00:00खूब सूरत 25 साल की इंडियन जासूस जब पाकिस्तानी अफसरों के हथे चड़ी तो सब हैरान रह गए लेकिन फिर जो हुआ वो सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे
00:09पाकिस्तानी अफसरों ने पहले तो उसका ऐसा काम किया कि उसकी छीकें तक निकल गई वो कापती रही मगर कोई रहम ना हुआ
00:17फिर एक अफसर ने आगे बढ़कर कहा इसे एक महीने के लिए मुझे सौप दो मैं इससे सब कुछ निकलवा कर दूँगा हर वो राज जो मुलक के काम आएंगे और फिर क्या वो अफसर एक महीने तक हुस ओरत के साथ ऐसे ऐसे हालातों से गुजरा कि जासूस ओरत बार बा
00:47हर पहलू से उसकी जाँच पड़ताल की गई हर तरीके से उसके जिस्म और जुबान से सच निकलवाया गया और हाँ उसका पूरा पूरा मज़ा भी लिया गया बिना कोई कसर छोड़े ये कहानी जब आप सुनोगे तो आप भी हैरान रह जाओगे सोच में पढ़ जाओगे
01:17कि पुराने हिस्से में एक सादा सा दो मंजला मकान खड़ा था जो बाहर से उतना ही चुप था जितना अंदर से अकेला यह मकान था एस पी हारीस मलिक का वर्दी में बहुत सख्त लेकिन दिल से बेहत खामोश और तनहा पीवी का इंतकाल हुए कई साल बीच चुके थे को�
01:47कमरे में बैठा हुआ था हाथ में चाय का कप सामने अखबार और टीवी पर चलती पुरानी खबरें सब कुछ रोज की तरह था जब दर्वाजे पर दस्तक हुई शमशाद उठकर गया और कुछ ही देर में वापिस आया साहब बाहर एक लड़की खड़ी है कहती है काम की त
02:17चेहरे पर तकलीफ भी थी और उमीद भी नाम क्या है माहक उसने धीमे लहजे में कहा पहले कहा काम किया है कई घरों में किया लेकिन हालात ने मजबूर किया अब नई जगह की तलाश है हारीस ने कुछ लमों तक सोचा फिर धीमे से जवाब दिया ठीक है एक हफ़ते काम कर
02:47पानी का आगास थी जिसमें राज भी थे धौका भी और एक नर्मी भरा दर्द भी जो वक्त के साथ कहरा होता गया माहक अब हारीस मलिक के घर में रोज आने लगी थी सुबह जल्दी आती चुपचाब जाडू पोंचा करती रसोई में कुछ पकाती और फिर शाम ढ़लते �
03:17वो सोचता आजकल के दौर में कहां मिलती है ऐसी अदब और ऐसी समझ कभी कभी उसकी निगाहें माहक पर ठहर जाती जैसे कोई किताब हो जिसे पढ़ा नहीं गया मगर उसके पन्नों की खुश्बू दिल तक उतरती हो एक दिन शाम के वक्त हारीस बरामदे में बैठा अख
03:47पढ़ी लिखी लगती हो कभी स्कूल कॉलेज गई थी माहक मुसकराई हलकी सी जैसे किसी पुराने जखम को सहलाया हो थोड़ा बहुत लेकिन जिन्दगी ही अब सबसे बड़ी तालीम बन गई है हारीस ने आगे कुछ नहीं पूछा मगर अंदर से कुछ हिलसा गया उसने म
04:17शमशाद ने भी एक दिन मजाक में कह दिया सहब ये लड़की कुछ ज्यादा ही असर छोड़ रही है आप पर हारीस ने सिर्फ मुसकरा कर टाल दिया मगर वो खुद जानता था दिल धीरे धीरे किसी अंजानी राह पर निकल पड़ा है इधर माहक भी अब घर के कोने कोने स
04:47चुपचाप छोटे-छोटे कैमरे लगाना, कंप्यूटर के पास माइक्रो डिवाइस रखना, सब कुछ इतने सलीके से कि कि किसी को एहसास तक न हो मगर जिस लंभे जजबात और मकसद के दर्मियान फासला मिटने लगे, वहीं से खेल भी बदलने लगा वो दिन जैसे किस
05:17शाम दोनों बरामदे में बैठे थे, आसमान पर शाम का धुंदल का उतर चुका था, माहक आसमान की तरफ देखती हुई बोली, सर कभी कभी सोचती हूँ, ये जो तारे है ना इन्हें छूपाऊं, मगर तकदीर में सिर्फ धुंद और अंधेरा है, हरीस ने कोई जवाब �
05:47नहीं रखता था, जिसके लिए वो सरहद पार आई थी, वो जानती थी कि उसका हर कदम रिकार्ड हो सकता है, हर हरकत मश्कूक बन सकती है, मगर फिर भी वो सुकून ढूंड रही थी, उस घर की दीवारों में, उस आदमी की खामोशी में, जब भरतिये जासूस पाकिस्तान
06:17सोचते हैं कि अब कुछ करना होगा, एक नया मिशन तयार किया जाता है, और यह तय होता है कि कुछ और जासूस पाकिस्तान भेजे जाएं, ताकि वो वहाँ जाकर पता लगा सकें कि आखिर हमारी जासूस की तरफ से कोई सूचना क्यों नहीं, आ रही, इधर हारीस को भी क�
06:47रखा अपना एक पुराना कैमरा चेक किया, जिस पर उसने कभी ध्यान नहीं दिया था, कई दिनों की रिकॉर्डिंग में एक लमहा ऐसा था, जिसमें माहक रात के वकत एक अजनबी से बात कर रही थी, तीरे बोल रही थी, मगर अलफाज वही थे, जो हारीस को समझने के ल
07:17करती और बिना कोई सवाल किये वापस चली जाती, मगर अब हारीस के दिल में एक हल चल थी, वो उसके आने से पहले दरवाजे की तरफ देखने लगा था, कभी वो उसे चोरी छुपे देखता और कभी सोचता, ये औरत कौन है, क्यों हर लफज में कोई राज सा छुपा होत
07:47माहक ने कुछ देर सोचा, फिर धीमे से बोली, कभी कभी खामोशी में भी बहुत कुछ कहा जाता है सर, हारीस कुछ नहीं बोला, मगर उसकी आँखें माहक के चहरे परटिकी रही, उधर दूसरी तरफ एक और हलचल शुरू हो चुकी थी, मगर पाकिस्तान में नहीं, भार
08:17ये लड़की कहीं अपने मकसद से भटक तो नहीं रही, दूसरे ने जवाब दिया, अगर उसने डेटा भेजना बंद किया है, तो हमें गुलिस्तान ट्वाइटीस एक्टिवेट करना होगा, एनप्रिशन, गुलिस्तान 22, एक खुफिया सैन ये योजना, जिसका मकसद था
08:47में बात कर रही है, आलफाई साफ नहीं थे, मगर जो था, वो काफी था, अब अगर ये सच है, हारिस ने खुद से कहा, तो ये महबत नहीं, धोखा है, और वहीं से उसके दिल में सवाल और साजिश की लड़ाई शुरू हो चुकी थी, हारिस की रातें अब बदल चुकी थ
09:17अब उसी की हर आहट में वो किसी छुपे इरादे को ढूंडता, वो रसोई में जाते हुए उसकी नजरें पकड़ता, स्टडी रूम से निकलते, फक्त उसके कदमों की आवाज सुनता, हर जर्रा जैसे बोल रहा था, कुछ तो छुपा है, एक शाम, हारिस ने अपने पुर
09:47अब कोई शक नहीं बचा था, वो जिस औरत को हर रोज देखता था, जिसकी मुसकान पर एक दिन दिल कांप गया था, वो एक जासूस थी, लेकिन महबत के बदले गद्दारी, ये चख्म न सबूत से भड़ता है, न कानून से, उधर भारत की खुफिया एजेंसी ने गुल
10:17ये हमला न सिर्फ एक सैने रणनीती थी, बलकि माहक की नाकामी पर परदा डालने की कोशिश भी, हारीस, कोई शक हो गया कि कुछ बड़ा होने वाला है, उसने तुरंत अपने सीनियर अफसरों को अलर्ट किया, मुझे यकीन, हैं, कोई आन परेशन चलाया जा रहा है, हमें
10:47प्याज अली के घर पर हमला हो चुका था, मगर पाकिस्तान की पुलिस और सेना पहले से तयार थी, हारीस ने खुद मोर्चा संभाला, एक एक करके तमाम हमलावर धेर कर दिये गए, मगर एक दहश्तगर्द के सामान से जो कागजात बरामद हुए, वो हारीस के कदम रोक द
11:17हारीस ने अगले ही दिन माहक को घर से बाहर बुलाया, सड़क पर खामोश खड़ा वो शखस अब वो हारीस नहीं था, जो बरसों से अकेला था, बलकि एक अफसर अपने फर्ज और दर्द के दर्मियान खड़ा हुआ, तुम जा सकती हो, पाकिस्तान तुम्हें छोड़ रह
11:47जैसे उसकी पहचान भी अब इसी मिट्टी, में दब गई हो, सड़क के किनारे खड़ी माहक कुछ पल तक हारीस को देखती रही, उसके लब खामोश थे, मगर आखें जैसे पूछ रही, थी, क्या तुम मुझे माफ कर पाओगे? हारीस ने उसकी तरफ देखा, चंद लमों
12:17से, माहक ने सिर जुका लिया, उसकी आँखों से आंसू की एक बूंद गिरी, और वो कदम पीछे हटाते हुए उस गली से निकल गई, जहां एक औरत ने जुर्म के परदे में महबत को छपा दिया था, चाह महीने बीट गए, एक रोज, हारीस को डाक में एक चठी मिली, त
12:47मिशावर में एक छोटा स्कूल चला रही हूँ, जहां लड़कियाँ पढ़ती हैं और नफरत से दूर रहती हैं, शायद यही मेरा प्रायश्चित हैं तुम्हारी नहीं रही, मगर अब किसी और की गुलाम भी नहीं, माहक निसा, हरीस देर तक उस चिठी को देखता रहा, �
13:17जासूसी की थी, अब चार साल की सजा काटने के बाद अच्छे व्यवहार और मानवता के आधार पर रहा की जा रही थी, मगर संयुक्त राष्ट्र और अंतर राष्ट्रिय मानवाधिकार, संस्थाओं के दबाव में उसके रहाई का दिन आ गया, उस दिन जेल के बाहर को�
13:47मगर लफ्ज गले में अटक गए, हारीस ने बस इतना कहा, चलो, तुम्हें घर छोड़ देता हूँ.
13:55काड़ी चुप थी, जैसे उनके दर्मियान की तमाम बातें उसी चुप़ी में दब चुकी थी.
14:01लाहौर से वागा बॉर्डर तक का सफर लंबा था, हर मील के साथ उनकी सांसें पास आती, और फासले भी बनते.
14:10रास्ते में माहक ने धीरे से कहा, मुझे लगा था, तुम मुझे देखने नहीं आओगे.
14:14हारीस ने कुछ देर खामोशी बरकरार रखी, फिर धीमे से बोला, मैंने तुम्हें सजा दी थी, अब शायद मोक्ष देना मेरा फर्ज है.
14:25माहक की आँखें भीग गई, मगर उसने उन्हें बहने नहीं दिया, सरहद अब नस्दीक थी.
14:31वागा बॉर्डर अब सिर्फ कुछ कदम दूर था, सरहद की वो बाड़ जो मुलकों को जुदा करती है.
14:38आज दिलों के दर्मियान भी एक आखिरी फसला बनकर खड़ी थी.
14:42काड़ी से उतरते हुए माहक ने एक बार फिर हारीस की तरफ देखा.
14:46क्या, तुम मुझे माफ कर पाओगे?
14:49हारीस ने कुछ देर उसकी आखों में देखा,
14:51जैसे वकत की सारी परतें पलट रहा.
14:54हो, मेरी वर्दी ने तुम्हें गुनहगार माना,
14:57मगर मेरा दिल आज भी तुम्हें सिर्फ इनसान समझता है.
15:00आज तुम्हें हर उस रिष्टे से रिहा करता हूँ,
15:03जिसमें मुहब्बत थी मगर सच्चाई नहीं थी.
15:06माहक ने सर जुका लिया.
15:08उसकी आखों से एक बूंद आंसु टपकी,
15:11और सरहद की मिट्टी में कहीं खो गई.
15:13वो कुछ कहे बिना उस बाढ़ के उस पार चली,
15:16गई.
15:17ना कोई नाम, ना कोई पहचान.
15:20बस खामूशी में लिप्टा हुआ एक आज़ाद वजूद.
15:23छे महीने बाद,
15:24हारीज को एक और चिठी मिली.
15:26इस बार भी पेशावर से.
15:28प्रिया हारीज,
15:29तुम्हारे दिये गए वकत ने मुझे बदल दिया.
15:32अब मैं पेशावर में एक छोटे से स्कूल में बच्चियों को पढ़ाती हूँ.
15:35नफरत से दूर,
15:37महबबत के साथ जीना सिखाती हूँ.
15:39शायद यही मेरा असली काम था,
15:41और शायद यही मेरा प्रायश्चित भी,
15:44तुम्हारी नहीं रही.
15:46लेकिन अब किसी की गुलाम भी नहीं.
15:48माहक हारीज,
15:50ने चिठी को चूमा और अपनी अधूरी किताब का आखिरी पन्ना भर दिया.
15:53उस किताब का नाम अब था,
15:55सरहत कचल,
15:56एक प्रेम, एक गलती और एक औरत की वापसी.
15:59दोस्तों,
16:00ये कहानी थी एक ऐसे अफसर की,
16:03जो फर्ज और महबबत के बीच लड़ा.
16:06जिंदगी में हम बहुत से लोग देखते हैं,
16:08कुछ ऐसे, जो पहले जूट लगते हैं,
16:11मगर वकक्त के साथ उनकी सच्चाई सामने आने लगती है,
16:15हर इंसान गलती करता है.
16:17मगर जो अपनी गलती को मान ले,
16:18उसे समझा जाए, उसे सुना जाए,
16:20तो शायद वो दोबारा सही रास्ते पर चल सकता है.
16:23हमें हर बात को सिर्फ सामने वाले के लहजे से नहीं उसके हालात से भी देखना चाहिए
16:28हर खामोशी के पीछे कोई डर भी हो सकता है
16:31और कभी-कभी कोई सच्ची पचतावा भी
16:33माफी देना हमेशा दूसरे को नहीं
16:36खुद को भी सुकून देने जैसा होता
16:38है माहक की कहानी हमें यहीं सिखाती है
16:40कि अगर एक औरत जो गलती से आई जूट लेकर आई
16:44वो भी बदल सकती है
16:46तो शायद हम सब के अंदर भी कहीं एक नया इंसान चुपा हुआ है
16:49हमें जरूरत है समझने की
16:52जोर से बोलने की नहीं
16:54दिल से सोचने की
16:55नफरत में बह जाने की नहीं
16:58याद रखिए
16:59हर बार लड़ाई बंदूक से नहीं
17:01कभी कभी एक खामोश महबबत
17:03भी बहुत कुछ बदल देती है
17:05और अब
17:06सबसे अहम बात
17:08यह सिर्फ एक कहानी है
17:09इसे हकीकत से जोडने की कोई
17:12जरूरत नहीं
17:13ना इसे दिल पर लें
17:14ना टाइसे किसी मुल्क या मजहब से जोड़ें
17:16कहानिया होती हैं सोचने के लिए समझने
17:19के लिए
17:20ना कि बहस करने या फैसले सुनाने के लिए
17:22इसलिए हर कहानी को कहानी की तरह सुनिए
17:25क्योंकि कुछ
17:27फर्जी अफसाने भी हमें असल जिन्दगी का आइना दिखा देते हैं
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