00:04नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ
00:09आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:13विद्या वाजस्थान गुलाब कुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेख
00:18जिसका शीरशक है निर्मात्री भी आज दिशा ही।
00:22स्रिष्टी गतिमान है, परिवर्दन शीद है, संतुष्टी मृत्यु है, स्रिष्टी का निर्मान और संचालन पुरुष प्रकरती के हाथ में है
00:31स्थूल और सूख्ष्म इस्तरों के मध्य, विज्यान, प्रयोग शाला की भाती, नित्य परिवर्दन होते हैं
00:38सूर्य से आगे सारे स्रिष्टी सूख्ष्म है, किन्तु वे ही आत्में उपर भी जीवन धारन करती हैं, जिन्हें पुन्हा मृत्यू
00:46लोग में नहीं लोटना होता
00:49आरंभु में सभी जीव उपर से नीचे ही स्थूल की और आते हैं
00:55लोटना कुछ कठिन भी है तुकि माया निश्यक करके रखती है कि उसका व्यापार चारों यूगों तक निर्बाद गती से
01:02चलता रहे
01:03वित्यू लोग में मनुश्य योनी, विशिष्ट ग्यानवान योनी है
01:07यहां माया को समझने वाले अनेक होते हैं, भले पाई जाने वाले कम हो
01:13अतह माया भी इस्त्री रूप में उसके साथ चलती है
01:17माया का प्रेम ऐसा होता है जिसमें सब जायज है, उसके लिए चंचलता छोटा शब्द है
01:23जन्म के साथ देव गुरु ब्रहस्पती और असुर गुरु शुक्राचारे की नीतियों से संपन्न होती है
01:30शरीर में परा अपरा प्रक्रती और माया सदाकारे रद रहते हैं
01:36पुरुष उसे इसी कारण नहीं समझ पाता क्योंकि वह अपनी बुद्धी के एहंकार का गुलाम होता है
01:42इस्ति उसे बाध लेना भी जानती है और स्वैम को मुक्त करा लेना भी
01:47माया का स्वधर्म है वह अन्य किसी धर्म की नहीं है
01:51इसी लिए माया में साहस भी है पुरुष से अधिक दिखाई भी देता है
01:56कोई उसके संकल्प को आहत करके तो देखे
01:59सीता देफी साहस करके ही सीमा रेखा पार की थी
02:03आज तो उस साहस ने इस्ति की परिभाशा ही बदल दी
02:07आज तो उस साहस करने लगी है
02:09जीवन अब तकरती की देन नहीं
02:11उसकी निजी संपत्ति बन चला है
02:13वह भी निजी धर्म के साथ जीना चाहती है
02:17स्रिष्टी इस्ति के असंतोष की कहानी है
02:20न वह पुरुष की शक्ति से संतुष्ट होने वाली है
02:23नहीं वह पुरुष को मोक्ष की और मोड देने वाली देह में अपरा है
02:28किशोरी के समझ किशोर को नचाने वाली होती है
02:32आप उस प्रतिक्रिया का अनुमान लगाईए
02:34जहां महले के 10-12 किशोर एक किशोरी को देखते हैं
02:38और वह भी उन सभी को एक-एक करके परति रहती है
02:43सबके साथ तो पिशले जन्मों का रिनानुबंध नहीं होता
02:47फिर भी एक जन्म में आज तो कई को जीवन के पाठ पढ़ा दीती है
02:52साहस्तो होता ही है
02:54आज तो उसका पौरुष भी बढ़ा चड़ा रहता है
02:57अपरा में इस्ट्री के पास दो बड़े हथिया रहते हैं
03:00दूद और आशू
03:02यहां प्रसिद है कि वह आज भी अनीती के सहारे नीती की लड़ाई लड़ लेती है
03:07उसका मान भंग करता है जो जो उसका बलात्तार करता है
03:12उसे वह सिखाती भी है
03:13लड़का सोलह वर्ष की उम्गुर्ण में बुरुष बनता है
03:18उसे चंदरमा की सोलह कलाओं का भोग करना होता है
03:22चंदरमा अत्री पुत्र है
03:23प्रित्वी के आर्थव से उसका स्परूफ बनता है
03:27और बना रहता है
03:29इस्त्री का आर्तव 12-13 वर्ष में प्रवाहमान हो जाता है
03:33उसकी उश्नता आहुती मांगने लगती है
03:36यह शुद्ध माया का क्षेत्र है जो अपरा में कारे करता है
03:40इस्त्री अपनी प्राक्रतिक भूमिका में दिखाई परती है
03:43आधुनिक विक्सित और शिक्षित देशों में इसका प्राक्रतिक स्वरूप प्रकर टूप में सामने आ रहा है
03:49शिक्षा ने विभा की उम्र बढ़ा कर इस मार्व को सहच कर दिया है
03:54निरोधक साधनों ने इस स्वरूप को और मुक्रित कर दिया है
03:58प्रप्रति में संबन्दों की व्यवस्था नहीं है
04:01लेविन भीस का एकुधारन में और प्रेम विभावी
04:04दोनों ही स्थितियों में इस्त्री ही स्वयम को कष्ट में डाल रही है
04:09माया के इस भाव को समझने की आवश्यक्ता है
04:13यह उसके पौरुष रूप की ही उपलब्धी है
04:16बिच्छो भी जल्दी ही हो जाता है
04:18परित्याग इस्त्री का होता है
04:20विक्रय इस्त्री का होता है
04:22भोग इस्त्री का होता है
04:23माया का यह कौन सा उद्देश्य है
04:26फिर भी पुरुष की भाग्य विधाता है
04:29Maya के इस रूप को किसी बड़े पशु अभ्यारन्य में बैठ कर समझा जा सकता है
04:35बड़े-बड़े हिंसक जानवर भी छोटे-छोटे पशुओं के साथ रहते हैं
04:39ब्रम्ध के विवर्द के लिए Maya भाव का स्वरूप इस्पष्ट हो जाएगा
04:44सब कुष्प्रति के नियमों से संचालित है
04:47हमारा वैवार भी वैसा ही होता है
04:49शरीर भिन्न है, नियम भिन्न नहीं है
04:52पशु पूर्ण सचंद रहकर भी मर्यादा नहीं दोरता
04:57हब मर्यादा की आड में सचंद जीना चाहते हैं
05:01इस्त्री की दिव्यता ने ही मानव योनी को उच्च कोटी में स्थापित किया है
05:06पुरुष्टो यहां भी अभ्यारन्य जैसा ही बनता जा रहा है
05:10माया का यही नियन है
05:11दूसरी और माया में श्रधा का रूप भी है
05:14सोम की जड़ श्रधा में है
05:17उसी में विश्व बंधुत्व बढ़ा हुआ है
05:20यही एक सुत्रता स्रिष्टी का सहित भाव है
05:23सोम बांध कर रखता है
05:24पहले पुरुष में सौमेता कम की
05:27पुरुष संतुष्टी नहीं कर सका उसको
05:29आकरामकता ही उसकी स्वच्चन्दिता बनी
05:32और स्रिष्टी की गती एक निश्य दिशा में आगे बढ़ी
05:35इस्त्री संतुष्टी का मार्ग भोजिती रही
05:38आज उसने करवट बद्ली
05:40और पुरुष मार्ग भोजने लगा
05:42इस्त्री शरीर उसे पौरुष का आईना दिखाने लगा
05:45प्रेम के स्थान पर समानता का तर्क खड़ा हो गया
05:49दोनों का एहनकार टक्रा पड़ा मिठास हो गया
05:52आज जीवन में अलग तरह की असंतुष्टी स्रिष्टी चक्र को चला रही है
05:57प्रम्ह की कामना एको हम बहुस्याम तो आज भी वैसी ही है
06:01लेकिन उर्वरा भूमी का अभाव होता जा रहा है
06:05कीट नाशक बढ़ते जा रहे है
06:06समानता और सशक्ती करण के नए वातावरण ने
06:10घर घर में युद्ध का वातावरण बना दिया है
06:13दोनों एक होने के स्थान पर दो बनकर ही घर में रहना चाहते हैं
06:18तब एक दूस्टे के लिए कहा रहे
06:20इस्थियों का स्थाई जीवन का सपना तूपता जा रहा है
06:23पश्चिम में छोटी-छोटी अभधी के लिए साथ रहते हैं
06:27और अलग हो जाते हैं
06:28पुरुष ने भी विक्सित देशों में मौन घोशना कर दी है
06:32कि वहां स्थाई रूप से किसी एक स्थिगे साथ नहीं रहेगा
06:37क्यानि परिवार का निर्मान नहीं होगा
06:39जो माया आज तक स्थिष्टी का संचालन करती रही
06:43उसका निर्मान, संसकार, पोर्शन का विभाग छोटा होता जा रहा है
06:47समाज तूट रहे हैं, करती अखेला, स्वच्छन्द जीने के लिए उतावला है
06:52दोनों गुद्धी से एक दूसरे को भोगना चाहते हैं
06:56पूरख बनने का एक दूसरे के लिए जीने का भाव लुप्त हो रहा है
07:00प्रशनी यह है, कि जब ऐसे मानों का निर्मान भी इस्त्री ही कर रही है
07:05तब इस इस्त्री को दिशा कौन दे
07:09एक कहावत है, मारे जीने माध्यो, मारे माध्यान कुण मारे
07:15नमस्कार
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