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Transcript
00:00हमारी संस्क्रिति, हमारे संसकार सदा रहें हमारे समझ
00:08भारत के महान ग्रंथों और कावियों का संपोर्ण संकलन
00:12सब्सक्राइब करें तिलग
00:31सिताराम चरित अतिपावन
00:38बधुर सरस अरुपति मनभावन
00:45सिताराम चरित अतिपावन
00:51बधुर सरस अरुपति मनभावन
00:57बधुर सरस अरुपति मनभावन
01:03बधुर सरस अरुपति मनभावन
01:07पुने पुने के तुने हो सुने सुनाए
01:15ये की प्यास उजट न बुचाए
01:24पुने की प्यास उज़ट न बुचाए
01:32ये की प्यास उज़ट न बुचाए
01:46जुग जुग जीओ
01:47सदा सुखी रहो
01:49दोनों बड़े प्रसंध हो
01:51बात क्या है?
01:52तात, मिथिला के महराज जनक जी के एक दूत..
01:55..आपके लिए शुब संदेश लेकर पढ़ा रहे हैं.
01:58महराज जनक का संदेश?
02:00हाँ, भईया राम का संदेश.
02:04मेरी राम का संदेशा, वो कुशल से तो है न?
02:07कुशल तो है ही माता, साथ ही..
02:10साथ ही, उन्होंने अपना रण कौशल भी ऐसा लिखाया है.
02:13कि आरेवर्थ के बड़े बड़े बलवान राजा..
02:15..वीर राजकुमार हार गए.
02:17तभी अपने भईया आगे बढ़े.
02:19पत रोगन, सारी बात एक साथ ही कह देगा.
02:22भाईया, बात रोगने से मेरे पेट में पीड़ा होने लगती.
02:26अरे बड़ी मा को तो आ जाने दे.
02:28उन्हें संदेशा भीजा है, आती ही होंगी.
02:33क्या बात है? राम का क्या संदेशा है?
02:36ऐसा संदेश है बड़ी मा, आप आनंद विबोर हो जाएंगी.
02:39पहले आप अपना धीरश तो संभालिये.
02:42अच्छा बाबा, धीरश तो रख लिये.
02:46अब बता मेरे लाल, बात क्या है?
02:49दो संदेश है, एक रिशी विश्वामितर जी का,
02:52दूसरा माराज जनक का.
02:54तो पहले कौन सा सुनाएगा रिपुदमन?
02:57क्यों तरसा रहे हो?
02:59लाओ, ये दोनों पत्रिका हैं, हम सुम्म पढ़ लेंगे.
03:03आप पढ़ेंगी?
03:06खुशी के आशू तो पहले ही उमड रहे हैं.
03:08इन आशूसे पत्रिका पढ़ने से पहले ही दुल जाएगी.
03:11फिर पढ़ने के लिए कुछ भी नहीं रहेगा.
03:27उन्होंने राक्षसी ताड़का को मार दिया.
03:33फिर मुनी उन्हें मिथिलापुरी ले गए.
03:38उसकी शर्ट थी, जो उनके याँ रखे होई शिव धनुश को उठाकर...
03:46सब राजा, राजकुमार, शक्ती लगा लगा कर हार गये.
03:56जो हमारे लक्षमन भाईया से सहन नहीं हुआ.
04:00और लक्षमन ने क्रोध में आकर भरी सभा में महाराज जनक को ललका रहा.
04:05फिर...
04:07फिर... फिर क्या था?
04:09मुनी वर विश्वामितर जी के आदेश पर राम भाईया उठे.
04:13और उन्होंने...
04:14और उन्होंने...
04:29अरे आगे तो कहो, क्या हुआ?
04:33फिर... फिर कुछ हुआ नहीं मातेश्वरी, होने वाला है.
04:39क्या?
04:45विवा...
04:49मेरे राम का विवा...
04:53दीदी...
04:55दीदी, मुझे समभालिये.
04:57बारे प्रसनिता के...
05:00मेरे यर्दें की दर्गन रुखने है.
05:03खैके, आपने को समभालो.
05:07अब सास वनने का समय आ गया है.
05:10सास?
05:11हाँ.
05:13दीदी...
05:17सास...
05:19सुनके ही कैसा लग रहा है?
05:24हम सास वननेगी.
05:27हमारी पहुँ आयेगी.
05:30हम...
05:32हम अपना सब कुछ उसे सौप कर...
05:35मिश्चित हो जाएगी.
05:38और फिर...
05:40और फिर...
05:42हमें...
05:43एक पर...
05:45एक पर फिर से नन्ने मुन्नों की किलकारी गुजेगी.
05:49हम...
05:50हम दादे बन जाएगी, दीदी.
05:53हम दादे बन जाएगी.
05:54हम दादे बन जाएगी.
05:59हम भी तो दादा बन जाएगी.
06:02दादा जी तो हम बन ही जाएगी.
06:04किन तो फिर हमें आपकी तरफ ध्यान देने का...
06:07अवकाश ही कहां मिलेगा.
06:09क्यों दीदी?
06:13भाईया, फिर हम भी तो कुछ बन जाएगी.
06:15हाँ, काका, तु...
06:17तु छोटा, मैं बड़ा.
06:20अरे, आप सब अपने ही सप्रुमे खोय जा रहे हैं.
06:24इतना शिष्टाचार भी फूलके...
06:26महाराज जनक की राजदूस से भी तु मिलना चाहिए.
06:29सचमुच हमें इसका ध्यानी नहीं रहा.
06:31भरत, उन महान भाव को सबाग्रह में लियाओ.
06:36गुरुदेव वशिष्ट के साथ हम उनसे वही मिलेंगे.
06:40जो आ गया था.
07:00मैं मिथला के महाराज जनक का दूद देवरत...
07:03अयोध्या के महाराज दशरत...
07:05अब पूझवर महरशी वशिष्ट के चर्णों में साधर प्रणाम करता हूँ.
07:09अयोध्या में आपका स्वागत है, शिरिमान देवरत.
07:12सनिवाद.
07:14मैं महाराज की सेवा में मिथला से सुप संदेश लेकर आया हूँ.
07:18आपका संदेश कुमार भरत ने हमें सुना दिया है.
07:22अब आगे के लिए क्या आदेश है, प्रभु?
07:25मेरे महाराज ने पूझवर विश्वा मित्र के आदेश से..
07:28..आपकी सेवा में निवेदम किया है..
07:30..कि आप अपने उपाध्याय कुल प्रोहित..
07:33..बंदु बांधों के साथ बारात लेकर..
07:36..मितलापुरी में पधारने की क्रिपा करें.
07:39इस संबंध में गुरुदेव अपना निर्ने प्रधान करें.
07:44उसी के अनुसार कारे किया जाए.
07:47आर्य देववरत, आयोध्यापती के और से..
07:52..महराज जनक की सेवा में निवेदन करिये..
07:55..कि हमें आपका निमंतरन स्वीकार करें.
07:59हम शीगरही शुब मूर्त में बारात लेकर..
08:02..जनकपुरी पहुँचेंगे.
08:04और हमारी और से, मितला नरे से कहिये..
08:08मितला और आयोध्या का यह सम्मन बढ़ा ही शुब है.
08:12इस सम्मन के द्वारा आर्यावरत की दो महान..
08:16..शक्तियों का मिलन होगा.
08:18पूछिवर महमुने, मैं अपने महराज जनक की ओर से..
08:22..इस आशिर्वात के लिए आपका धन्यवात करता हूँ.
08:27महराज, मुझे जनकपुरी जाने की आज्या प्रदान करें..
08:31..जिससे मैं आपके आने का शुब समाचार..
08:34..अपने महराज तक शीकर पहुंचा सकु.
08:38आपको हमारी ओर से अनुमती है आर्यावरत.
08:42वहाँ जाकर हमारे दोनों बालकों को..
08:46..हमारा स्नेह, संदेश, हमारी शुब आशीश देना.
08:51मेरे राम से कहना, तुम्हारे बिना..
08:55..तुम्हारे पिता उसी प्रकार जी रहे हैं..
09:00..जैसे स्वाती की प्रतीक्षा में चा तक जीता है.
09:04शरी राम और लक्षमन को बालक कहना..
09:07आपका अधिकार है, महाराज.
09:10परन्तु सारे संसार के लिए..
09:12..वे दोनों प्राकरम और वीर्ता का अवतार हैं.
09:15ऐसे दिव्य और यश्यस्य पुत्रों का पिता होने का सौभाग..
09:19..तो देवताओं के लिए भी धुरलब है.
09:22आप जैसे भागिसाली के दर्शनों से मैं धन्य हो गया.
09:28बहुत सुन्दर वार्ता लाप कर लेते हो, देवरत.
09:31तुम हमारे पुत्रों का शुब समाचार लाए हो.
09:34इसलिए हमारी ओर से भेट स्विकार करो.
09:53आप जैसे कीरतिवान महराज का उपार पाना..
09:56..मेरे जीवन का परम सौभाग्य है.
09:59परन्तु महराज, यह हमारी बेटी की संसुराल है.
10:04यहाँ से कुछ लेना नेति और परंपरा के विरुद है.
10:08महराज, मुझे शमा करने की क्रिपा करें.
10:11महराज, यह हमारी बेटी की संसुराल है.
10:14यहाँ से कुछ लेना नेति और परंपरा के विरुद है.
10:18महराज, मुझे शमा करने की क्रिपा करें.
10:24धन्य हो, धन्य हो.
10:28महत्मा जनक के राज दूत में ही ऐसे संस्कार हो सकते हैं.
10:33राजन, आर्यदेव वरत की प्रतिक्रिया ऊचित है.
10:40महराज, हमें आज्या दें.
10:50अब गुरुदेव आज्या दें.
10:53उसी प्रकार कारेकरम निर्धारित किया जाए.
10:56राजन, सुन्दर संजोग बन रहा है.
11:03राम की बराद प्रस्थान के लिए,
11:06परसों सूर्य उदए की तीन घड़ी बाद,
11:10मत्यान प्रारंब होते ही, शुबमूर्ध बनता है.
11:15गवरी गनेश मना कर प्रस्थान हो.
11:20कुमार भरत, वच्रि पुदमन, गुरुदेव वशिष्ट जी,
11:26और हमारी ओर से श्रद्धे शरी वाम देव जावाली,
11:30शुरी कश्यब जी, आदि महात्माओं को सविनै निमंतरन दो.
11:34समस्त मंत्री गण, सममंत गण और सारे नगर में,
11:38निवते का शुरी फल फिरवा कर, सब को हमारा निवेदन सुना दो.
11:42नगर भर को राम की बारात में चलने का निमंतरन दे दो.
11:46और सेना पती से चातुरुंगनी सेना तैयार करने को कह दिया जाए.
11:51जो आग्या ताक.
11:53समय कम है, तैयारी बहुत करनी है.
11:56तुरंद तत्परता पुर्वग कारिय करना होगा कुमार भरत.
11:59आप निष्चिन्ट रहें गुरुदेव.
12:30आरे सुमन्त.
12:31महाराणी जी.
12:32राम की मंगल कामना के लिए मैंने अनुष्टान किया है.
12:37दान की ही तमाम वस्तुही, इसके अतिरिक्त ब्रामहनों को सरस्र गउं,
12:42भंडार गळे से अन्न वस्त्र प्रजाजन में बटवा दीजी.
12:46जो आग्या महाराणी जी.
12:47महाराणी जी.
12:48इस आउसर पर महाराज ने भी राजकोष के द्वार कर खुल वाती है.
12:53उन्हें ऐसा ही करना चाहिए.
12:55आरे सुमन्त.
12:57राम की बाराज जाने से पहले,
13:00ब्रामहनों और याचेकों को इतना दान दीजी,
13:02कि उन्हें कुछ माँगने की आवशकता न रह जाए.
13:06जिस राजा के राज में, प्रजा का एक भी प्राणी दुखी रह जाए,
13:11उन्हें अपना कोई उत्सों मनाने का अधिकार नहीं होता.
13:14हमारे महाराज तो सदाही प्रदावत सल रहे है, महाराणी जी.
13:17आरे सुमन्द, मिठिला पहुँचकर सबसे पहले सिता की माता से हमारा अढ़धिक अविनंदन कहिएगा.
13:25उनसे कहिएगा, राम को पुतर के समान ही समझे,
13:30और सिता के और से लेश मातर भी चिंता न करे.
13:34सिता आयो द्यामी, बहु बनकर नहीं, बेटी बनकर आएगी.
13:42कौशल्या की मम्ता के आचल में संधान की समानी स्थान पाएगी.
13:49जाओ सुमन्द, जाओ.
14:03जाओ सुमन्द, जाओ.
14:07जाओ सुमन्द, जाओ.
14:11जाओ सुमन्द, जाओ.
14:15जाओ सुमन्द, जाओ.
14:19जाओ सुमन्द, जाओ.
14:23अवध मरिश, मिथिला आपका स्वागत करती है.
14:27मेरे बड़े भाग्य हैं..
14:29..कि आपकी चरनरज से मिथिला पावन हो गई.
14:34मिथिलेश्वर, आपकी आज्या हुई..
14:38..और हम आपके प्रेम की डोर में बंधे चले आए.
14:42इतनी प्रतिष्ठा, इतना सवभाग्य प्राप्त होगा मुझे..
14:47..ये तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था.
14:50रखो कुल के साथ सम्मन्द होने से..
14:53..मेरे वंश की प्रतिष्ठा भी बढ़ गई.
14:56कैसी बात करते हैं, विदेहराज?
14:57वही शुब समय आने पर इन कड़ियों को जोड़ देता है.
15:02उनी परमेश्वर की इच्छा से..
15:05..आज आयोध्या और मिठिला..
15:09..दोनों बराबर के साथ प्रतिष्ठा भी बढ़ गई.
15:13विदेहराज, वही शुब समय आने पर इन कड़ियों को जोड़ देता है.
15:17आज आयोध्या और मिठिला..
15:21..दोनों बराबर के साथ प्रतिष्ठा भी बढ़ गई.
15:25नहीं महरसी, बराबरी के नहीं.
15:30मैं तो कन्या का पिता हूँ, आपका दास हूँ.
15:36मेरी और आपकी बराबरी कैसे?
15:39आपने ठीक कहा महराज जनक.
15:41हमारी आपकी बराबरी कैसे हो सकती है?
15:45आज आप दाता है.
15:48और मैं एक याचक, एक भीखारी..
15:52..जो आपके द्वार पर आपकी कन्या का दान माँगने आया है.
15:58देने वाला दाता तो सदा ही महान होता है.
16:03शास्त्र भी कहता है..
16:05प्रति ग्रहो दात्रवश.
16:09लेने वाला दाता के आधिन होता है.
16:13इसलिए आप जो आज्या करेंगे..
16:17..वो हमें शिरोधारी होगी.
16:20आप कितने उदान है महराज टस्रत.
16:24अपने स्ने के बंधन में..
16:27..आपने विदेह को भी बांध लिया.
16:29आपके साथ देवता तुल्लि वशिष्ठ..
16:37..वाम देव जी..
16:40..ऐसी महान विभुतियों के स्वागत के अभिमान से..
16:44..मेरा मस्तक भी उचा हो गया.
16:46विदेही राज, मेरा विचार है कि..
16:51..महराज टस्रत, महरस्य वशिष्ठ..
16:54..और बारात में आये हुए अठितियों को..
16:58..यात्रा की ठकान मिठाने के लिए विश्राम कर लेंगे.
17:03प्रातह शुबु मोहरत में आप दोनों संबंदी..
17:07..गुरु जन के साथ बैठ कर..
17:10..शरी राम और राजकुमारी सिता के विवा की चर्चा करें..
17:14..तो उचीद होगा.
17:22भाईया! भाईया! पिताजी आ रहे हैं.
17:25भरत भाईया और शत्रुघन भी आ रहे हैं.
17:27महराज जनक उन्हें जनवासे में ले गए.
17:29पिताजी के दर्शिन करने चलें.
17:30पिताजी के दर्शिन करने चलें.
17:32नहीं लक्षमन.
17:34हम इस समय गुरु विश्वा मित्र की आज्या के अधिन हैं.
17:38उनकी आज्या के बिना नहीं जा सकते.
17:41जब वो स्वायम कहेंगे तब जाएंगे.
17:45धन्य हो राम!
17:47तुम्हारे सैयम और शिष्टाचार आदर्श है.
17:51हम स्वायम तुम्हें महराज दश्रत के पास ले जाने ही आये हैं.
17:55आओ चले.
18:17उठे हरशि सुख सिंधु महु चले धाँसी लेत.
18:31बार बार पदरज भरी सीसा.
18:56बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार बार �
19:26कुना सम दो
19:31सहा दुख वेते
19:35दिख अरेड
19:43के ज़हून ढय ओ
19:56सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब सब स�
20:27राम!
20:29जी!
20:32राम कभी आयोध्या यादाती थी?
20:37जी!
20:39छोटे भाई!
20:42माताएं तो अवश्य यादाती हुँगी!
20:46तात!
20:48सब यादाते थे!
20:51जी!
20:53जी!
20:54सब यादाते थे!
20:56परन्त जिस कारे के लिए आपने हमें भेजा था
21:00उसमें ज़रासी भी तुरुटी ना रह जाए!
21:03उसके परती सजग रहने में
21:05सदा इस बात का अभास रहता था!
21:09जैसे आप हमारे साथ हैं!
21:12और हमारा मार्ग दर्शन कर रहे हैं!
21:15इतनी कम आयो में तुमने जो आदर्श,
21:20जो सत्कर्म संचित कर लिये हैं
21:23वो हम प्रध्धावस्ता तक नहीं कर सके!
21:29यह आप क्या कह रहे हैं पिताश्री!
21:32मेरे पेरिणास्त्रोत तो आप ही है!
21:34आप ही है!
21:37आप ही के पत्चिन्नों पर चलकर कुछ करने की क्षमता पाई है मैंने!
21:43आप ने तो देवलोक तक जाकर अपनी कीरती पताका अस्थापित की है!
21:48वो जो कुछ किया है, एक राजा ने अपनी कीरती की आकांक्शा,
21:53अपना प्रभाव, अपनी सत्ता का दबदबा जमाई रखने के लिए किया हैं।
21:58किन्तु तुमने जो कुछ किया है, पिता की आज्या, गुरुजणों की सेवा, प्रजा पालन,
22:08रिश्यों, मुनिजणों, तपस्यों की सुरक्षा के लिए किया है।
22:14इसी में तुम्हारी महानता है। तुम जैसे आदर्श पुत्र को पाकर न किवल तुम्हारे माता, पिता, वर्णपूरे रखवंशी पित्रों का मस्तक गर्व से उंचा हो गया है।
22:34अपनी प्रशंसा सुनकर सकुछा रहे हो राम।
22:39हर पिता स्टेहवश अपनी पुत्र को ही बढ़ाय देता है। वही आप कर रहे हैं। अनिथा मैंने तो बस वही किया जो आपका निर्देश था।
22:52हर पुत्र का धर्म है पिता अपने मुझ से ना भी कहें। फिर भी यदि पिता के मन में कोई इच्छा हो तो उसे प्रांच दे कर भी पूरा करें। इसी कर्तव की पेरणा से ही मैंने ये सारे कारे की हैं।
23:12सारे आर्यवर्त के शूर्वीर पूरे बाहुबल की शक्ती लगा कर जिस शिवधनुष को हिला नहीं सके उसके भंजन में किसकी प्रेर्णा थी राम।
23:28जाओ विश्राम करो जब तक हम प्रशंसा करते जाएंगे तुम संकोच से नमते जाओगे जाओ वत्स।
23:58सारे आर्यवर्त के शूर्वीर पूरे बाहुबल की शक्ती लगा कर जिस शिवधनुष के शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा कर जिस शक्ती लगा
24:28पुछवाटिका से आने के बाद जो राम भाईया की विध्रशा मैंने देखी
24:33क्या देखी
24:34रात भर चान को देखका थंदी सांसें लेते रहे
24:38अच्छा
24:39हाँ
24:40जब भाईया को मैंने इतना विचलित देखा तो पूछा तो कहने लगे
24:46लक्षमन जैसे किसी ने मेरे मन के शान सरोबर में कंकरी फेक दी हो
24:52चा
24:53जिसमें प्रेम की लहरें हिलोरें ले रही है
24:57हर लहर में सीता की छली
25:00चान को देखता हूं तो सीता
25:16राम भाईया
25:17मैं भरत भाईया को बता रहा था
25:19कि भाभी की पहले दर्शन कैसे हुए
25:24भाईया
25:25गुरु आश्रम में प्रेम शास्त्र तो नहीं पढ़ा जाता
25:28फिर आपने ये प्रेम की शिक्ष कहां से पाई
25:32उसी प्रकर्ति से शत्रुगन
25:34जिसने मा को बालक से
25:36भाई को भाई से
25:38और सागर की लहरों को
25:40चंद्रमा से प्रेम करना सिखाया
25:43संसार में
25:45पिता पुत्र या भाई का नाता
25:48जैसे मनुष्य के बनाने से नहीं बनता
25:51वो पहले से ही निर्धारित होता है
25:53उसी प्रकार
25:55जीवन में
25:56किसे तुम्हारी पत्नी बनना है
25:58और कब
26:00कहां उससे भेट होनी है
26:02ये भी विधाता
26:04पहले से ही निष्चित कर देते है
26:06इसलिए
26:07मनुष्य को चाहिए
26:09कि जब उससे भेट हो
26:11तो अपना संपूर्ण विश्वास
26:13संपूर्ण प्रेम उससे सोंप दे
26:15पुझ्य महरश्य वशिष्ठ
26:19प्रमर्शी विश्वा मित्र
26:23महराज अदर्श्रत
26:25इस सबां में
26:27हम आपका स्वागत करते हैं
26:30अब हमारे कोई गामशिर wieder
26:34आवशयार 你ंजवय
26:38वीठ शुक्ती है
26:41कि वाक टॉंगरा आतemed
26:43अब हमारे कुल गुरु मान्यवर शतानन्जी इस सभा में उपस्तित गुरुजनों के सम्मुख विवा का प्रस्ताव रखें.
26:55महराज जनक की पतिग्या की अनुसार शिव धनुष के भंग होते ही..
27:01अपनी पुत्री सीता का विदी पुर्वक और धर्म पुर्वक कन्यादान करना चाहते हैं.
27:30इसके लिए महराज जनक आपकी आग्या चाहते हैं.
27:37यही बात आपके पुत्र सी राम ने भी कही है कि पिता की आग्या मिलने पर ही सीता का पानी ग्रहन करुँगा.
27:49अब आप उसके लिए आग्या प्रदान करें तो लग्नपर्तरी का शोधी जाए.
27:57पूज्ञेवर शतानन्जी, आपके वचनों से हम करतार्थ हुए.
28:03जो प्रस्ताव आपने प्रस्तुत किया है वो हमारे लिए गवरोग की बात है.
28:09इस सीष्ठा के लिए हम महराज जनक का भी अभिनंदन करते हैं.
28:15हमें अपने पुतर राम पर भी बहुत गर्व है.
28:19परन्तु महराज जनक जानते ही होंगे कि इक्ष्वा कुल के देवता ये महर शिवशिष्ठ है.
28:27हम गुरुदेव से प्रार्थना करते हैं, हमारा मार्ग दर्शन करें.
28:33महराज जनक विवा व्यक्तिगत कार्य नहीं है.
28:37ये एक सामाजिक संस्कार है.
28:40केवल एक स्तिरी और एक पुरुष के गथबंदन को ही विवाह नहीं कह सकते हैं.
28:47क्योंकि उन दोनों व्यक्तियों के साथ उनका समाज, उनका कुल, उनका धर्म चुड़ा होता है.
28:56विवाह का अर्थ है दो कुलों का, उनके आचार विचार का, उनकी संस्कृती का संगम.
29:03इसलिए आप से आपकी पुत्री का हाथ माँगने से पहले हमारे लिए आवश्चक हैं कि अपने महराज दशरत की कुल परमपरा का परिचे दे.
29:17और आपको विश्वास दिलाएं कि राजकुमार राम आपकी पुत्री के सर्वता योग्य हैं.
29:24महराज दिलिप के सुपुत्र भगिरत ने देवलोक से गंगा को पुरुथ्वी पर लाकर इस आर्य भूमी पर जो उपकार किया है वो युग युगांतर तक उन्हें अमर बनाए रखेगा.
29:44फिर इस कुल में रगु होए, जिनके नाम से ये रगु कुल कहलाता है. फिर भक्त शिरोमणी अमरीश और उनके प्रपवत्र महराज अज़ होए. महराज अज़ के सुपुत्र महराज दशरत होए.
30:02ऐसे यशश्वी कुल में उत्पन आर्यपमार राम और लक्षमन के लिए मैं आपकी दोनों पुत्रियों सीता और उर्मिला को वरन करता हूँ.
30:15मुनिवर, आपके उदार वचनों से मैं धन्य हो गया.
30:22मैं बड़ी विनम्रता के साथ..
30:27..अपनी सीता को श्रीराम के लिए..
30:32..और अपनी छोटी पुत्रि उर्मिला को आर्यपमार श्रीर लक्षमन के लिए..
30:40..रगु कुल की कुल वधुनों के रूप में समर्पित करता हूँ.
30:43महाराज डशरत, विदेह राज जनक..
30:47..इस आनंद मंगल मै प्रकरण का पूर्ण पटाकशेप अभी नहीं हुआ.
30:52यदि महरशी वशेष्ट सम्मती दें..
30:55..तो हम भी अपने मन के उदगार प्रगट करें.
30:59आज्या दे ब्रह्मरशी.
31:01राम और लक्षमन परने सूत्र में बंध कर अयुध्या जाएं..
31:05..और भरत, रिपुदमन कुमारे रह जाएं.
31:09यह तो उचीत नहीं.
31:11महाराज जनक के छोटे भराता, संकाशा नरेश..
31:15..कुषद्धज की दो कन्याय हैं.
31:17मांडवी, शुरुत कीरती.
31:19हम इन दोनों सु कन्यायों का कुमार भरत..
31:23..और शत्रुघन के लिए वरन का प्रस्ताओ रखते हैं.
31:28इस प्रस्ताओ का अनुमोधन मैं किन शब्दों में करूँ?
31:33मोनी राज, आपके इस प्रस्ताओ से..
31:37..सारा निमिवंश धन्य हो गया.
31:39कुषद्वज, अपनी पुत्री मांडवी का..
31:44..कुमार भरत के लिए..
31:46..और अपनी छोटी पुत्री शुरुत कीरती का..
31:50..कुमार शत्रुघन के लिए कन्यादान अवश्य करेंगे.
31:54फिर इस शुब्कारिय में विलंब क्यों?
31:55दो दिन बाद उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है.
32:00उस दिन चारो विवा संपन्द करने के लिए..
32:05..अती उत्तम लगना है.
32:08आयोध्धापती दशरत, आब आप चारो राजकुमार..
32:13..के लिए कन्यादान अवश्य करेंगे.
32:15जो आग्या गुरुदेव.
32:18सुनो, सुनो, सुनो.
32:20मानवी जी जी, उर्मिला, शुर्ति केर्ती..
32:24..अधिनारष्य आगते हैं.
32:26विवांद वाली, हमरे पासेव, तो बनके जानते हैं.
32:31विवांद को सबकारिय बनाओं.
32:33पशचात विवाह का शुब कारिया आरंब कीजी।
32:37जो हाँग्या गुरुदेव।
32:40सुनो, सुनो, सुनो.
32:41मानवी जी जी, उर्मिला, शुरृति कीर्ती.
32:45सुनो, सुनो.
32:46अरे तुम भी सब सुनो.
32:48सुना नाज, क्या सुना रहे हैं?
32:50ऐसे क्या ख़बर लाई हो, सुनन्दा?
32:52सब कुशल और मंगल हैं यहाँ पर.
32:54और आगे समाचार यही है
32:56कि जनकपुरी और संकास्य नगरी
32:59एक ही दिन और एक ही सासाथ सुनी सुनी हो जाएंगी.
33:02राम चंद्र जी ने एक धनुश भंग किया
33:05और सीता जी को वर लिया.
33:06किन्टु अग तो..
33:08मांडवी भरतलाल की जै!
33:12उर्मिला लखनलाल की जै!
33:16चुति कीर्ति शत्रुगन कुमार की जै!
33:21क्या?
33:22तुम समझे नहीं जी जी.
33:24महराज दश्रत और महराज जनक ने मिलकर
33:27चारो भाईयों का तुम चारो बहनों के साथ
33:30एक ही दिन, एक ही साथ विभा करने का निष्चे कर लिया है.
33:33हाँ, हाँ, विभा करने का निष्चे कर लिया है.
33:57सीता राम चरीत अति बावन
34:04मधुर सरस अरुपती मन भावन
34:18पुनी पुनी के दिने हो सुने सुने
34:23पुनी के दिने हो सुने सुनाए
34:30यगी ब्यास भुझत न भुझाए

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