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00:01क्या एक औरत का धर्म सिर्फ चुप रहना है या फिर अपने और अपने बेटे के लिए सही राह चुनना
00:08ही सच्छा साहस है जैपूर में रहने वाली एक योग इंस्ट्रक्टर और सिंगल मदर एक इस्तुरी जिन्होंने रिष्टों और समाज
00:17किये पेक्षाओं से परे अपन
00:29किताबों के दबाव और बेडमिंटन के सपनों के बीच वह अपना आसमान खोज रहा है माँ के मन में सवाल
00:37उमड़ते हैं क्या समाज उनकी स्वतंतता को समझ पाएगा क्या माँ के फैसले बेटे के भविशया पर साय डालेंगे क्योंकि
00:45असली संग्राम तो यही है मोह और क
00:53किसी के मन में किसी ना किसी रूप में चलता ही रहता है और आज इसी कहानी के जरीए हम
00:58भी इस अंग्राम से रूबरू होंगे
01:06पुटा यारे?
01:09क्यों साथ और बोही है
01:11क्यों से वैसे बोही है
01:34आए, आए, आए.
02:16प्रणाम अचरी जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपने समय दिया, बहुत दिनों से इस दिन का नितिजार था, मेरा नाम वर्षा
02:23शर्मा है, ये मेरो बेटा है, अर्नो शर्मा, वे, निस्ते है, किस क्लास में वहीग?
02:28अर्मा का जोओं है, करी वीज्स, क्सक्राइब बहुत दिनों कुज़न के आपने से इस पान में आपने से बाचाना है,
02:44श्रमा के हिरुए जिता कि दिनों खतंब कोचिछ एगंधान है तो जापूर में चलता इससेब बहँते हैं तु आपुर में
02:57चाऌ इस बहते अधर है त�
02:58तो बस वह स्कूल में सेट नहीं हो पाई तो पुरान दोस्तों की रादती है यह शिफ्ट क्यों किया है
03:09ओम टाउन से जैपुर अचरी जी हम लोग जहां रहते हैं हम टाउन जो है मेरा व राजस्तान का छोटा
03:15शहर है तो वहां पर उतनी अच्छी बहतर कोचिंग और एजुक
03:28थी उदर वो हो चुकी मतलब मुझे भी अपने अपनी ग्रोथ के लिए एक बड़े शहर में आने की जरूरत
03:33थी तो इसलिए हमने अभी जुलाई में शिफ्ट किया इधर काम आप योग का ही पहले भी करती थी और
03:39जैपुर में भी कर रही है पहले योग का ही कर रही थी ले
03:54मैं ने वापस से अपना योग ऐस्टा ड़ाँ किया अचारी जी मेरे पास तो उससे पहले मैं अपको अपनी जीवन
04:02के बारे में बताना चाहूंगी मैंने अपने शुरु अधिशिक्षा अपने हम टाउन में होई मेरी राजस्तान में उसके बाद में
04:09मेरा योग और इसमें
04:11थोड़ा इंट्रेस्ट हुआ तो उसके लिए मैंने गोरकपुर से सबसे पहला अपना कोर्स जॉइन किया था वही पे मुझे मेरे
04:19हस्बंड से मेरी मुलाकात हुई हमारी लव मैरेज हुई मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपना सेंटर भी खोल लिया
04:27अपने शहर मे
04:28और उसी मेरे जो कारण जो मेरी पहचान बनी थी उसके कारण मेरे हस्बंड की जॉब भी वही मेरे शहर
04:35में लग गई तो हम लोग वही पे रहने लगे कुछ साल हमारा ठिक ठाक चला उसके बाद में सच्चा
04:43ही सामने आने लगी कि वो लोग थोड़ा बहुत इतने पढ़े �
04:47तो थोड़ा मतलब रूड़ी वादी और थोड़ा थोड़ा कंजर्वेटिव फैमिली थी उसके गारण घर में तनाव रहता था और उस
04:55तनाव का असर फिर बच्चे पर भी आने लगा मतलब दीरे बढ़ते बढ़ते वो इस से ऐसे सवाल करने लगे
05:02जो की मतलब आट साल के
05:04बच्चे से नहीं किया जाने चाहिए कि घर में कौन आता है किस से मिलते हो मम्मी किस से बात
05:09करती है यह सब उसी दोरान मैंने आपको भी सुनने शुरू किया था तो थोड़ी थोड़ी बात समा जा रहे
05:15थी कि सही क्या है और गलत क्या है तो मैं उसे ऐसा माहौल नहीं देना
05:31पिलाई, मैं अकेली रह रही हूं, अकेले अपना काम कर रही हूं, तो उनको रहता है कि नहीं यह कुछ
05:36गलती कर रही होगी, तो ऐसा क्यों होता है चरेजी?
05:44दिखे यह तो वही चीज है जो पीछे से चली आ रही है, जिन वजहों से कुछ पुरुशों को, पतियों
05:55को, यह लगता है कि पत्नी के पास अगर पैसे आ जाएंगे, या उसका अपना काम होगा, उसकी अपनी पहचान
06:06बन जाएगी, तो वो हाथ से निकल जाएगी,
06:10उसी वजह से फिर जो हमारा समाज है, वो भी महिलाओं को नहीं चाहता है कि वो हाथ से निकल
06:17जाएगी, समाज हम ही लोगों से बनाएगी, जैसे हम होते हैं, तो बहुत सारे लोग आ जाते हैं हमारे जैसे,
06:24तो उसको समाज कहते हैं, समाज है, तो जैसी ज्यादातर लोगों
06:28की सोच होती है, उसी को फिर हम कह देते हैं कि समाज ऐसा है, वो समाज की सोच है,
06:34वो असल में व्यक्तियों की सोच होती है, तो अगर व्यक्ति की सोच ऐसी है, कि लड़की को, पत्नी को,
06:41महिला को छूट नहीं मिलनी चाहिए, वो सोतंतर नहीं हो, वो अपना काम न सीखे, न आ
06:58समाज भी वैसे ही मानने लग जाता है, समाज नहीं चाहता, ज्यादातर लोग, समाज बदल रहा है, पहतर हो रहा
07:06है, पर अभी भी बहुत सारे लोग हैं, जहां भी यह है कि महिला की सही जगह, तो यही है
07:14कि वो घर में रहे, घर का काम वगेरा देखे, उसका अपना केरियर, �
07:23उसकी अपनी ताकत, इसको बहुत महत्तु नहीं दिया जाता, तो उसको अगर ताकत आनी भी है, तो पती से आए,
07:31पती ताकतवर है, तो पतनी उससे ताकतवर हो जाएगी, तो कहने को तो यह है बिलकुल, कि हाँ, जितनी चीज़ों
07:40का आप कंजम्शन कर सकते हैं, वो महिला
07:46हैं, पर किसी पुरुष के माध्यम से, पहले पिता के माध्यम से, फिर पती के माध्यम से, फिर पुत्र के
07:55माध्यम से, तो यह मना ही नहीं है, कि लड़की के पास, या पतनी के पास, पैसे नहों, या भूम
08:05फिर नहीं सकती है, हाँ, असली बात ही है कि आजादी नहों, तो �
08:10पैसे आपके पास परयाप्त हो सकते हैं, पर वो किसी और के होंगे, वो अपनी सुछा से देगा तो देगा,
08:15और कभी न दे तो न दे.
08:16लेकिन अगर वो बाहर निकल करके, अपनी चेतना के अनुसार, खुद अपना नाम पहचान बनाती है, खुद कमाती है, अपना
08:27केरियर देखती है, और इसमें उसे कम भी अगर आमदनी होती है, उसमें उसे कठनाईया भी बहुत जेलनी पड़ती है,
08:35तो भी ये चीज बहुत �
08:36अखरती है, क्योंकि मामला स्वाधीनता का है, मामला रुपए पैसे का भी नहीं है, मामला वास्ताव में केरियर का भी
08:46नहीं है, पती के काम में अगर पतनी जा करके, हाथ बटा रही है, मान लिए पती की फैक्टरी है,
08:53या कोई वे आपार है, या कुछ है, और वहां वो काम
08:56कर रही है और salary ले रही है तो उसमें बहुत लोगों को आपती नहीं होगी और वो अपना छोटा
09:02सा काम शुरू कर देती है
09:05स्वाधीन हो करके तो अभी भी काफी लोग हैं जिने ये बात रुचती नहीं है विशेशकर अगर वो
09:14पते से एकदम ही अलग हो चुकी है तब तो ये बात एकदम खटक्ती है है क्योंकि सोच पुरानी ऐसी
09:22है कि इस तरह का स्वाधीन होुना अच्छा नहीं होता
09:28हम परिक्षाओं में देखते हैं, हम जिंदगी की घटनाओं में देखते हैं
09:34कि महिलाएं जब उन्हें सही अवसर मिलता है
09:40तो पुरुशों के समकक्षी है
09:42सोचने में, विचारने में, साहस में, कई ख्षमताओं में
09:48लेकिन, इंसान के साथ एक चीज और भी चलती है, क्या, कि हम दूसरे को दबा कर रखना चाहते हैं
09:58कंट्रोल में, कंट्रोल में रखना चाहते हैं
10:01उससे हमारी इंसेक्यूरिटी को थोड़ी सांतुना मिलती है
10:05जो आदमी भीतर से बड़ा ड़गा हुआ होता है दूसरे को नहीं डभा के रखना चाहता है
10:10उसको लगता है कहीं वो भाग न जाये
10:12जिस आदमी को अपने पर भरोसा होगा वो दूसरे पर अक्रामक होने की
10:18दूसरे को नियंतरत करने की कोशिश कम करेगा
10:24जो खुद डरा होगा वई
10:27खुद जितना डरा होता है वो दूसरे को एक तरह समझे पट्टा बांद के रखना चाहता है
10:32और यह चीज प्रेम तो नहीं होती
10:35आप दूसरे को डॉमिनेट कर रहे हो
10:38आप दूसरे को आजादी से जीने नहीं देना चाहते
10:41तो फिर प्रेम कहां से आएगा
10:43जिस भावना से कोई भी किसी दूसरे
10:46के साथ बेइमानी कर देता है
10:49जिस भावना से
10:50इतने सालों तक घुलामी
10:52प्रथा चलती रही
10:53अभी भी दूसरे रूपों में चली रही हो चुप-चुप
10:56के ठीक उसी
10:58जिस भावना से एक इंसान
11:00दूसरे इंसान पर राज करना चाहता है
11:02उसकी जिन्दगी पर चड़ बैठना चाहता है
11:04भावना वही है पुरानी
11:05वो भावना हट सके
11:07इसी के लिए तो शिक्षा होती है ना
11:09पर जो हमारी शिक्षा व्यवस्था है
11:11वो इतनी अच्छी नहीं है
11:13उसमें भी इतनी चेतना नहीं है
11:16वो भाव निकल नहीं पाता
11:19और अगर भाव नहीं निकला होगा
11:21तो पती-पत्नी का शोशन करेगा
11:23पत्नी-पत्नी का शोशन करेगी
11:25बेटा-बाप का करेगा
11:27बाप-बेटे का
11:30मा बेटे का करेगी
11:31और उसके रूप बदलते रहेंगे
11:33कई बार तो पता भी नहीं चलता है कि यह शोशन चल रहा है
11:36कई बार लगता है यह प्यार मुहबबत चल रही है
11:38यह ममता चल रही है या कुछ और चल रहा है
11:40कोई किसी की बहुत परवाह कर रहा है
11:42केर कर रहा है लेकिन वह छुपा-छुपा शोसन ही हो रहा होता है और वो भीमारी हर बच्चे में
11:48होती है जब वो पिय Sp best हुआ है
11:51इसलिए तो इतनी शिक्षा चाहिए होती है
11:53जब किसी को यह दिखाई दे जाए
11:55कि जिन्दगी ने
11:58समाज ने
11:59परिवार ने
12:02उसके
12:03उपर बंधन डालने
12:05की कोशिश करी
12:08और दुरवेभार करा
12:10तो इसमें बहुत
12:11अचरज नहीं लग जाना चाहिए
12:14इसमें यह नहीं लग जाना चाहिए
12:15कि हाई राम मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो गया
12:17ऐसा सब के साथ होता है क्योंकि हम सब
12:19पैदा ही ऐसे होते है
12:21मनुष्य इंसान का बच्चा
12:23पैदा ही स्वार्थी होता है
12:25वो तो उसको समझा समझा के
12:27और संसकार देने का भी ऐसली मतलब यही है
12:30कि हम जिन पाशविक प्रवरतियों के साथ पैदा होते है
12:34भीतर से हमारे बहुत कुछ ऐसा है जो जानवर जैसा होता है
12:37तो जैसे जानवर एक दूसरे से नोचते खसोडते रहते हैं
12:40देखा है ना
12:42कई बार तो आप खुले में बैठके कुछ खा रहा है और बंदर आता है उठा ले जाता है
12:46आज सुबही तो अचारी जी हमने एक बंदर को एपल दिया था
12:50और वो हमेरे उपर चला रहा था
12:54तो यह वो जो बंदर है ना वो हम सब के भीतर भी बैठा हुआ है
12:57तो यह चलता रहता है बहुत मत सोचिए कि कुछ आपके साथ ही बहुत गलत हो गया
13:02या हो गया यह जगत है यहाँ ऐसा ही होना है
13:07यहाँ बहुत उम्मीदे नहीं पालनी चाहिए
13:11अचारी जी जैसे हम लोग मैं हुँ मेरी मम्मी हम तीनों साथ में रहते हैं
13:15इसके अलावा मेरे पापा की थोड़ी कुछ प्रापर्टी थी तो वो उनके जाने के बाद हम उसे बेचना चा रहे
13:22थे
13:22तो हमारे ही अपने रिष्टेदारों ने हम पे केस कर दिया कि तुम इसे नहीं बेच सकते हैं जो हमारा
13:29इससा है वो हमें दो
13:30तो वो बिना केस के भी दिया जा सकता था ऐसा लेकिन वही बात है कि हम अकेले हम अकेली
13:38महिलाएं हैं मैं और मेरी मम्मी दोनों
13:40अपने रिष्टेदारी ऐसे होते हैं आजारे जी तो रिष्टों पर कोई भरोसा ही नहीं होता है देखिए इनसान अकेला आता
13:51है अकेला जाता है ठीक है रिष्टे बहुत अच्छी चीज है पर रिष्टे भी स्वस्थ उसी के बनते हैं जो
14:01सबल होता है यह श्री कृष्ण है
14:07और अर्जुन को समझा रहे हैं, ज्यान दे रहे हैं, कहने लड़ो, युद्ध्यसोर, किसके विरुद्ध है युद्ध, उस अब रिष्टिदार
14:17ही खड़े हुए उधर, अब लड़ना भिड़ना अपने आप में कोई अच्छी बात तो होती नहीं है, लेकिन जहां पर
14:32बात स
14:33मज में आए, कि सच्चाई मारी जा रही है, वहाँ फिर इनसान को संघर्ष करना भी पड़ता है, एक होता
14:41है कि मेरे स्वार्थ है, मेरी कामना है, मैं इसके लिए भिड़ जाओं, और एक होता है कि सच्चाई कुछ
14:49और है, और चल कुछ और रहा है, तो सच को जिताना पड�
14:59है, और वो संघर्ष वही कर सकता है, जो सरप्रथम सबल हो, कमजोर आदमी के रिष्टे स्वस्थ हो, बड़ा मुश्किल
15:08है, नहीं होगा, अच्छे रिष्टे, स्वस्थ रिष्टे, भी दो मजबूत और आजाद लोगों में ही बन सकते हैं, दो लोग
15:19जो कमजोर हैं और व
15:29सबसे पहले, जो कमजोर है, वो किसी को देख आ सकता है, उसके पास तो खुदी कुछ नहीं है, तो
15:35जो कमजोर होता है, फिर वो स्वार्थी हो जाता है, वो सबसे पहले देखता है, मैं कैसे बचूँ, उसी की
15:41जान हर समने अटकी रहती है, मानलो एक्जाम से आधे पहले, ए
15:58अच्छे रिष्ते संभव हैं, बिल्कुल संभव हैं निकिन उर तभी हो सकता है कि जब दोनों लोग कमजोर न हो..
16:06जहान एक कमजोर हुआ तहाँ वो न गभी दूसेवरे पर आश्रित हो जाता है
16:11वो जिस पर आश्रित हो जाएगा
16:14वो भी कहेगा कि जब ये मुझ पर आश्रित ही है
16:16तो मैं कुछ कीमत क्यों नवसूल हूँ
16:20ये तो उसकी और से है
16:21जो अभी रिष्टे में मजबूत है
16:23और जो रिष्टे में कमजोर है
16:25उसकी क्या हालत होगी
16:26वो कहेगा मैं इस पर आशृत हूँ
16:30तुम इसको जाने कैसे दूँ
16:32क्योंकि अगर इस चला गया तो मेरा क्या होगा
16:34मेरा तो दाना पानी इसी से चलता है
16:36बात समझ में आ रही है
16:38आप इसको जगण के रखोगी क्योंकि अगर ओ चला गया
16:40तो आपकी तो हालत खराब हो जाएगी
16:42और मेरी हालत खराब ना हो जाए
16:44इस नाते से रिष्टा बना कर रखना
16:46ये कोई स्वस्त संबंद तो होता नहीं
16:49तो जब दोनों लोग अपने अपने क्षेत्र में
16:52सही होते हैं, स्थापित होते हैं
16:55और स्वेच्छा से एक दूसरे के साथ होते हैं
16:57तब रिष्टा सुन्दर होता है, मधुर होता है
16:59स्वस्त होता है, प्रेम पूर्ण होता है
17:01बाकी हम इनसान हैं
17:03लोगों के बुरे वक्त आते हैं
17:05उस समय पर किसी सहायता की जरूरत है
17:07ठीक है, उतना हो जाता है
17:08पर यह नहीं होना चाहिए
17:10कि यह स्थिति स्थाई हो जाए
17:11पर्मानिंट हो जाए
17:13कि हमने एक पर्मानिंट रिष्टा ही ऐसा बना लिया है
17:15जिसमें एक का कामे देने का और एक का कामे लेने का
17:17दुनिया स्वार्थी है
17:20तभी तो भगवत गीता का जो पूरा तीसरा अध्याय है
17:24वो निश्काम कर्म का है
17:26क्यों सिखाना पढ़ रहा इतना जोर दे कर गे
17:29क्योंकि लोग निश्कामी होते नहीं
17:32दुनिया स्वार्थी है
17:33इसका मतलब क्या है
17:34इसका मतलब ही है कि अगर कोई आपको कुछ दे रहा है
17:37तो भले ही आपको ये लगे
17:40कि मुफ्त दे रहा है
17:41पर मुफ्त कोई किसी कुछ नहीं देता
17:43दुनिया निश्कामी नहीं होती
17:44अगर कोई आपको कुछ दे रहा है
17:46जो आपको लग रहा है कि मुफ्त है
17:47तो कहीं न कहीं पीछे से दबे छुपे वो आपसे कीमत भी वसूल रहा होगा
17:52तो सतर कहना चाहिए
17:54ना किसी पर आश्रित बनो
17:57और ना किसी और को अपने उपर आश्रित होने दो
18:00आपात काल में किसी के सहायता कर देना दूसरी बात है
18:05पर जैसे ये अपने भीतर ये भाव पाओ, कि मैं तो किसी पर बिलकुल निर्भर होकर जी सकती हूँ, क्योंकि
18:11वो मेरा है, समझ लेना ये भाव गड़बढ है, ये रिष्टे को खराब कर देगा
18:17इसी तरीके से हमें बड़ा अच्छा लगता है कई बार, हम कहते हैं वो ना पूरी तरह मुझ पर डिपेंडेंट
18:21है, ये बात छोटे बच्चों पर तो चल जाती है, अब छोटा बच्चा कोई है वो आप पर निर्भर है,
18:26वो कोई समस्या नहीं है, लेकिन अगर कोई वयस्क ह
18:29करके भी आप पर निर्भर हो रहा है, आश्रित, डिपेंडेंट हो रहा है, तो ये इस्थिति बहुत दिन तक नहीं
18:35चलनी चाहिए, आप कोशिश करिए कि वो अपने पैरों पर खड़ा हो सके, तो किसी को आप पाएं कि वो
18:41काबिल है, वयस्क है, उसके बाद भी आप पर कि
18:47किसी ने किसी तरीके से अश्रित हुआ जा रहा है, चाहे आर्थिक रूप से, चाहे भावनात्मा करूप से, चाहे किसी
18:52और तरीके से, वो अश्रित हुआ जा रहा है, तो उसको प्रेरित करिये, उसको कहिए कि तुम इस लायक बनो,
18:58कि सुतंत्र जी सको, आत्म निर्भर होक
19:01कर जी सको, मेरे उपर आश्रित होना अच्छी बात नहीं है, और बात ये नहीं है कि मैं तुहारी सहायता
19:06नहीं करना चाहती, सहायता मैं पूरी करना चाहती हूँ, पर तुम्हारे लिए ही अच्छा नहीं है कि तुम मुझे पर
19:11आश्रित हो जाओ.
19:13अच्छारी जी जैसे मैं सिंगल पेरेंट हूँ
19:15मैं कोशिश कर रही हूँ अपने बच्चे के लिए जितना अच्छा कर पा हूँ
19:19उसकी एजुकेशन के लिए उसकी खेल के लिए
19:22और भी जो आप से सीखती हूँ, सुनती हूँ, समझती हूँ
19:26वो कोशिश करते हूं कि उसके जीवन में भी किसी तरह पहुचा सको
19:31लेकिन अचारी जी मैं चाहते हूं कि वो आपकी तरह बने
19:36मतलब एक अच्छा इंसान बने
19:38वो अपनी तरह बने
19:40मेरी तरह बनेगा तो वो एक तरह की नकल हो जाएगी
19:43आप की तरह का मतलब मेरा ये था कि जो अपनी समद से काम करे और
19:48जो उसकी उच्चितम संभावना है ना जो उसका हाइस्ट पुटेंशियल है वो उसको हासिल करे जो होना उसका बर्थ राइट
19:58है जन्म से धधिकार है हम पैदा इसी लिए होते हैं
20:02ताकि जो हमारी असलियत है हम उसको पा सकें जो हमारी उचाई है उसको हासिल कर सकें जब ये अपनी
20:10उचाईयों को हासिल कर लेगा तो वहां पर उसे मैं मिलूँगा तब ये पाएगा कि मैं और ये एक हैं
20:18अपने आप से सवाल करना खुझ से पूछना मैं जैसा हूँ मैं जो
20:23चाह रहा हूँ, वो कहां से आ रहा है?
20:26अत्म ग्यान
20:27अपने आपको बार बार देखते रहना
20:29अपनी कमजोरियों को
20:31पगड़ते रहना और बहतर
20:33होने की भरसक कोशिश करते रहना
20:36यही जिन्दगी है और क्या जिन्दगी है?
20:38आप अगर कुछ ना करो
20:40ऐसे ही पड़े रहो, जानवर की तरह
20:42भी पड़े रहो, तो जिन्दगी तो कठी जाएगी
20:44पर जिन्दगी सफल उन्हीं की होती है
20:47जो लगातार रोज-रोज
20:49हर पल बल की अपने आप से क्या बोल रहे होते हैं?
20:52कहां है, कहां है
20:53अभी और कहां पर कमजोरी चुपी हुई है
20:56अभी और कहां स्वार्थ चुपा हुआ है
20:58अभी और कहां पर अंधेरा बैठा हुआ है भीतर
21:00मुझे और बहतर होना है
21:03उन्होंने समझे लो कि असली जिन्दगी जी
21:08मैं चाहती हूं अचारे जी कि ये भी भगवत गीता पढ़ना शुरू करे और
21:12आप समय आ गया है आप दसवी में आ गये हो समय आ गया है बलकि एक दो साल पहले
21:16से भी शुरू कर सकते थे पर अब तो समय बिलकुल आ गया है
21:19और जिसको अब मैच जीतने है जो अब इरादा बना रहा है कि अब चैंपियनशिप्स के लिए खेलेगा टूर्नमेंट्स में
21:27जाएगा उसके लिए तो गीता बहुत जरूरी है
21:31गीता खास क्यों है गीता खास इसलिए है क्योंकि संघर्ष की इस्थित में कही गई है और आदमी का जीवा
21:37नहीं क्या है पहले दिन से आखरी दिन तक संघर्ष ही है
21:41तो इसलिए गीता इतनी ज्यादा कीमती, जरूरी और उची सीख है
21:46क्योंकि वहाँ भी संघर्ष है देखो
21:50वहाँ भी संघर्ष है और हमारी दिंदगी में भी संघर्ष है
21:54और अर्जुन की दिंदगी में भी संघर्ष है
21:56और उसी संघर्ष में कैसे रहना है, कैसे लड़ना है, कैसे जीतना है, क्या समझना है, ये सिखाते हैं श्री
22:07कृष्ण अर्जुन को, उसी का नाम गीता है. हर वो इनसान जो जीवन में किसी अच्छे सार्थक संघर्ष में उतरा
22:14हो, उसे गीता चाहिए.
22:17आचारे जी, पिछले आट-दस साल बहुत स्ट्रगल में बीते हैं, लेकिन अब ये है कि हम लोग एक स्टेबल
22:23पोजीशन में हैं, मतलब ऐसा नहीं है कि हम फाइनेशली स्ट्रॉंग हैं, इमोशनली हम लोग किसी और की जरूरत महसूस
22:32नहीं होती हैं, लेकिन आचारे जी, मै
22:35चाहती हूं कि अब कुछ बड़ा करना चाहती हूं, जैसे कि मतलब मैं भी जब अपने घर में थी तो
22:41मुझे भी खहा चाता था कि क्या कर लेगी, थोड़े दिन में आएगी रोके वापस, मतलब एक महिला होके मैं
22:49नहीं जाते कि मुझे कमज़ोर समझा जाएं, महिला को भी
22:55कमज़ोर नहीं समझा जाएं, पुरुष को भी कमज़ोर नहीं समझा जाएं, इनसान को ही कमज़ोर नहीं होना चाहिए, मतलब हमारे
23:02परिवारों में भी ऐसा होता है कि तू लड़की है तू क्या कर लेगी, अकेले क्या रह लेगी, बाहर निकलेगी
23:10तो पता चलेगा, तो �
23:14बाहर निकलके ही तो पता चलता है न कि दुनिया क्या चीज है और वो आपको पता नहीं चला और
23:21आप जीवन भर घर में सजी बजी गुडिया बनकर बैठी भी रह गई तो आपको कुछ पता तो नहीं चला
23:27न कोई आप से कहे बाहर निकलेगी तो पता चलेगा तो कहिए पता ह
23:32तो करना है इसलिए तो बाहर निकलना है जो संघर्ष नहीं कर सकता और को चोटे नहीं जहल सकता फिर
23:40उसको विजय भी नहीं मिलती है संघर्ष के बिना किसी क्या मिलता है संघर्ष के बिना गीता हो सकती थी
23:46क्या जब स्वयम इनको संघर्ष करना पड़ रहा है तो हम आप क्य
23:51कहा है? जा चीज है. जिसने जिन्दगी का संघर्ष नहीं देखा. उसे फिर जिन्दगी वर्दान, जिंदगी का आनन्द भी कभी
24:02नहीं मिलेगा. तो आप संघर्ष करें, बिलकुल करें,
24:06अभी तक भी करा है और आप तो सफल हो करके आ रही है सामने और एक बात और इसमें
24:12वक्त का कुछ भरोसा नहीं होता अभी सफलता सामने कभी सफलता फिर आ सकती है सामने तो सफलता सफलता भी
24:20ठीक है इनको भी बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए संघर्ष में ही सफलता
24:24है। जब Arjuna को कहते हैं कि तुम लड़ो तो पूरी गीता में बड़े धूंधने पर कही मिलेगा कि
24:33Arjuna को कहते हूं कि तुम νप विज्एै अवश्य हो गे। ऐसा कोई भरोसा ऐसी कोई गारंटी नहीं
24:39पर ये कहते हैं कि जो काम सही है वो करो, अंजाम चाहे जो हो, इसी को तो निश्कामता कहते
24:44हैं न, कि जो सही करम है वो तुम करो, परिणाम अपने आप भूल जाओगे, तो सफलता मिलती है अंत
24:51में क्या सफलता मिलती है अंत में बड़ी बात नहीं है, सही संघर्ष ही जीवन
24:56है अंजाम चाहे जो निकले और जो नदी हार भी जाते तो भी
24:59कीता में जो बात कही गई है वो उतने ही मूल लेकी रहती
25:02क्योंकि संघर्ष तो किया ना असली चीज होती है कि मैंने
25:05सही काम किया और उसके लिए अगर मुझे आफ़ज हिलनी पड़ी
25:08कीमत चुकानी पड़ी तो मैं तयार थी मैंने करा और जिन्दगी
25:12क्या होती है अपने आपको बिलकुल रूई खे फाहे में बचा कर
25:17जिये सुरक्षित मरेंगे तो वो भी ना तो जो मरना ही है तो सही
25:21जिन्दगी जी करके फॉलाद बन करके मरेंगे जल नहीं है तो रूई की तरह क्यों जलें फॉलाद की तरह पिखलेंगे
25:32कुछ मजा भी आएगा कुछ आ रही बात से मुझे में
25:36अचारी जी एक तरफ तो लोग कहते हैं कि दहिज लेना मतलब दहिज देना चाहिए और देते भी हैं बड़ी
25:41-बड़ी शादियों में बहुत दहिज दिया जाता है
25:43मतलब छोटे से छोटे लोग भी होते वो भी अपने दहेज देते हैं
25:48और एक तरफ जब मैंने अलोमेनी लेने से मना किया
25:51तो सब लोगों ने मुझे बहुत फोर्स किया
25:54कि तुम्हें अलोमेनी लेनी चाहिए
25:55लेकिन मैं आपको सुन रही थी
25:57तो आप ने बताया कि स्वतंत्रता सबसे बड़ी चीज है उसके लिए कभी कोई समझाता नहीं करो तो मैंने यही
26:07बोला कि मैं जहड़ों पोचा कर लूँगी घड़ जाके लेकिन मैं उनका एक रुपया भी नहीं लूँगी मैं अपने बच्चे
26:12को खुद पाल सकती हूं तो �
26:16आप क्या कहना चाहेंगे जरी जिस वरे मैंने सही किया या गलत आप बता ही आपने सही किया कि गलत
26:23नहीं सही किया बस ठीक तो मेरे आपके साथ होने का उदेशे भी यही होता है कि आप खुद जानने
26:33लग जाएं कि क्या सही है क्या गलत उसमें धीरे धीरे मेरी सलाह की जर�
26:42पर गर्व किया जा सके और नहीं एलिमनी एलिमनी का प्रावधान भी रखा गया था उस इस्थिति के लिए जहां
26:51पर महिला बिल्कुल ही आश्रित होती है पती पर ठीक से पढ़ी लिखी भी नहीं होती तो अगर पती से
27:02उसका संबंद विच्छेद हो गया पती ने उसको छो�
27:06काईगी वो किसी हालत में काबिलियत ही नहीं रखती है कि एक रुपया भी कमा पाए तो वो तो फिर
27:12दर बदर ठोकर खाएगी तो उस इस्थिति से महिला को बचाने के लिए एलिमनी का प्राविशन प्रावधान रखा गया नियम
27:20बनाया गया अलिमनी का अब यह नियम ही ज
27:36कई बार बहुत शोशक रिष्टे भी महिला तोड़ नहीं पाती क्योंकि अगर रिष्टा तोड़ दिया तो कहीं के नहीं रहेगी
27:42तो ऐसी स्थिति से महिला को बचाने के लिए एलिमनी का नियम लाया गया था लेकिन यह जिस स्थिति के
27:48लिए बनाया गया गया हम वो स्थि
28:04कि बोले कि अगर रिष्टा तूट रहा है तो मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, मैं अपना देख लूँगी, दो हम
28:10उम्र लोग, एक समान उनकी उम्र है, एक समान उनकी शिक्षा भी होनी चाहिए, एक समान उनकी अकल भी होनी
28:19चाहिए, एक समान उनका जो वैश्वेक एक
28:22एकस्पोजर है वो भी होना चाहिए.
28:25दुनिया को जानने समझने की,
28:27दुनिया में सफलता से जी पाने की
28:28दोनों की काभिलियत भी गराबर होनी चाहिए.
28:30तो रिष्टा टूटने पर एक दूसरे को पैसा क्यों दे,
28:33ये स्थिती ही नहीं आनी चाहिए,
28:35पर यह स्थिति आती है, क्योंकि महिला लाचार रहती है, लाचार रहती है, तो इसलिए अलिमनी का पनाया गया था,
28:41आपने नहीं ली अलिमनी आपने बहुत बहुत अच्छा करा, मैं चाहता हूँ जादा इस तरहीं इस स्थिति में रहें कि
28:48अगर कभी रिष्टा तूटे, त
28:51उन्हें हाथ ना पहलाना पड़े कहीं, अलिमनी के लिए भी हाथ ना पहलाना पड़े, बहुत अच्छी बात होगी, उसमें अपनी
28:56गरिमा भी है ना, कि जब तक तुम्हारे साथ थे तो थे, अब जब रिष्टा तूट रहा तो तुमसे पैसे
29:01लेके थोड़ी जाएंगे,
29:02बलकि जब साथ थे तब हो सकता है तुमसे कुछ ले भी लेते, प्रेम केनाते ले लेते, पर अब रिष्टा
29:08ही तूट रहा है, जब प्रेम ही नहीं बचा तो तुमसे क्यों ले कोई पैसा, और दहेज काता मैं बोलू
29:12ही क्या, आप एक पुरुष हो, और आप विवाह करने क
29:18के लिए पैसे मांग रहे हो, तो ये विवाह नहीं है, ये तो पेशा हो गया, ये विवाह नहीं है,
29:25तो वियापार हो गया, और आप बेच क्या रहे हो, जो अपने आपको पैसे के लिए बेच रहा हो, उसको
29:31क्या बोले, कुछ अच्छा तो नहीं बोल सकते, या बोले, नही
29:39आप एक काम कर रहे हो जो कि ग्यार कानूनी तो है ही
29:45आपने अपने अप शुरू होने वाले रिष्टे की नीव ही खोद डाली है
29:50यह लड़की आपके घर आ रही है
29:52उसको पहले ही पता है कि मैं बहुत सारा पैसा लेकर आ रही हूँ
30:05उसकी dignity उसके आत्म सम्मान के लिए जरूरी है कि वेलेमनी न ले
30:11वैसे ही पुरुष के आत्म सम्मान के लिए बहुत जरूरी है कि दहेज ऐसी चीज सुने भी नहीं
30:16दो इंसान आपस में सम्मन्ध बनाने जा रहे हैं
30:19इसमें पैसा कहां से बीच में आ गया
30:22पर फिर पुरुष मालू में क्या तर्क देते हैं
30:26वो कहते हैं कि अच्छा हम तो पैसा ना लें इससे दहेज का
30:32पर इसमें तो शादी यही देख के करी ना कि मैं कमा कितना रहूं
30:35तो यह तो पैसा देख रही थी तो मैं पैसा क्यों ना देखूं
30:38ये पुरिशों की और से तरक आता है और इस तरक में भी कुछ जान तो है तो इसलिए रिष्टा
30:46जो है वो पैसा देख के बनना ही नहीं चाहिए ना लड़की ये देखें कि लड़का कमाता कितना है
30:54कमाना एक बाइप्रोडक्ट हो सकता है पर किसी इनसान में जो खुबियां देखी जाती है वो दूसरी होती है पैसा
31:00उनमें बहुत नीचे आता है यही चीज़े में फिर गीता सिखाती है कि किसी इनसान में आपको सबसे पहले क्या
31:07देखना चाहिए ना तो उसका पैसा देखो
31:09ना उसका शरीर देखो कि कितना आकरशक है, सुन्दर है, सेक्सी है यह सब जो बहुत चलता है कि फोटो
31:15देख लो, कद नाप लो, रंग गोरा है कि नहीं, यह सब नहीं
31:21कियान कितना है
31:23हाँ, समझदारी कितनी है, हौसला कितना है, डरपोक तो नहीं है, प्रेम है, उसके बीतर कुछ कुछ करुणा है, हिंसक
31:34तो नहीं है, पर इसके जगे हम यह देखते हैं कि उसके पैसा कितना है, यह लड़की सुन्दर कितनी है,
31:40आप यह सब देखके अगर शादी करोगे, त
31:44अगर दूर तक चलेगी भी, तो आप जीवन पर बस उसे ढोगे, हम शुरुवात में ही गल्तियां कर जाते हैं,
31:51और उन्हीं गल्तियों के कारण फिर दहेज की नौबत आती है, फिर ऐलिमनी की बात आती है, शुरुवाती गल्ती ही
31:56ये होती है, कि हमें जीवन के मूलभूत सि
32:09गल्ती करते हैं, बहुत छोटी, बहुत मूलहीन चीजें हमारे लिए बहुत बड़ी हो जाती है, और जब ऐसा हो जाता
32:15है, तो सिंदगी परवाद हो जाती है, आजकल कुछ महिलाएं पुर्शों पर इल्जाम लगा देती हैं, उन्हें जेल भिजवा देती
32:24हैं, कोट केस कर
32:25देती है, तो उसके कारण बाकी सारे महिलाएं जो भी बदनाम होती हैं, तो वो अच्छा नहीं लगता है, मुझे
32:33बहुत बुरा लगता है, तो ये तो हो रहा है, महिलाओं का एक छोटा वर्ग है, सभी महिलाएं नहीं, बहुत
32:43छोटी उनकी संख्या है, वो पुरुशों प
32:55को ही नहीं, उसके घरवालों को भी कई बारो जेल रवाना करवा देती है, उससे जो पूरा महिला वर्ग है,
33:01वही बतनाम हो जाता है, देखिए ये सब नहीं, विश व्रक्ष के फूल हैं, चाहे वो दहेज हो, चाहे वो
33:10ऐलिमनी हो, चाहे वो 498 ए, जिस कानून के अंतरगत
33:16महिलाएं पुरुषों पर इलजाम लगा करके, जूटे आरोप लगा करके उनको जेल भिजवा देती हैं, ये सब एक ही जहरीले
33:24पेड के अलग-अलग फल फूल हैं, और जहरीले पेड क्या है? गलत आधार पर संबंध बनाना, जब गलत आधार
33:31पर संबंध बनाओगे, तो
33:33उसी में दहेज भी दिखाई देता है, उसी में अलिवनी भी दिखाई देती है, उसी में एक कोट का चहरी
33:37बाजी भी दिखाई देती है, उसी में जेल भी होता है, उसी में भुरून हत्या भी होती है, उसी में
33:44पुरुष जो अब कई मामले सामने आ रहे हैं, पुरुष आत
34:03फलफूल है, इनका तना एक ही है, और इनकी जड़ एक ही है, इनकी जड़ में है आत्म अग्यान, मुझे
34:09पता ही नहीं कौन हूँ तो मैं फिर कहीं भी रिष्टा बना आता हूँ, तो भगवत गीता का जो मूल
34:14संदेश है वो यही है, कि खुद को तो जानो पहले, अगर मुझ
34:32से जो चीज निकलती है, क्या निकलती है, गलत संबंध, और उन्हीं फिर गलत संबंधों से क्या क्या आता है,
34:38अबने का दहेज, ऐलिमनी, प्रताणना, किच-किच, तो इस वरिक्षर का एक बड़ा जो फल है वो यह भी है,
34:45कि बच्चों की जिंदगी बरवाद होना, क्यों
34:58आम कहां से खाए, तुम्हारे रिष्टे की शुरुआत ही गलत है, अब कैसे ठीक करें, ठीक अभी हो सकता है,
35:05लेकिन बड़ी अब महनत लगेगी, इससे कहीं बहतर होता, आसान होता, कि तुमने रिष्टे की शुरुआत ही गलत ना करी
35:10होती, और रिष्टे की शुरुआत �
35:13इसके लिए गीता चाहिए
35:14लोग सोचते हैं गीता तो
35:1675 के बाद पढ़ेंगे साब सन्यास ले करके
35:19नहीं गीता आपको पढ़नी है
35:21जिन्दगी के एहम फैसले लेने से
35:23पहले सारे फैसले ले लिए
35:25और जिन्दगी बरबाद कर ली उसके
35:27बाद जाकर कि गीता पढ़ रहे हो
35:29तो अब पश्टाय होत किया जब
35:31चुडिया चुक गई खेत
35:32गीता तो पढ़नी चाहिए जवानी में
35:34गीता तो पढ़नी चाहिए इनकी उमर में
35:37ताकि ये अब जो फैसले लें
35:38और रिष्टे बनाएं वो गड़बर न हो जाएं
35:40बात समझ रहे हैं
35:42हम कुछ नहीं जानते हमें कुछ चुनना नहीं आता
35:44हमें घर चुनना नहीं आता
35:46हमें हमें स्कूल कॉलेज चुनने नहीं आते
35:48हमें अपने लिए ठीक से कपड़े चुनने भी नहीं आते
35:52हमें क्या खाना है क्या नहीं खाना है ये चुनना भी नहीं आता
35:55तो हमें अपने लिए पति-पत्नी चुनना कहां से आ जाएगा
35:59आप भारत की राजनीते को देखते हैं आपको लगता है लोगों को नेता चुनना आता है
36:04उपर से लेके नीचे तक देखिए, दाएं से बाएं तक देखिए, छोटे स्तर से लेके उचे से उचे स्तर तक
36:10देखिए, लोगों को पता है, वोट डालना आता है, हमें कुछ चुनना नहीं आता, चुनाव तो हमें आता ही नहीं
36:15है, तो फिर हम पती-पत्नी भी गलत चुन �
36:33जिस फैसे किसी लोगों को हम गुरू बना लेते हैं, ऑड़नी है, पूजे ये, हमें कुछ चुनना नहीं आता, तो
36:42फिर हम पती भी प्हेक 1973 के सु चुन लेंगे।
36:47यह चुनने की कला बड़ी जबर्दस चीज होती है
36:51और चुनना तभी सही हो पाएगा
36:53चुनाव तभी ठीक हो पाएगा जब चुनाव करने वाला ठीक है
36:57कर्म तभी ठीक हो पाएगा जब करता ठीक है
37:00यही गीता की सीख है
37:02लोग कहते हैं, गीता कर्म सिखाती है, नहीं, गीता सिखाती है कर्म तभी ठीक होगा जब कर्ता ठीक है, और
37:08कर्ता अगर ठीक है तो कर्म की परवा करना छोड़ दो, कहते हैं कि अपने, मतलब अपना कर्तवे पूरा करो,
37:16गीता में यही लिखा है कि कर्तवे पूरा करो, और श
37:32मैं ब्रहम मात्र हूं, मैं कौन हूं, मैं आत्मा हूं, मैं सत्य हूं,
37:37तो मानि जीवन का उद्देश है सत्य तक जाना, सत्य तक कैसे जाये जाता है,
37:41जिस जूठ में आप घिरे हुए हो, जिससे बंदे हुए हो, उसको काट कर,
37:46तो यही जीवन का उद्देश है, सतत संघर्ष, इसलिए तो गीता युद्ध के मैदान पर उतरी है, ताकि आप कोई
37:53बताया जा सके कि जीवन है ही इसलिए कि जूज हो, जीवन इसलिए नहीं है कि फूलों की पंखोडियों पर
37:59सो रहे हो, खुश्बूों के बीच, जीवन ज�
38:04जूजने में मौज है, जिसको जूजने में मौज नहीं है, उसको कहीं भी आराम नहीं मिलने वाला.
38:11तो जो हमारे बड़े लोग सिखाते हैं कि तुम ऐसे मैनेज करो
38:15जो भी माननेताय होती है हमारी हमको सिखाई जाती है
38:20एक बहू के रूप में, बेटी के रूप में
38:23और जो भी हम अपने धर्म से सीखते हैं कि इस तरह से पूजा पाट करो
38:28इस तरह से वरत रखो
38:30और जो यह सब जोतिस और फैंक्शुई और यह सब की जीवन में शानती आ जाए उसके लिए यह सब
38:36किया
38:37लेकिन जब आप से पढ़ना शुरू किया निरालम उपनिशन
38:43तो जब मैंने आप से पढ़ना शुरू किया और धीरे-धीरे मुझे बात समझ में आने लगी
38:49तो तकलीफ तो बहुत होई उन सारी चीजों को जूट मानने में
38:53मतलब जो हमको सिखाया जाता है उनको नहीं मान पाते कि अकेले रह सकते हैं
38:58यहीं लगता है कि नहीं पती पतनी का साथ होना जरूरी है तब ही महिला सुरक्षित है
39:02मतलब परिवार का तोटना अच्छी बात नहीं है बच्चे के लिए अपने परिवार को बचा लो पर जब मैं देख
39:09रही थी कि वो परिवार को बचाना ज्यादा खतरना खो रहा है बच्चे के लिए ही
39:15तो मतलब वो माननेता है तोड़ना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन सही को जानते हुए अगर सही के साथ रहे
39:22तो
39:24देखे माननेता नहीं बचानी होती है जिन्दगी बचानी होती है
39:28जिन्दगी किसी भी माननेता धारणा परंपरा से बड़ी चीज होती है न अगर बात ये है कि जिन्दगी बचाएं कि
39:36माननेता बचाएं तो किसको बचाएं जिन्दगी बचाएं न कोई माननेता ऐसी हो सकती है जिसका आप अगर परिक्षन करें जिसकी
39:45आप जाज पड़ताल
39:46करें और उस जिंदगी के लिए उपयोगी निकले
39:48तो फिर ठीक है हम चलेंगे
39:50उस पर ऐसी माननेता जो जिंदगी को
39:52भरवाद कर रही हो दो कोड़ी की फेग दीजिए
39:54उसको लेकिन
39:55बात माननेता को बचाने की नहीं है बात
39:58ये होती है कि माननेता को बचाकर
39:59अहंकार सोयम को बचाता है
40:01हम जब कहते हैं कि हम माननेता नहीं छोड़ना चाहते
40:03वो अधूरी बात है
40:05हम खुद को नहीं छोड़ना चाहते
40:07नाम माननेता का होता है
40:09बचाया खुद को जा रहा होता है
40:11क्योंकि हम कहते हैं हमारी माननेता है
40:13ना तो गलत कैसे हो सकती है
40:14मेरे पुर्खों ने कोई बात इतने दिनों से मानी
40:17तो बात गलत कैसे हो सकती होगी
40:18वो मेरे पुर्खें है
40:19और मैं इतना शेष्ट हूँ
40:20तो मेरे पुर्खों की बात गलत कैसे हो सकती है
40:23मेरे पुर्खें है ना
40:24मैं महान तो मेरे पुर्खे भी महान तो उनकी माननता भी महान
40:28तुल्य देखे माननता के नाम पर भचाया अहंकार को जाता है
40:32अहंकार बहुत तरीके के नकाब पहनता है
40:34वो सीधही थोड़ी बोलेगा कि मैं हंकार हूँ और मैं खुद को बचाने में उत्सुक हूँ
40:38वो और बहुत सारे इधर उधर के बहाने बना कर खुद को बचाता है
40:43तो जो भी कुछ चला आ रहा है अतीज से पीछे से आ रहा है
40:46उसको ना अच्छा मानिए ना बुरा मानिए
40:49जिग्यासा करिए प्रश्न करिए
40:51अतीज से तो हमको गीता भी मिली है
40:53गीता को तो सरमाथे रखेंगे
40:55पर अतीज से बहुत सारे अंधविश्वास भी मिले हैं
40:58उनको कचरे में फेक देंगे
40:59और ये हमारी विवेक का काम है कि हम देखें
41:01कि अतीज से अगर उपनिशद आ रहे हैं
41:04तो उनको प्रणाम करना है
41:06और अतीज से अगर भेद भाव आ रहा है
41:09और तमाम तरह की रूड़ियां आ रही है
41:12लिंग भेद आ रहा है
41:14जाती भेद आ रहा है
41:15अतीज से ये सब भी तो आ रहा है
41:16ये सब भी तो आ रहा है तो कशड़े में डाल देंगे
41:19पर आचारी जी जब सवाल करते हैं न अपने बड़ों से तो कहते हैं कि
41:24हमने तो कोभी सवाल नहीं किया हमें जिस जो कहा हमने मान लिया
41:27अरे बड़ों से सवाल बड़े से बड़े यहां बैठे हैं
41:31तो जब सवाल करना है तो जो सबसे बड़े हैं उनसे करेंगे ना
41:35ये हैं सबसे बड़े
41:36कोई उम्र में आपसे बड़ा हो गया इससे नहीं बड़ा हो जाता है
41:40हम श्री कृष्ण को प्रणाम क्या इसलिए करते हैं कि वो हमसे उम्र में बड़े हैं
41:44उम्र की तो बात नहीं होती, चेतना की बात होती है
41:47जो चेतना में बड़ा है, उसको बड़ा माना जाता है
41:50उम्र में बड़ा होने से कोई बड़ा नहीं हो जाता है
41:52कोई आदमी जिंदगी भर सोता रहे, तो भी उम्र में तो बड़ा होई जाएगा
41:56उम्र और अनुभव के साथ साथ अगर आपकी समझ बढ़ी है तो जरूर हम आपको प्रणाम कर लेंगे
42:04नहीं तो कौर्वों की तरफ जो बड़े-बड़े महारती खड़े थे वो तो उम्र में सब अरजुन से बढ़े थे
42:12भीश्मद्रोन, कृपाचार यहां तक की दुरियोधन और अभी ज्यादा तर अरजुन से बढ़े हैं उम्र में
42:21तो क्या हो गया? उम्र में बढ़े हैं, समझ में थोड़ी बढ़े हैं
42:25पर उम्र तो शकुनी की भी बहुत थी उसको थोड़ी सम्मान दे देंगे
42:31पर आचारे जी, कृष्णे का ये रूप तो आपने दिखाया है, बाकी हम तो बहार तो देख रहे हैं कि
42:37उनका रिपोर्ट घड़ा है, कि बाल गुपल क्लास में वस्ट आये है, उनको सब में 100 में 100 मार्क्स मिले
42:46है
42:46माया है, माया, दुनिया के रंग धंग है, देखना चाहिए और मुस्कुरा देना चाहिए, माया है
42:54श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं निश्कामना, और हम मंदिर भी जाते हैं अगर कृष्ण के, तो कहते हैं पूरी करो
43:01मनो कामना
43:04Krishnah कह रहे हैं
43:05निशकामना
43:07और हम वहाँ जा भी रहें तो
43:08बोल रहे हैं मनो कामना
43:09ये दोनों बाते एक साथ कैसे चलेंगी
43:12हम तो Shri Krishnah की बात
43:14मानने को तैयार नहीं है
43:16हम कैसे लोग है
43:18मेरा भी एक सवाल था
43:19जैसे की जब
43:22इसी सीज में रहता है की
43:29और डर लगता है क्या अगे करना है? तो यदि जो कुछ भी सामने है
43:41उसे बच बच के मच चलो उसमें पूरा डूबो उसे पूरा अनुभव करो
43:47उस से दो ही परणाम सामने आएंगे अगर वह वाकई सही चीज है
43:52तो तुम्हारा उससे प्यार और बढ़ेगा
43:55और तुम उसमें और ज़्यादा डूप पाओगे
43:57और अगर वो सही चीज नहीं है
44:00तो फिर तुमें दिखेगा सही नहीं है तो मुझे छोड़ भी पाओगे
44:03आगे क्या करना है यह आगे की कल्पना करकर के नहीं तो पता चलेगा
44:07हम कोशिश यही करते हैं हम सोचते हैं आगे का निर्णाय लेना है तो सोचू आगे का आगे का मत
44:12सोचो
44:12जो अभी चल रहा है न अगर उसको ठीक से जान समझ लिया
44:15तो आगे के फैसले अपने आप हो जाते है
44:17अब बैडमिंटन है
44:19अगर तुम बैडमिंटन को जान लगा के
44:21खेलोगे ही नहीं तो तुम्हें कैसे पता चलेगा
44:23कि वो चीज तुम्हारे लिए ठीक है की नहीं
44:28तुम पूरी जान लगा के खेलो
44:30तो या तो तुम्हें दिख जाएगा कि हाँ ये काम मैं करना चाहता हूँ
44:32अगले दस साल बीस साल
44:35जब ये करता हूँ तो भीतर से बिलकुल आग हो जाता हूँ
44:39आनन्द आ जाता है
44:40या फिर तुम्हें दिख जाएगा ये बैडमिंटन में मज़ा नहीं आ रहा
44:44मुझे नहीं करना है
44:46लेकिन अगर बैडमिंटन खेलोगे भी
44:48और साथी साथ आधा धूरा खेलोगे
44:50दूरी बना कर चलोगे तो कुछ समझ में नहीं आएगा
44:52जादा तर लोग ऐसी आधी धूरी जीते है
44:54वो जो कुछ भी कर रहे होते हैं
44:56उसको पूरा नहीं करते हैं
44:57उसमें डूबते नहीं है
45:00मैंने का डूबने से दो ही परिड़ाम सामने आते हैं
45:02और दोनों परिड़ाम पूरे पूरे होते हैं
45:05या तो फिर उस काम के हो जाओगे या फिर उस काम को छोड़ दोगे
45:09तो फैसले जिन्दगी पर छोड़ देने चाहिए
45:12और जिन्दगी को सचाई के सुपूर्द कर देना चाहिए
45:15सचाई कैसे पता चलती है?
45:17तथें का सामना करके, डूब करके
45:21और जब तक किसी चीज में हो पूरी तरह समर्पित रहो
45:26पूरा समर्पड ही किसी दिन हो सकता है छोड़ो आभी दे
45:29वैसा छोड़ो ना शुब होगा
45:31और पूरे समर्पड से यह भी हो सकता है कि पूरी तरह उसमें डूब जाओ
45:35वो डूबना भी शुब होगा
45:36तो तुम अभी दोनों कामों में अपने आपको पूरे तरीके से लगाओ, पढ़ाई में भी, बैडमिंटन में भी, फिर खुद
45:44ही देखने लग जाएगा कि इन में से कौन है जो जिन्दगी पर छा रहा है फिर उसे छाने दो
45:48अचरे जी, एक बात मैं कहना चाहूंगे आपसे, कि आपने और संस्थारे मेरी बहुत मदद की है, आपकी वज़े से
45:59ही, सही ग्यान और सही संगती की वज़े से ही, मतला मुझे ऐसा लगता है कि आपने बिलकुल गड़े से
46:05निकालके मुझे भार खीच लिया एकदम, गर्थ स
46:09बाहर की चलिया है, उसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया चरे जे, जिन्दगी भर संगर्ष चलेगा, जिन्दगी भर चलेगा, अरे, तो
46:25इसमें कोई भी बिंदो आखरी नहीं होता, आज आप जहां पहुंच गए हैं, इसके आगे भी यात्रा है, चलती रहेगी,
46:36और या
46:37आटरा का मज़ा तो संगर्षों में ही है, ठीक है, तो जीतेंगे, चाहे हारेंगे, पर खेलेंगे जम के, अपनी भीतरी
46:47शान में कमी नहीं आनी चाहिए, हो सकता है बुरी तरह हार के आए हो, पर फिर भी ये भरोसा,
46:54खुददारी, शान होनी चाहिए, ये एक भी जगह दि
47:07हालंकि एक बिंदु के बाद और एक उम्र के बाद, इनकी जिन्दगी किस दिशा जानी है, ये खुद ही तै
47:14करेंगे, ठीक है, लेकिन आप मा हैं, मा बच्चे को दे वही पाती है, जो मा के पास है, आपके
47:22पास प्रगाश होगा, ज्यान होगा, साहस होगा, तो बच्चे त
47:36साल बनाए, इसी में बच्चे के प्रति प्रेम है, आपको खुशी होगी इसनाते, जो हमारी अपनी एप है, जिसमें हमारे
47:47गीता और बाकी सब कारिकरम चलते हैं, यहाँ पर बुद्ध हैं, गीता हैं, उपनिशद हैं, अश्टावक्र हैं, ये मुझे मिले
47:54मेरी जिन्दग
47:57भी बदलेगी, सच पूछी हो तो मतलब लाखों नहीं, तो कम से कम हजारों जिन्दगियां तो हैं, जो बिलकुल बदली
48:02हैं, दो लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े, आचार्य प्रशांत अप पर, पहला महीना बिलकुल फ्री, गीता मिशन
48:10का पूर
48:11एक्सिस, एप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइफ सत्र, हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेश समवाद, गीता कम्यूनिटी का एक्सिस, गीता
48:21परीक्षा, चैनित समाचार, ओडियो बुक्स, कोट्स और भी बहुत कुछ, गूगल प्ले स्टोर या एपल एप स्टोर प
48:41झाल
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