00:00भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि उनके द्वारा दिया गया यह ज्ञान न केवल आज का है बलकि यह शाश्वत है
00:20यह ज्ञान पीधियों से चल रहा है पर समय के साथ खो गया अब वे इसे फिर से अर्जुन को प्रदान कर रहे हैं
00:29इसका अर्थ है भगवान कहते हैं कि उन्होंने इस अविनाशी योग का ज्ञान सूर्य देवता विवस्वान को दिया जिन्होंने इसे मनु को सिखाया और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया
00:53यह ज्ञान शाश्वत है जो मानवता को सच्चे मार पर ले जाता है
00:59अर्जुन को अपने कर्तवियों को समझाने के लिए भगवान कृष्ण अपने दिव्य अवतारों का रहे से प्रकट करते हैं
01:07वे बताते हैं कि जब-जब अधर्म बढ़ता है और धर्म का नाश होता है तब वे प्रित्वी पर अवतरित होते हैं
01:16श्लोक एक यदा यदा ही धर्मस्यत लानिर भवती भारत अभ्युत्थान मधर्मस्यत अदात मानम स्रिजा में हैं
01:26इसका अर्थ है जब-जब धर्म का पतन और अधर्म का उध्थान होता है तब-तब मैं अवतार लेता हूँ
01:34श्लोक दो परित्रानाय साधूना विनाशाय चदुश्कृता धर्मसन स्थापनार्थाय संभवामी युगे-युगे इसका अर्थ है
01:46साधुजनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवत्रित होता हूँ
01:54यह श्लोक हमें प्रेयना देता है कि जब भी हम कठिनाईयों का सामना करते हैं, भगवान का संरक्षन हमेशा हमारे साथ है
02:03श्रीकृष्न अर्जुन को समझाते हैं कि सच्चा ज्यान जीवन का सबसे बड़ा शुद्धिकारक है
02:10यह ज्यान हमें अज्यानता से मुक्त करता है और आत्मा को शुद्ध करता है
02:20इस संसार में ज्यान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं है
02:33योग के माध्यम से इस ज्यान को समय के साथ स्वया आत्मा में पाया जासकता है
02:40यहां हमें सिखाता है कि ज्ञान केवल जानकारी नहीं है बलकि यहां आत्मा को शुद्ध करने का माध्यम है
02:48श्रीकृष्ण बताते हैं कि हर त्याग चाहे वह धन, तपस्या, योग या ज्यान का हो यदि वह नहस्वार्थ भाव से किया जाए तो वह आत्मा को उचाए पर ले जाता है
03:01श्लोक
03:02द्रव्यय ज्यास्त पोयग्या योग्य ज्यास्त थाप्रे
03:06स्वाध्याय ज्यान्य ज्याष्ट यतयह संशितवर्ता है
03:11इसका अर्थ है
03:13कुछ लोग धन का त्याग करते हैं, कुछ तपस्या और योग का
03:18कुछ लोग पवित्र शास्त्रों का अध्ययन और ज्यान के यग्यमें लगते हैं
03:25यह सभी त्याग एक ही उद्देश्य की ओर ले जाते हैं
03:29यह हमें सिखाता है कि हर त्याग यदि नहस्वार्थ है
03:34तो वह हमें इश्वर के करीब ले जाता है
03:36अध्याय के अंत में श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं
03:41कि ज्ञान के माध्यम से ही सभी संदे और अज्ञान का अंत होता है।
03:47जो व्यक्ति आत्मा को समझ लेता है, वह कर्मों के बंधन से मुख्थ हो जाता है।
03:53शलोक एक तद्विध्धी प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेव्या।
03:59उपदेख श्यंती ते ज्ञान ज्ञानिनस्तर्थ्वदर्शिना।
04:03इसका अर्थ है।
04:05सत्य को जानने के लिए ज्ञानी गुरुओं के पास जाओ, उनसे आदर पूर्वक प्रश्न करो और उनकी सेवा करो।
04:13वे तुम्हें सत्य का ज्ञान देंगे।
04:17शलोक दो
04:19योग सन्यस्त कर्मान ज्ञान संचिन नसंशयम।
04:22आत्मवंत न कर्माने निबधननती धनन जय।
04:26इसका अर्थ है।
04:28जो अपने कर्मों को योग में समर्पित कर देता है और जिसके संदेह ज्ञान द्वारा नश्ट हो जाते हैं, उसे कर्म बंधन नहीं बांध सकते।
04:38यहां हमें प्रेरित करता है कि ज्ञान ही मुक्ती का सबसे बड़ा साधन है।
04:43ज्ञान योग का यह अध्याय हमें सिखाता है कि ज्ञान केवल जानकारी नहीं है, यह आत्मा को मुक्त करने का माध्यम है।
04:53जब कर्म ज्ञान के साथ किया जाता है, तो वह मोक्ष का मार्ग बन जाता है।
04:59श्री कृष्ण हमें प्रेणा देते हैं कि हम अपने जीवन के हर कार्य को ज्ञान और नहस्वार्थता के साथ करें।
05:08यदि यह विडियो आपको प्रेणा देता है, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ साजा करें।
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