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पूरा वीडियो: गुनाह पैसेवालों के, सज़ा आम आदमी को || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2024)

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Transcript
00:00जो आदमी खुद को जानने लग जाता है, उसमें भोग की हवस कम हो जाती है, उसको बहुत दूसरी जगों
00:06से मौज मिलनी शुरू हो जाती है, वो हो सकता है कहीं बैठ के कुछ गाने लगे, गिटार वा जाने
00:10लगे, कुछ नहीं कर रहा है, बस बैठा है, देख रहा है, सोच
00:13लिख रहा है कुई किताब पढ़ रहा है कुछ लिख रहा है किसी से बात कर रहा है कर यह
00:17यह जो चुपचाप एक जगाए नहीं बैठ सकती जो बैठ के��?
00:32जब कोई अच्छी कविता अच्छा साहित्य नहीं पड़ सकती, कोई अच्छा गाना नहीं सुन सकती, किसी से शांति से प्यारी
00:39दो बाते नहीं कर सकती, यही वो बेचैनी है, जो हमें मजबूर करती है, कि जाओ, भोगो, और उस भोगने
00:46की प्रक्रिया में, सारी ग्रीन हाउ
01:01रिलिजिन एक्षिस्ट तू फुल्फिल और दिसायर्स पुर्यने कमाऊ स्वर्ग जाओ, मंदिर जाओ, मनो कामना पूरी करो धार्म का कामी है
01:09अच्छी कहांस है हमने कामना को ही सत्यमान रख्ख है, हमने कामना को ही सर्वच मान रख्ख और उस KaylaMyat
01:15Crisis is.
01:16झाल
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