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सृष्टि के अद्भुत विस्तार के बाद, आज हम जानेंगे ध्रुव के वंश में जन्मे महान प्रचेताओं की दिव्य गाथा! 🔥 दस प्रचेताओं ने अपने पिता की आज्ञा पर घोर तपस्या की, जहाँ उन्हें भगवान शिव का दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उनकी 10,000 वर्षों की तपस्या से पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ा? और उनके क्रोध ने कैसे सृष्टि में उथल-पुथल मचाई? इस रोमांचक कड़ी में हम देखेंगे कि कैसे प्रचेताओं की तपस्या ने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनके साहसिक कार्यों से दक्ष प्रजापति का पुनर्जन्म हुआ, जो भविष्य की कई महत्वपूर्ण घटनाओं की नींव रखेगा। #विष्णुपुराण #VishnuPurana #Prachetas #दक्ष #शिव #विष्णु #Mythology #HinduPuranas #EpicSagas
Transcript
00:00परम ज्यानी महर्षी परशुराम अपने परम प्रिय शिश मैत्रे को पिछले वृत्तांत की याद दिलाते हुए दक्ष प्रजापती की कन्याओं
00:08से उत्पन हुए विशाल संसार का वर्णन आरंभ करते हैं।
00:13रिशी परशुराम बताते हैं कि किस प्रकार प्रजाप्ती दक्ष की साथ रूपवती कन्याओं के विवाह से देव, दानव, गंधर्व और
00:21समस्थ स्थावर जंगम जीवों की स्रिष्टी इस धरातल पर संभव हुई थी
00:27मैत्रे अत्यंत श्रद्धाभाव से अपने गुरु के मुखारविन से टपक्ते ज्यानमरित को पान करते हुए, स्रिष्टी के इस अध्भुत और
00:35रहस्य में विस्तार को समझने का प्रयास करते हैं
00:40दक्ष प्रजाप्ती द्वारा आयोजित महान वैदिक यग्यों की दिव्य अगनी की ज्वालाओं से उठी उर्जाने संपून ब्रहमांड में जीवन की
00:48बहुरंगी किर्णों को बिखेर दिया था
00:51अधिती के देवगणों और दिती के दैतियों के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए प्रकृती ने समस्थ चराचर जगत में अपनी
00:59विविद शक्तियों का संचार किया
01:02दक्ष के वन्शानुक्रम के उपरांत महर्शी परशुराम अब कथा के प्रवाह को ध्रुव जी के उस अमर राजवन्ष की ओर
01:10मोरते हैं जिसने धर्म की नीम पर शासन किया था
01:14परम विश्नुभक्त ध्रुव महाराज ने अपने अचलतप और अटूट भक्ती के बल पर न केवल ध्रुव पद प्राप्त किया बलकी
01:22प्रित्वी पर एक आदर्श धर्मराज्य की स्थापना भी की
01:27ध्रुव के महान शासनकाल ने आर्यावर्त में एक ऐसे स्वर्णिम युग की शुरुवात की जहां प्रत्येक राजाने सत्य करुणा और
01:35प्रजापालन को ही अपना सर्वोप्री धर्म माना
01:39ध्रुव के जेश्ट पुत्र उत्कल ने राज सिनहासन के मोह को त्याग कर गेहन अध्यात्म और शांत वनों की तपस्या
01:47को अपने जीवन का परमधे चुना
01:50उत्कल के पश्चात वत्सर और उनके वन्ष जोने ध्रुव के महान संसकारों को अक्षुन रखते हुए प्रित्वी पर शांती और
01:58न्याय का ध्वच फहराय रखा
02:01जिग्यासु मैत्रे ने विनमरता पूर्वक हाथ जोड़कर पूछा की ध्रुव के इसी महान कुल में आगे चलकर कौन-कौन से
02:08प्रतापी और प्रभावशाली राजा अवतरित हुए
02:13परशुराम जी ने उत्तर देते हुए राजा अंग का नाम लिया जो अत्यंत प्रजापालक, धार्मिक और न्यायी शासक थे किन्तु
02:21उनके ह्रदय में संतान की चिंता सदा बनी रहती थी
02:25राजा अंग ने एक महान पुत्रिष्टी यग्य का आयोजन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र तो प्राप्थ हुआ, परन्तु वह अधर्म
02:34के संस्कारों के साथ जन्मा
02:37अंके घर वेन नाम का पुत्र पैदा हुआ, जिसने बड़े होकर अपने मातामह के अधार्मिक गुनों को अपनाया और संपूर्ण
02:45राज्य में विनाश की छाया फैला दी
02:48दुष्ट राजा वेन ने समस्त धर्मकारियों, यग्यों और पूजायोग्य रिशियों के सम्मान पर प्रतिबंध लगाकर अपने राज्य को अंधकार और
02:57विनाश के गर्त में धकेल दिया
03:00स्रिष्टी के संतुलन की रक्षा हेतु महर्शी विश्वामित्र और अन्य महर्शियों ने अपने मंत्रों द्वारा बेन के देह का मंथन
03:08करके अधर्म का नाश करने का कठोर निर्ने लिया
03:11उसी मन्थन से परम तेजस्वी महाराज प्रिथु का प्राकटे हुआ जो भगवान विश्णों के अंशावतार थे और जिनके हाथों में
03:20सुदर्शन तथा धनुष की चमक बिखरी थी
03:24समराट प्रिथु ने प्रिथवी रूपी गाय का दोहन करके समस्त ओषधिया अन्न और जीवन्दाइनी संपदाए पुनह संपूर्ण मानवता और जीवों
03:33को प्रदान की
03:35महर्शी परशुराम आगे बताते हैं कि इसी महान राजा प्रिथु के ही वन्ष परमपरा में आगे चलकर प्राचीन बरही और
03:43उनके दस महा प्राक्रमी पुत्र प्रचेता उत्पन हुए
03:47अब मैत्रे उतकंठा से भर उठते हैं क्योंकि परशुराम उन दस प्रचेता भाईयों की उस अध्भुत महागाथा का द्वार खोलने
03:56जा रहे हैं जो शिव और विश्नु की असीम क्रिपा से जुड़ी है
04:01महाराज ध्रूग के तेजस्वी वन्षज राजा प्राचीन बरही ने अपने प्रतापी शासन से धर्म और वैदिक परमपराओं का ध्वज संपूर्ण
04:10विश्व में फहराया
04:12महान समराट प्राचीन बरही ने प्रिथवी पर अंगिनत भव्य यग्यों का आयोजन किया जिससे चारों दिशाए पवित्र वैदिक मंत्रों से
04:20गूंज उठी
04:22निरंतर संपन्न होने वाले महायग्यों के कारण संपूर्ण भूमंडल पूर्व दिशा की ओर बिची हुई पवित्र कुष घास से आच्छादित
04:31हो गया
04:32कालक्रम में राजा प्राचीन बरही की महारानी ने दस दिव्य और परम तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया जो प्रचेतस के
04:40नाम से विख्यात हुए
04:42दसो प्रचेतस भ्याता बाल्यावस्था से ही परस्पर अगात प्रेम अखंड एक्ता और वेदों के गूड ज्यान से विभूशित थे
04:51जब प्रचेतस युवावस्था में पहुँचे तब राजा प्राचीन बरही ने उन्हें अपने राजसभा में बुलाकर भावी जीवन के महान उत्तरदायत्व
05:00का बोध कराया
05:02राजा ने अपने पुत्रों को आज्यादी की वे उग्र तपस्या के माध्यम से इश्वर को प्रसन करें और इस संसार
05:10में प्रजाकी वृद्धी कर सभेता का पुरुद्धार करें
05:13अपने पिता की आज्या को सर्वोप्री मानते हुए दसों प्रचेतस भाईयों ने शीश नवाकर इस परम कर्तवे को सहर्ष स्विकार
05:22किया
05:23पिता का आशिरवाद लेकर प्रचेतस भाईयों ने अपनी समरिध राजधानी बरहिश्मती का त्याग किया और घने वनों की ओर प्रस्थान
05:32किया
05:34दुर्गम परवतों, बहती पवित्र नदियों और प्राचीन जंगलों को पार करते हुए दसों राजकुमार अनवरत आगे बढ़ते रहे
05:43निरंतर यात्रा करते हुए प्रचेतस भाता अंत्ध अनंत फैलाव वाले एक विशाल और शांत महासागर के तट पर पहुँचे
05:52समुद्र की विशालता और शांती को देखकर दसों भाईयों ने निर्नै लिया कि यही स्थान उनकी कठोर तपस्या के लिए
05:59सर्वता उप्युक्त है
06:02राजसी वस्त्रों का त्याग कर वलकल धारन किये हुए दसों प्रचेतस समुद्र तट पर हाथ जोड़कर ईश्वर के ध्यान में
06:10लीन होने लगे
06:12इसी बीच देवर्शी नारद ने राजा प्राचीन बरही के राज महल में आगमन किया ताकि वे राजा को केवल कर्मकांडों
06:20से उपर उठा कर आत्मज्यान की ओर ले जा सके
06:24देवर्शी नारद ने राजा को स्मरण कराया कि केवल बाहरी यग्यों और पशुबली से मोक्ष संभव नहीं, बल्कि आत्मा का
06:32परमात्मा से मिलन ही परमसत्य है
06:45देवर्शी नारद ने राजा को पुरंजन का रूपक आख्यान सुना कर संसार के भ्रम और जीवात्मा की मुक्ति का मार्क
06:52स्पष्ट किया
06:54उधर समुद्र तट पर प्रचेतस भाईयों ने घोर तपस्या करने के लिए जल के भीतर प्रवेश करने का संकल्त लिया
07:02दसों प्रचेतस महासागर की अगाध गहराईयों में उतर कर जल के भीतर एक साथ समाधिस्थ हो गए और हजारों वर्षों
07:11तक अनन्य भक्ती में लीन रहे
07:14प्रचेताओं की इस कठिन और निश्चल तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव स्वयन जल के उपर प्रकट होने के लिए
07:21उद्यत हुए
07:23महाराजा प्राचीन बरही ने अपने दस निश्थावान पुत्रों प्रचेताओं को सभा में बुलाकर प्रित्वी पर घट्ती स्रिष्टी और जीवन के
07:32विस्तार की परम आवश्शक्ता का ज्यान कराया
07:35पिता की आग्या को अपने सिर्माथे पर रखते हुए दसों प्रचेता भाईयों ने स्रिष्ट समवर्धन के इस महान धर्म कार्य
07:43के लिए एक स्वर में अपनी स्वीकृती दी
07:47जब प्रचेताओं ने महल की अटारी से बाहर देखा तो उन्हें दूर दूर तक फैले निर्जन वनों और जीवन विहीं
07:54भूभाग को देखकर स्विष्ट विस्तार का तीवर संकल्प जगा
07:59संसार के कल्यान हेतु दसों राजकुमारों ने अपने समस्त राजसी आभूशनों, रतनों और रेश्मी वस्त्रों का त्याग कर सन्यासी बनने
08:08का कठोर निर्णय लिया
08:11वल्क वस्त्रधारन किये और हाथों में पवित्र कुश घास लिये, दसों राजकुमार एक साथ अपने विशाल राज्य के द्वार से
08:19बाहर की ओर निकल पड़े
08:21नगर की प्रजा अपने प्रिय और तेजस्वी राजकुमारों को तपस्या के मार्ग पर जाते देख भावुक होकर अश्रुपूरित नेत्रों से
08:29उन्हें विदाई दे रही थी
08:32एक ही संकल्प से बंधे दसो भाई अगनी की दस जलती हुई लप्तों के समान अत्यंत तेजस्वी प्रतीत होते हुए
08:39घने वनों की ओर बढ़ते चले गए
08:43अपनी यात्रा के दौरान प्रचेताओं ने परमपिता भगवान नारायन का ध्यान करते हुए मधुर और ओजस्वी वैदिक मंत्रों का सामुहिक
08:51गान किया
08:53उनके मुख से निकलते पवित्र मंत्रों के प्रभाव से वन के भयानक हिंसक जीव भी अपने वैरभाव को छोड़कर उनके
09:01साथ शान्ती पूर्वक चलने लगे
09:03कई दिनों की निरंतर यात्रा के बाद दसो प्रचेता भाई विशाल और अनन्त महासागर के तटपर पहुँचे जहां उठती तरंगे
09:12सूर्य की किर्णों में चमक रही थी
09:15समुद्र की अगाध गहराई को देखते हुए प्रचेताओं को स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णू की अनन्त महिमा का साक्षात बोध
09:23हुआ
09:25तभी महासागर की दिशा से एक दिव्य सुगंधित वायू प्रवाहित हुई जिसमें शंक की मधुर और अलौकिक ध्वनी गुंजती प्रतीत
09:33हुई
09:35आकाश में सुख्ष्म रूप से प्रकट होकर ब्रहमाजी ने अपने मानस पुत्रों को देखा और मन ही मन उन्हें सफल
09:42तपस्या का गुप्ट आशिरवाद प्रदान किया
09:46अलौकिक संकेत को पाकर प्रचेताओं ने जल के भीतर प्रवेश करके सहसर वर्षों तक घोर तपस्या करने का अंतिन निश्चय
09:54किया
09:55जल में उतर कर दसों भाईयों ने प्राणायाम द्वारा अपने चित को एकागर किया और बिना डिगे केवल भगवान नारायन
10:03के ध्यान में लीन हो गए
10:06समुद्र की अतल गहराईयों में प्रचेताओं की तपस्या इतनी तीवर थी की जल के नीचे का वातावर्ण दिव्य जोती से
10:14जग्म का उठा
10:15उनके शरीर से उत्पन्न हुई स्वर्णिम तपोगनी जल में फैलने लगी जिससे आसपास की अशान्त तरंगे स्वतह शान्त होने लगी
10:26प्रचेताओं के इस अभूत पूर्व त्याग और निष्ठा को देख कर स्वर्गलोग के देवता और अपसराय आकाश से उन पर
10:33पुश्पवर्शा करने लगे
10:35जल की गहरायों में दसो भाईयों की एक निष्ठ भक्ती ने ऐसा आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न किया कि उसकी तरंगे वैकुंठ
10:44लोक तक पहुँचने लगी
10:46अपने संकल्प पर अडिग रहकर प्रचेता अब उस महानक्षन की प्रतीक्षा करने लगे जब भगवान शिव और विश्णु उन्हें दर्शन
10:55देकर क्रितार्थ करेंगे
10:57जब प्रचेताओं के कदम घने अलौकिक वनों को पार करते हुए एक विशाल और शांत सरोवर के तटकी ओर बढ़े
11:05तब प्रकृती स्वयं उनके आगमन का स्वागत करने लगी
11:09उस विशाल सरोवर के तटपर पहुँचकर दसो भाईयों ने देखा कि जल की सतह पर हजारों दिव्य कमल खिले थे
11:17और पानी से पवित्र सुगंध हा रही थी
11:21अचानक उस नीरोल सरोवर के मध्य से अलोकिक तरंगे उठने लगी और जल की सतह एक अत्यंत पवित्र स्वर्णिम और
11:29नीली दिव्य आभा से जगमगा उठी
11:32जल के उस तेजपुंच के बीच से स्वयंत रिशूलधारी महादेव भगवान शिव प्रकट हुए जिनकी असीम करुणा और तेज देखकर
11:41समस्त दिशाएं धन्य हो गई
11:43रुद्र का वह प्रत्यक्ष स्वरूप देखकर दसों प्रचेताओं के हृदय अपार भक्ती से भर गए और उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से
11:52महादेव को प्रणाम किया
11:54दयालू भगवान शिव ने मधुरवानी में प्रचेताओं की सराहना की और उनकी कठोर तपस्या के पवित्र संकल्प के प्रती अपनी
12:03प्रसन्नता व्यक्त की
12:05महादेव ने प्रचेताओं को उपदेश देते हुए कहा कि इस स्रिष्टी में भगवान विश्णू की भक्ती ही जीवन का सर्वोत
12:13क्रिष्ट और अंतिन कल्यानकारी मार्ध है
12:16शिव जी ने उन्हें विश्णू की परम प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अत्यन्त पवित्र और गोपनिय रुद्रगीत का उपदेश देना
12:24प्रारंभ किया
12:27रुद्रगीत के प्रथम श्लोकों के गूंजते ही पूरे वायुमंडल में उमकार की पवित्र ध्वनी भर गई और समस्त वन में
12:34शान्ती छा गई
12:36महादेव ने रुद्रगीत के माध्यम से भगवान विश्नु के भव्य चतुर्भुज रूप के ध्यान और उनकी स्तुती की विधी का
12:43पूर्ण वर्णन किया
12:46भगवान शिव द्वारा रचित इस स्तोत्र ने प्रचेताओं के अंतहकरण को पूर्ण ज्यान और परम एकागरता से आलोकित कर दिया
12:55शिव जी ने प्रचेताओं को निर्देश दिया कि वे इस रुद्र गीत का जाब करते हुए 10,000 वर्षों तक
13:02सरोवर के जल में रहकर तपस्या करें
13:05महादेव ने प्रचेताओं को आश्वासन दिया कि इस रुद्रगीत के निरंतर जब से भगवान विश्णु स्वयम प्रकट होकर उन्हें वांचित
13:14वर्दान देंगे
13:16भगवान शिव ने प्रचेताओं को अपना आशिर्वाद प्रदान किया और उनके सिर पर अभय हस्त रखकर उन्हें महान सफलता का
13:24वर्दिया
13:26अपना दिव्य उपदेश पूर्ण करने के बाद भगवान शिव धीरे धीरे अंतरध्यान होने लगे और उनका तेज आकाश गंगा में
13:34समा गया
13:36महादेव के अंतरध्यान होने के पश्चात प्रचेताओं का हृदय अपार उत्साह, आत्म विश्वास और द्रिड संकल्प से भर उठा
13:45दसों प्रचेताओं ने एक दूसरे का हाथ थामा और भगवान विश्णु का स्मरण करते हुए पवित्र सरोवर की गहराईयों में
13:53प्रवेश किया
13:55सरोवर के शीतल और पवित्र जल में समा कर वे सभी भाई ध्यान की पराकाश्ठा में लीन होकर जल के
14:02भीतर बैठ गए
14:14इस प्रकार प्रचेताओं की महान अंडर वॉटर तपस्या प्रारंभ हुई जिसने तीनों लोकों को उनकी अनन्य विश्णु भक्ती का परिचय
14:22दिया
14:23शिव के दिव्य उद्बोधन से प्रेरित होकर प्रचेताओं ने संसार के कल्यान और अपने पिता के अपमान का प्रतिशोध लेने
14:31हेतु अदमे संकल्प धारण किया
14:34वे एक-एक करके अथा समुद्र की गर्जनाकर्ती लहरों में समाते चले गए मानोस्वय वरुन देव उन्हें अपने आगोश में
14:43ले रहे हुँ
14:45समुद्र की गहराईयों में भी उनके अंतर्मन में भगवान शिव का वह दिव्य उपदेश प्रतिध्वनित हो रहा था जिसने उन्हें
14:53इस गहन तपस्या की ओर अग्रसर किया था
14:57उनके होंट केवल ओम नमो भगवते वासुदेवाय के शाश्वत मंत्र का जाब कर रहे थे जिसकी हर ध्वनी जल में
15:04अद्रिश तरंगें उत्पन कर रही थी
15:08उनकी अदमय तपस्या को देख कर समुद्र के विशाल का आई जीव जैसे वहल और शार्क भी विस्मय से उनके
15:15चारों और घेरा बना कर शांत खड़े हो गए
15:19सहसरों वर्ष बीटते चले गए जैसे रेट की घड़ी से धूल के कन जहरते हों किन्तु प्रचेताओं के लिए समय
15:26की धार्णा अद्रिश हो चुकी थी
15:28उनकी तपस्या की प्रचेंड उर्जा ब्रहमांड में फैलने लगी जिससे स्रिष्टी के कनकन में एक अद्रिश कमपन उत्पन हो गया
15:39स्वर्गलोक में बैठे देवता भी इस असाधारन तपस्या की तीवर्ता से विचलित होने लगे
15:44उनके सिनहासन डोलने लगे और दिव्यवातावर्ण में एक अजीब सी बेचैनी चागई
15:51स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा अपने कमल सिनहासन पर बैठे गहन चिंतन में लीन थे
15:58उनकी चार आखों में प्रचेताओं की तपस्या का प्रतिबिम जलक रहा था
16:03कैलाश पर विराजमान भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी पारवती के साथ प्रचेताओं की अविचल भक्ती को देख कर प्रसन्नता से मुस्कुरा
16:12रहे थे
16:14देवर्शी नारद अपनी वीना पर नारायन नाम का जाब करते हुए तीनों लोकों में भ्रमन कर रहे थे
16:21और उन्होंने प्रचेताओं की तपस्या की महिमा का बखान किया
16:26जैसे जैसे तपस्या की अवधी बढ़ती गई
16:29समुद्र की गहराई में भी एक अद्रिश कमपन उत्पन होने लगा
16:33जिसने प्राचीन निद्रालू जीवों को जागरित कर दिया
16:37उनकी तपस्या की अगनी जल के भीतर भी प्रजवलित हो रही थी
16:42जिससे समुद्र का जल धीरे-धीरे उश्न होने लगा
16:45मानो स्वय वरोन देव भी उनकी शक्ती से भैभीत हो
16:50अंतर शीरसागर में शेशनात पर विराजमान भगवान विश्नु का ध्यान प्रचेताओं की अटूप तपस्या की गोर आकर्शित हुआ
16:59समुद्र की गहरायों में जहां प्रचेताओं की तपस्या चरम पर थी एक दिव्य स्वर्णिम प्रकाश पुँझ उतरने लगा
17:07उस दिव्य प्रकाश के मध्य से स्वय भगवान विश्नु प्रकट हुए उनकी अनुपम आभासे संपूर्ण समुद्र जग्मगा उठा
17:28विश्नु ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वर्दान दिया जिससे स्रिष्टी का संतुलन पुनह स्थापित हो सके
17:37वर्दान प्राप्ट कर प्रचेताओं ने समुद्र की गहरायों से बाहर कदम रखा उनके शरीर पर दिव्य तेज चमक रहा था
17:58अभिनंदन कर रही हो प्रचेताओं के वंगमन उप्रांट प्रित्वी बिना शासक के असंतुलित होने लगी जहां मानवी व्यवस्था का अभाव
18:08गहराने लगा था
18:10मंद गती से भूमी पर अंकुर फूटने लगे प्रकृती की असीमित और अनियंतरित शक्ती का प्रमान देते हुए जो अब
18:18बेलगाम थी
18:20छोटे पौधे शीघ्रही विशालकाय व्रिक्षों में बदल गए आकाश को छूने की प्रतिसपरधा करते हुए जिनकी शाखायक शितिच तक फैलती
18:29चली गई
18:31खुले मैदान और उपजाव भूमी धीरे-धीरे हरे-भरे घने वनों में विलीन होने लगी, हरियाली का एक अथा सागर
18:38बनता जा रहा था
18:41मनुष्य जाती इस अकल्पनिय विस्तार को विस्मय और भय से देख रही थी, अपने भविश्य को लेकर एक अनिश्चित्ता के
18:49घेरे में
18:50अन्न उगाने के लिए भूमी संकुचित होती जा रही थी, भुखमरी की भीशन आशंका प्रतेक रिदय में गहराने लगी
18:59देखते ही देखते, छोटे-छोटे ग्राम और बस्तिया व्रिक्षों के विशाल आवर्ण तले समाहित होने लगी, मानो प्रित्वी उन्हें निगर
19:08रही हो
19:09मानविय पत और नदिया भी सघन वनस्पतियों से आच्छादित होने लगी, यात्रा लगभग असंभव हो गई, मानो कोई अद्रिश्य शक्ती
19:18उन्हें अवरुद्ध कर रही हो
19:21सूर्य का प्रकाश भी धर्ती तक पहुँचने में संधर्श कर रहा था, हर और एक चिरस्थाई संध्या का सामराज्य था,
19:29गेहन अंधकार और नमी से भरा
19:32जहां वन्यजीवों का सामराज्य फलता फूलता, वहीं मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए जूज रहा था, भोजन और आश्रे की तलाश
19:41में भटकता हुआ
19:43मानवों में निराशा और हताशा फैलने लगी, वे प्रकृती की अदमय शक्ती के आगे पूर्णता लाचार थे, अपनी नेती को
19:51स्विकार करते हुए
19:53देवर्शी नारद ने अपनी दिव्यद रिष्टी से पृत्वी के इस विक्राल होते असन्तुलन को अनुभव किया, जो स्रिष्टी के चक्र
20:02को बाधित कर रहा था
20:04उन्होंने गहन विचार किया कि यह अतिवरिधी स्रिष्टी के चक्र को भंग कर रही है, जिससे जीवन और मृत्यु का
20:11संतुलन डगमदा रहा है
20:15प्रिथ्वी माता अपनी हरित चादर तले दम घुटने का अनुभव कर रही थी, सहायता के लिए एक मूख कारोनिक पुकार
20:22कर रही थी
20:24यहां तक की अचल परवत भी अब व्रिक्षों के घने आवर्ण से ढखने लगे थे, उनकी भव्यता अद्रिश्य हो गई,
20:31सिर्फ हरियाली का राज था
20:34प्राचीन नगरों के अवशेश भी अब केवल वनों के भीतर छिपे खंडहर मात्र रह गए थे, इतिहास को प्रकृती के
20:42आगोश में समाहित करते हुए
20:44पूरी प्रित्वी एक अनन्त, विशालकाय हरित महासागर में परिवर्तित हो गई थी, जीवन का हर रूप ढंकती हुई, एक अदमय
20:53शक्ती का प्रदर्शन
20:55मानवों का अस्तित्व अब कुछ दुर्गम पहाडियों और छोटे मोटे द्वीपों तक ही सीमित रह गया था, शेश सभी स्थान
21:03वनों से आच्छा दित थे
21:06प्रकृती की यह अदमय शक्ती मानव सभ्यता के अंत का संदेश दे रही थी, एक भयावह मौन फैला था, भविश्य
21:13की आशंकाओं से भरा
21:15अब इस भीशन संकट से मुक्ती हेतु किसी अलौकिक शक्ती या प्राचीन समाधान की आवश्यक्ता थी, जो इस विक्राल असंतुलन
21:24को पुनह स्थापित कर सके
21:27सदियों से अथा सागर की गहरायों में प्रचेताओं की अटूट भक्ती और कठोर तपस्या की ज्वाला ब्रहमांड के कोने-कोने
21:35में फैल रही थी, जहां वे एक ही लक्ष के साथ द्रिड़ता से लीन थे
21:41उनकी तपस्या की प्रचेंड उर्जा ने न केवल प्रित्वी को, बलकि सब्तलोको को भी कम्पित कर दिया था, जैसे कोई
21:49अनंत अगनी बिना इंधन के धधक रही हो
21:53देवताओं और रिशियों ने स्वर्ग से उस दिव्य उर्जा को महसूस किया, यह जानते हुए कि कोई महान तपस्या अपने
22:00चर्मोतकर्ष पर पहुँच रही है
22:04शन भर के लिए वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान विश्नो की कमलसी आखों ने इस अध्भुत तप को निहारा और
22:11उनके चहरे पर एक कोमल मुस्कान खिल उठी
22:16प्रचेताओं की अटूट श्रधा और निस्वार्थ तपस्या ने भगवान विश्नो के हृदय में करुणा और प्रसन्नता की लहरें उत्पन कर
22:24दी थी
22:26तब समस्त लोकों के स्वामी ने स्वयम प्रकट होकर अपने भगतों को दर्शन देने का संकल्प लिया जो उनकी भगती
22:33का परम प्रतिफल था
22:36अचानक प्रित्वी के ऊपर आकाश में एक दिव्य उर्जा का स्पंदन हुआ जो वैकुंट से किसी महान शक्ती के अवतरण
22:44का संकेट दे रहा था
22:46वायुमंडल में मधुर अलौकिक संगीत गूंजने लगा जैसे स्वर्ग के वाध्य यंत्र स्वयम बस उठे हो जो आसन्य डिवाइन मैनिफेस्टेशन
22:55की घोशना कर रहे थे
22:57फिर एक अत्यंत तेजोमय प्रकाश पुंज आकाश से प्रिथवी की ओर उतरने लगा जिसकी चमक हजार सूरियों के समान थी
23:07उस दिव्य प्रकाश के केंद्र से भगवान विश्णु चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए उनकी छवी करोडों सूरियों के तेज और
23:15शितलता के संगम के समान थी
23:18प्रचेताओं ने अपनी आखें खोली और अपने समक्ष ब्रह्मान के परम रक्षक भगवान विश्णु को देखकर स्थब्ध रह गए उनका
23:26हृदय कृतग्यता और विस्मय से भरूठा
23:30भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवानी में कहा ये प्रचेताओं तुम्हारी निष्ठा और धैर्य ने मेरे हृदय को प्रसन्न किया है
23:38तुम्हारी तपस्या अब पूर्ण हुई
23:42उन्होंने प्रचेताओं को वर्दान दिया कि उनकी तपस्या का फल उन्हें शीध्र ही प्राप्थ होगा और वे प्रित्वी पर प्रजाका
23:50विस्तार करेंगे
23:52भगवान ने उन्हें दीरगायू और सम्रिध्धी का भी वर्दान दिया, ताकि वे अपने वंश को यशस्वी बना सकें और धर्म
24:00की स्थापना कर सकें
24:02श्री हरी ने उन्हें जीवन के उद्देश और कर्म के महत्व का भी उपदेश दिया, जिससे वे प्रिथवी पर अपने
24:09कर्तवियों का सही धंग से पालन कर सकें
24:13भगवान के अध्भुत दर्शन और वर्दान पाकर प्रचेताओं ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुती की उनकी आखों से आनंद के अश्रु
24:21बह रहे थे
24:23धीरे धीरे भगवान विश्णू का दिव्य रूप उस प्रकाश पुंज में विलीन होने लगा, मानों वे पुना ब्रहमांड के कणकण
24:31में समा रहे हों
24:33उनकी अनुपस्थिती में भी उस स्थान पर एक दिव्य सुगंध और शान्ती का अनुभव हो रहा था जो उनके आगमन
24:41की चिरस्थाई चाप छोड़ गई
24:44प्रचेताओं के हृदय में भगवान के दर्शन की स्मृती और उनके दिये वर्दान की शक्ती सदैव के लिए अनकित हो
24:51गई थी
24:52अब वे अपने नए उद्देश्य और भगवान द्वारा दिये गए वर्दानों को पूर्ण करने के लिए द्रिड संकल्पित होकर उठे
25:00प्रित्वी पर प्रजाका विस्तार करने और धर्म की स्थापना करने के लिए तयार थे
25:07गेहन जल समाधी से सहसरों वर्षों की तपस्या पूर्ण कर प्रचेतस रिशिगन एक नए यूग की दहलीज पर शांत सागर
25:15से बाहर आए उनकी देह पर दैविये तेज चमक रहा था
25:19उनकी आखों ने जो चिरकाल से बंद थी अब इस नूतन स्रिष्टी पर द्रिष्टि पात किया जहां हरियाली का अदमे
25:28सामराज फैला हुआ था
25:30जहां कभी मानव सभ्यता के चिनह थे वहां अब विशाल अनियंत्रित व्रिक्षों का एक अजे दुर्ग खड़ा था जिसने धर्ती
25:38को पूरी तरह से ढख लिया था
25:41अनन्त वनों की शाखाएं एक दूसरे में उलजी हुई थी, मानो पूरी प्रित्वी एक विराठ हरे आलिंगन में समा गई
25:49हो, जिसमें सास लेना भी असंभव था
25:53जीवजन्तों के लिए, मानवों के लिए, यहां तक की पवन के स्वतंत्र मार्ग के लिए भी कोई स्थान नहीं बचा
26:00था, केवल हरियाली का ही एक आधिकार था
26:04प्रचेट्सों ने अनुभव किया कि यह केवल वन नहीं, अपितु एक विनाशकारी अतिक्रमन है, जिसने जीवन के नैसरगिक प्रवाह को
26:12अवरुद्ध कर दिया है
26:15उनके हृदय में गेहन निराशा उभी, क्योंकि उनकी तपस्या का उद्देश्य स्रिष्टी के कल्यान में था, न की इस अनियंत्रित
26:23फैलाव में
26:25पवित्र तपस्या से अर्जित उनकी शान्ती अब भंग होने लगी थी, और उनके अंतर्मन में एक प्रचंड क्रोध की लहर
26:33उठने लगी
26:35उन दस रिशियों की आखों में एक समान द्रिडता और न्याय का संकल्प चमक उठा, जैसे दस सूर्य एक साथ
26:42उदे हुए हो
26:44उन्होंने निश्चय किया कि इस अनियंत्रित विस्तार को नियंत्रित करना ही अब उनका परम धर्म है, ताकि पृत्वी पुनह जीवन
26:53योग्य बन सके
26:55अपने गहन तपस्या के बल पर उन्होंने अपने भीतर की दिव्य अगनी और प्रचंड वायु को जागरित किया, जो स्रिष्टी
27:02के तत्वों को भी चुनोती दे सकती थी
27:06उनके मुख से एक प्रचंड गर्जना निकली, जो केवल ध्वनी नहीं, अपितु अगनी और वायु का एक ज्वलन तूफान थी,
27:14जो धर्ती को शुद्ध करने चला था
27:17एक एक कर, सभी प्रचेतस ने अपनी तपस्या की शक्ती को एक साथ केंद्रित किया, जिससे उनके मुख से अगनी
27:25की धाराये और वायु के भयंकर जो के निकलने लगे
27:30वनों में तुरंट आद लग गई, जैसे सूखा एंधन वर्षों से इस पल की प्रतीक्षा कर रहा हो और ज्वालाये
27:37आकाश को चूने लगी
27:40प्रचंड वायु ने अगनी को और भी भड़काया, जिससे वह एक अनियंत्रित दानव की भाती पूरी प्रित्वी पर नाचने लगी,
27:48हर्याली को भस्म करती हुई
27:51शन भर में विशाल काय वरिक्ष उनके नीचे की जाडिया और सारी वनस्पती धूल और राख में बदलने लगी, एक
27:59भयंकर तबाही का मनजर बन गया
28:02जिस धर्ती पर कभी जीवन का गला घोंटा गया था, अब वह धुए से ढकी हुई थी, लेकिन पहली बार
28:09उसमें मुक्ती की एक सांस थी
28:12प्रचेतस अपने अलौकिक बल को शांत करते हुए, शांत भाव से उस परिवर्तित भूमी को निहार रहे थे, उनके चहरे
28:20पर एक गहन संतोश की अभिव्यक्ती थी
28:24धर्ती अब स्पष्ट थी, खुली हुई थी, जीवन के नए अंकुरों के लिए एक विशाल उर्वर कैनवास बनकर तैयार थी,
28:33जो भविश्य की प्रतीक्षा कर रहा था
28:36प्रचेट्सो ने अपने कर्तव्यकी पूर्ती की ब्रहमांडिय संतुलन को पुनह स्थापित किया, और प्रिथवी को नवसरिष्टी के लिए एक पवित्र
28:45मंच प्रदान किया
28:47वनों के विनाश से प्रिथवी पर भयानक असंतुलन चा गया था, जहां कभी हरियाली थी, अब वहाराख और मुख चीतकार
28:55का सन्नाटा पसरा हुआ था, जिससे जीवन की सासे घुट रही थी
29:01यह भयंकर द्रिश देखकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया और देवगण भय तथा चिन्ता से ग्रसित होकर स्रिष्टी के
29:09इस बिगड़ते संतुलन को निहार रहे थे
29:13स्रिष्टी के जनक भगवान ब्रह्मा अपने परमधाम में विराज मान थे, जहां उन्हें प्रकृती की इस्तीवर पीड़ा और प्रिथवी के
29:21बिगड़ते स्वास्थ्य का गेहन अनुभव हुआ
29:25ब्रह्मा ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से स्रिष्टी के हर कोने को देखा और प्रचेताओं के क्रोध के परिणामों को समझते हुए,
29:33उन्हें रोकने का दृढ निश्चय किया
29:36इस बीच प्रचेताओं का क्रोध अभी भी शान्त नहीं हुआ था और वे अपने तपस्या की शक्ती से उत्पन्न अगनी
29:43से बचे हुए वनों को भी भस्म कर रहे थे
29:47ब्रहमा अपने ब्रहम लोक से नीचे उत्रे, उनके आगमन से आकाश गंगा में एक दिव्य प्रकाश फैल गया, जो संपूर्ण
29:55स्रिष्टी को उनकी उपस्थिती का संकेत दे रहा था
29:59जब ब्रहमा प्रचेताओं के समक्ष प्रकट हुए, तो उनकी दिव्य आभा ने संपूर्ण विनाशकारी वातावर्ण को शांती और संतुलन से
30:08भर दिया
30:10प्रचेताओं ने अपने सामने अचानक प्रकट हुए, स्रिष्टी के पालक को देखकर भय और विस्मय से अपनी डिस्ट्रक्टिव अगनी को
30:18रोक लिया, उनकी आखें आश्चर्य से विस्तृत हो गई
30:22ब्रह्मा की शांत और सौमे उपस्थिती ने उस भयंकर वातावर्ण को तुरंत परिवर्थित कर दिया, जहां क्रोध की ज्वाला थी,
30:31अब श्रद्धा की शितलता व्याप्थ हो गई थी
30:34ब्रह्मा ने अपनी दिव्यवानी में कहा, हे प्रचेताओं, तुम्हारी कठोर तपस्या और शिव विश्नों की क्रिपा से तुम धन्य हो,
30:42लेकिन तुम्हारे क्रोध ने सृष्टी का संतुलन बिगार दिया है
30:48उन्होंने आगे कहा, तुम्हारी अग्नी ने प्रित्वी की हरियाली को नश्ट कर दिया है, जिससे जीवन संकट में है, और
30:55सृष्टी का चक्र रुकने लगा है
30:59ब्रह्मा ने उन्हें अपनी अग्नी को शांत करने और सृष्टी के चक्र को पुनस्थापित करने का आदेश दिया, ताकि जीवन
31:07फिर से पनप सके
31:09फिर ब्रह्मा ने उन्हें मारिशा नामक एक दिव्यकन्या से विवाह करने का निर्देश दिया, जो इस नवजीवन के पुनरस्थापन का
31:17माध्यम बनेगी
31:19उन्होंने समझाया कि मारिशा वरिक्षों की आत्मा और सोम चंद्रमा की पुत्री है, जो जीवन सुन्दर्ता और उर्वर्ता का प्रतीक
31:28है
31:29ब्रह्मा ने स्पष्ट किया कि यह विवाह स्रिष्टी के संतुलन और विस्तार के लिए अत्यंत आवश्चक है, क्योंकि इससे पृत्वी
31:38पर फिर से हरियाली और जीवन लोटेगा
31:41उन्होंने प्रचेताओं को समझाया कि यह केवल एक विवाह नहीं, बलकि एक दिव्य योजना का हिस्सा है, जिससे एक महान
31:50वंश का उदे होगा जो पृत्वी को समरिध्धी से भर देगा
31:55प्रचेताओं ने ब्रह्मा के इन आदेशों को सुना और उनके मन में उठने वाले संदेहों के बीच उन्होंने अपने भविश्य
32:02की ओर देखा
32:04ब्रह्मा ने अपनी बात समात्त करते हुए, उन्हें कर्तव्य और स्रिष्टी के प्रती उनके उत्तरदायत्व की याद दिलाई, जिसे निभाना
32:13ही उनका अंतिम लक्ष था
32:16प्रचेताओं ने अंत्ह ब्रह्मा के आदेश को स्विकार किया और अपने भविश्य के इस महत्वपूर्ण मोर पर सहमती व्यक्त की
32:24अब प्रचेताओं की द्रिष्टी एक नई सुभह की ओर थी, जहां मारिशा का आगमन स्रिष्टी में एक नए अध्याय की
32:32शुरुवात का संकेत था
32:35गेहन वन से बाहर निकल कर शिव क्रिपा से शुद्ध हुए प्रचेताओं ने अपने पिता ब्रह्मा के उस आदेश को
32:42स्मरण किया जिसने स्रिष्टी के चक्र को आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया था
32:47तभी उस पवित्रस्थल पर अपसराओं सी सौंदर्यमेई म्रिगनेनी मारिशा का आगमन हुआ जिसकी आभासे संपूर्ण वातावर्ण दैविय उर्जा से भर
32:58उठा
33:00प्रचेताओं ने एक युनिफाइड आत्मा के रूप में ब्रहमा के निर्देश का सम्मान करते हुए मारिशा को अपनी अर्धांगिनी के
33:08रूप में सहर्ष स्विकार किया जिससे स्विष्टी के एक नए अध्याय का आरंभ हुआ
33:14आकाश से देवों और रिशियों ने पुष्प वर्षाकर इस पवित्र मिलन को आशिरवाद दिया जिससे यह प्रमानित हुआ की यह
33:22सन्योग केवल प्रेम का नहीं बलकी ब्रहमान्डिय योजना का एक अनिवार्य अंग था
33:29रितूओं ने अपनी चादरें बदली, सूर्य और चंद्रमा कई बार अपने मार्ग पर चले और समय की अध्रिश्य धारा ने
33:36इस दिव्य मिलन को एक नए जीवन के आगमन की ओर अग्रसर किया
33:41कुछ समय उपरांत मारिशा का गर्भ दैविय तेज से दीप्थ हो उठा, मानो वह स्वयं एक लगु ब्रहमान्ड को अपने
33:49भीतर धारन किये हुए हो, जिसकी आभा उसके पूरे अस्तित्व को आलोकित कर रही थी
33:56प्रचेताओं ने एक सन्यमित धैर्य के साथ अपने भविश्य के पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा की उनके हृदय में स्रिष्टी
34:04के एक नए अध्याय के साक्षी बनने की गहरी श्रद्धा भरी थी
34:09अंतह एक शुभ मुहूर्त में एक अलोकिक प्रकाश ने संपूर्ण ब्रह्मान को आलोकित कर दिया, जो मारिशा के गर्ब से
34:17एक नए जीवन के दिव्य जन्म का उद्गोश था
34:20उस प्रकाश के मध्य एक नवजात शिशु प्रकट हुआ, जिसका तेज इतना प्रकर था कि वह सहसर सूर्यों के समान
34:29प्रतीत होता था, उसकी प्रत्येक अंगरचना में दैविय सामर्थ्य जहलक रहा था
34:36प्रचेताओं ने उस शिशु में अपनी अंतरद्रिष्टी से पूर्व जन्म के दक्ष प्रजाप्ती की आत्मा को पहचान लिया, जिसने क्रोधवश
34:44शिव का अपमान किया था और अब नवजीवन प्राप्त कर चुका था
34:49उन्होंने उस शिशु का नाम दक्ष रखा, जिसका अर्थ है सक्षम और कुशल यह जानते हुए कि वह स्रिष्टी के
34:56विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा
35:00दक्ष का बचपन असामान्य गती से व्यतीत हुआ, वह शैशव काल में ही ज्ञान और बुद्धिमत्ता के ऐसे लक्षन प्रदर्शित
35:08करने लगा, जो केवल एक प्रजाप्ती में ही संभव थे
35:13उसकी वाणी में वेदों का सार, उसकी द्रिष्टी में भविश्य का प्रतिबिंब और उसके विचारों में स्रिष्टी के गूढ रहसियों
35:20का ज्यान स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था
35:24दूर बैठे, स्रिष्टी के जनक, भगवान ब्रह्मा ने अपने दिव्य नेत्रों से इस नए दक्ष की प्रक्ती का अवलोकन किया
35:32और एक शांत मुस्कान के साथ उसके भविश्य की महानता को स्वीकृती प्रदान की
35:39अपनी स्वाभाविक क्षमता और ब्रह्मा के आशिरवाद से दक्ष ने स्रिष्टी के विस्तार का कार्य आरंभ किया, पहले सुक्ष्म तत्वों
35:47से फिर जटिल जीवन रूपों का स्रिजन करते हुए
35:51उसके प्रयासों से न केवल देवों और दानवों की अनेक प्रजातिया उत्पन हुई, बलकी गंधर्व, यक्ष और नागो जैसे विविद
36:00प्राणी भी स्रिष्टी में अपना स्थान ग्रहन करने लगे
36:04दक्ष का स्रिजन कार्य इतना विशाल था कि उसने स्रिष्टी के चक्र को एक बार फिर तीवर्ता और संतुलन प्रदान
36:12किया, जिससे ब्रहमांड में जीवन की निरंतरता सुनिश्चित हुई
36:16उसके वंशजों से प्रिथवी और आकाश के हर कोने में जीवन का अंकुर फूटा, जिससे ब्रहमांड का सौन्दर्य और विविधता
36:25अनंत गुना बढ़ गई
36:27प्रचेताओं ने अपने पुत्र दक्ष की इस अध्वितिय यात्रा को देख कर गहरा संतोष अनुभव किया, यह जानते हुए कि
36:35उन्होंने ब्रहमा के आदेश का पूर्णत है पालन किया था
36:39और इस प्रकार दक्ष के माध्यम से जीवन का वह अन्वरत चक्र गतिमान रहा, जहां स्रिजन और विकास की धाराय
36:47अनंत काल तक प्रवाहित होती रहेंगी
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