00:00काईद आजम मुहम्मद अली जिनाप पाकिस्तान के पहले मिसिंग परसन थे जिन को मरने के लिए पाकिस्तानी स्टैबलिश्मेंट ने जियारत
00:08भीज दिया था
00:08ये मैं नहीं कह रहा बलके सीनियर सियासदान जावेद हाश्मी साहब ने कहा है
00:13उनका कहना था कि जियारत की चार हजार साला तारीख में कोई एक मरीज बता दें जिसको जियारत इलाज के
00:20लिए भेजा गया हो
00:35क्योंके पहारी लाके में ऑक्सीजन का लैवल कम होता है जिसकी वज़ा से टीबी के मरीज को वक्ती तोर पर
00:41रिलीफ मिलता था
00:42अब इन दोनों सियासदानों में से कौन ठीक कह रहा है
00:45इसके लिए आपको सबसे पहले काइद आजम को होने वाली बिमारी टीबी के बारे में जानना होगा
00:53टीबी एक ऐसा मर्ज है जिसमें मरीज खांस खांस कर आधा हो जाता है
00:58ये बिमारी हजारों सालों से इनसानों को लाहक होती रही है
01:02असारे कदीमा को जो हजारों साल पुराने इंसानी धांचे मिले हैं
01:06उनके तजिये के बाद ये बात सावित होती है
01:09कि टीबी का बैक्टेरिया आज से तकरीबन नो हजार साल पहले मौजूद इंसानों के अंदर पाया जाता था
01:1619 और 20 सदी में एक वक्त ऐसा भी आया कि टीबी के मर्ज से तकरीबर 100 करोड लोग लुकमाएं
01:24अजल बन गए
01:24ये उस वक्त अच्छूत की बिमारी की यानि एक शक्त से दूसरे और दूसरे से तीसरे में फैलती फैलती
01:30इसने पूरी इंसानी आबादी को अपनी लपेट में ले लिया
01:35इस बिमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर भी टीबी की मर्ज में मुब्तला हो जाते
01:40और आखिरकार अपनी जान जाने आफरीन के हवाले कर देते
01:43लंदन में 20 सदी में हालात ये थे के हर 4 में से एक शक्स टीबी की वज़ा से मर
01:49जाता था
01:50अब जदीद दोर में इसका इलाज मुम्किन हो चुका है लेकिन इसके बावजूद भी
01:55ये दुनिया की टोप 10 बिमारियों में शुमार होती है जिसके वज़ा से इनसान मौत के मुँ में चला जाता
02:01है
02:01WHO की 2021 की एक रिपोर्ट के मताबिक सालाना पूरी दुनिया में 6 करोर 80 लाख अमबात होती है
02:09और इन अमबात में 10 बड़ी वज़ा टीबी है जबके पहली बड़ी वज़ा हाट अटेक है
02:152024 में WHO की रिपोर्ट के मताबिक 1 करोर 7 लाख लोगों को दुनिया भर में टीबी का मर्ज लाहक
02:22हुआ
02:22और इसकी वज़ा से 12 लाख 30 हजार अमबात होई
02:27अब आते हैं फवाद चोधरी साहब के उस बयान की तरफ
02:31जिसमें उन्होंने कहा था कि टीबी के मरीजों को पहाडी लाखों में भेजा जाता था
02:36जिससे उनको वक्ती रिलीफ मिल जाता था
02:38क्या वाकिए ऐसा होता था तो इसका जवाब है हाँ
02:42उस वक्त पहाड़ी इलाकों में TB के मरीजों को भेजा जाता था और उनको इस बिमारी में वक्ती रिलीफ में
02:48मिलता था
02:49TB के मरीजों का ये तरीका इलाज 1853 में उस वक्त के जर्मन साइंटिस ब्रहमर ने एजाद किया था
02:56डॉक्टर ब्रहमर वो इनसान थे जिनको टीबी का मर्ज लाहक हुआ तो उसके बाद वो हिमालिया रीजन में चले गए
03:03उन्होंने कुछ अरसा पहाड़ी इलाकों में गुजारा तो उनका वजन बढ़ने लग गया
03:07जिसके बाद उन्होंने जर्मनी जाकर 1856 में एक रिसर्च शाया की
03:12जिसमें उनका ये कहना था कि अगर कोई शक्स टीबी का मरीज है और वो पहाड़ी इलाके में चला जाता
03:33है
03:34जब ये रिसर्च किताबों में शाया हुई तो उस वक्त पूरी दुनिया में पहाड़ी और पुर्फिजा इलाकों में सैनेटोरियम बनने
03:41लग गए
03:41सैनेटोरियम ऐसे होटेल्स या गेस्ट हाउस होते थे जहां पर टीबी के मरीजों को लंबे अरसे के लिए रखा जाता
03:48और उनको वहां मुख्तलिफ किसम की हेल्दी एक्टिविटीज और अच्छी डाइट के साथ साथ एक्सेसाइज करवाई जाती
03:54अब सैनेटोरियम बनने का सिलसला पूरी दुनिया में शुरू हो गया
03:57एक वक्त ऐसा आया कि अमरीका और कैनेडा में उस वक्त 500 से जायद सैनेटोरियम बन चुके थे
04:04और इन सेनेटोरियम्स में मरीजों का इलाज किया जाता जबके बाकी दुनिया में सेनेटोरियम अलग से बन रहे थे
04:10तब कि मरीजों का इलाज सो साल तक यूँ ही जारी रहा क्यूंके टीबी की कोई भी मैडिसन्स नहीं बनी
04:17थी
04:17सेनेटोरियम बनने से टीबी का मरीज डाइट अच्छी लेता था एक्टिविटीज करता था
04:21और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने की वज़ा से ये बिमारी उसके एहले खाना और सुसाइटी के दूसरे अफराद तक नहीं पहुंचती
04:29थी
04:29और मर्ज में वक्ती तोर पर अफाका भी हो जाता था
04:32टीबी का पहला मरीज जो दुनिया में ठीक हुआ वो 1945 में हुआ
04:37सल्मान वाक्समैन नामी साइंटिस्ट ने टीबी की दवा 1943 में बनाई थी
04:42और 1945 में टीबी का पहला मरीज उस दवा से सहत्याब हुआ था
04:47यानि दवा 1943 में बनी और दो साल मरीज पर अपलाए हुई वो खाता रहा
04:53और दो साल के बाद वो ठीक हुआ
04:55अब इस दवा के बहुत से साइड अफेक्से और मरीज को ठीक होने में तकरीबन 18 माँ से 24 मान
05:01लग सकते थे
05:02लेगन इस सब के बावजूद ये दवा 80 से 90 फीसद तक कारगर साबित होती रही
05:07फिर आया 1966 जब टीबी की इटालियन मेडिसन मार्किट में आ गई
05:11और आज तक टीबी के खिलाफ ये दवा मौसर तरीके से काम कर रही है
05:17काइद आजम मुहम्मद अलिजिना तवील अरसे से टीबी जैसी मूजी मर्सिल लड़े थे
05:23करारदार लाहूर 1940 में पेश हुई उस वक्त उनकी उमर 60 प्लस हो चुकी थी
05:2960 प्लस डिटायर्मेंट एज है जिसमें इनसान रेस्ट करता है
05:33लेकिन काइद आजम रह्मत अलिजिना पर काम का बोज इतना ज्यादा था
05:36कि तहरीके अजादी का प्रेशर और अंठक मेहनत की वज़ा से
05:40वो कई कई दिनों तक आराम नहीं कर पाते थे
05:43डॉक्टर्स और मुहतरमा फात्मा जिना साहिबा के इसरार के बावजूद
05:47काइद आजम मुहम्मद अलिजिना रेस्ट नहीं करते थे
05:50एवन जब वो अपने घर आते तो जूतों और सूर समेत ही सो जाते थे
05:55और उनका वजन भी इंतहाई कम हो चुका था
05:58लेकिन काइद आजम ने अपनी इस बिमारी को खूफिया रखा
06:01और किसी को भी इस बिमारी का जिकर करने से मना कर दिया था
06:04ये उनके वियन का हिस्सा था
06:06वो नहीं चाहते थे कि इस बिमारी का इल्म अंग्रेजों को हो अगर ये इल्म अंग्रेजों को हो जाता
06:11तो तहरीक अजादी या पार्टिशन रुक सकती थी
06:14या उसमें डिले आ सकता था
06:22करनल इलाही भख्ष काइद आजम मुहम्मद अली जिना के जाती मौलिज थे
06:26ये 1948 का साल था
06:28काइद आजम पाकिस्तान बना चुके थे
06:30और उस वक्त वो गवर्नर जैनरल की हैसियस से हलफ भी उठा चुके थे
06:34टीबी की मैडिसन तो 1943 में बन चुकी थी
06:371945 में मरीज भी ठीक हो चुका था
06:39लेकिन रिसर्च इतनी आम नहीं हुई थी
06:42और पाकिस्तान इंडिया तो बहुत दूर और इंतहाई तरक्की पजीर थे
06:47यहां तक तो उस रिसर्च का पहुंचना उस वक्त नामुम्किन था
06:50उनके जाते मौालिज करनल इलाही बख्ष ने उनको जियारत ले जाने का मश्वरा दिया
06:56और कहा कि वही तरीका इलाज अपनाया जाए जो पिछली एक सदी से अपनाया जा रहा है
07:01क्यूंके जियारत एक पुर्फिजा मुकाम है और वहां इनकी सहत बेहतर होने के इमकानात मौजूद हैं
07:07लेकिन काइद आजम की तबियत संभल नहीं रही थी वो दिन बदिन मजीद बिगरती जा रही थी
07:11लियाकत अली खान मुलक के वजीर आजम थे उन्होंने काइद आजम से बेरूने मुलक इलाज का इसरार किया तो काइद
07:18आजम ने साफ मना कर दिया
07:20फिर उनको कराची ले जाकर बेरूने मुलक से डाक्टर मंगवा कर उनका इलाज करवाने की पेशकश की गई
07:26जिस पर काईदे आजम रहमतुल्ला अले ने हामी भर ली
07:29अब जियारत से काईदे आजम को कोईटा एरपोर्ट पहुँचाया गया
07:32फिर कोईटा से एक खसूसी जहास के जरिये उनको कराची पहुँचाया गया
07:37कराची में मुक्यमाडी एरपोर्ट पर लैंड हुए
07:40आम तोर पर ये समझा जाता है कि जियारत में काईदे आजम मुहमद अली जिना की एमबुलेंस खराब हुई थी
07:45तो ये तासुर दुर्स नहीं है
07:47जियारत में उनकी एमबुलेंस खराब नहीं हुई थी
07:50बलके जब वो कोईटा से कराची मारीपूर एरपोर्ट पर उतरते हैं
07:54तो वहां पर एमबुलेंस लाई गई
07:56एमबुलेंस के इंचार्ज ने अपनी वालेहाना मुहबत और लाजवाल अकीदत की वज़ा से
08:01अजीम लेडर के लिए खुद जाते दिल्चस्पी लेते हुए सबसे बेहतरीन उस वक्त की एमबुलेंस का इंतखाब किया
08:07और उस एमबुलेंस को कराची एरपोर्ट भेजा गया
08:10अब एमबुलेंस ने काइद आजम को एरपोर्ट से लिया और गवर्नर जरनल हाउस की तरफ जाना शुरू कर दिया
08:16के रास्ते में वो खराब हो गई
08:18अब ये एमबुलेंस किसी ने जान बूच कर खराब नहीं की थी
08:211948 में किस किसम की पाकिस्तान में गाड़ियां होंगी
08:24इसका अंदाजा आप बखु भी लगा सकते हैं
08:27हाँ, अलबता गलती ये जरूर हुई थी कि बैक अप के तोर पर एमबुलेंस नहीं रखी गई थी
08:31चान बूच कर अगर एमबुलेंस ही खराब करनी होती
08:34तो उनके लिए खुसूसी जहाज ही क्यूं कोईटा से कराची भेजा जाता
08:38ये कारवाई तो जियारत में भी की जा सकती थी
08:41अब एमबुलेंस के खराब होते और उसको एरपोर्ट से गवरनल जर्नल हाउस तक पहुँचने में दो घंटे का वक्त लग
08:48गया
08:48कराची एरपोर्ट पर लैंड करने के बाद काइद आजम मुहमद अली जिना ने 6 घंटे तक अपनी जान जान आफरीन
08:55के हवाले नहीं की थी
08:5811 सेप्टेंबर 1948 को काइद आजम मुहमद अली जिना ने इस दारे फानी से कूच किया
09:05लेकिन 10 सेप्टेंबर 1948 को एक दिन पहले ही डॉक्टर इलाही बख्ष ने मौहतरमा फात्मा जिना से कह दिया था
09:11कि जो इनकी हालत है इनके सर्वाइवल के चांसिस बहुत कम है
09:15और इसी वज़े से इस्टैबलिश्मिंट पर ये थौप दिया जाता है कि उन्होंने एम्बुलेंस खराब कर दी थी जबके हकीकत
09:22इस से कोसों दूर है क्यूंकि उस वक्तों मिल्टरी इस्टैबलिश्मिंट का वजूद ही काइम नहीं हुआ था
09:27पाकिस्तान एक इंतहाई तरक्की पजीर नया नया मुल्क था जो टैक्सी कर रहा था और उसने उडान भरने थी
09:34लेगन सवाल ये पैदा होता है ये इतना जूट इतनी तेजी से क्यूं फैलता है तो इसमें किसी का कोई
09:40कसूर नहीं
09:40असल में हम अपने हीरो से इतनी लाजवाल महबत और अकीदत रखते हैं कि हम उसको मरता हुआ नहीं देख
09:47सकते हम अकीदत में अपने हीरो को इतना बड़ा समझने लग जाते हैं कि हम उसको इनसानों की कैटगरी में
09:54शुमार ही नहीं करते और उसको किसी देवता की तस्वी
10:10करने के लिए हरकिस तयार ही नहीं है कि उनके साथ इस तरह का कोई अफसोसनाक वाकिया पेश आ सकता
10:17है
10:17हाला के उनके मौालज, मुफक्किर, दानिश्विर और बड़े-बड़े मसन्निफ, इवन फोरन राइटर्स भी इस बारे में बहुत कुछ लिख
10:24चुके हैं कि एक्चुली कायद आजम मुहम्मद अली जिना के साथ हुआ क्या था
10:28लेकिन हमारे जहनों में ये बात बैठ चुकी है कि इस्टैबलिश्मेंट में जान बूच कर उनकी एमबुलेंस को खराब करवाकर
10:35उनको मरवाया था
10:37जिसका दूर दूर तक हकीकत से कोई तालुक नहीं है
10:41अपने मिजबान यासिर शामी को इजाज़त दीजिए
10:46अपने में जान आज़ाए जिसने हमें मुलक पाकिस्तान जैसी अजीम मां से नावाजा
10:52अलाहापस
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