00:00अचारे जी, जब अपनी मम्मी या अपनी मौसी से बाहर जाकर कुछ काम करने या फिर कुछ नया सीखने के
00:05लिए कहते हूँ, मुझसे बोलती हैं कि हम तो घरबरी ठीक हैं, तो उनसे क्या कहें?
00:09आप कामकाजी महिला का चहरा देखेंगे, और अगर संपन घर से है महिला, हाउस वाइफ, उसका चहरा, तो आप तक्काल
00:20बता देंगे कि अंतर है, कामकाजी महिला आम तोर पे आपको सीधी साधी देखेगी, वो नहीं बहुत सच्ती सवर्ती, क्योंकि
00:27वो अपने काम पर ध्य
00:29देना चाहती है, वो काम कर रही है, जूज रही है, बॉस का प्रेशर है, क्लाइंट फोन कर रहा है,
00:35बहुत सारी बाते हो सकती है, यही आप जब जो महिला घर पे होती है, और यह घर में बैठके
00:40का रही है, बच्चे स्कूल चले गए, पती दफतर चला गया, उसको समय होता
00:45खीरा, गाजर, मेथी, मूली, हींग, सत्तर चीजे लेके मूँ पे लगड़ो, आंख पे लगाओ, और तचा बनाओ, रीठे को बाल
00:58में लगाओ, और पहले का समय था, जब इतना पैसा नहीं था, घर में चक्की चल रही है, डाल क्या
01:07ना, उसमें से आटा बना रहे हैं, बह
01:11बहाना बनाना भी खुद है, बरतन भी खुद साफ करने, सौ काम होते थे घर के, जिसमें महनत वाले काम
01:15भी शामिल होते थे, वो तब आप कह भी सकते हो कि काम था, पर उन कामों का नाम लेकर,
01:22उन कामों का बहाना बनाकर, आप घर में घुसे रहोगे, बहार निकलोगे नही
01:28बाहर कोई संघर्ष नी करोगे, कोई चनोती नी उठाओगे, बाहर निगलने के लिए साहस चाहिए, सडकों की धूल फाकनी पड़ती
01:36है, धूल गर्द, धूप, अंजान परिचित लोग और इस्थितियां इनका मुकाबला करना पड़ता है, इससे भीतर लोहा तैयार होता है
01:47को अरुए, रोहा हमें जोता है, तो छोँख उाऊत लोग मुकाबला है.
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