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  • 2 hours ago
असम के सबसे मशहूर पारंपरिक वाद्ययंत्रों में से एक, 'बिहू पेपा' को 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन' यानी 'जीआई टैग' मिला है. इससे 'बिहू पेपा' को अपनी अनोखी सांस्कृतिक विरासत के लिए राष्ट्रीय पहचान मिली है. गोलाघाट में इस घोषणा का गर्व के साथ स्वागत किया गया है, जहां कारीगरों की कई पीढ़ियों ने हाथ से इस वाद्ययंत्र को बनाने की परंपरा को जिंदा रखा है.पारंपरिक रूप से भैंस की सींग से बनाए जाने वाले और बांस के माउथपीस (मुंह से फूंकने वाले हिस्से) वाले 'पेपा' को पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकों का इस्तेमाल करके बहुत बारीकी से हाथ से बनाया जाता है. कारीगरों और लोक कलाकारों का मानना ​​है कि जीआई पहचान से इस परंपरा को बचाने, इसके बारे में जागरूकता बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों को इस लोक वाद्ययंत्र को सीखने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी.

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Transcript
00:04इसकी खास आवाज सदियों से असम के गावों में गुंचती रही है और ये त्योहारों के जश्न और राज्य की
00:11सांस्कृतिक पहचान का एक एहम हिस्सा है
00:16अब असम के सबसे मशूर पारंपरेग वाद्य यंत्रों में से एक बीहु पेपा को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानि जियाई टैग मिला
00:24है
00:24इससे बीहु पेपा को अपनी अनोखी सांस्कृतिक विरासत के लिए राश्ट्रिय पहचान मिली है
00:32गोला गाट में इस घोशना का गर्व की साथ स्वागत किया गया है
00:35जहां कारिगरों की कई पीडियों ने हाथ से इस वादय यंत्र को बनाने की परंपरा को जिन्दा रखा है
01:15पारमपरिक रूप से भैस की सींग से बनाय जाने वाले और बास के माउथ पीस वाले पैपा को पीडियों से
01:21चलिया रही तक्नीकों का अस्तेमाल करके बहुत बारिकी से हाथ से बनाया जाता है
01:28कारिगरों और लोक कलाकारों का मानना है कि जियाई पहचान से इस परमपरा को बचाने इसके बारे में जागरुपता बढ़ाने
01:36और आने वाली पीडियों को इस लोक वादेयंत्र को सीखने के लिए फ्रोचसाहित करने में मदद मिलेगी
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