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  • 1 year ago
self made movies
Transcript
00:00हिंदी हॉरर स्टोरी पिंजरा
00:01सूरज की आखरी किरने जब खेतों के पार डूबने लगती तो गाउं कनहयापुर में एक अजीब सी खामोशी छा जाती
00:08ये गाउं सुन्दर था पर सालों से एक रहस्य में जकडा हुआ
00:13कहते थे शाम धलने के बाद वहां की हवा भी बाते करने लगती है
00:17शहर की भागदोर से परेशान विवेक शर्मा अपनी पतनी संध्या और दो बच्चों आरव दस और त्रिशा छे के साथ गाउं लोटे थे
00:26ये उनका पुष्टैनी गाउं था जहां उनका बच्चपन बीता था
00:30उन्होंने अपने दादा जी की पुरानी हवेली में रहने का फैसला किया
00:34जो गाउं के कोने में बांसों और नीम के पेड़ों के बीच एक सुनसान जगा पर थी
00:39हवेली बहुत बड़ी थी लकडी की खिडकियां पुरानी दिवारें और एक टूटा हुआ जूमर
00:45हवेली के बीचों बीच एक बड़ा पिंजरा रखा था लोहे का जंग लगा हुआ और बंद
00:52पहली ही रात आरव की चीख सुनकर संध्या भागी
00:56आरव का कहना था मा उस पिंजरे में कोई बैठा था बड़ी बड़ी लाल आँखें और उसके हाथ बहुत लंबे थे
01:04संध्या ने हसते हुए कहा बेटा ये पुरानी हवेली है कोई सपना देखा होगा
01:10लेकिन रात को संध्या ने भी कुछ महसूस किया जैसे कोई खिड़की के पास सांस ले रहा हो
01:16जब उसने परदा हटाया वहां कोई नहीं था बस धुंद और एक हलकी सी औरत की हसी
01:23अगले दिन विवेग गाउं के बुजुर्ग हरिदास बाबा से मिलने गया
01:26बाबा की आँखों में डर था वो हवेली छोड़ दो बेटा उस पिंजरे को मत छेड़ना वहां चाया बंध है
01:33चालिस साल पहले गाउं की एक लड़की थी चमपा बहुत सुन्दर पर सब उसे डरते थे
01:40कहते हैं वो तंत्र करती थी एक दिन गाउं की कई औरते गायब हो गई और जब लोग चमपा के घर पहुँचे वो पिंजरे में बैठी मुस्कुरा रही थी
01:50आखों में खून, होठों पर हसी, गाउं वालों ने तांत्रिक बुलाया और चमपा को उसी पिंजरे में कैद कर दिया
01:58लेकिन उसकी आत्मा आज भी वही है, पिंजरे में बंद
02:02दिन बदिन हवेली का माहौल डरावना होता जा रहा था
02:05दिवारों से खून जैसा पानी टपकता, तरिशा अपनी नीद में बोलती
02:10दीदी कहती है मुझे पिंजरे से बाहर निकालो, लेकिन उसके पास कोई दीदी थी ही नहीं
02:17विवेक ने सीसी टीवी लगवाया, रात दो बच तेरा मीनट पर कैमरे में साफ दिखा
02:22एक औरत हवेली में घूम रही थी, बिना जमीन पर कदम रखे
02:27और वो सीधा पिंजरे के पास जाकर रुकती थी, और कहती थी मुझे आजाद करो
02:32हरिदास बाबा की मदद से विवेक ने वही पुराना तांतरिक ढूंडा
02:36भैरवनात जो अब बूरहा हो गया था
02:39उसने हवेली में आते ही कहा, इस बार ये सिर्फ हवेली नहीं, पूरा परिवार इसकी गिरफ्त में है
02:45रात को उन्होंने पूजा शुरू की, तरिशा के शरीर में कापने लगी, उसकी आवाज बदल गई
02:51तुमने मुझे कैद किया, अब मैं इनकी बेटी में हूँ, पिंजरा खुला तो तुम्हारा सर्वनाश होगा
02:58भैरवनाथ ने मंतरों से तृशा को बिहोश किया, और बताया, चम्पा की आत्मा अब पिंजरे में नहीं, वो हवेली में घूम रही है, और उसने तृशा को चुनाया
03:08अगली रात हवेली के चारों तरफ ट्रीशूल और हवनकुंड बनाए गए, पूरा गाउं एकठा हुआ, चम्पा की आत्मा ने भायंकर रूप धारन किया, उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, आखे आग जैसी थी और वो तृशा को ले जाने आई थी, भैरवनाथ ने आ
03:38जब ढुआ साफ हुआ, पिंजरा पूरी तरह राख बन चुका था, लेकिन तीन महीने बाद विवेक का परिवार शहर लोट कया, सब सामान ने लग रहा था, लेकिन एक दिन आरव की ड्रॉइंग कॉपी में तृशा ने एक तस्वीर बनाई, एक लड़की लाल आखें और
04:08शर्मा का परिवार एक रहसे मई पिंजरे और उसमें बंद आत्मा चंपा के संपर्क में आता है, एक तांत्रिक भैरवनात की मदद से चंपा की आत्मा को जला कर मुक्ती देने की कोशिश होती है, लेकिन अंत में तृशा की ड्रॉइंग में चंपा की वापसी का संकेत मिल
04:38में खड़ी होकर एक ही बात कह रही थी, मेरा पिंजरा तूट केया है, अब मैं ओर सकती हूँ, संध्या ने डरते हुए तांत्रिक भैरवनात को फोन किया, लेकिन उधर से जवाब आया, भैरवनात अब इस दुनिया में नहीं है, उनकी मौत तीन दिन पहले हो चुकी है, �
05:08वापस चाहिए, वो समझ गया, चमपा की आत्मा मुक्त नहीं हुई, बलकि अब उसने त्रिशा को पूरी तरह से अपना माध्यम बना लिया है, विवेक अब जान चुका था, कि ये आत्मा कहीं भी जा सकती है, हवेली हो या शहर, उसे इसे वहीं खत्म करना होगा जहां से
05:38पिंजरे की राक अब भी गर्म और हवेली के बीचों बीच दीवार पर लिखा था, मैं अभी भी बंद हूँ, पर अब शरीर में, पिंजरे में नहीं। गाउं की एक पिचानवे साल की महिला लक्षमी काकी ने एक चौका देने वाली बात बताई, चमपा बुरी नहीं थी
06:08कैद कर दिया गया, तंत्र के नाम पर उसे पिशाचनी बना दिया गया, विवेक समझ गया, चमपा बदला ले रही थी और भैरवनात की मौत उसी बदले का हिस्सा थी। अब त्रिशा की आत्मा और चमपा की आत्मा एक हो चुकी हैं, अगर चमपा को इंसाफ नहीं मिला, �
06:38और वो हवा में उपर उठ गई। चमपा की आत्मा ने बोला, मैं निर्दोश थी, मैंने किसी का खून नहीं किया, फिर भी मुझे कैद किया गया, अब मुझे इंसाफ दो, नहीं तो मैं हर जन्म में लोटूंगी।
07:08गाउं के मंदिर में दीब जलाया गया, माफी मांगी गई। त्रिशा धीरे धीरे होश में आई, हवेली शान्त हो गई, सब कुछ ठीक हो गया लग रहा था, विवेक का परिवार वापस शहर लोटा, एक रात आरव की चीख फिर गुझी, मा, पिंजरा वापस आ गया, और
07:38चिख्थी, इनसाफ मिला, पर मेरी आत्मा अब तुम्हारे साथ है, देखती रहूंगी, अगले दिन त्रिशा ने अपने कमरे की दीवार पर कुछ लिखा था, अब मैं कभी अकेली नहीं हूँ, चम्पा दीदी मेरे साथ हैं,
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