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  • 8 hours ago
तंत्र ही स्व और पर का निर्धारक

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00:04नमस्कार, मैं डॉक्टर श्वेता तिवारी आप सभी का अभिन्दन करती हूँ, आईए आज सुनते हैं विद्या वाचसपती डॉक्टर गुलाव खुठारी
00:12का इस पंदर में प्रकाशित आलेग जिसका शीषक है तंत्र ही स्वर और पर्का मिर्धारक, जिससे स्वरूप र
00:24जहानी हो वह पर कहलाता है, आत्मा को भी स्वर तभी कह सकते हैं जब वह किसी तंत्र मर्यादा में
00:31रहता है, तंत्र ही स्वर और पर्का निर्धारक है, इसमें अंतर इतना ही है कि आत्म भाव प्रबल है अत्वा
00:39मन का कामना भाव, आत्मा ना स्वर तंत्र है ना पर तंत्र
00:432. 2. 2. 1. 2. 2. 2. 3. 4. 4. 5. 5. 6. 6. 7. 7. 8.9.
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05:20अब तक पुरुष की अर्धांगी ने भी पूरुष को पूरुष के साथ आती थी।
05:45ग्रहस्त आश्रम का तंत्र था, इसी में सुरक्षा और सम्मान भी व्यवस्थित थे, ये सारा तंत्र प्रक्रति के तंत्र पर
05:52ही आधारित था, धर्म या जाती के कारण कोई भेद नहीं आया।
05:56सूर्य के बिना चंद्रमा की चांदनी कहां से प्राक्त होगी? किन्तु बिना चांदनी के चंद्रमा का पिंड तो रहेगा, किन्तु
06:04प्रकाश के अभाव में क्या भूतों का डेरा नहीं हो जाएगा?
06:08सूर्य चंद्रमा के युगल से ही संवत सर बनता है, सर्दी गर्मी बरसात होते हैं, क्या वर्षा की बिना खेती
06:15संभव है? वनस्पती औशिदी पैदा हो सकेंगे? तब प्रित्वी लोग के स्रिष्टी रहेगी या नहीं? इसका एक ही उत्तर है,
06:23सबको अपने अपने तंत
06:38दूसरे तत्र से बाहर नहीं को सकता, यही मृत्यू है, जीवन में अपूर्णता भी मृत्यू है, सुख पूर्वक जीने के
06:45लिए पहली आवशक्ता ही तंत्र है, अकेला पन नहीं है
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