00:00जब स्रिष्टी में संतुलन बिगडता है, जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब केवल शक्ती ही नहीं, बलकी
00:08मा का रूप धारण कर दिव्यता स्वयम प्रित्वी पर उतरती है.
00:12नवरात्री के पावन दिनों में, हर दिन मा दुर्गा के एक विशेश स्वरूप की आराधना की जाती है, और पांचवा
00:19दिन समर्पित है, मा सकंदमाता को, जो ममता, शक्ती और संरक्षन का अद्भुच संगम है.
00:26बहुत प्राचीन समय की बात है. एक असुर था, तारकासुर, जिसने कठोर तपस्या कर ब्रहमा जी से वर्दान प्राप्त किया
00:36कि उसका वद केवल भगवान शिव के पुत्रद्वारा ही संभव होगा.
00:39लेकिन उस समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे. संसार से विरक्त और विवाह से दूर. इस वर्दान के
00:49कारण तारकासुर अहंकारी हो गया. उसने तीनों लोकों में आतंग फैलाना शुरू कर दिया.
00:54देवता, रिशी और मानव सभी उसके अत्याचार से भैभीत हो गए. तब सभी देवताओं ने मिलकर आदिशक्ती से प्रार्थना की.
01:04और तभी एक दिव्य योजना बनी. माता पार्वती ने कठोर तपस्या आरंब की. वर्षो की साधना. अटूट समर्पन. और अंत
01:15तह �
01:15उनका तप सफल हुआ. भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया. यह केवल एक विवा नहीं
01:23था. बलकि स्रिष्टी के संतुलन को पुना स्थापित करने की शुरुआत थी. समय बीता और एक दिव्य बालक का जन्म
01:32हुआ. भगवान का
01:45यह रूप हमें सिखाता है कि जब शक्ती ममता में बदलती है तो वह केवल स्रिजन ही नहीं करती. बलकि
01:53संसार की रक्षा का संकल्प भी बन जाती है. जैसे जैसे कार्तिके बड़े हुए, उनका तेज और पराक्रम अद्भुत होता
02:02गया. देवताओं ने उन्हें अपनी से
02:04का सेनापती बनाया. और फिर वह क्षन आया. जब धर्म और अधर्म के बीच निरनायक युद्ध हुआ. कार्तिके ने युद्ध
02:13भुमी में तारकासुर का सामना किया. और अंत ता उसका वद कर तीनों लोकों को भैसे मुक्त किया. यह केवल
02:21एक असुर का अंत नहीं था. �
02:23बलकि एंकार पर धर्म की विजय थी. और इस विजय के पीछे जो सबसे बड़ी शक्ती थी. वह थी मास
02:31कंदमाता. मास कंदमाता का स्वरूप अपने आप में एक गहरा संदेश है. गोद में बाल कार्तिके, मम्ता और संरक्षन का
02:40प्रतीक. कमल का आसन, शुद्धता और वै
02:53प्रात्री के पांचवे दिन. उनकी पूजा और साधना का विशेश महत्व है. इस दिन भक्तजन प्राताकाल ब्राम महूर्त में उठकर,
03:02स्नान कर अपने शरीर और मन को पवित्र करते हैं. स्वच और हलके या स्लेटी रंग के वस्त्र धारन करते
03:09हैं. पूजा स्थान को ग
03:23हात जोड़कर शांत मन से मा का ध्यान किया जाता है. हे मा सकंद माता, आप जो अपने भक्तों को
03:30भैसे मुक्त करती हैं. उन्हें सुक, शांती और संरक्षन प्रदान करती हैं. हम आपको नमन करते हैं. मा को कमल
03:39पुश्प अर्पित किया जाता है. साथ ही फल, मिठाई और व
03:53ओम देवी सकंद माताय नमा, इस मंत्र का 11, 21 या 108 बार जाप करना अत्यंत फल्दाई माना जाता है।
04:02जाप के दौरान मन को पूर्ण रूप से एकाग्र और शांत रखना चाहिए। जाप के पश्चात, मा से अपने जीवन
04:11में सुख, शांती, संतान सुख और सुरक्षा के ल
04:23अत्यंत आवशक है। भक्तजन सात्विक भोजन ग्रहन करते हैं, लहसुन और प्यास का त्याग करते हैं और अपने विचार, वानी
04:32और कर्म को शुद्ध रखने का प्रयास करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस दिन सच्चे मन
04:39से मास कंदमाता की आराधना करता है�
04:42उसे संतान सुक, मानसिक शांती और जीवन में स्थिरता का आशीरवाद प्राप्त होता है। नवरात्री का पांचवा दिन साधक के
04:51भीतर विशुद चक्र को जागरित करता है। जिससे मन निर्मल होता है। विचार सकारात्मक होते हैं। और आत्मा में दिव्य
04:59शांती का �
05:15।
05:31यही सची शक्ती है, तो जब भी जीवन में डर लगे, जब भी लगे कि परिस्थितियां आपके विरुद्ध हैं, तब
05:39मा सकंद माता को स्मरण कीजिए, क्योंकि जहां मा का आशीरवाद होता है, वहां भैटिक नहीं सकता, और जहां ममता
05:48होती है, वहां स्वयन शक्ती जन्म �
05:51देती है, यहां वीडियो चिंतन धारा चैनल द्वारा प्रस्तुत की गई है, जहां हम केवल कथाए नहीं, बलकि उनके पीछे
06:00छुपे गहरे आध्यात्मिक सत्य और ज्ञान को आपके सामने लाते हैं,
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