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यह वीडियो 14 जनवरी को खण्डगिरि, जैन मंदिर, भुवनेश्वर में, विषय "व्यवहार ही परमार्थ का द्वार है" पर हुई बातचीत से लिया गया है।

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Transcript
00:00मूर्तियों का सिंबोलिजम क्या हमें समझाना जाते हैं?
00:03मूर्ति को जो कुछ भी सगोण है उसके समकक्ष मागा
00:10मूर्तियां सब वेवार एक तल पर होती है क्योंकि उनके साथ रूप, रंग, नाम, अकार, कथाएं होती है
00:15उनका काम है आपको, आपकी कलपना, आपकी अपनी जो अभिरंजना है, उसकी बिलकुल सीमा तक ले जाना
00:26तो कई धार्मिक धाराएं हैं जिनमें मूर्ति पूजन नहीं होता, पर शब्द तो वहां भी है ना
00:36ये भागवार्दगीता है, उसमें शब्द है ना, तो शब्द मूर्ति है, ये जो कुछ भी फिजिकल ही नहीं, मेंटल भी
00:44हो, वो मूर्ति है
00:45तो एक अर्थ में ये कहा जाजकता है कि धर्म की शुरुआत तो मुर्ति पूजन से ही होगी
00:52क्योंकि आप अगर फिजिकल मुर्ति को नभी पूजो तो भी आप शब्द तो रखोगे न
01:14सत्थे सत्य का द्वार होना चाहिए, व्यवहार परमार्थ का द्वार होना चाहिए.
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