00:00जिस मिट्टी ने विवेकानन्द और रामकृष्ण को सींचा, वही मिट्टी एक ऐसी पीड़ी को पोशन दे सकती है जो दयालू
00:08और उद्यमी दोनों हो, जड़ से जुड़ी और स्वतंत्र भी हो, कुलकाता साहित्य संगीत तर्क और एक दुरलभ मानविय सौम्यता
00:16से जीव
00:29पूंजी का पुनर वित्रण कर सकते हैं, लेकिन यदि मन संसकारित और सीमित रहता है, तो नई प्रणाली जल्द ही
00:36पुरानी जैसी दिखने लगती है, एक ऐसा समाज हमेशा नए खलनायकों, क्रांतियों और ढांचागत बदलावों की तलाश में रहता है,
00:44ऐसी हर तलाश �
00:45निराशा में खत्म होती है, क्योंकि तलाश करने वाले का अपना आंतरिक केंदर अनच्छुआ रह जाता है,
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