने देखा कि सर्पों
22:44का विश भी प्रहलाद को छू न सका
22:48शीरसागर में भगवान विश्नु, उनके अश्ट भुजी रूप से दिव्य प्रकाश फूट रहा था, प्रहलाद की अटूट भक्ती पर मंदमंद
22:56मुस्कुरा रहे थे, उनकी आखों में असीम करुना जहलक रही थी
23:01उसने अपने भयानक असुर सेनापतियों को आदेश दिया कि प्रहलाद को उची परवत चोटी से नीचे फैंक दिया जाए, ताकि
23:09उसके टुक्रे टुक्रे हो जाए
23:12क्रोर दानवों ने छोटे प्रहलाद को निर्दैता से पकड़ लिया और उसे एक विशाल नुकीली चट्टान से भरे पहाड की
23:20ओर खींच ले गए, जहां से अनंत गहराई तक सिर्फ अंधकार था
23:25सैकडों फीट उची चट्टान से नीचे गिरते हुए भी, प्रहलाद ने अपने मुख पर शांत मुस्कान बनाए रखी, उसकी आखें
23:33केवल नारायन का स्मरण कर रही थी
23:37भगवान विश्नु के नेत्रों में एक क्षणिक चमक उभी, जब उन्होंने अपने भक्त को निर्भय होकर अगात खाई में गिरते
23:45देखा, और उनकी लीला का अगला अध्याय आरंभ होने वाला था
23:50नीचे गिरते ही भूमी की देवी ने उसे फूलों की एक नरम शया पर ग्रहन किया, जहां एक भी पत्थर
23:58उसे छू न सका
23:59इस चमतकार को देखकर हिरन्यक्षिपु का क्रोध एक जलते हुए ज्वाला मुखी की तरह फट पड़ा, जिससे उसका पूरा दर्बार
24:08भै से काप उठा
24:10एक बार फिर प्रहलाद को शांत और अक्षक अवस्था में दर्बार में लाया गया, जहां हिरन्यक्षिपु गेहन अविश्वास और धधक्ते
24:19क्रोध से अपनी अगली क्रूर योजना बना रहा था
24:23शीरसागर में भगवान विश्णू अपने शेशनात पर विराजमान, प्रहलाद की द्रिड़ता और अपने भक्तों की रक्षा करने की अपनी प्रतिग्या
24:32पर संतुष्थ होकर एक दिव्य हसी में डूबे हुए थे
24:37खिरन्यक्षिप उन्हें अपने वैद्यों को बुलाया और उन्हें आग्यादी की प्रहलाद को सबसे घातक विश पिलाया जाए जो क्षन भर
24:45में प्राण हर ले
24:47शांतचित्प प्रहलाद ने विश से भरा प्याला अपने हाथों में लिया उसकी आखों में कोई भय नहीं था बस नारायन
24:55के प्रती अटूट विश्वास की जलक थी
24:58जैसे ही प्रहलाद ने विश्पान किया भगवान विश्णू की क्रिपा से वह पे अमरित में बदल गया और उसके शरीर
25:06में एक दिव्य उर्जा का संचार हुआ
25:09भगवान विश्णू ने अपने भक्त की सुरक्षा पर मुस्कुराते हुए एक दिव्य गर्जना की जो ब्रहमांड में गूंज उठी यह
25:17दर्शाते हुए कि कोई भी शक्ती उनके भक्तों को हानी नहीं पहुँचा सकती
25:23विश्पान के बाद भी प्रहलाद और अधिक तेजस्वी दिख रहा था उसके मुख पर एक अध्वितिय चमक थी जिससे हिरन्यक्षिपु
25:32का अविश्वास और गहरा हो गया
25:36खिरन्यक्षिपु की क्रूरता की अगनी अब और भी प्रचंड हो गई उसने प्रहलाद को विशाल हाथियों के पैरों तले कुचलवाने
25:43का आदेश दिया ताकि उसकी हड़ी हड़ी चूर हो जाए
25:48भयानक गजराज जिनकी आखों में क्रोध और उन्माद भरा था प्रहलाद की ओर तेजी से बढ़ रहे थे उनकी चाल
25:56से धर्ती काप रही थी
25:59भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया से एक अद्रिश कवच का निर्मान किया जो प्रहलाद के चारों और फैल गया ताकि
26:07कोई भी शक्ती उसे चू न सके
26:10जैसे ही हाथी प्रहलाद के पास पहुँचे वे अचानक रुप गए उनके पैरों के नीचे की भूमी मुलायम हो गई
26:18और वे एक अद्रिश शक्ती द्वारा विचलित होकर पीछे हट गए
26:23प्रहलाद हाथियों के भैभीत होने के बावजूद अविचलित खड़ा रहा उसका मुखमंडल और भी अधिक कान्तिमान था जो उसकी अटूत
26:32भक्ती और परमात्मा की असीम क्रिपा का प्रतीक था
26:36प्रहलाद हाथियों के भैभीत होने के बावजूद अविचलित खड़ा रहा उसका मुखमंडल और भी अधिक कान्तिमान था जो उसकी अटूत
26:45भक्ती और परमात्मा की असीम क्रिपा का प्रतीक था
26:50देवतागन, विशेशकर ब्रहमा और नारद मुनीक दूर स्वर्ग से इस द्रिश को देख रहे थे उनके चहरे पर चिंता और
26:58विस्मय के भाव स्पष्ट थे
27:01हिरन्यक्षिपू अपने रक्तरंजित सिनहासन से उठ खड़ा हुआ, उसकी आखें क्रोध से लाल थी और उसका शरीर विफलता के कारण
27:09काप रहा था
27:11उसके कप्टी मन में एक भयानक विचार कौन धा, जिसने उसकी हर नस में प्रतिशोध की आग भर दी
27:19क्रोध से भरा, हिरन्यक्षिपू अपने सिनहासन से नीचे उत्रा और प्रहलाद की ओर तेजी से बढ़ा, जैसे कोई तूफान अपने
27:28रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह करने के लिए बढ़ रहा हो
27:33वैकुंठ में भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से जागे हुए, अपने भक्तों की रक्षा के लिए तैयार एक शान्त मुस्कान
27:41के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे
27:45हिरन्यक्षिपुने प्रहलाद को उसके कोमल बाजूओं से कसकर पकड़ा, उसकी दान्विय पकड़ बच्चे के छोटे शरीर पर भयानक दबाव डाल
27:53रही थी
27:54पिता का क्रोध एक तूफानी समुद्र की तरह उमड रहा था, जबकि पुत्र का विश्वास एक अटूट परवत की तरह
28:02अडिक खड़ा था
28:04तेरा विश्णु कहा है, धिरन्यक्षिपु ने गरस्ते हुए पूछा, उसकी आवाज महल की दिवारों में गूंज रही थी, क्या वह
28:12सचमुच हर जगह है, जैसा की तू दावा करता है
28:17देवतागन भयभीत होकर अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रार्थना कर रहे थे, जबकि रिशिगन गेहन तपस्या में लीन थे,
28:25ब्रह्मांड के संतुलन के लिए दिव्य हस्तक शेप की आचना कर रहे थे
28:31हाँ, पिताश्री, प्रहलाद ने शांत भाव से उत्तर दिया, वे हर जगह हैं, इस महल में, आप में, और यहां
28:38तक की इस खंभे में भी
28:41प्रहलाद के शब्द एक शांत ज़रने की तरह थे, जो पिता के क्रोध की धधक्ती आग में भी शितलता प्रदान
28:48कर रहे थे, उसकी भक्ती की गहराई का प्रमान
28:52हिरन्यक्षिपु ने उफास पूर्वक हंस्ते हुए, प्रहलाद के बताय खंभे की ओर इशारा किया, उसकी आखों में क्रूर विजय की
29:00चमक थी
29:02कैलाश परवत पर भगवान शिव गहन ध्यान में लीन अपनी दिव्य तीसरी आख से ब्रहमांड के इस महत्वपूर्ण क्षन को
29:10देख रहे थे
29:12तो तेरा भगवान इस खंभे में छिपा है, हिरनेक्षिपु ने जोर से पूछा, अपनी शक्तिशाली मुठी को उपर उठाते हुए,
29:21खंभे पर वार करने के लिए तयार
29:24खंभा, विशाल और स्थिर एक गूढ रहस्य को अपने भीतर समेटे हुए था, जो दानव राजा के क्रोध के सामने
29:32अपनी नियती की प्रतीक्षा कर रहा था
29:35एक गगनभेदी गर्जना के साथ, हिरनेक्षिपु ने पूरी शक्ति से खंभे पर प्रहार किया, जिससे महल की नीम्व तक हिल
29:43गई और धूल का एक बादल उठ गया
29:46चौदा लोकों के सभी प्राणी, रिशी, देव और दानव एक साथ इस अविश्वसनिय घटना के साक्षी बने भय और प्रत्याशा
29:55से अपनी सासे रोक ली
29:58खंभा चूर-चूर हो गया, भीतर से एक असहनिय चकाचौंध कर देने वाली रोशनी फूट पड़ी, जिसने पूरे महल को
30:06दिव्य उर्जा से भर दिया
30:08जैसे ही खंभा तूटा, उसमें से एक भयानक गर्जना के साथ विश्णु का चौथा और सबसे कुरूर अवतार नर्सिन प्रकट
30:17होने लगा, जो ब्रहमांडिय न्याय का प्रतीक था
30:21नर्सिन का भयानक मुखमंडल धीरे-धीरे तूटे हुए खंभे से पूरी तरह बाहर आया, जिसकी आखों से ब्रहमांडिय क्रोध की
30:29लप्टे निकल रही थी
30:32इस अविश्वसनी द्रिश्य को देखकर, हिरन्यक्षिपु का अदमय अहमकार क्षन भर के लिए काप उठा, क्योंकि उसने अपने सामने साक्षात
30:41मृत्यु को देखा
30:43दानव सभा में उपस्थित सभी दानव, जिनकी आखों में पहले घमंड था, अब वे भैभीत होकर पीछे हटने लगे, अपनी
30:52तलवारे धीली छोड़ते हुए
30:55समय का चक्र मानो थम सा गया था, क्योंकि स्रिष्टी ने ब्रहमांडिय न्याय के इस अभूत पूर्व क्षन को अपनी
31:02आखों से देखा
31:04खंभे के टुक्रों के बीच से नर्सिह का पूरा शरीर प्रकट हुआ, जिसमें एक दिव्य मनुष्य की शक्ती और एक
31:11जंदली शेर की क्रूरता समाहित थी
31:15आकाश में देवतागन, जिनमें ब्रहमा, शिव और अन्यरिशी शामिल थे, इस अद्भूत अवतार को देखकर विस्मय और श्रधा से जुप
31:24गए
31:25नर्सिह ने एक और गर्जना की, जो इतनी तीवर थी कि हिरन्यक्षिपु के महल की नीम तक हिल गई और
31:32दीवारों पर दरारे पड़ गई
31:35वह गर्जना केवल एक ध्वनी नहीं थी, बलकि ब्रहमांड के नियमों का एक उद्गोश था, जिसने हिरन्यक्षिपु के सभी वर्दानों
31:44को चुनौती दी
31:46हिरन्यक्षिपु ने अपनी मरंशील आखों से नर्सिंह को देखा, और पहली बार अपने जीवन में उसे लगा कि उसका अंत
31:54निकट है
31:56प्रहलाद जो अब तक अपने पिता की क्रूरता से काप रहा था, नर्सिंग के दर्शन से शांत और आनंदित हो
32:03उठा
32:05हिरन्यक्षिपु ने फिर भी अपनी शक्ती पर घमंड करते हुए नर्सिंग पर अपनी भारी गदा से आक्रमन करने की मूर्ख
32:12तापून कोशिश की
32:15लेकिन नर्सिंग के सामने हिरन्यक्षिपु का बल एक छोटे बच्चे के खेल के समान था, जो ब्रहमांडिय शक्ती के सामने
32:23तुछ था
32:25नर्सिंग ने हिरन्यक्षिपु को सहच्ता से पकड़ लिया, जैसे एक शेर अपने शिकार को दबोचता है, उसके सारे वर्दानों को
32:33व्यर्थ करते हुए
32:35देव और रिशिगण जो दूर से यह सब देख रहे थे, अब अपनी आखे बंद कर लिये, इस भयानक न्याय
32:42के गवाह बनने के लिए तयार नहीं थे
32:46नर्सिह ने हिरन्यक्षिपु को अपने घुटनों पर लिटा दिया, और अपने तीखे पंजों से उसके कवच को फाड़ डाला
32:54यह न दिन था न रात, न घर के अंदर न बाहर, न जमीन पर न आकाश में, नर्सिह ने
33:01सभी वर्दानों को धता बता दिया
33:03फिर नर्सिह ने अपने पंजों से हिरन्यक्षिपु का पेट चीर दिया, जैसे एक शिकारी अपने शिकार को निर्दैता से चीरता
33:12है
33:14हिरन्यक्षिपु की अंतिन चीख ब्रहमांड में गूंज उठी, एक दुष्ट यूग के अंत की घोशना करते हुए
33:21नर्सिह ने हिरन्यक्षिपु के आंतरिक अंगों को निकाल कर उसके रक्ट से अपने शरीर को रंगा, ब्रहमांड ये शुद्धिकरण का
33:29प्रदर्शन करते हुए
33:32जैसे ही हिरन्यक्षिपु का अंत हुआ, ब्रहमांड में शांती लोट आई और धर्म की स्थापना हुई, जिसका साक्षी प्रहलाद बना
33:42हिरन्यक्षिपु के अंत के उपरांत, उसके विशाल महल में एक अलौकिक शांती छा गई, जहां द्रिसिन्ह अभी भी अपनी प्रचंड
33:50उर्जा से गर्जना कर रहे थे, परन्तु अब उनकी क्रोधागनी धीरे-धीरे मंद पढ़ने लगी थी
33:57उनकी सिंहकरजना, जो कुछ क्षन पहले ब्रहमांड को विदीर्ण कर रही थी, अब एक गहरी शांत प्रतिध्वनी में बदल गई
34:05थी, जैसे कोई प्रल्यंकारी तूफान अपने चरम के बाद धीमा पड़ रहा हो
34:11निसिंह ने हिरन्यक्षिपु के निश्प्राण शरीर को अपनी गोज से धीरे से दहलीज पर रख दिया, जैसे एक माली सूखे
34:19पत्ते को सावधानी से गिराता है, यह ब्रहमांडिय न्याय की अंतिन क्रिया थी
34:25फिर उनके दिव्य शरीर से एक प्रखर जोती फूट पड़ी, जो ब्रहमांड के हर कोने तक फैल गई, अंधकार को
34:33चीरती हुई और धर्म के पुनुरुप्थान का उद्गोश करती हुई
34:38जैसे ही न्रिसिन्ह के प्रचंड रूप का तेज मंद पड़ा, उनकी आखों में वह ब्रहमांडिय शांती उतर आई जो स्रिष्टी
34:45के पालनहार का शाश्वत स्वभाव है
34:49बालत प्रहलाद ने अपने आराध्य के इस शांत होते रूप को देखा और उसके हृदय में भक्ती, श्रध्धा और असीम
34:57प्रेन की लहरें उमर पड़ी
35:00आकाश से देवता और रिशियों के समोह प्रकट होने लगे, जो इस दिव्य लीला के साक्षी बनने और नारायन की
35:07स्थुती करने के लिए आतुर थे
35:11तत्पश्चात एक स्वर्गिय पुश्पवर्शा हुई, जो आकाश से धीरे-धीरे बरसती हुई पूरे महल परिसर को सुगंधित कर गई, यह
35:19ब्रहमांड की प्रसन्नता का प्रतीक थी
35:23ग्रिसिंग ने अपनी शांति पूर्ण आखों से बालक प्रहलाद की ओर देखा, उनके चहरे पर अब एक पिता की ममता
35:30और गुरु की कृपा का भाव जलक रहा था
35:34प्रहलाद भय और विस्मय के मिश्रण से भरे हुए, धीरे धीरे अपने आराध्य की ओर बढ़े, उनके प्रत्येक कदम में
35:41अनवरत भक्ती की सुगंध थी
35:44ग्रिसिंह ने एक गहरी मधुर ध्वनी में प्रहलाद से बात की, उनके शब्द आकाश गंगाओं में गुंचते हुए ब्रहमांड को
35:52आशिरवाद दे रहे थे
35:55प्रहलाद के प्रतीन रिसिंह का आशिरवाद एक सुनहरी उर्जा के रूप में उनके हाथों से निकला, जिसने बालत को अपनी
36:03दिव्य आभा से घेर लिया और उसे अदमय शक्ती प्रदान की
36:08द्रिसिंह ने प्रहलाद को उसके नए उत्तरदायत्वों और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्ग दर्शन दिया, उसे एक
36:16न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ राजा बनने का आदेश दिया
36:20देवता और रिशी समूह दूर से इस अद्भुत द्रिश्य को देख रहे थे, उनकी आखों में असीम श्रद्धा और ब्रहमांडिय
36:28व्यवस्था की पुनर्स्थापना का संतोष था
36:32न्रिसिंह का दिव्य रूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा, उनकी प्रचंड शक्ती एक शांति पूर्ण आभा में बदल गई, जैसे
36:39तीवर सूर्योदय धीरे-धीरे शांत दिन में परिवर्तित हो जाता है
36:45अंतह, उनकी प्रचंड शक्ती और दिव्य उपस्थिती केवल एक चमकदार उर्जा-पुन्च के रूप में शेश रही, जो धीरे-धीरे
36:53आकाश में विलीन हो गई, केवल उनकी शिक्षाओं की गूंच पीछे छोड़ गई
36:59निरिसिन्य के विलीन होते ही, प्रहलाद ने अपने कंधों पर एक नए युग के भार को महसूस किया, जिसमें उसे
37:06धर्म और न्याय का प्रतीक बनकर शासन करना था
37:11देवता, रिशी और अन्य सेलेस्टियल बींग्स अब प्रहलाद को उसके उचित स्थान पर देख रहे थे, उन्हें दैथ्यकुल का सबसे
37:19पवित्र और न्यायप्रिय राजा स्वीकार करते हुए
37:23प्रहलाद ने विनमरता पूर्वक अपने नए पद को स्वीकार किया, अपने हाथों को जोड़कर ब्रहमांड और अपने आराध्य को कृतग्यता
37:32अर्पित की
37:34इस प्रकार हिरन्यक्षिपु का शासन समाक्थ हुआ और प्रहलाद के नेतरित्व में धर्म का एक स्वर्ण युग आरंभ हुआ जहां
37:42न्याय और भक्ती का प्रकाश हर दिशा में फैल गया

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