00:03करनाटा का चिन्ना पटना शहर टॉप टाउन के नाम से मशूर है जहां कभी वीकेंड और दशेहरा उत्सव के समय
00:10कारिगरों के पास कस्टुमस की भारी भीड देखी जाती थी लेकिन अब वो नई मुश्किलों का सामना कर रही है
00:16और उनकी मुश्किलों की वच्छा है बें�
00:29से कम सोग रहकाते हर वीकेंड हमारे घरों में तो हार जैसा होता था खिलोनों की दुकानों तक पहुचने के
00:35लिए यात्रियों को कई किलोमेटर दूर जाकर फिर से वापिस आना पड़ता है
00:41बेंगरूरू मैसूर एक्सप्रेसवे ने एक तरफ जहां लोगों के सफर को आसान बना दिया है वहीं चिन्नापटना के कारिगरों और
00:48खिलोना इंडस्ट्री के लिए अभिशाप बन गया है
00:51एक्सप्रेसवे बनने से पहले सभी गालियां चिन्नापटना शहर से गुजरती थी लोग यहां रुक कर खिलोने खरीदे थे लेकिन एक्सप्रेसवे
00:59की वजह से रूट टाइवर्ट हो गया है और यात्रियों का यहां आना बंद हो चुका है जिससे यहां की
01:06दुकानों में
01:06बिक्री काफी कम हो चुकी है इस एक्सप्रेसवे के बनने के बाद हमारा बिजने साट से सतर प्रतिशत तक गिर
01:19गया है और कुछ दुकाने बंद भी हो गई है हमारी परिशानी बढ़ गई है
01:27कस्टमर्स की नहीं आने से यहां की कारिगरों को नया बाजार ढूनना पड़ रहा है पिछले एक साल से वो
01:34नई कस्टमर्स बनाने के लिए अपने खिलोने बंगलूरू, चैन्नेई और दूसरे शहरों में भेज रहे हैं लेकिन वहां चीनी खिलोनों
01:42की वज़ह से उन्हें
01:54में हमें लग भग 15 दिन लगते हैं, चीनी फेक्टरिया कुछ ही मिन्टों में 1000 पीस तक बना सकती हैं,
02:00मशीनों की वज़ह से उनके दाम कम हैं, हमारे खिलोने हाथ से बनाये और पॉलिश के जाते हैं, उस फिनिशिंग
02:09को मशीनरी से दोहराया नहीं जा सकता
02:13चिनना पटना में खिलोने बनाने की परंपरा सदियों पुरानी हैं, माना जाता है कि फार्सी कलाकरतियों से प्रेरित होकर टीपू
02:20सुल्तान ने फार्सी कलाकारों को बुला कर स्थानियन लोगों को ट्रेनिंग दिलवाई, तब से यहां हाथों से खिलोने बनाये जाते
02:27है
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02:30or eco-friendly paint.
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