00:00अभी हम दुर्गा सब्षती कर रहे थे उसमें एक दैट्यका आता है उसका नाम है रोम उस दैट्यका यह था
00:06कि उसने जीवन भर इतनी मारकाट करी थी कि उसके जो रोएं थे शरीर के जो रुबाल होते हैं यही
00:13बड़े होके तीखे होके धारदार तलवार जैसे हो गए थे �
00:17आपका अहंकार जैसा होता है न वो आपके शरीर में चीज़ दिखाई देने लग जाती है
00:21तो अगर अहंकार शरीर को दूशित कर सकता है
00:24तो अहंकार के न होने से ये काया पवित्र भी होने लग जाती है
00:28जो लोग सौंदर के बड़े आगरही हों
00:31वो खाल चमकाना बंद करें
00:33वो अपनी भीतरी सफाई करें
00:35जो भीतरी सफाई करता है
00:36उसकी काया भी बहुत सुंदर हो जाती है
00:38हम जब भी बात करते हैं
00:40देवियों की तो क्या हम बार बार नहीं कहते हैं
00:42बहुत सुंदर, बहुत सुंदर
00:44कि जगत में इनसे सुंदर कोई नहीं
00:46वो सुंदर कहां से आ रहा है
00:47वो काया का सुंदर नहीं है
00:48तो ये प्रक्रति है
00:50अहंकार चाहे तो इसे मुक्त छोड़ दे
00:52जो अहंकार को करना चाहिए
00:54अहंकार चाहे तो इसको एकदम
00:56मलिन कर दे, बरबाद कर दे
01:11कि आप उनके साथ छेड़ खानी न करें।
01:14आपके पास करने के लिए अपना काम ही बहुत है।
01:16आपका क्या काम है?
01:18अपने आपको जानना और जानकर अपने आपको विदा कर देना।
01:22सोयम को जानिये, सोयम को विदाई दीजिये।
Comments