00:00कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर आगे है हमारे सहाब का जलवा पाचे पाचे हरी फिरे कहत कभीर कभीर
00:13तो सहाब को रहरसल थोड़ी करनी पड़ती थी उनको किसी नियम काईदे धर्रे में नहीं बनधना है जरूरत ही नहीं
00:25है न क्योंकि इमानदारी इतनी है
00:30कि वही कह रहे हैं जो जी रहे हैं गए हैं हाट में अपना कपड़ा बेचने वहीं जो हाल देखे
00:38तो जट से कुछ कह दिया कोई सुन रहा था उसने याद कर लिया या लिख लिया उन्होंने खुद थोड़ी
00:47कभी कोई किताब लिखी नजाने कितना बोले होंगे जो किसी की इ
00:59करवार लगता था और उसमें भी यही कहानी है कि बैठते थे तो भी काम करते रहते थे भुनकर थे
01:10तो कपड़ा बुनते रहते थे अब वो बुनते जा रहे हैं किसी ने कुछ कह दिया तो जवाब में कुछ
01:17बातें बोली कुछ पद्ध कुछ गद्ध कोई अगर शागिर्द �
01:23बैठा हुआ है वहाँ पर तो उसने बात को लिख लिया ये है सरलता का सूत्र तुम्हें तैयारी करनी ही
01:31न पड़े तुम्हारा जीवन ही तुम्हारी सीख बन जाए कहते हुए सोचना बिलकुल भी न पड़े छट से बात मानस
01:41में उभर आए किसी अंजाने स्रोत से सहज ही
01:48शब्द होठों पर आ जाए तुमको पता भी ना हो कि ये बात तुमने बोल कैसे दी तुम कहो ये
01:54बात हमें पहले से तो पता ही नहीं थी जैसे सुनने वालों ने ये बात पहली बार सुनी वैसे ही
02:00हमने अभी ये बात बोली तो पहली बार सुनी जिंदगी ऐसी होनी चाहि�
02:06झाल
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