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  • 2 weeks ago
कर्नाटक का चेन्नापटना शहर टॉय टाउन के नाम से मशहूर है, जहां कभी वीकेंड और दशहरा उत्सव के समय कारीगरों के पास कस्टमर्स की भारी भीड़ देखी जाती थी, लेकिन अब वो नई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं और उनकी मुश्किलों की वजह है बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे.वीकेंड और दशहरा त्योहार के दौरान, हर दुकान पर एक दिन में कम से कम 100 ग्राहक आते थे. हर वीकेंड हमारे घरों में त्योहार जैसा होता था. लेकिन अब हम मुश्किल से एक महीने में 100 ग्राहक देख पाते हैं. खिलौनों की दुकानों तक पहुंचने के लिए, यात्रियों को कई किलोमीटर दूर जाकर फिर से वापस आना पड़ता है.  कस्टमर्स के नहीं आने से यहां के कारीगरों को नया बाजार ढूंढना पड़ रहा है. पिछले एक साल से वे नए कस्टमर्स बनाने के लिए अपने खिलौने बेंगलुरु, चेन्नई और दूसरे शहरों में भेज रहे हैं.. लेकिन वहां चीनी खिलौनौं की वजह से उन्हें टफ कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ रहा है.  चन्नापटना में खिलौने बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है. माना जाता है कि फारसी कलाकृतियों से प्रेरित होकर टीपू सुल्तान ने फारसी कारीगरों के बुलाया और स्थानीय लोगों को ट्रेनिंग दिलवाई.. तब से यहां हाथों से खिलौने बनाए जाते हैं. खिलौनों को रंगने के लिए वेजिटेबल डाई और इकोफ्रेंडली पेंट का इस्तेमाल किया जाता है. इन खिलौनों को 2005 में GI टैग मिला था.. लेकिन नए संकट की वजह से इसकी पहचान पर खतरा पैदा हो गया है और कारीगरों के लिए रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.  

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00:03करनाटा का चिन्ना पटना शहर टॉप टाउन के नाम से मशूर है जहां कभी वीकेंड और दशेहरा उत्सव के समय
00:10कारिगरों के पास कस्टुमस की भारी भीड देखी जाती थी लेकिन अब वो नई मुश्किलों का सामना कर रही है
00:16और उनकी मुश्किलों की वच्छा है बें�
00:29से कम सोग रहकाते हर वीकेंड हमारे घरों में तो हार जैसा होता था खिलोनों की दुकानों तक पहुचने के
00:35लिए यात्रियों को कई किलोमेटर दूर जाकर फिर से वापिस आना पड़ता है
00:41बेंगरूरू मैसूर एक्सप्रेसवे ने एक तरफ जहां लोगों के सफर को आसान बना दिया है वहीं चिन्नापटना के कारिगरों और
00:48खिलोना इंडस्ट्री के लिए अभिशाप बन गया है
00:51एक्सप्रेसवे बनने से पहले सभी गालियां चिन्नापटना शहर से गुजरती थी लोग यहां रुक कर खिलोने खरीदे थे लेकिन एक्सप्रेसवे
00:59की वजह से रूट टाइवर्ट हो गया है और यात्रियों का यहां आना बंद हो चुका है जिससे यहां की
01:06दुकानों में
01:06बिक्री काफी कम हो चुकी है इस एक्सप्रेसवे के बनने के बाद हमारा बिजने साट से सतर प्रतिशत तक गिर
01:19गया है और कुछ दुकाने बंद भी हो गई है हमारी परिशानी बढ़ गई है
01:27कस्टमर्स की नहीं आने से यहां की कारिगरों को नया बाजार ढूनना पड़ रहा है पिछले एक साल से वो
01:34नई कस्टमर्स बनाने के लिए अपने खिलोने बंगलूरू, चैन्नेई और दूसरे शहरों में भेज रहे हैं लेकिन वहां चीनी खिलोनों
01:42की वज़ह से उन्हें
01:54में हमें लग भग 15 दिन लगते हैं, चीनी फेक्टरिया कुछ ही मिन्टों में 1000 पीस तक बना सकती हैं,
02:00मशीनों की वज़ह से उनके दाम कम हैं, हमारे खिलोने हाथ से बनाये और पॉलिश के जाते हैं, उस फिनिशिंग
02:09को मशीनरी से दोहराया नहीं जा सकता
02:13चिनना पटना में खिलोने बनाने की परंपरा सदियों पुरानी हैं, माना जाता है कि फार्सी कलाकरतियों से प्रेरित होकर टीपू
02:20सुल्तान ने फार्सी कलाकारों को बुला कर स्थानियन लोगों को ट्रेनिंग दिलवाई, तब से यहां हाथों से खिलोने बनाये जाते
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02:28they have used a vegetable dye
02:30or eco-friendly paint.
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